स्वामीनारायण सम्प्रदाय सहजानंद स्वामी (1781–1830) से चली वैष्णव परंपरा है, जिन्हें अनुयायी स्वामीनारायण कहते हैं। अयोध्या के पास छपैया में जन्मे सहजानंद ने 1800 में गुजरात में रामानंद स्वामी से दीक्षा ली और उनके बाद समुदाय का नेतृत्व किया। इसके मुख्य ग्रंथ शिक्षापत्री (1826) और वचनामृत हैं, और एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन इसके दर्शन की नींव रामानुज के विशिष्टाद्वैत को बताता है। सहजानंद ने स्वयं सम्प्रदाय को अहमदाबाद और वडताल की दो गादियों (क्षेत्रों) में बाँटा; बाद में बीएपीएस जैसी अलग संस्थाएँ भी बनीं।
- संस्थापक
- सहजानंद स्वामी (स्वामीनारायण), 1781–1830; बचपन का नाम घनश्याम, यात्रा के समय नीलकंठ वर्णी
- दर्शन
- विशिष्टाद्वैत की नींव पर, अक्षर पर विशेष बल के साथ; बीएपीएस इसे “अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन” कहता है
- मुख्य ग्रंथ
- शिक्षापत्री (212 श्लोक, 1826); वचनामृत (गुजराती प्रवचन, 1819–1829); सत्संगिजीवन (शतानंद मुनि); देश-विभाग का लेख
- मुख्य केंद्र
- सहजानंद के बनवाए छह मंदिर: अहमदाबाद, भुज, वडताल, जूनागढ़, धोलेरा, गढडा; जन्मस्थान छपैया (उत्तर प्रदेश); बीएपीएस का बोचासण
- तिलक
- शिक्षापत्री के अनुसार गोपीचंदन या चंदन का खड़ा तिलक, बीच में कुमकुम का गोल चांदला; गले में तुलसी की दोहरी कंठी
स्वामीनारायण सम्प्रदाय क्या है
सहजानंद स्वामी के अनुयायी उन्हें “स्वामीनारायण” कहते हैं, और यही नाम उनका मंत्र भी है, जिसका जप सम्प्रदाय की साधना का मुख्य अंग है। रेमंड विलियम्स (A New Face of Hinduism, 1984) के अनुसार सहजानंद ने धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति पर आधारित भागवत धर्म का उपदेश दिया, संन्यासियों के लिए कड़े नियम बनाए, और गुजरात में नैतिक और सामाजिक सुधार के कार्य किए; ब्रिटिश अधिकारी भी इन सुधारों का समर्थन करते थे।
स्वामीनारायण और श्रीकृष्ण के संबंध पर अनुयायियों में एक से अधिक मत हैं। विलियम्स तीन मत गिनाते हैं: कुछ मानते हैं कि सहजानंद ने श्रीकृष्ण को ही परम उपास्य बताया; कुछ उन्हें श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं; और विलियम्स के अनुसार अधिकतर अनुयायी स्वामीनारायण को पुरुषोत्तम, यानी परमेश्वर, का पूर्ण प्रकट रूप मानते हैं। विलियम्स के अनुसार अहमदाबाद और वडताल की दीक्षा में आज भी सहजानंद का अपनाया कृष्ण-मंत्र (“श्रीकृष्ण, तुम मेरी शरण हो”) प्रयोग होता है।
संक्षिप्त इतिहास
सहजानंद का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी, संवत 1837, यानी 3 अप्रैल 1781 को अयोध्या के पास छपैया में एक सरयूपारी ब्राह्मण परिवार में हुआ; माता-पिता प्रेमवती और हरिप्रसाद पांडे थे, जिन्हें सम्प्रदाय भक्तिमाता और धर्मदेव कहता है। बचपन का नाम घनश्याम था। ग्यारह वर्ष की आयु में माता-पिता के देहांत के बाद उन्होंने घर छोड़ा और नीलकंठ नाम से लगभग सात वर्ष हिमालय से दक्षिण भारत तक तीर्थों की यात्रा की।
सौराष्ट्र में जूनागढ़ के पास लोज में उनकी भेंट रामानंद स्वामी के शिष्य मुक्तानंद स्वामी से हुई। रामानंद स्वामी गुजरात में रामानुज के दर्शन का प्रचार करते थे; विलियम्स के अनुसार परंपरा मानती है कि श्रीरंगम में रामानुज ने उन्हें स्वप्न में दीक्षा दी, और सत्संगिजीवन और वचनामृत में उन्हें कृष्ण के सखा उद्धव से जोड़ा गया है, इसलिए उनके अनुयायियों को उद्धव सम्प्रदाय भी कहते हैं। 1800 में रामानंद स्वामी ने नीलकंठ को वैष्णव संन्यास की दीक्षा देकर “सहजानंद स्वामी” नाम दिया, और लगभग दो वर्ष बाद जेतपुर में एक सार्वजनिक समारोह में उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया।
जीवन के अंतिम दस वर्षों में सहजानंद ने छह बड़े मंदिर बनवाए: अहमदाबाद (पहला, नरनारायण देव का), भुज, वडताल (लक्ष्मीनारायण देव का), जूनागढ़, धोलेरा और गढडा। 1826 में उन्होंने अपने दोनों भाइयों के एक-एक पुत्र को गोद लेकर आचार्य बनाया: अयोध्याप्रसाद को अहमदाबाद का और रघुवीर को वडताल का, और यह पद वंश-परंपरा से चलने का नियम बनाया। “लेख” नाम के दस्तावेज़ में उन्होंने दोनों गादियों के क्षेत्र बाँटे: कलकत्ता से द्वारका तक खींची एक रेखा के उत्तर का क्षेत्र अहमदाबाद के और दक्षिण का वडताल के अधीन। 1830 में गढडा में उनका देहांत हुआ।
विश्वास और साधना
दर्शन: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन के अनुसार सम्प्रदाय के दर्शन की नींव रामानुज का विशिष्टाद्वैत है; विलियम्स भी लिखते हैं कि यह रामानुज जैसा दर्शन मानता है, पर इसके आचार्य श्रीवैष्णव नहीं हैं। विलियम्स के अनुसार जहाँ रामानुज तीन नित्य तत्त्व मानते हैं (जीव, ईश्वर, माया), सहजानंद ने पाँच बताए: जीव, ईश्वर, माया, अक्षर (भगवान का धाम) और पुरुषोत्तम; इनमें केवल अक्षर और पुरुषोत्तम माया से परे हैं। ईश्वर निराकार नहीं, सदा दिव्य साकार रूप वाला माना जाता है।
आचार: शिक्षापत्री गृहस्थों और संन्यासियों, दोनों के लिए नियम देती है। इसके अनुसार अनुयायी सूर्योदय से पहले उठकर, स्नान के बाद, श्रीकृष्ण की मानसी पूजा करते हैं, और कृष्ण-भक्ति की दीक्षा लिए अनुयायी गले में तुलसी की दोहरी कंठी पहनते हैं और माथे, छाती और भुजाओं पर गोपीचंदन या चंदन का खड़ा तिलक लगाते हैं, जिसके बीच कुमकुम का गोल चांदला होता है; विवाहित स्त्रियाँ केवल कुमकुम का चांदला लगाती हैं। शिक्षापत्री प्रतिदिन पढ़ने या सुनने का आदेश भी इसी ग्रंथ में है। हर पक्ष की एकादशी पर संन्यासियों का व्रत अनिवार्य है, और गृहस्थ भी व्रत रखते हैं।
पर्व: विलियम्स के अनुसार अहमदाबाद-वडताल और बीएपीएस के उत्सव-पंचांग में कुछ अंतर है, पर अधिकतर पर्व दोनों मनाते हैं। वर्ष का आरंभ चैत्र शुक्ल नवमी पर स्वामीनारायण जयंती से होता है, जो रामनवमी भी है; फिर जन्माष्टमी, हिंडोला (झूले का उत्सव), दीवाली, और नए वर्ष पर अन्नकूट। वसंत पंचमी को शिक्षापत्री पूरी होने का दिन माना जाता है।
शाखाएँ
अहमदाबाद (नरनारायण देव गादी) और वडताल (लक्ष्मीनारायण देव गादी) सहजानंद की बनाई दो मूल गादियाँ हैं, जिनके आचार्य आज भी उनके परिवार की वंश-परंपरा से आते हैं; विलियम्स के अनुसार “लेख” में दी गई सीमाएँ बीसवीं सदी के आरंभ के एक मुकदमे में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी मानीं। विलियम्स इन्हें “पुराना पक्ष” कहते हैं।
बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) की स्थापना शास्त्रीजी महाराज (स्वामी यज्ञपुरुषदास, 1865–1951) ने की, जिन्होंने वडताल छोड़ा और बोचासण में पहला मंदिर बनाया, जहाँ 1907 में स्वामीनारायण और गुणातीतानंद स्वामी की मूर्तियाँ स्थापित हुईं। बीएपीएस के अनुसार सहजानंद ने गुणातीतानंद स्वामी (1785–1867) को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बनाया, जो “अक्षर” के प्रकट रूप थे, और स्वामीनारायण (पुरुषोत्तम) सदा अपने प्रमुख भक्त, यानी गुरु, के माध्यम से पृथ्वी पर प्रकट रहते हैं; इसे बीएपीएस “अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना” कहता है। बीएपीएस की गुरु-परंपरा: गुणातीतानंद स्वामी, भगतजी महाराज (प्रागजी भक्त), शास्त्रीजी महाराज, योगीजी महाराज, प्रमुख स्वामी महाराज, और उनके बाद महंत स्वामी महाराज। अहमदाबाद और वडताल इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते; विलियम्स इस मतभेद को सम्प्रदाय का सबसे बड़ा सैद्धांतिक और संस्थागत विभाजन बताते हैं।
दूसरी शाखाएँ भी हैं। विलियम्स के अनुसार अहमदाबाद के संत मुक्तजीवनदास ने 1940 के दशक में मणिनगर में “स्वामीनारायण गादी” स्थापित की, जो मानती है कि सहजानंद ने गोपालानंद स्वामी को उत्तराधिकारी बनाया था। इसके अलावा कई स्वतंत्र ट्रस्ट और संस्थाएँ भी स्वामीनारायण परंपरा में काम करती हैं।
प्रमुख केंद्र
अहमदाबाद का नरनारायण देव मंदिर और वडताल का लक्ष्मीनारायण देव मंदिर दोनों गादियों के मुख्यालय हैं। गढडा में सहजानंद लंबे समय तक दादा खाचर के घर में रहे, और वह घर वहाँ के बड़े मंदिर का हिस्सा है। भुज, जूनागढ़ और धोलेरा के मंदिर भी सहजानंद के बनवाए हुए हैं, और उत्तर प्रदेश में अयोध्या के पास छपैया उनका जन्मस्थान है। बीएपीएस के प्रमुख मंदिरों में बोचासण, सारंगपुर, गोंडल और अटलादरा (वडोदरा) गिने जाते हैं।
स्रोतों में अंतर
- नेतृत्व का वर्ष: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन (हन्ना एच. किम) लिखता है कि सहजानंद 1801 में सम्प्रदाय के प्रमुख बने; विलियम्स के अनुसार वे लगभग दो वर्ष (1800–1802) रामानंद के आश्रम में रहे, फिर जेतपुर में उत्तराधिकारी बने, और उनका सार्वजनिक कार्यकाल 1802 से 1830 तक गिनते हैं।
- जन्म-वर्ष: विलियम्स के अनुसार कुछ पुराने अंग्रेज़ी विवरण 1780 देते हैं; यह संवत को ईसवी में बदलने की भूल है। संवत 1837 चैत्र शुक्ल 9 का मेल 3 अप्रैल 1781 से है।
- वचनामृत की संख्या: विलियम्स के अनुसार वडताल गादी की प्रामाणिक प्रति में, जिसे बीएपीएस भी मानता है, 262 प्रवचन हैं; अहमदाबाद की प्रति (आचार्य अयोध्याप्रसाद द्वारा संपादित) में 11 और, यानी कुल 273।
- बीएपीएस का आरंभ: विलियम्स लिखते हैं कि शास्त्रीजी महाराज ने 1906 में वडताल छोड़ा; दूसरे स्रोत 1905 देते हैं। बोचासण में मूर्ति-प्रतिष्ठा 1907 में हुई (विलियम्स के अनुसार इसकी 75वीं वर्षगाँठ 18 मई 1982 को मनाई गई), और बीएपीएस इसी को अपनी स्थापना मानता है।
- अक्षर का स्थान: बीएपीएस की 1976 की शिक्षापत्री (स्वामी केशवजीवनदास का अनुवाद) की भूमिका में अक्षर को पुरुषोत्तम का शरीर और गुणातीतानंद स्वामी को अक्षर का प्रकट रूप बताया गया है, और इसके आधार में शिक्षापत्री के श्लोक 109–110 बताए गए हैं; अहमदाबाद और वडताल गुणातीतानंद स्वामी को अक्षर का प्रकट रूप और गुरु-परंपरा का आरंभ नहीं मानते (विलियम्स)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्वामीनारायण सम्प्रदाय क्या है?
सहजानंद स्वामी (1781–1830), जिन्हें अनुयायी स्वामीनारायण कहते हैं, से चली वैष्णव परंपरा, जो गुजरात से फैली। इसके मुख्य ग्रंथ शिक्षापत्री और वचनामृत हैं और इसके दर्शन की नींव विशिष्टाद्वैत है।
स्वामीनारायण (सहजानंद स्वामी) कौन थे?
सहजानंद स्वामी, जिनका जन्म 3 अप्रैल 1781 (चैत्र शुक्ल नवमी, रामनवमी) को अयोध्या के पास छपैया में हुआ। 1800 में रामानंद स्वामी से दीक्षा लेकर वे उनके उत्तराधिकारी बने, गुजरात में छह बड़े मंदिर बनवाए, और 1830 में गढडा में देह त्यागी। अधिकतर अनुयायी उन्हें पुरुषोत्तम, यानी परमेश्वर, का प्रकट रूप मानते हैं।
शिक्षापत्री क्या है?
सहजानंद स्वामी का लिखा 212 श्लोकों का संस्कृत ग्रंथ, जिसमें गृहस्थों, स्त्रियों, आचार्यों और संन्यासियों के लिए आचार के नियम हैं। इसके अंतिम श्लोकों के अनुसार यह वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5), संवत 1882, यानी 1826 को पूरा हुआ; विलियम्स के अनुसार सहजानंद ने इसे वडताल में लिखा।
अहमदाबाद और वडताल गादी क्या हैं?
सहजानंद ने 1826 में सम्प्रदाय को दो क्षेत्रों में बाँटा: अहमदाबाद (नरनारायण देव) और वडताल (लक्ष्मीनारायण देव), और अपने दो भतीजों, अयोध्याप्रसाद और रघुवीर, को इनका आचार्य बनाया। इनके आचार्य आज भी उसी परिवार से आते हैं।
बीएपीएस और अक्षर-पुरुषोत्तम क्या है?
बीएपीएस (बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था) शास्त्रीजी महाराज की स्थापित संस्था है, जिसका पहला मंदिर बोचासण में 1907 में प्रतिष्ठित हुआ। बीएपीएस के अनुसार स्वामीनारायण पुरुषोत्तम (परमेश्वर) हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षर, और भगवान अक्षर-स्वरूप गुरु की परंपरा के माध्यम से सदा प्रकट रहते हैं। अहमदाबाद और वडताल यह सिद्धांत नहीं मानते।
स्रोत
- एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन (दूसरा संस्करण): “Swaminarayan Movement” (हन्ना एच. किम, 2005)
- रेमंड बी. विलियम्स, A New Face of Hinduism: The Swaminarayan Religion (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1984)
- विकिपीडिया: “BAPS” (वर्तमान गुरु के लिए)
- शिक्षापत्री, संस्कृत मूल और अंग्रेज़ी अनुवाद, स्वामी केशवजीवनदास (भारतीय विद्या भवन, बॉम्बे, 1976; बीएपीएस के एच. टी. दवे की भूमिका सहित)
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