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अहोई माता की आरती: जय अहोई माता PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ahoi-mata-aarti/
“जय अहोई माता” अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्ण अष्टमी) पर गाई जाने वाली अहोई माता की लोक आरती है। माताएँ संतान की कुशलता के लिए दिन भर व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा और व्रत-कथा के बाद यह आरती गाती हैं। इसकी कई पंक्तियाँ लक्ष्मी जी की आरती “ॐ जय लक्ष्मी माता” से मिलती हैं। शब्द क्षेत्र के अनुसार थोड़े बदलते हैं।
यह एक लोक आरती है और इसके शब्द क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं। यहाँ सबसे अधिक छपा रूप दिया गया है। कुछ संस्करणों में पद 5 में ‘मन नहीं धड़काता’ की जगह ‘मन नहीं घबराता’, और पद 2 में ‘ब्रह्माणी’ की जगह ‘ब्राह्मणी’ मिलता है। इसकी कई पंक्तियाँ “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती जैसी हैं, जैसे ‘हर विष्णु विधाता’, ‘क्षीर निधि जाता’ और ‘रतन चतुर्दश’। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है; कई जगह टेक ‘ॐ जय अहोई माता, मैया जय अहोई माता’ के रूप में गाई जाती है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अहोई माता की आरती कब गाई जाती है?
अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्ण अष्टमी, करवा चौथ के चार दिन बाद) की शाम को, अहोई माता की पूजा और व्रत-कथा के बाद। इसके बाद माताएँ तारों को देखकर अर्घ्य देती हैं और व्रत खोलती हैं।
यह आरती लक्ष्मी जी की आरती जैसी क्यों लगती है?
इसकी कई पंक्तियाँ “ॐ जय लक्ष्मी माता” से लगभग ज्यों की त्यों मिलती हैं, जैसे ‘हर विष्णु विधाता’, ‘सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता’ और ‘रतन चतुर्दश’। दोनों की लय भी एक जैसी है।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
रचयिता ज्ञात नहीं है। यह लोक आरती है और इसके अंतिम पद में किसी कवि का नाम नहीं आता।
‘थारो’ और ‘तोकू’ का क्या अर्थ है?
ये लोक बोली के शब्द हैं: ‘थारो’ यानी तुम्हारा, ‘वाहि’ यानी उसी, और ‘तोकू’ यानी तुझको। आरती की भाषा में हिंदी के साथ ब्रज और राजस्थानी बोलियों का रंग है।
स्रोत
- परंपरागत लोक आरती (शब्द क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं)
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