अहोई माता की आरती: जय अहोई माता

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अहोई अष्टमी की पूजा: पानी भरा करवा, हलवा-पूरी की थाली, दीया और दीवार पर बना माता का चित्र, पास बैठे माँ और बच्चे
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय अहोई माता, जय अहोई माता। तुमको निसदिन ध्यावत, हर विष्णु विधाता॥

    हे अहोई माता, आपकी जय हो। शिव (हर), विष्णु और ब्रह्मा (विधाता) दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

  2. पद 2

    ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता। सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

    आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) हैं, आप ही जगत की माता हैं। सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपका गुणगान करते हैं।

  3. पद 3

    माता रूप निरंजन, सुख-सम्पत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, नित मंगल पाता॥

    हे माता, आपका रूप निर्मल (निरंजन) है और आप सुख-संपत्ति देने वाली हैं। जो कोई आपका ध्यान करता है, वह सदा मंगल पाता है।

  4. पद 4

    तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता। कर्म-प्रभाव प्रकाशक, जगनिधि से त्राता॥

    आप पाताल में भी बसती हैं और आप ही शुभ देने वाली हैं। आप कर्मों का प्रभाव प्रकट करती हैं और संसार रूपी सागर से बचाने वाली हैं।

  5. पद 5

    जिस घर थारो वासा, वाहि में गुण आता। कर न सके सोई कर ले, मन नहीं धड़काता॥

    जिस घर में आपका (थारो) वास होता है, उसी में सब गुण आ जाते हैं। वहाँ व्यक्ति वह भी कर लेता है जो पहले नहीं कर पाता था, और उसका मन भय से नहीं धड़कता।

  6. पद 6

    तुम बिन सुख न होवे, न कोई पुत्र पाता। खान-पान का वैभव, तुम बिन नहीं आता॥

    आपके बिना सुख नहीं होता और न कोई पुत्र (संतान) पाता है। खाने-पीने की समृद्धि भी आपके बिना नहीं आती। अहोई अष्टमी का व्रत संतान की कुशलता के लिए रखा जाता है।

  7. पद 7

    शुभ गुण सुंदर युक्ता, क्षीर निधि जाता। रतन चतुर्दश तोकू, कोई नहीं पाता॥

    आप शुभ और सुंदर गुणों से युक्त हैं और क्षीरसागर से प्रकट हुई हैं। चौदह रत्न आपके बिना (तोकू: तुझको, यानी आपको पाए बिना) कोई नहीं पाता। ये पंक्तियाँ लक्ष्मी जी की आरती से मिलती हैं, जहाँ ये समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों की बात करती हैं।

  8. पद 8

    श्री अहोई माँ की आरती, जो कोई गाता। उर उमंग अति उपजे, पाप उतर जाता॥

    आरती कहती है कि जो कोई श्री अहोई माँ की यह आरती गाता है, उसके हृदय में बहुत उमंग उठती है और उसके पाप दूर हो जाते हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ahoi-mata-aarti/

संक्षेप में

“जय अहोई माता” अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्ण अष्टमी) पर गाई जाने वाली अहोई माता की लोक आरती है। माताएँ संतान की कुशलता के लिए दिन भर व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा और व्रत-कथा के बाद यह आरती गाती हैं। इसकी कई पंक्तियाँ लक्ष्मी जी की आरती “ॐ जय लक्ष्मी माता” से मिलती हैं। शब्द क्षेत्र के अनुसार थोड़े बदलते हैं।

यह एक लोक आरती है और इसके शब्द क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं। यहाँ सबसे अधिक छपा रूप दिया गया है। कुछ संस्करणों में पद 5 में ‘मन नहीं धड़काता’ की जगह ‘मन नहीं घबराता’, और पद 2 में ‘ब्रह्माणी’ की जगह ‘ब्राह्मणी’ मिलता है। इसकी कई पंक्तियाँ “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती जैसी हैं, जैसे ‘हर विष्णु विधाता’, ‘क्षीर निधि जाता’ और ‘रतन चतुर्दश’। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है; कई जगह टेक ‘ॐ जय अहोई माता, मैया जय अहोई माता’ के रूप में गाई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अहोई माता की आरती कब गाई जाती है?

अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्ण अष्टमी, करवा चौथ के चार दिन बाद) की शाम को, अहोई माता की पूजा और व्रत-कथा के बाद। इसके बाद माताएँ तारों को देखकर अर्घ्य देती हैं और व्रत खोलती हैं।

यह आरती लक्ष्मी जी की आरती जैसी क्यों लगती है?

इसकी कई पंक्तियाँ “ॐ जय लक्ष्मी माता” से लगभग ज्यों की त्यों मिलती हैं, जैसे ‘हर विष्णु विधाता’, ‘सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता’ और ‘रतन चतुर्दश’। दोनों की लय भी एक जैसी है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता ज्ञात नहीं है। यह लोक आरती है और इसके अंतिम पद में किसी कवि का नाम नहीं आता।

‘थारो’ और ‘तोकू’ का क्या अर्थ है?

ये लोक बोली के शब्द हैं: ‘थारो’ यानी तुम्हारा, ‘वाहि’ यानी उसी, और ‘तोकू’ यानी तुझको। आरती की भाषा में हिंदी के साथ ब्रज और राजस्थानी बोलियों का रंग है।

स्रोत

  1. परंपरागत लोक आरती (शब्द क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं)

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, hindi.webdunia.com, bhaktibharat.com