परंपरा के अनुसार देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार महीने के शयन से जागते हैं। घरों में इस दिन जो व्रत-कथा सुनी जाती है, वह एक सेवक की लोक कथा है: एकादशी पर वह नदी किनारे भोजन बनाकर सच्चे मन से भगवान को बुलाता है, और भगवान स्वयं उसके साथ भोजन करने आते हैं। इन्हीं दिनों तुलसी विवाह भी होता है, इसलिए तुलसी और शालग्राम की कथा भी सुनाई जाती है।
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देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी है, जिसे प्रबोधिनी, हरिबोधिनी और देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से भगवान विष्णु के शयन के जो लगभग चार महीने चलते हैं, जिन्हें चातुर्मास कहते हैं, वे इस दिन पूरे होते हैं। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी में होता है; अपने शहर का समय देवउठनी एकादशी के पन्ने पर है।
गीता प्रेस की पुस्तक "एकादशी-व्रत का माहात्म्य", जिसकी कथाएँ पद्म पुराण के आधार पर दी गई हैं, में प्रबोधिनी एकादशी पर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को वह माहात्म्य सुनाते हैं जो ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाया था। उसमें इस व्रत, रात के जागरण, विष्णु-कथा सुनने और तुलसी से पूजा की महिमा है, पर कोई अलग कहानी नहीं है; Drik Panchang भी यही माहात्म्य देता है। घरों में जो कथाएँ सुनाई जाती हैं, वे लोक में प्रचलित हैं। नीचे पहले विष्णु के शयन की बात है जैसी गीता प्रेस की पुस्तक में है, फिर दो लोक कथाएँ, और अंत में तुलसी की कथा।
व्रत और कथा की विधि
- एकादशी की शाम शंख, घंटी और दीपक के साथ भगवान को जगाया जाता है ("देव जगाना"), और कई घरों में गन्नों (अक्सर तीन) का मंडप बनाया जाता है। यह लोक रीति है।
- गीता प्रेस के माहात्म्य में इस रात जागरण, भगवान के सामने गीत, वाद्य और विष्णु-कथा, और जागरण के समय जल, फल और दूसरी सामग्री से जनार्दन को अर्घ्य देने की बात है। पद्म पुराण (उत्तर खंड 124) में भी इस रात गीत, वाद्य, पुराण-पाठ और दीपकों का वर्णन है।
- कार्तिक में, और विशेषकर इस दिन, तुलसी दल से विष्णु की पूजा की बड़ी महिमा कही गई है (गीता प्रेस का माहात्म्य; पद्म पुराण, उत्तर खंड 105)।
- तुलसी का शालग्राम से विवाह हल्दी, कन्यादान और फेरों जैसी विवाह की रीतियों से कराया जाता है। दिन परिवार की परंपरा से तय होता है: एकादशी, द्वादशी, या एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक कोई दिन; Drik Panchang कुछ ग्रंथों के मत से कार्तिक शुक्ल नवमी भी बताता है।
- इसी दिन से कार्तिक पूर्णिमा तक पाँच दिन का भीष्म पंचक व्रत रखा जाता है (पद्म पुराण, उत्तर खंड 124)। परंपरा में इस दिन के बाद विवाह, मुंडन और गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य फिर शुरू होते हैं।
भगवान विष्णु का चार मास का शयन
गीता प्रेस, "एकादशी-व्रत का माहात्म्य" (पद्म पुराण पर आधारित), शयनी और प्रबोधिनी एकादशी के प्रसंग।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी, यानी शयनी एकादशी, की महिमा बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि उस दिन से उनका एक स्वरूप राजा बलि के यहाँ रहता है, और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर सोता है। यह शयन आने वाली कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है।
इसलिए इन महीनों को विशेष रूप से धर्म के आचरण का समय कहा गया है। उसी प्रसंग में चौमासे के नियम भी हैं: भगवान के सोने के इन दिनों में भूमि पर सोना; सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल छोड़ना; या इन महीनों में ब्रह्मचर्य रखना।
कार्तिक शुक्ल एकादशी को यह शयन पूरा होता है, इसीलिए इसे प्रबोधिनी, यानी जागरण वाली, एकादशी कहते हैं। गीता प्रेस के प्रबोधिनी-माहात्म्य में नारद जी इसे वह एकादशी कहते हैं जिस दिन भगवान गोविंद जागते हैं।
लोक में इस शयन के पीछे वामन अवतार की कथा भी सुनाई जाती है: तीन पग भूमि के दान के बाद भगवान राजा बलि के यहाँ रहने लगे; तब लक्ष्मी जी ने बलि को रक्षा-सूत्र बाँधकर भाई बनाया और भगवान को वापस माँगा, और तभी से भगवान हर वर्ष चार महीने बलि के पास रहते हैं। लक्ष्मी जी और रक्षा-सूत्र वाली बात गीता प्रेस की पुस्तक के इस प्रसंग में नहीं है।
भगवान के साथ भोजन करने वाला सेवक
लोक में प्रचलित कथा: वेबदुनिया, भक्ति भारत, इंडिया टीवी और न्यूज़24 में। पद्म पुराण पर आधारित गीता प्रेस की पुस्तक और Drik Panchang में यह कथा नहीं है।
एक धर्मात्मा राजा के राज्य में सब लोग एकादशी का व्रत रखते थे। उस दिन राज्य में किसी को अन्न नहीं दिया जाता था; भक्ति भारत के रूप में पशुओं को भी नहीं।
एक दिन दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास नौकरी माँगने आया। राजा ने कहा, "नौकरी मिल जाएगी, पर एक शर्त है: एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा, केवल फलाहार।" उस व्यक्ति ने शर्त मान ली।
एकादशी आई तो उसे फलाहार दिया गया, पर उससे उसकी भूख नहीं मिटी। वह राजा के सामने विनती करने लगा, "महाराज, फलों से मेरा पेट नहीं भरता; मुझे अन्न दीजिए।" उसकी विनती पर राजा ने उसे आटा, दाल और चावल दे दिए।
वह सामान लेकर नदी के किनारे गया, स्नान किया और भोजन बनाया। फिर उसने भगवान को पुकारा, "आइए भगवान, भोजन तैयार है।" पुकार सुनकर पीले वस्त्र पहने चतुर्भुज भगवान वहाँ आ गए। दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया, और फिर भगवान अंतर्धान हो गए। वह व्यक्ति अपने काम पर लौट आया।
अगली एकादशी आई तो उसने राजा से दोगुना सामान माँगा। राजा ने कारण पूछा तो वह बोला, "महाराज, मेरे साथ भगवान भी भोजन करते हैं।" राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, और उसने स्वयं जाकर देखने का निश्चय किया।
राजा चुपके से एक पेड़ के पीछे छिप गया। उस व्यक्ति ने पहले की तरह स्नान करके भोजन बनाया और भगवान को पुकारा, पर इस बार भगवान नहीं आए। वह बार-बार पुकारता रहा, फिर भी भगवान नहीं आए।
अंत में उसने कहा, "भगवान, आप नहीं आए तो मैं इसी नदी में कूदकर अपने प्राण दे दूँगा।" उसकी यह पुकार सुनते ही भगवान प्रकट हो गए। उन्होंने उसके साथ बैठकर भोजन किया, और फिर उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए।
यह सब देखकर राजा समझ गया कि व्रत का सच्चा फल मन की शुद्धता और सच्चे भाव से मिलता है, केवल बाहरी नियम से नहीं। उसके बाद राजा भी शुद्ध मन से व्रत रखने लगा, और अंत में उसे स्वर्ग मिला।
सुंदर स्त्री के रूप में राजा की परीक्षा
लोक में प्रचलित दूसरी कथा, संक्षेप में: वेबदुनिया (2015 और 2021) और न्यूज़24 में।
एक और राजा के राज्य में भी एकादशी को कोई अन्न नहीं खाता था। भगवान ने उसकी परीक्षा लेने के लिए एक सुंदर, असहाय स्त्री का रूप धरा और राह के किनारे बैठ गए। राजा उस पर मोहित हो गया और उसे अपनी रानी बनाना चाहा।
स्त्री ने शर्त रखी कि राज्य का सारा अधिकार उसे दिया जाए और राजा वही करे जो वह कहे। राजा मान गया। एकादशी के दिन उसने अन्न के पकवान बनवाए और राजा से खाने को कहा; मना करने पर उसने बड़े राजकुमार का सिर कटवाने की बात कही।
तब बड़ी रानी ने राजा से कहा, "पुत्र तो फिर मिल सकता है, पर धर्म गया तो लौटकर नहीं आता।" राजकुमार भी पिता के धर्म के लिए अपना सिर देने को तैयार हो गया।
तब भगवान अपने असली रूप में प्रकट हुए, राजा की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की और वर माँगने को कहा। राजा ने मुक्ति माँगी, राज्य पुत्र को सौंप दिया और विमान में बैठकर इस लोक से विदा हुआ।
तुलसी और शालग्राम: दो कथाएँ जो एक हो गईं
शिव पुराण, रुद्र संहिता, युद्ध खंड 2.5.23, 2.5.26 और 2.5.41; देवी भागवत 9.24–25; पद्म पुराण, उत्तर खंड 15 (wisdomlib.org पर अंग्रेज़ी अनुवाद में जाँचे)। लोक रूप वेबदुनिया और भक्ति भारत में।
तुलसी विवाह पर जो कथा सबसे अधिक सुनाई जाती है, वह इस तरह है: जालंधर की पत्नी वृंदा के पतिव्रत के कारण जालंधर को कोई हरा नहीं पाता था। भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धरा, और वृंदा का व्रत टूट गया। वृंदा ने उन्हें पत्थर हो जाने का शाप दिया; लक्ष्मी जी या देवताओं की विनती पर शाप वापस लिया गया या हल्का हुआ, और वृंदा सती हो गई। उसकी राख से तुलसी उगी, और भगवान ने कहा कि उनका शालग्राम रूप तुलसी के साथ पूजा जाएगा और वे तुलसी दल के बिना भोग नहीं लेंगे। इसी से हर वर्ष कार्तिक में तुलसी और शालग्राम का विवाह होता है।
पुराणों में ये दो अलग कथाएँ हैं, जो लोक में मिलकर एक हो गई हैं। पहली वृंदा और जालंधर की है। शिव पुराण के अनुसार जालंधर शिव के क्रोध के तेज से समुद्र में जन्मा था, और उसकी पत्नी वृंदा असुर कालनेमि की पुत्री थी। वृंदा के पतिव्रत से जालंधर अजेय था। भगवान विष्णु ने माया रची: पहले तपस्वी बनकर उसे पति के मारे जाने का दृश्य दिखाया, फिर जालंधर का रूप धरकर उसके पास आए। वृंदा का व्रत टूटा, और जालंधर का अंत हुआ।
सच जानकर वृंदा ने विष्णु को शाप दिया। शिव पुराण में शाप यह है कि उनकी पत्नी का हरण होगा और वानर उनके सहायक बनेंगे, जो आगे रामावतार की ओर संकेत है; पद्म पुराण में शाप है कि तपस्वी का वेश धरे कोई उनकी पत्नी को हर ले जाएगा। दोनों में वृंदा विष्णु को पत्थर होने का शाप नहीं देती। फिर वृंदा ने अग्नि में देह त्याग दी।
शिव पुराण के अनुसार इसके बाद विष्णु वृंदा की राख के पास मोह में बैठे रहे। तब देवताओं ने मूल प्रकृति की स्तुति की, उनके दिए बीजों से आँवला (धात्री), मालती और तुलसी के पौधे उगे, और विष्णु का मोह दूर हुआ। पद्म पुराण के उसी प्रसंग में वन में वृंदा के पसीने से तुलसी के उत्पन्न होने की बात आती है।
पत्थर (शालग्राम) वाला शाप दूसरी कथा का है, तुलसी और शंखचूड़ की (शिव पुराण 2.5.41, देवी भागवत 9.24)। तुलसी का विवाह असुर शंखचूड़ से हुआ था, और जब तक तुलसी का पतिव्रत अटल था, तब तक शंखचूड़ की शक्ति बनी रहती थी। जब शिव शंखचूड़ से युद्ध कर रहे थे, तब विष्णु शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के पास गए, और उसका व्रत टूट गया।
सच जानकर तुलसी ने विष्णु को शिला (पत्थर) हो जाने का शाप दिया। शिव पुराण में तब शिव उसे बताते हैं कि उसकी देह गंडकी नदी बनेगी, वह स्वयं तुलसी का पौधा बनेगी, और विष्णु गंडकी के तट पर शालग्राम शिला के रूप में रहेंगे; देवी भागवत में भी यही परिणाम है। तुलसी सदा विष्णु की प्रिय बनी रहीं।
देवी भागवत (9.25) में तुलसी के आठ नामों में वृंदा और वृंदावनी भी हैं, और वहाँ कार्तिक पूर्णिमा को तुलसी का जन्मोत्सव बताया गया है, जिस दिन विष्णु ने पहली बार उनकी पूजा की। तुलसी विवाह की रीति का वर्णन हमें उन अध्यायों में नहीं मिला जिन्हें हमने जाँचा; यह रीति परंपरा से चलती है।
कथा के अलग-अलग रूप
- सेवक की कथा में भोजन करने आने वाले भगवान को वेबदुनिया (2015) और इंडिया टीवी विष्णु कहते हैं, और वेबदुनिया (2021) व भक्ति भारत श्रीकृष्ण; इसलिए ऊपर "भगवान" लिखा है। पीले वस्त्रों का वर्णन वेबदुनिया (2015) में है।
- वेबदुनिया (2015) के रूप में अगली एकादशी पंद्रह दिन बाद आती है और सेवक शाम तक भगवान को पुकारता रहता है; दूसरे स्रोत समय नहीं बताते।
- न्यूज़24 इन कथाओं को श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई बताता है। यह ढाँचा पद्म पुराण वाले एकादशी-माहात्म्यों जैसा है, पर इन कथाओं के लिए किसी ग्रंथ में नहीं मिला। राजा की परीक्षा वाली कथा में भगवान को वेबदुनिया विष्णु और न्यूज़24 श्रीकृष्ण कहता है।
- विष्णु के शयन का एक और कारण लोक में सुनाया जाता है: आषाढ़ शुक्ल एकादशी को शंखासुर का वध करके भगवान थककर सो गए। इसका कोई ग्रंथ हमें नहीं मिला; यह कथा तुलसी वाली शंखचूड़ की कथा से अलग है।
- भगवान को जगाने का मंत्र "उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते…" बहुत जगह छपता है, पर इसका मूल ग्रंथ हमें नहीं मिला।
- कुछ वेबसाइटें वृंदा वाली कथा को देवी भागवत से बताती हैं, पर देवी भागवत में तुलसी और शंखचूड़ की कथा है, वृंदा और जालंधर की नहीं। वेबदुनिया (2021) शंखासुर और तुलसी की कथा को शिव महापुराण से बताती है, जो ठीक है (शिव पुराण 2.5.41 में उसका नाम शंखचूड़ है)। Drik Panchang वृंदा-जालंधर की कथा को पद्म पुराण से बताता है; वह कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड 15) में है, पर पत्थर वाले शाप के बिना।
कथा के बाद
भगवान को जगाने की पूजा, आरती और तुलसी विवाह परिवार की परंपरा के अनुसार होते हैं। अपने शहर में व्रत के पारण का समय देवउठनी एकादशी के पन्ने पर है।
ॐ जय जगदीश हरेअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवउठनी एकादशी की कथा क्या है?
घरों में सबसे अधिक एक सेवक की लोक कथा सुनाई जाती है: एकादशी पर अन्न माँगकर वह नदी किनारे भोजन बनाता है और भगवान को बुलाता है, और भगवान उसके साथ भोजन करते हैं; यह देखकर राजा समझता है कि व्रत का सार मन की शुद्धता है। यह लोक कथा है; पद्म पुराण पर आधारित गीता प्रेस के माहात्म्य में इस एकादशी की कोई अलग कहानी नहीं, केवल उसकी महिमा है।
भगवान विष्णु चार महीने क्यों सोते हैं?
पद्म पुराण पर आधारित गीता प्रेस की पुस्तक के अनुसार देवशयनी एकादशी से भगवान का एक रूप राजा बलि के पास रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग पर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक शयन करता है। लोक में इसे वामन अवतार और लक्ष्मी जी के रक्षा-सूत्र की कथा से भी समझाया जाता है।
क्या वृंदा ने विष्णु को पत्थर होने का शाप दिया था?
शिव पुराण और पद्म पुराण में वृंदा का शाप यह है कि विष्णु की पत्नी का हरण होगा। पत्थर (शालग्राम) होने का शाप शिव पुराण (2.5.41) और देवी भागवत (9.24) में तुलसी देती हैं, जो असुर शंखचूड़ की पत्नी थीं। लोक कथा में ये दोनों कथाएँ मिलकर एक हो गई हैं।
तुलसी विवाह कब किया जाता है?
परिवार की परंपरा के अनुसार देवउठनी एकादशी को, अगले दिन द्वादशी को, या एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन (Drik Panchang, विकिपीडिया)। कुछ ग्रंथों के मत से Drik Panchang कार्तिक शुक्ल नवमी भी बताता है।
स्रोत
- गीता प्रेस, गोरखपुर: "एकादशी-व्रत का माहात्म्य" (पद्म पुराण पर आधारित 26 कथाएँ; शयनी और प्रबोधिनी एकादशी), archive.org
- शिव पुराण, रुद्र संहिता, युद्ध खंड 2.5.23, 2.5.26 और 2.5.41 (जे. एल. शास्त्री का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org)
- देवी भागवत पुराण 9.24 और 9.25 (wisdomlib.org)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड 15, 105 और 124 (wisdomlib.org)
- wisdomlib.org: वृंदा (शिव पुराण के अनुसार)
- Drik Panchang: प्रबोधिनी एकादशी व्रत कथा; तुलसी विवाह
- वेबदुनिया: देवउठनी एकादशी पौराणिक व्रत कथा (2015); देवउठनी एकादशी की 3 कथाएँ (2021); तुलसी विवाह कथा
- भक्ति भारत (bhaktibharat.com): देवउठनी एकादशी व्रत कथा; तुलसी विवाह पौराणिक कथा
- इंडिया टीवी हिंदी (2025) और न्यूज़24 हिंदी: देवउठनी एकादशी की कथा
- ETV भारत (शहडोल): देवउठनी एकादशी, गन्ना और तुलसी विवाह
- हिंदी विकिपीडिया: देवशयनी एकादशी; अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Tulasi Vivaha, Chaturmasya, Prabodhini Ekadashi
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