भगवान धन्वंतरि की आरती: जय धन्वंतरि देवा

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धनतेरस पर धन्वंतरि पूजा: अमृत कलश, तुलसी, नीम, हल्दी, आँवला और खरल
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय धन्वंतरि देवा, जय धन्वंतरि जी देवा। जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा॥

    हे धन्वंतरि देव, आपकी जय हो। बुढ़ापे और रोग से पीड़ित हर व्यक्ति को आप सुख देते हैं।

  2. पद 2

    तुम समुद्र से निकले, अमृत कलश लिए। देवासुर के संकट, आकर दूर किए॥

    आप (समुद्र मंथन में) अमृत का कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए, और आकर देवताओं और असुरों का संकट दूर किया। यह भागवत पुराण (स्कंध 8) में वर्णित समुद्र मंथन का प्रसंग है।

  3. पद 3

    आयुर्वेद बनाया, जग में फैलाया। सदा स्वस्थ रहने का, साधन बतलाया॥

    आपने आयुर्वेद रचा और उसे संसार में फैलाया, और सदा स्वस्थ रहने का उपाय बताया।

  4. पद 4

    भुजा चार अति सुंदर, शंख सुधा धारी। आयुर्वेद वनस्पति से, शोभा भारी॥

    आपकी चार भुजाएँ अत्यंत सुंदर हैं; आप शंख और अमृत (सुधा) धारण करते हैं। आयुर्वेद की वनस्पतियों (औषधियों) से आपकी शोभा बहुत बढ़ जाती है।

  5. पद 5

    तुम को जो नित ध्यावे, रोग नहीं आवे। असाध्य रोग भी उसका, निश्चय मिट जावे॥

    आरती कहती है कि जो आपका नित्य ध्यान करता है, उसे रोग नहीं होता, और उसका असाध्य रोग भी निश्चय ही मिट जाता है।

  6. पद 6

    हाथ जोड़कर प्रभुजी, दास खड़ा तेरा। वैद्य-समाज तुम्हारे, चरणों का घेरा॥

    हे प्रभु, आपका यह दास हाथ जोड़कर खड़ा है। वैद्यों का समाज आपके चरणों को घेरे (आपकी शरण में) रहता है।

  7. पद 7

    धन्वंतरिजी की आरती, जो कोई नर गावे। रोग-शोक न आए, सुख-समृद्धि पावे॥

    आरती कहती है कि जो कोई धन्वंतरि जी की यह आरती गाता है, उसके पास रोग और शोक नहीं आते और वह सुख-समृद्धि पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/dhanvantari-aarti/

संक्षेप में

“जय धन्वंतरि देवा” आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि की आरती है। भागवत पुराण के अनुसार धन्वंतरि समुद्र मंथन में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे, और आरती इसी प्रसंग को याद करती है। यह धनतेरस पर, जिसे धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं, धन्वंतरि पूजा के अंत में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

यह पाठ कई स्रोतों में लगभग एक जैसा मिलता है। कहीं ‘धन्वंतरि’ को ‘धन्वन्तरि’ और ‘सुंदर’ को ‘सुन्दर’ लिखा जाता है, और एक संस्करण में पद 4 की दूसरी पंक्ति ‘आयुर्वेद वनस्पति से, है शोभा भारी’ मिलती है। कुछ जगह टेक ‘जय धन्वंतरि देवा, जय जय धन्वंतरि देवा’ के रूप में गाई जाती है। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धन्वंतरि जी की आरती कब गाई जाती है?

धनतेरस (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) पर, जो धन्वंतरि जयंती भी है, धन्वंतरि पूजा के अंत में। इसे धन्वंतरि जी की किसी भी पूजा में गाया जा सकता है।

भगवान धन्वंतरि कौन हैं?

वे आयुर्वेद के देवता और विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं। भागवत पुराण (8.8) के अनुसार वे समुद्र मंथन में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए। परंपरा में धनतेरस को उनके प्रकट होने का दिन माना जाता है।

क्या यह आरती रोग का इलाज है?

नहीं। आरती भक्ति की रचना है और रोग दूर होने की बात भक्त के विश्वास के रूप में कहती है। बीमारी में योग्य चिकित्सक की सलाह और उपचार ज़रूरी है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता ज्ञात नहीं है; अंतिम पद में किसी कवि का नाम नहीं आता।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. समुद्र मंथन से धन्वंतरि का प्रकट होना: भागवत पुराण, स्कंध 8, अध्याय 8

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, hindi.webdunia.com, hindi.news24online.com, bhaktvatsal.com