भागवत पुराण (10.24–27) के अनुसार श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के यज्ञ के बदले गौओं, ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत की पूजा के लिए मनाया। क्रोधित इंद्र ने प्रलय के मेघ भेजे, तो श्रीकृष्ण ने एक हाथ से गोवर्धन उठाकर सात दिन तक पूरे ब्रज को उसके नीचे बचाए रखा। अंत में इंद्र ने क्षमा माँगी, और सुरभि गाय और इंद्र ने अभिषेक करके उन्हें "गोविंद" नाम दिया।
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गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, दीपावली के बाद सुबह होती है; इसे अन्नकूट भी कहते हैं। पद्म पुराण (उत्तर खंड, अध्याय 122) और स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 10) इस दिन सुबह गोवर्धन की पूजा का विधान करते हैं, और उसकी प्रार्थना में गोवर्धन को धरती का आधार, गोकुल का रक्षक और विष्णु के हाथों उठाया गया पर्वत कहा गया है। पर ये ग्रंथ यह नहीं कहते कि पर्वत इसी तिथि को उठाया गया था, और "अन्नकूट" शब्द इन अध्यायों में नहीं है; अनेक पकवानों का अन्नकूट परंपरा है।
कथा भागवत पुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24–27) में विस्तार से है; विष्णु पुराण (5.10–12) और हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 16–19) में भी यही प्रसंग है। नीचे कथा भागवत के क्रम से है, और जहाँ दूसरे ग्रंथ अलग कहते हैं वहाँ बताया गया है।
व्रत और कथा की विधि
- यह कथा गोवर्धन पूजा के दिन पढ़ी-सुनी जाती है; छपी व्रत-कथा पुस्तिकाओं में यह "गोवर्धन कथा" के नाम से मिलती है।
- पद्म और स्कंद पुराण के अनुसार प्रतिपदा की सुबह गोवर्धन की पूजा होती है; गायों को सजाया जाता है, और उस दिन उन्हें न दुहा जाता है, न उन पर बोझ लादा जाता है।
- परंपरा में आँगन में गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है, कई जगह लेटे हुए पुरुष के रूप में, फूलों और गाय-बछड़ों की छोटी आकृतियों के साथ। उसकी नाभि के गड्ढे में दूध, दही, गंगाजल, शहद और मिठाई रखी जाती है, और जल गिराते व जौ बोते हुए सात परिक्रमा की जाती है (Drik Panchang, हिंदी विकिपीडिया, भारतकोश)।
- भगवान को अनेक पकवानों का भोग लगता है, जिसे अन्नकूट कहते हैं; Drik Panchang अनाज से बने व्यंजन, बेसन की कढ़ी और पत्तेदार सब्ज़ियाँ बताता है। मंदिरों में देव-प्रतिमा के सामने अन्नकूट सजाया जाता है, और बाद में सब मिलकर प्रसाद पाते हैं।
इंद्र-यज्ञ की जगह गोवर्धन पूजा
भागवत पुराण 10.24, विष्णु पुराण 5.10 और हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 16–17) के अनुसार।
वर्षा ऋतु बीत चुकी थी और शरद आ गई थी। श्रीकृष्ण और बलराम ब्रज में रहते थे। एक दिन श्रीकृष्ण ने देखा कि सारे ग्वाले किसी बड़े यज्ञ की तैयारी में लगे हैं। उन्होंने आदर से नंद बाबा से पूछा, "बाबा, यह किसकी पूजा की तैयारी है? यह शास्त्र में कहा गया है, या केवल रीति से चला आ रहा है?"
नंद बाबा ने कहा, "बेटा, देवराज इंद्र मेघों के स्वामी हैं। उनके भेजे मेघ बरसते हैं, वर्षा से अन्न उपजता है और गौओं के लिए घास होती है। इसलिए वर्षा के बाद हम हर साल इंद्र का यज्ञ करते हैं।"
भागवत पुराण में श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि हर प्राणी अपने कर्म से ही सुख-दुख पाता है, मेघ अपने स्वभाव से बरसते हैं, और इंद्र किसी का भाग्य नहीं बदल सकते। विष्णु पुराण और हरिवंश में उनका तर्क दूसरा है: "हम न खेती करते हैं, न व्यापार। हम वन में रहने वाले ग्वाले हैं; गायें ही हमारी जीविका और हमारे देवता हैं, और ये वन और पर्वत हमें आश्रय देते हैं। हमें इंद्र से क्या? हमें पर्वत और गौओं की पूजा करनी चाहिए।"
फिर श्रीकृष्ण ने कहा कि इंद्र के यज्ञ के लिए जो सामग्री जुटाई गई है, उसी से गौओं, ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत का यज्ञ हो। खीर से लेकर दाल तक अनेक पकवान बनें, पूए और तरह-तरह के व्यंजन बनें, और सारा दूध-दही-घी इकट्ठा किया जाए। ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए, और सबको, यहाँ तक कि कुत्तों को और समाज में सबसे नीचे माने जाने वालों को भी, भोजन मिले; गायों को हरी घास दी जाए। फिर सब सज-धजकर गौओं, ब्राह्मणों, अग्नि और पर्वत की परिक्रमा करें।
नंद बाबा और सब ग्वालों को यह बात अच्छी लगी, और उन्होंने वैसा ही किया। हरिवंश उस उत्सव का सुंदर चित्र देता है: बाजे बजे, बैल गरजे, बछड़े रँभाए, दही के सरोवर और दूध की नदियाँ बनीं, और पके हुए चावल का पर्वत जैसा ढेर गोवर्धन के पास ले जाया गया।
पूजा पूरी होने पर श्रीकृष्ण ने एक विशाल रूप धारण किया और कहा, "मैं पर्वत हूँ।" उस रूप में उन्होंने ब्रजवासियों का चढ़ाया सारा भोग ग्रहण किया। साथ ही अपने बाल रूप में वे ब्रजवासियों के साथ उस रूप को प्रणाम करते हुए बोले, "देखो, पर्वत ने प्रकट होकर हम पर कृपा की है।"
इंद्र की वर्षा और गोवर्धन धारण
भागवत पुराण 10.25 और 10.26.3, विष्णु पुराण 5.11 और हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 18) के अनुसार।
जब इंद्र ने देखा कि उनका यज्ञ रोक दिया गया है, तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने सांवर्तक नाम के मेघों को, जो प्रलय के समय बरसते हैं, ब्रज पर भेजा। विष्णु पुराण के अनुसार इंद्र ने कहा कि वे स्वयं अपने हाथी ऐरावत पर चढ़कर आँधी को और तेज़ करेंगे।
ब्रज पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। तेज़ आँधी चली और ओले गिरे। धरती, आकाश और दिशाएँ सब पानी में एक हो गए। कई गायों ने अपने बछड़ों को अपने शरीर से ढक लिया, बछड़े हवा में काँपने लगे, और घबराए हुए ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचे: "कृष्ण, हमारी रक्षा करो!"
श्रीकृष्ण समझ गए कि यह इंद्र के क्रोध का काम है और ब्रज की रक्षा करनी होगी। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को धरती से उखाड़ा और एक हाथ से खेल-खेल में ऐसे उठा लिया, जैसे कोई बालक कुकुरमुत्ता उठा लेता है (भागवत पुराण)। हरिवंश के अनुसार उन्होंने पर्वत बाएँ हाथ पर थामा।
उन्होंने ब्रजवासियों से कहा, "अपनी गायों और सामान के साथ जल्दी पर्वत के नीचे आ जाओ। डरो मत, पर्वत गिरेगा नहीं।" सब ग्वाल-ग्वालिनें अपनी गायों, बछड़ों, गाड़ियों और सामान के साथ पर्वत के नीचे आ गए, और सबके लिए वहाँ जगह हो गई।
सात दिन तक वर्षा होती रही, और सात दिन तक श्रीकृष्ण बिना हिले पर्वत थामे खड़े रहे। उन्होंने भूख-प्यास की भी परवाह नहीं की, और ब्रजवासी पर्वत के नीचे से आश्चर्य और प्रेम से उन्हें निहारते रहे। भागवत पुराण में बाद में ग्वाले आपस में अचरज करते हैं कि सात वर्ष के एक बालक ने इतना बड़ा पर्वत एक हाथ से ऐसे उठा लिया, जैसे हाथी कमल उठा लेता है।
इंद्र का सारा प्रयास व्यर्थ गया। चकित होकर उन्होंने मेघों को लौटा लिया। आकाश साफ़ हुआ और सूरज निकल आया। सब लोग अपनी गायों और सामान के साथ बाहर आए, और श्रीकृष्ण ने सबके देखते-देखते गोवर्धन को उसकी जगह वापस रख दिया।
ब्रजवासियों ने प्रेम से श्रीकृष्ण को गले लगाया, और आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए।
इंद्र की क्षमा और गोविंद अभिषेक
भागवत पुराण 10.27, विष्णु पुराण 5.12 और हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 19) के अनुसार।
इंद्र का घमंड टूट चुका था। भागवत पुराण के अनुसार वे गोलोक से आई दिव्य गाय सुरभि के साथ एकांत में श्रीकृष्ण के पास आए, उनके चरणों में सिर झुकाया और माना कि अभिमान में उनसे भूल हुई। विष्णु पुराण में इंद्र ऐरावत पर चढ़कर गोवर्धन आते हैं और देखते हैं कि गरुड़, मनुष्यों को न दिखते हुए, अपने पंख फैलाकर श्रीकृष्ण पर छाया किए हुए हैं।
श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्होंने यह यज्ञ इसीलिए रुकवाया था कि इंद्र का अभिमान दूर हो।
तब सुरभि ने गौओं की ओर से विनती की, "आप ही हमारे इंद्र बनिए।" सुरभि ने अपने दूध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, और माता अदिति और देवताओं की माताओं के कहने पर इंद्र ने ऐरावत की सूँड़ में भरे आकाशगंगा के जल से उनका अभिषेक किया। देवताओं और ऋषियों ने उन्हें "गोविंद" कहकर उनकी जय-जयकार की।
विष्णु पुराण में इंद्र कहते हैं कि वे गायों की इच्छा से आए हैं। वे ऐरावत से लिए कलश के पवित्र जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक करके उन्हें "उपेंद्र" बनाते हैं और कहते हैं कि गायों के इंद्र होने से आप "गोविंद" कहलाएँगे; उस समय गायों ने अपने दूध से धरती को भिगो दिया। हरिवंश में इंद्र सोने के कलश के दिव्य जल से अभिषेक करते हैं, और आकाश की गायें बादलों से दूध बरसाती हैं।
फिर इंद्र स्वर्ग लौट गए, और श्रीकृष्ण गायों और ग्वालों के साथ ब्रज लौट आए। हरिवंश में इंद्र कहते हैं कि जो इस प्रसंग का पाठ करके नमन करेगा, उस पर दुख नहीं आएगा।
कथा के अलग-अलग रूप
- श्रीकृष्ण का तर्क ग्रंथों में अलग है: भागवत पुराण में कर्म और स्वभाव की बात है, विष्णु पुराण और हरिवंश में यह कि ग्वालों की जीविका गौओं, वन और पर्वत से है। आज तक जैसी नई कथाएँ इसे प्रकृति (नदी, पशु, धरती, पेड़ और पर्वत) की पूजा के रूप में कहती हैं।
- भागवत पुराण और विष्णु पुराण कहते हैं कि पर्वत एक हाथ से उठाया गया; हरिवंश (एम. एन. दत्त का अनुवाद) बायाँ हाथ बताता है, और उसी अनुवाद में एक जगह "उँगली के सिरे पर" भी लिखा है (मूल संस्कृत हमने नहीं जाँची)। सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठा) की बात लोक-प्रचलित है: Drik Panchang, हिंदी विकिपीडिया, भारतकोश, आज तक और छपी व्रत-कथा पुस्तिका ("कानी उंगली") में; स्कंद पुराण के अनुवादक तगारे की टिप्पणी भी इसे लोक-प्रचलित कथा बताती है।
- अवधि: भागवत में सात दिन, विष्णु पुराण में सात दिन और रात, हरिवंश में सात रातें; Drik Panchang केवल "कई दिन" लिखता है।
- अभिषेक तीनों ग्रंथों में अलग है: भागवत में सुरभि का दूध और ऐरावत की सूँड़ से आकाशगंगा का जल; विष्णु पुराण में ऐरावत से लिए कलश का जल और गायों का दूध; हरिवंश में सोने का कलश और आकाश की गायों का दूध। छपी व्रत-कथा पुस्तिका में इंद्र स्वयं दूध से अभिषेक करते हैं और वह दूध एक कुंड में इकट्ठा होता है; कुंड का नाम उस स्कैन में साफ़ नहीं पढ़ा जाता।
- केवल विष्णु पुराण में इंद्र इसी भेंट में श्रीकृष्ण से अपने अंश अर्जुन की रक्षा करने को कहते हैं।
- छप्पन भोग की बात आज तक, भारतकोश और छपी पुस्तिका में है। सात दिन और हर दिन आठ भोग (7 × 8 = 56) वाली व्याख्या GNT और अमृत विचार देते हैं; यह मान्यता है, ग्रंथ में नहीं। भारतकोश लिखता है कि छप्पन व्यंजन पहले इंद्र के लिए बने थे।
- कथा का अंत: भारतकोश के अनुसार इसके बाद श्रीकृष्ण ने हर वर्ष गोवर्धन पूजा करने को कहा; छपी पुस्तिका के अनुसार इंद्र का मान टूटने की याद में अन्नकूट विजय-पर्व के रूप में मनाया जाता है।
कथा के बाद
कथा के बाद गोवर्धन जी की आरती गाई जाती है और अन्नकूट का प्रसाद बाँटा जाता है। अपने शहर में गोवर्धन पूजा का मुहूर्त गोवर्धन पूजा के पन्ने पर है।
गोवर्धन जी की आरती: श्री गोवर्धन महाराजअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोवर्धन पर्वत किस उँगली पर उठाया था?
भागवत पुराण (10.25.19) और विष्णु पुराण (5.11) कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने पर्वत एक हाथ से उठाया; हरिवंश के अनुसार बाएँ हाथ से। सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठा) पर उठाने की बात लोक-मान्यता है, जो Drik Panchang, भारतकोश और छपी व्रत-कथाओं में मिलती है; हमने जिन ग्रंथों को जाँचा, उनमें कनिष्ठा उँगली का उल्लेख नहीं है।
गोवर्धन पूजा की कथा किस पुराण में है?
भागवत पुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24–27) में विस्तार से; विष्णु पुराण (5.10–12) और हरिवंश (विष्णु पर्व, अध्याय 16–19) में भी। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का विधान पद्म पुराण (उत्तर खंड, अध्याय 122) और स्कंद पुराण (कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 10) में है।
गोवर्धन पूजा पर छप्पन भोग क्यों लगाते हैं?
यह लोक-मान्यता है, किसी ग्रंथ में नहीं मिलती। प्रचलित व्याख्या यह है कि माता यशोदा श्रीकृष्ण को दिन में आठ बार भोजन कराती थीं, और पर्वत उठाए रखने के सात दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया, इसलिए सात दिनों के आठ-आठ, यानी छप्पन भोग लगाए गए।
अन्नकूट क्या है?
अन्नकूट का अर्थ है अन्न का ढेर या पर्वत; इस दिन भगवान को अनेक पकवानों का भोग लगाना परंपरा है। यह शब्द पद्म और स्कंद पुराण के गोवर्धन पूजा वाले अध्यायों में नहीं है; हरिवंश में गिरि-यज्ञ के समय पके चावल के पर्वत जैसे ढेर का वर्णन है, जो इसके सबसे निकट है।
स्रोत
- भागवत पुराण 10.24, 10.25, 10.26.3 और 10.27 (vedabase.io पर श्लोक-दर-श्लोक जाँचा)
- विष्णु पुराण 5.10–12 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, wisdomlib.org)
- हरिवंश, विष्णु पर्व, अध्याय 16–19 (एम. एन. दत्त का 1897 का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org; अध्याय-संख्या प्रचलित संस्करण की)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 122 (एन. ए. देशपांडे का अनुवाद) और स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 10 (जी. वी. तगारे का अनुवाद), wisdomlib.org
- Drik Panchang: गोवर्धन पूजा 2026; दिवाली की कथाएँ
- हिंदी विकिपीडिया: गोवर्धन पूजा
- भारतकोश (bharatdiscovery.org): गोवर्धन पूजा
- आज तक: गोवर्धन पूजा का इतिहास (22 अक्टूबर 2025)
- GNT और अमृत विचार: छप्पन भोग की मान्यता
- "व्रत कथा" पुस्तिका (archive.org, 20240806_20240806_0450): गोवर्धन कथा
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