व्रत कथा

कार्तिक पूर्णिमा की कथा

कार्तिक पूर्णिमा: मंगलवार, 24 नवंबर 2026

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 9 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
त्रिपुरारी रूप में जटाधारी शिव, अर्धचंद्र, सर्प और बाघंबर के साथ, विशाल रथ पर खड़े होकर महान धनुष खींचे हुए; उस पर चढ़ा एक दहकता बाण रात के आकाश में एक सीध में आए तीन उड़ते नगरों (सोने, चाँदी और लोहे के) की ओर तना है; रथ के पास हाथ जोड़े देवता और आकाश में पूरा चाँद
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

कार्तिक पूर्णिमा की मुख्य कथा त्रिपुर के नाश की है। शिव पुराण और महाभारत के अनुसार असुर तीन भाइयों के तीन नगर केवल तभी नष्ट हो सकते थे जब वे एक जगह मिलें और एक ही बाण उन्हें भेदे; शिव ने वही एक बाण चलाकर तीनों को भस्म किया और त्रिपुरारी कहलाए। ग्रंथों में इसकी कोई तिथि नहीं दी गई; इसे कार्तिक पूर्णिमा से जोड़ना और इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा कहना परंपरा है।

कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक मास की पूर्णिमा है। इस दिन भोर में गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान और शाम को दीपदान की परंपरा है; Drik Panchang इसे त्रिपुरी या त्रिपुरारी पूर्णिमा और देव दीपावली भी कहता है। अपने शहर में स्नान और दीपदान का समय कार्तिक पूर्णिमा के पन्ने पर है।

इस दिन की मुख्य कथा शिव द्वारा त्रिपुर के नाश की है, जो शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खंड, अध्याय 1–10) और महाभारत (कर्ण पर्व, गांगुली अनुवाद के अध्याय 33–34) में है; दोनों को हमने अनुवाद में पढ़कर जाँचा। पर इनमें से किसी में कोई महीना या पूर्णिमा नहीं दी गई है। शिव पुराण वह घड़ी बताता है जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में हो, जो कार्तिक पूर्णिमा से मेल नहीं खाती। इसलिए "इसी दिन शिव ने त्रिपुर का नाश किया" परंपरा की बात है, और इसी परंपरा से यह दिन त्रिपुरारी पूर्णिमा कहलाता है।

देवी भागवत (9.25) में कार्तिक पूर्णिमा को तुलसी का जन्मोत्सव बताया गया है। सिख परंपरा में इसी दिन गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व (गुरपुरब) मनाया जाता है; उनका जन्म 1469 में राय भोई दी तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ था।

व्रत और कथा की विधि

  • भोर में गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान; शरद पूर्णिमा से चलने वाला कार्तिक स्नान इस दिन पूरा होता है (Drik Panchang)।
  • शाम को गंगा में दीपदान और गंगा आरती। वाराणसी में इस शाम घाटों पर देव दीपावली होती है; मान्यता है कि इस दिन देवता गंगा स्नान के लिए काशी आते हैं। यह एक परंपरा है, और इसके आरंभ के वर्ष पर मत अलग हैं (नीचे प्रश्न देखें)।
  • देवउठनी एकादशी से चलने वाला पाँच दिन का भीष्म पंचक व्रत इस दिन पूरा होता है (पद्म पुराण, उत्तर खंड 124), और तुलसी विवाह के दिनों का भी यह अंतिम दिन है (Drik Panchang)।
  • पुष्कर का मेला, गढ़मुक्तेश्वर का स्नान और ओडिशा का बोइत बंदाण भी इसी दिन से जुड़े हैं (Drik Panchang, विकिपीडिया)।

त्रिपुर का नाश: शिव पुराण की कथा

शिव पुराण, रुद्र संहिता, युद्ध खंड, अध्याय 1, 8 और 10 (जे. एल. शास्त्री का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org) के अनुसार; वहाँ यह कथा सनत्कुमार व्यास जी को सुनाते हैं।

शिव पुराण में यह कथा तारकासुर के वध के प्रसंग के बाद आती है। कार्तिकेय के हाथों तारकासुर मारा गया, तो उसके तीन पुत्र रह गए: सबसे बड़ा तारकाक्ष, बीच का विद्युन्माली और सबसे छोटा कमलाक्ष। प्रचलित कथाओं में कहा जाता है कि वे अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहते थे।

तीनों भाइयों ने बहुत कठोर तप किया। ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। उन्होंने अमर होने का वर माँगा, पर ब्रह्मा जी ने कहा कि यह वर वे नहीं दे सकते; कुछ और माँगो।

तब उन्होंने माँगा कि उनके लिए तीन नगर बनें। वे नगर हज़ार वर्ष बाद ही एक जगह मिलें, और उसी घड़ी जो एक ही बाण से तीनों को भेद दे, केवल वही उनका नाश कर सके। शिव पुराण में वह घड़ी भी बताई गई है: दोपहर का अभिजित समय, जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में हो; और वह एक बाण शिव का ही होगा। ब्रह्मा जी ने यह वर दे दिया।

मय दानव ने उनके लिए तीन नगर बनाए: स्वर्ग में तारकाक्ष के लिए सोने का, आकाश में कमलाक्ष के लिए चाँदी का, और पृथ्वी पर विद्युन्माली के लिए लोहे (फ़ौलाद) का। इन्हीं तीन पुरों को मिलाकर "त्रिपुर" कहा गया।

इन नगरों के बल पर असुर तीनों लोकों को सताने लगे। दुखी देवता पहले ब्रह्मा जी के पास गए, फिर शिव जी की शरण में पहुँचे। शिव ने त्रिपुर का नाश करना स्वीकार किया।

शिव के लिए विश्वकर्मा ने एक अद्भुत रथ बनाया, जिसमें सारे लोक समाए थे। सूर्य और चंद्रमा उसके दाएँ-बाएँ पहिए बने, चारों वेद घोड़े, और ब्रह्मा जी सारथी। मेरु पर्वत धनुष बना, नागराज उसकी प्रत्यंचा, और स्वयं भगवान विष्णु बाण बने।

शिव पुराण बताता है कि पहले गणेश जी की पूजा न होने से काम में देर हो रही थी। गणेश जी का पूजन हुआ, तब काम आगे बढ़ा।

फिर वह घड़ी आई और तीनों नगर एक साथ आ मिले। शिव ने धनुष पर वह बाण चढ़ाया, जो स्वयं विष्णु थे और जिसकी नोक अग्नि थी, और एक ही बाण छोड़ा। तीनों नगर एक साथ जलकर भस्म हो गए।

शिव पुराण के अनुसार उस आग में भी मय दानव और वे असुर बचा लिए गए जो शिव के भक्त थे।

देवताओं ने प्रसन्न होकर शिव की स्तुति की। त्रिपुर का नाश करने से शिव त्रिपुरारी और त्रिपुरांतक कहलाए।

परंपरा के अनुसार यह विजय कार्तिक पूर्णिमा को हुई और देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया; इसी से यह दिन त्रिपुरारी पूर्णिमा और देव दीपावली कहलाता है। शिव पुराण और महाभारत में इसकी तिथि नहीं दी गई है।

महाभारत में त्रिपुर की कथा

महाभारत, कर्ण पर्व, अध्याय 33–34 (गांगुली का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org) के अनुसार।

महाभारत में यह कथा दुर्योधन शल्य को सुनाता है; इसे कभी मार्कंडेय ऋषि ने धृतराष्ट्र को सुनाया था। दुर्योधन की बात यह थी कि जैसे ब्रह्मा ने शिव का रथ हाँका था, वैसे ही शल्य कर्ण के सारथी बनें।

यहाँ भी तीनों भाई तप करके वर पाते हैं: हज़ार वर्ष बाद तीनों नगर मिलें, और तब एक ही देव एक ही बाण से उन्हें भेद सके। मय ने सोने, चाँदी और लोहे के तीन नगर बनाए, स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी में, हर एक सौ योजन का।

महाभारत में एक बात और है: तारकाक्ष के पुत्र हरि ने एक ऐसा सरोवर बनाया, जिसमें डालते ही मरे हुए दैत्य फिर जी उठते थे।

देवता ब्रह्मा के पास गए और फिर शिव के पास। शिव ने देवताओं की आधी शक्ति लेकर उसे अपनी आधी शक्ति से मिलाया। यहाँ रथ पृथ्वी है, मंदराचल उसकी धुरी और गंगा उसका दंड; बाण में विष्णु, सोम (चंद्रमा) और अग्नि तीनों समाए हैं; और ब्रह्मा सारथी बनते हैं।

तीनों नगर मिलते ही शिव ने एक बाण छोड़ा, और वे जलते हुए गिर पड़े। शिव ने जले हुए असुरों को पश्चिमी समुद्र में डाल दिया।

कथा के अलग-अलग रूप

  • कई लोक कथाओं में तीन भाइयों की जगह एक ही असुर "त्रिपुरासुर" बताया जाता है, जिसके तीन नगर थे (इंडिया टीवी)।
  • बाण में कौन-कौन देव थे, इसमें अंतर है: शिव पुराण में विष्णु बाण हैं और अग्नि उसकी नोक; महाभारत में विष्णु, सोम और अग्नि; इंडिया.कॉम के रूप में विष्णु, वायु, अग्नि और यम।
  • नगरों के मिलने की घड़ी: शिव पुराण और महाभारत दोनों में हज़ार वर्ष बाद; शिव पुराण इसके साथ दोपहर, अभिजित और पुष्य में चंद्रमा बताता है; इंडिया.कॉम इसे अभिजित नक्षत्र कहता है; महाभारत में नक्षत्र नहीं है।
  • अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार इस कथा का सबसे पुराना रूप तैत्तिरीय संहिता में है, जहाँ रुद्र एक बाण से असुरों के तीन दुर्ग नष्ट करते हैं; वह मूल पाठ हमने नहीं जाँचा।
  • कुछ समाचार-पत्र और वेबसाइटें कहती हैं कि भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा को मत्स्य अवतार लिया था। इनमें से कोई किसी ग्रंथ का नाम नहीं देता, और Drik Panchang मत्स्य जयंती चैत्र शुक्ल तृतीया को बताता है। यह एक प्रचलित दावा है, जिसका आधार हमें नहीं मिला।

कथा के बाद

शाम को दीपदान होता है, और वाराणसी में देव दीपावली। शिव जी की आरती का पाठ नीचे है; अपने शहर में स्नान और दीपदान का समय कार्तिक पूर्णिमा के पन्ने पर है।

शिव जी की आरती: ॐ जय शिव ओंकारा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा क्यों कहते हैं?

परंपरा के अनुसार इसी दिन शिव ने एक बाण से तारकासुर के तीन पुत्रों के तीन नगर (त्रिपुर) नष्ट किए और त्रिपुरारी कहलाए। यह कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, युद्ध खंड) और महाभारत (कर्ण पर्व) में है, पर उनमें तिथि नहीं दी गई; कार्तिक पूर्णिमा से इसका संबंध परंपरा से है।

कार्तिक पूर्णिमा की कथा क्या है?

तारकासुर के तीन पुत्रों ने ब्रह्मा से वर पाया कि उनके तीन नगर हज़ार वर्ष बाद ही एक जगह मिलेंगे और तभी एक ही बाण से नष्ट हो सकेंगे। मय ने सोने, चाँदी और लोहे के नगर बनाए। जब असुर तीनों लोकों को सताने लगे, तो देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने दिव्य रथ पर चढ़कर, विष्णु रूपी बाण से, तीनों नगरों को एक साथ भस्म किया।

क्या कार्तिक पूर्णिमा को मत्स्य अवतार हुआ था?

कई समाचार-पत्र और वेबसाइटें ऐसा लिखते हैं, पर कोई ग्रंथ का नाम नहीं देता। मत्स्य अवतार की कथा (भागवत पुराण 8.24, मत्स्य पुराण) में तिथि नहीं दी गई, और Drik Panchang मत्स्य जयंती चैत्र शुक्ल तृतीया को बताता है। इसलिए इसे एक प्रचलित दावा ही माना जाना चाहिए।

काशी में देव दीपावली कब से मनाई जाती है?

मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा को देवता गंगा स्नान के लिए काशी आते हैं, इसलिए घाटों पर दीप जलाए जाते हैं। आज के उत्सव की शुरुआत पर मत अलग हैं: कुछ इसे पंचगंगा घाट पर अहिल्याबाई होल्कर के हज़ारा दीप-स्तंभ (18वीं सदी) से जोड़ते हैं, कुछ 1985 में पंचगंगा घाट पर स्थानीय युवाओं के दीयों से, और अंग्रेज़ी विकिपीडिया 1991 में दशाश्वमेध घाट पर पं. किशोरी रमण दुबे (बाबू महाराज) से। कोई एक वर्ष तय नहीं है।

स्रोत

  1. शिव पुराण, रुद्र संहिता, युद्ध खंड, अध्याय 1, 8 और 10 (जे. एल. शास्त्री का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org)
  2. महाभारत, कर्ण पर्व, अध्याय 33–34 (गांगुली का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org)
  3. पौराणिक विश्वकोश (वेट्टम मणि): त्रिपुर की कथा, wisdomlib.org
  4. देवी भागवत पुराण 9.25; पद्म पुराण, उत्तर खंड 124 (wisdomlib.org)
  5. Drik Panchang: कार्तिक पूर्णिमा; मत्स्य जयंती
  6. इंडिया टीवी हिंदी (2025), इंडिया.कॉम हिंदी (2024), अमर उजाला (2025) और वेबदुनिया (2021): कार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरासुर और मत्स्य अवतार
  7. अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Tripurasura, Kartika Purnima, Dev Deepavali (Varanasi), Guru Nanak Gurpurab; हिंदी विकिपीडिया: कार्तिक पूर्णिमा
  8. एशियानेट न्यूज़ हिंदी, aadikashi.com और varanasiguru.com: देव दीपावली का इतिहास
  9. SikhNet: गुरु नानक का जन्म, कार्तिक या बैसाख

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