विवाह पंचमी की कथा श्रीराम और सीता के विवाह की है। विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को राजा जनक की मिथिला ले गए; वहाँ राम ने वह शिव धनुष तोड़ दिया जिसे कोई राजा उठा तक नहीं पाया था, और जनक ने सीता का विवाह राम से कर दिया। उसी मंडप में लक्ष्मण का उर्मिला से, भरत का मांडवी से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से विवाह हुआ।
हर सुबह तिथि, राहु काल और आने वाले व्रत-त्योहार, WhatsApp पर एक छोटे संदेश में।चैनल फ़ॉलो करें
विवाह पंचमी मार्गशीर्ष (अगहन) शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। परंपरा के अनुसार इसी दिन जनकपुर में श्रीराम और सीता का विवाह हुआ था, इसलिए मिथिला, नेपाल के जनकपुर धाम और अयोध्या के मंदिरों में इस दिन राम-सीता का विवाह उत्सव होता है (Drik Panchang, नेपाल पर्यटन बोर्ड)। अपने शहर में पंचमी तिथि का समय विवाह पंचमी के पन्ने पर है।
यह कथा मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण के बालकांड (सर्ग 66–77) और गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के बालकांड (दोहा 206–361) में है; दोनों को हमने मूल पाठ में पढ़कर जाँचा। तिथि किसी में नहीं दी गई। वाल्मीकि विवाह का नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी बताते हैं, और मानस महीना बताता है: “हिम रितु अगहनु मासु सुहावा”, यानी हेमंत ऋतु का सुहावना अगहन मास। शुक्ल पंचमी की तिथि परंपरा से आई है।
व्रत और कथा की विधि
- Drik Panchang के अनुसार सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है और श्रीराम-सीता की मूर्ति या चित्र की पूजा धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, फल और पंचामृत से होती है।
- कथा के रूप में वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस से सीता स्वयंवर और विवाह का प्रसंग पढ़ा या सुना जाता है (Drik Panchang)। बालकांड के अंत में मानस स्वयं कहता है कि जो सीता-राम का विवाह प्रेम से गाते और सुनते हैं, उनके जीवन में सदा उत्सव रहता है (दोहा 361)।
- एक प्रचलित रीति है कि इस दिन कथा विवाह पर ही पूरी कर दी जाती है और आगे का प्रसंग नहीं पढ़ा जाता (वेबदुनिया, DNA हिंदी)।
- शाम को मंदिरों में राम-सीता का प्रतीकात्मक विवाह, झाँकियाँ, भजन-कीर्तन और मंगल गीत होते हैं (Drik Panchang)।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम-सीता विवाह
वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 31, 49–50 और 66–77 के अनुसार (संस्कृत पाठ और देसिराजु हनुमंत राव का अनुवाद, valmikiramayan.net; मुख्य श्लोक संस्कृत विकिस्रोत से मिलाए)।
विश्वामित्र का यज्ञ राम-लक्ष्मण की रक्षा में पूरा हुआ, तब वहाँ के ऋषियों ने राम से कहा कि मिथिला के राजा जनक एक बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। वहाँ एक अद्भुत धनुष है, जिस पर देवता, असुर या मनुष्य कोई डोरी नहीं चढ़ा सका। राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ मिथिला चल पड़े (सर्ग 31)।
रास्ते में गौतम ऋषि के आश्रम में राम-लक्ष्मण ने अहल्या के चरण छुए, और शाप से छिपी अहल्या फिर सबको दिखाई देने लगीं (सर्ग 49)। मिथिला पहुँचने पर राजा जनक अपने पुरोहित शतानंद के साथ विश्वामित्र का स्वागत करने आए और पूछा कि ये दो तेजस्वी युवक कौन हैं (सर्ग 50)।
अगली सुबह विश्वामित्र ने जनक से कहा कि ये दशरथ के पुत्र धनुष देखना चाहते हैं। जनक ने धनुष की कथा सुनाई: यह शिव का धनुष है, जो देवताओं ने निमि के छठे वंशज राजा देवरात को धरोहर के रूप में सौंपा था (सर्ग 66)।
फिर जनक ने सीता के बारे में बताया। एक बार यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय हल की रेखा से एक कन्या निकली। हल की रेखा (सीता) से मिलने के कारण उसका नाम सीता पड़ा। वह किसी माता के गर्भ से नहीं जन्मी थी, पर जनक ने उसे अपनी ही बेटी की तरह पाला (सर्ग 66.13–15)।
जनक ने प्रण किया था कि सीता “वीर्यशुल्का” है, यानी उसका विवाह केवल पराक्रम के मूल्य पर होगा, उसी से जो यह धनुष चढ़ा सके। कई राजा आए, पर कोई धनुष उठा भी न सका। रूठकर उन्होंने एक वर्ष तक मिथिला को घेरे रखा; तब जनक ने तप से देवताओं की सेना पाई और वे राजा भाग गए। जनक ने कहा कि यदि राम इस पर डोरी चढ़ा दें, तो वे सीता का विवाह उनसे कर देंगे (सर्ग 66.15–26)।
आठ पहियों वाली लोहे की पेटी में रखा वह धनुष पाँच हज़ार लोग बड़ी कठिनाई से खींचकर लाए। विश्वामित्र के कहने पर राम ने पेटी खोली, धनुष को बीच से पकड़कर सहज ही उठाया और डोरी चढ़ा दी। जब वे उसे कान तक खींच रहे थे, धनुष बीच से टूट गया। वज्र जैसा शब्द हुआ और धरती काँप उठी; विश्वामित्र, जनक और दोनों भाइयों के सिवा सब लोग मूर्च्छित हो गए (सर्ग 67.3–19)।
जनक ने कहा कि उनका प्रण पूरा हुआ और सीता राम की पत्नी बनकर जनक-कुल का यश बढ़ाएँगी। विश्वामित्र की सहमति से उन्होंने अपने मंत्री अयोध्या भेजे। तीन रात की यात्रा के बाद दूतों ने राजा दशरथ को समाचार दिया। दशरथ ने वसिष्ठ आदि से सलाह की और अगले ही दिन चल पड़े; चार दिन में वे मिथिला पहुँचे, जहाँ जनक ने उनका स्वागत किया और राम ने पिता के चरण छुए (सर्ग 67–69)।
जनक ने अपने छोटे भाई कुशध्वज को सांकाश्य नगर से बुलवाया। वसिष्ठ ने राम का इक्ष्वाकु वंश सुनाया और जनक ने निमि से चला अपना वंश। फिर जनक ने कहा कि वे सीता राम को और अपनी दूसरी बेटी उर्मिला लक्ष्मण को देते हैं। उन्होंने कहा: आज मघा नक्षत्र है; तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी में विवाह कीजिए (सर्ग 70–71; 71.24)।
तब विश्वामित्र ने वसिष्ठ की सहमति से कहा कि कुशध्वज की दो बेटियों का विवाह भरत और शत्रुघ्न से हो, ताकि दोनों कुल और गहरे जुड़ें। जनक ने प्रसन्न होकर यह मान लिया और कहा कि चारों विवाह एक ही दिन हों। दशरथ ने अपने हर पुत्र के लिए ब्राह्मणों को बहुत सी गायें दान कीं (सर्ग 72)।
विवाह के दिन वसिष्ठ ने मंडप के बीच वेदी बनाई और मंत्रों के साथ अग्नि स्थापित की। जनक सब आभूषणों से सजी सीता को लाए, उन्हें अग्नि के सामने राम के सम्मुख खड़ा किया और कहा: “इयं सीता मम सुता”, यह मेरी बेटी सीता है, तुम्हारे धर्म में साथ चलने वाली; इसका हाथ अपने हाथ में लो। यह छाया की तरह सदा तुम्हारे साथ रहेगी। यह कहकर उन्होंने मंत्रों से पवित्र जल राम के हाथों में छोड़ा, और आकाश से फूल बरसे (सर्ग 73.19–29)।
फिर जनक ने लक्ष्मण को उर्मिला का, भरत को मांडवी का और शत्रुघ्न को श्रुतकीर्ति का हाथ थामने को कहा। चारों भाइयों ने वसिष्ठ के मंत्रों के बीच अपनी पत्नियों के साथ अग्नि, वेदी, राजा जनक और ऋषियों की परिक्रमा की और अग्नि के तीन फेरे लिए। आकाश में दुंदुभियाँ बजीं, गंधर्वों ने गाया और अप्सराएँ नाचीं (सर्ग 73.30–39)।
अगली सुबह विश्वामित्र हिमालय की ओर चले गए। जनक ने बेटियों को बहुत सा धन, वस्त्र और सेना देकर विदा किया, और दशरथ अयोध्या के लिए चले। वाल्मीकि के अनुसार परशुराम इसी लौटते समय रास्ते में मिले: उन्होंने राम को विष्णु का धनुष चढ़ाने की चुनौती दी; राम ने वह धनुष चढ़ाया, और परशुराम महेंद्र पर्वत को लौट गए (सर्ग 74–76)।
अयोध्या में सजी हुई गलियों में सबका स्वागत हुआ, और रानियों ने सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति का आदर से स्वागत किया। वाल्मीकि कहते हैं कि राम और सीता का प्रेम एक-दूसरे के गुणों से दिन-दिन बढ़ता गया (सर्ग 77)।
रामचरितमानस में सीता-राम विवाह
गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 206–361 के अनुसार (गीता प्रेस का पाठ और संख्या, mnsgranth.com और swargarohan.org पर मिलाकर)।
मानस में विश्वामित्र अयोध्या आकर राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ पहले दुखी होते हैं, पर वसिष्ठ के समझाने पर दोनों पुत्रों को सौंप देते हैं। राम ताड़का को मारते हैं और यज्ञ की रक्षा करते हैं। फिर धनुष-यज्ञ की बात सुनकर दोनों भाई मुनि के साथ चल पड़ते हैं; रास्ते में राम के चरणों के स्पर्श से शिला बनी अहल्या का उद्धार होता है (दोहा 207–211)।
जनकपुर पहुँचने पर राजा जनक विश्वामित्र से मिलने आते हैं। दोनों भाइयों को देखकर वे अपनी सुध भूल जाते हैं और पूछते हैं कि कहीं वेदों का गाया ब्रह्म ही तो दो रूपों में नहीं आया। विश्वामित्र बताते हैं कि ये राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं (दोहा 214–216)।
अगली सुबह दोनों भाई गुरु की पूजा के लिए फूल लेने राजा की फुलवारी (पुष्पवाटिका) में जाते हैं। उसी समय सीता सखियों के साथ वहाँ के सरोवर में स्नान करके गिरिजा (पार्वती) के मंदिर में पूजा करने आती हैं। एक सखी दोनों राजकुमारों को देख आती है, और सीता उन्हें देखने चलती हैं (दोहा 226–229)।
कंगन और नूपुरों की ध्वनि सुनकर राम उस ओर देखते हैं और सीता को देखकर लक्ष्मण से कहते हैं कि यह वही जनक की पुत्री है जिसके लिए धनुष-यज्ञ हो रहा है। सीता भी लताओं की ओट से राम को देखती हैं और उन्हें मन में बसा लेती हैं (दोहा 230–234)।
मंदिर लौटकर सीता गौरी की स्तुति करती हैं। गौरी की मूर्ति मुस्कुराती है, माला खिसककर गिरती है, और गौरी आशीर्वाद देती हैं कि जिस साँवले, सुंदर वर पर तुम्हारा मन रीझा है, वही तुम्हें मिलेगा। उधर राम गुरु को सब सच-सच बता देते हैं, और विश्वामित्र आशीर्वाद देते हैं (दोहा 235–237)। यह फुलवारी का प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है।
मानस इसे “सीय स्वयंबर” कहता है। रंगभूमि में देश-देश के राजा बैठे हैं, और सीता सखियों के साथ लाई जाती हैं। भाट जनक का प्रण सुनाते हैं: जो शिव का यह कठोर धनुष तोड़ेगा, सीता उसी की होंगी। रावण और बाणासुर जैसे योद्धा धनुष देखकर चुपचाप चले गए थे; बाकी राजा पूरा ज़ोर लगाकर भी उसे उठा न सके (दोहा 240–251)।
दुखी जनक कहते हैं कि लगता है धरती वीरों से खाली हो गई है। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोध में उठ खड़े होते हैं, पर राम के संकेत पर शांत हो जाते हैं। तब विश्वामित्र कहते हैं: उठो राम, शिव का धनुष तोड़ो और जनक का दुख मिटाओ (दोहा 252–254)।
सीता की माता (मानस में उनका नाम सुनयना है) चिंता करती हैं कि यह कोमल राजकुमार इतना कठोर धनुष कैसे उठाएगा, और सीता मन ही मन देवताओं से प्रार्थना करती हैं। राम मन में गुरु को प्रणाम करते हैं, बड़ी फुर्ती से धनुष उठाते हैं, और पल भर में उसे बीच से तोड़ देते हैं; किसी ने देखा भी नहीं कि कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा (दोहा 255–261)।
चारों ओर जय-जयकार होती है। सखियों के कहने पर सीता राम के गले में जयमाला पहनाती हैं, और देवता फूल बरसाते हैं (दोहा 262–264)।
मानस के अनुसार धनुष टूटने की खबर सुनकर परशुराम उसी सभा में आ पहुँचते हैं। वे बहुत क्रोधित होते हैं; लक्ष्मण उन्हें तीखे उत्तर देते हैं और राम विनम्रता से उन्हें शांत करते हैं। अंत में परशुराम राम से विष्णु का धनुष चढ़ाने को कहते हैं; धनुष अपने आप राम के पास चला जाता है, और परशुराम राम को पहचानकर उनकी स्तुति करते हैं और तप के लिए वन चले जाते हैं (दोहा 268–285)।
विश्वामित्र जनक से कहते हैं कि विवाह तो धनुष पर टिका था और धनुष टूटते ही हो गया; अब कुल की रीति से विवाह कीजिए और अयोध्या दूत भेजिए। जनक की पत्रिका पढ़कर दशरथ, भरत और पूरा अवध आनंद से भर जाता है, और बड़ी बारात जनकपुर पहुँचती है (दोहा 286–309)।
लग्न का दिन आता है: हेमंत ऋतु और सुहावना अगहन (मार्गशीर्ष) का महीना। ब्रह्मा जी लग्न शोधकर नारद के हाथ भेजते हैं, और जनक के ज्योतिषियों ने भी वही गणना की थी। गोधूलि की बेला में विवाह आरंभ होता है (दोहा 312)।
स्त्रियाँ मंगल गीत गाती हुई दूल्हे राम का परछन करती हैं, और सीता की माता आनंद से उनकी आरती उतारती हैं; फिर सखियाँ सीता को मंडप में लाती हैं। जनक और सुनयना राम के चरण धोते हैं और जनक सीता को राम को सौंपते हैं। दोनों कुलगुरु शाखोच्चार करते हैं, पाणिग्रहण होता है, हवन के बाद गाँठ जोड़ी जाती है और फेरे होते हैं। फिर राम सीता की माँग में सिंदूर भरते हैं, और वसिष्ठ के कहने पर वर-वधू एक आसन पर बैठते हैं (दोहा 317–325)।
इसके बाद वसिष्ठ की आज्ञा से जनक उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति को बुलवाते हैं। अपने भाई कुशकेतु की बड़ी बेटी मांडवी का विवाह भरत से, सीता की छोटी बहन उर्मिला का लक्ष्मण से और श्रुतकीर्ति का शत्रुघ्न से उसी रीति से होता है। चारों जोड़ियों को एक मंडप में देखकर दशरथ आनंद से भर जाते हैं (दोहा 325)। बहुत दिन के सत्कार के बाद बारात लौटती है और अयोध्या में उत्सव होता है (दोहा 326–361)।
कथा के अलग-अलग रूप
- परशुराम कहाँ मिले: मानस में जनकपुर की सभा में, धनुष टूटते ही, जहाँ लक्ष्मण से उनका संवाद होता है (दोहा 268–285); वाल्मीकि रामायण में विवाह के बाद अयोध्या लौटते समय रास्ते में, और लक्ष्मण से कोई संवाद नहीं (सर्ग 74–76)।
- फुलवारी (पुष्पवाटिका) में राम-सीता का पहला दर्शन और सीता की गौरी पूजा केवल रामचरितमानस में है (दोहा 226–237); वाल्मीकि रामायण में नहीं।
- स्वयंवर या पराक्रम का प्रण: वाल्मीकि में सीता “वीर्यशुल्का” हैं, यानी उनका विवाह पराक्रम के मूल्य पर होना था; राम धनुष विश्वामित्र, जनक और हज़ारों लोगों के सामने तोड़ते हैं, उस दिन राजाओं की कोई सभा नहीं है, और राजा पहले ही हारकर मिथिला को एक वर्ष घेर चुके थे (सर्ग 66–67)। मानस इसे “सीय स्वयंबर” कहता है, राजाओं की भरी सभा में धनुष टूटता है और सीता जयमाला पहनाती हैं (दोहा 240–264)।
- अहल्या: वाल्मीकि में वे शाप से सबके लिए अदृश्य होकर आश्रम में तप करती थीं, और राम-लक्ष्मण उनके चरण छूते हैं (सर्ग 49); मानस में वे शिला थीं और राम के चरणों के स्पर्श से मुक्त हुईं (दोहा 210–211)।
- जनक के छोटे भाई का नाम वाल्मीकि में कुशध्वज (सांकाश्य के राजा) है और मानस में कुशकेतु; मांडवी और श्रुतकीर्ति दोनों में उन्हीं की बेटियाँ हैं। सीता की माता का नाम (सुनयना) मानस में है, वाल्मीकि के इन सर्गों में नहीं।
- विवाह का दिन: वाल्मीकि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र बताते हैं (सर्ग 71.24, 72.13), मानस अगहन मास और गोधूलि बेला (दोहा 312); शुक्ल पंचमी की तिथि किसी में नहीं है, वह परंपरा से है।
कथा के बाद
कथा के बाद श्रीराम-सीता की पूजा, भजन-कीर्तन और मंगल गीत होते हैं, और शाम को मंदिरों में राम-सीता का विवाह उत्सव (Drik Panchang)। अपने शहर में पंचमी तिथि का समय विवाह पंचमी के पन्ने पर है।
श्री राम स्तुति: श्री रामचंद्र कृपालु भजु मनअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विवाह पंचमी की कथा क्या है?
यह श्रीराम और सीता के विवाह की कथा है। विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को मिथिला ले गए, जहाँ राजा जनक का प्रण था कि जो शिव का धनुष चढ़ा दे, सीता उसी की होंगी। राम ने धनुष उठाकर तोड़ दिया, अयोध्या से राजा दशरथ बारात लेकर आए, और एक ही दिन चारों भाइयों का विवाह हुआ: राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति (वाल्मीकि रामायण, बालकांड 66–73; रामचरितमानस, बालकांड)।
क्या रामायण में लिखा है कि विवाह पंचमी को हुआ था?
नहीं, तिथि नहीं लिखी। वाल्मीकि रामायण में जनक विवाह के लिए उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का दिन चुनते हैं (बालकांड 71.24)। रामचरितमानस में महीना दिया है: हेमंत ऋतु का अगहन मास, और विवाह गोधूलि बेला में (बालकांड, दोहा 312)। मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को विवाह का दिन मानना परंपरा है, जिसे Drik Panchang और नेपाल पर्यटन बोर्ड जैसे स्रोत बताते हैं।
क्या सीता का स्वयंवर हुआ था?
रामचरितमानस इसे “सीय स्वयंबर” कहता है: राजाओं की सभा में राम धनुष तोड़ते हैं और सीता उन्हें जयमाला पहनाती हैं (दोहा 240–264)। वाल्मीकि रामायण में सीता “वीर्यशुल्का” हैं, यानी उनका विवाह पराक्रम के प्रण से होना था; वहाँ राम धनुष विश्वामित्र और जनक के सामने तोड़ते हैं और जयमाला का उल्लेख नहीं है (बालकांड 66–67)।
क्या विवाह पंचमी के दिन शादी नहीं करते?
यह एक लोक मान्यता है, शास्त्र का नियम नहीं। ETV भारत (दरभंगा, 2020) और DNA हिंदी (2022) के अनुसार मिथिला में कई परिवार इस दिन बेटियों का विवाह नहीं करते, क्योंकि विवाह के बाद सीता जी का जीवन कष्टों से भरा रहा; वेबदुनिया यही बात नेपाल के लिए भी कहता है। दूसरी ओर नेपाल पर्यटन बोर्ड इस दिन को विवाह के लिए शुभ बताता है। अपने परिवार की रीति के लिए अपने पुरोहित से पूछें।
परशुराम राम से कहाँ मिले थे?
रामचरितमानस में परशुराम धनुष टूटने की खबर सुनकर जनकपुर की सभा में आते हैं, लक्ष्मण से उनका तीखा संवाद होता है, और विष्णु का धनुष राम के पास चले जाने पर वे राम को पहचानकर वन चले जाते हैं (बालकांड, दोहा 268–285)। वाल्मीकि रामायण में वे विवाह के बाद अयोध्या लौटती बारात को रास्ते में मिलते हैं, और राम के विष्णु का धनुष चढ़ाने पर महेंद्र पर्वत लौट जाते हैं (बालकांड 74–76)।
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 31, 49–50, 66–77 (संस्कृत पाठ और देसिराजु हनुमंत राव का अनुवाद, valmikiramayan.net; संस्कृत विकिस्रोत)
- गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 206–361 (गीता प्रेस का पाठ, mnsgranth.com और swargarohan.org)
- Drik Panchang: विवाह पंचमी 2026; विवाह पंचमी व्रत कथा
- नेपाल पर्यटन बोर्ड (ntb.gov.np): विवाह पंचमी
- द राइजिंग नेपाल (2022) और द हिमालयन टाइम्स (2017): जनकपुर धाम में विवाह पंचमी; अमर उजाला (2024): अयोध्या से जनकपुर राम बारात
- ETV भारत, दरभंगा (2020), DNA हिंदी (2022) और वेबदुनिया: मिथिला में विवाह पंचमी पर विवाह न करने की मान्यता
- अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Vivaha Panchami
कुछ गलत लगा? गलती बताएँ
