व्रत कथा

आमलकी एकादशी व्रत कथा

आमलकी एकादशी: गुरुवार, 18 मार्च 2027

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मार्च 2027 की एकादशी की तारीखें लिखा चित्र: 4 मार्च: विजया एकादशी, 18 मार्च: आमलकी एकादशी, साथ में नई दिल्ली का पारण समय
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संक्षेप में

पद्म पुराण (उत्तर खंड) में आमलकी एकादशी की कथा वसिष्ठ मुनि राजा मांधाता को सुनाते हैं: प्रलय के बाद परमात्मा के मुख से गिरी एक बूँद से आँवले का वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसमें सब देवताओं का वास है, और स्वयं भगवान ने ऋषियों को फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर आँवले के नीचे जागरण और परशुराम जी की पूजा का व्रत बताया। लोक में इस दिन एक बहेलिए की कथा भी सुनाई जाती है, जो वैदिश नगर में इस एकादशी का जागरण देखते हुए रात भर भूखा जागा और अगले जन्म में राजा वसुरथ बना; यह कथा पद्म पुराण में नहीं है।

आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल एकादशी को, होली से कुछ दिन पहले आती है। आमलकी आँवले का संस्कृत नाम है: इस दिन आँवले के वृक्ष के पास भगवान विष्णु की पूजा, उपवास और रात्रि जागरण होता है। पूजा के बाद कथा पढ़ी या सुनी जाती है।

पद्म पुराण के उत्तर खंड में इस एकादशी के अध्याय में कोई मनुष्य-कथा नहीं है: उसमें आँवले की उत्पत्ति, उसकी महिमा और व्रत की पूरी विधि है। Drik Panchang, व्रत-कथा की वेबसाइटें और ISKCON की पुस्तक इस दिन एक बहेलिए और राजा वसुरथ की कथा सुनाते हैं। इसलिए इस पन्ने पर पहले पद्म पुराण का प्रसंग हमारे शब्दों में है, और उसके बाद वह लोक-कथा, अलग से।

व्रत और कथा की विधि

  • पद्म पुराण के अनुसार एकादशी की सुबह दातुन करके यह संकल्प लिया जाता है: “हे कमलनयन अच्युत, मैं एकादशी को निराहार रहकर अगले दिन भोजन करूँगा; आप मेरी शरण हों।” उस दिन पतित, चोर, पाखंडी और दुराचारी लोगों से बात नहीं की जाती।
  • दोपहर बाद नदी, तालाब, कुएँ या घर पर स्नान, पहले शरीर पर मिट्टी लगाकर। फिर अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने की परशुराम जी की छोटी प्रतिमा बनवाकर घर पर पूजा और होम।
  • फिर सब सामग्री लेकर आँवले के वृक्ष के पास जाएँ, चारों ओर की भूमि साफ़ करें, और वहाँ जल से भरा कलश स्थापित करें: उसमें पंचरत्न और सुगंध, गले में माला, सफ़ेद चंदन, पास में छाता और जूते, चारों ओर धूप और दीपों की पंक्ति। कलश पर खील (लाजा) से भरा पात्र और उस पर परशुराम जी की प्रतिमा रखकर, भगवान के नामों से उनके अंगों की पूजा और एक फल से अर्घ्य।
  • रात भर भक्ति से जागरण: गीत, वाद्य, धर्म की कथाएँ और स्तुति। भगवान विष्णु के नाम लेते हुए आँवले की 108 या 28 परिक्रमाएँ।
  • द्वादशी की सुबह श्रीहरि की आरती, ब्राह्मण का सम्मान करके उसे परशुराम जी का कलश, दो वस्त्र और जूते दान, फिर आँवले को छूकर परिक्रमा, स्नान, ब्राह्मणों को भोजन, और उसके बाद परिवार के साथ भोजन।
  • आँवले का पेड़ पास न हो, तो परिवार अपनी परंपरा से पूजा का रूप चुनते हैं; ISKCON की पुस्तक ऐसे में तुलसी की पूजा का सुझाव देती है।

पद्म पुराण: आँवले की उत्पत्ति और आमलकी व्रत

पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 45 (गीता प्रेस के संस्करण में 47) के अनुसार; संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर। इस अध्याय में कोई मनुष्य-कथा नहीं है।

युधिष्ठिर ने कहा, "श्रीकृष्ण, मैंने विजया एकादशी का महान फल देने वाला माहात्म्य सुना। अब फाल्गुन के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम बताइए।" श्रीकृष्ण बोले, "धर्मपुत्र, सुनो। मैं तुम्हें वह प्रसंग सुनाता हूँ, जो राजा मांधाता के पूछने पर महात्मा वसिष्ठ ने कहा था।"

वसिष्ठ बोले, "फाल्गुन शुक्ल की एकादशी का नाम आमलकी है। इसका पवित्र व्रत भगवान विष्णु के लोक तक पहुँचाता है। इस दिन आँवले के पेड़ के नीचे जाकर रात को जागरण करने से हज़ार गायों के दान का फल मिलता है।" मांधाता ने पूछा, "द्विजश्रेष्ठ, यह आमलकी कब उत्पन्न हुई? यह पवित्र और पाप नाश करने वाली क्यों है? मुझे बड़ा कौतूहल है।"

वसिष्ठ बोले, "महाभाग, सुनो कि आँवला पृथ्वी पर कैसे आया। बहुत पहले, जब सब कुछ एक ही समुद्र में डूबा था और चर-अचर, देवता, असुर, नाग और राक्षस, सब नष्ट हो चुके थे, तब सनातन परमात्मा अपने अविनाशी पद में स्थित थे। उनके मुख से चंद्रमा जैसी चमकती एक बूँद निकलकर धरती पर गिरी। उसी बूँद से आँवले का विशाल वृक्ष उत्पन्न हुआ, बहुत-सी शाखाओं वाला और फलों के भार से झुका हुआ। इसे सब वृक्षों में पहला कहा गया है।"

"फिर सृष्टि हुई, और देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, नाग और निर्मल मन वाले महर्षि उत्पन्न हुए। देवता और ऋषि वहाँ आए जहाँ भगवान का प्रिय यह आँवला खड़ा था, और उसे देखकर चकित रह गए: इस पेड़ को वे नहीं जानते थे। तभी आकाशवाणी हुई, ‘यह आमलकी है, सबसे श्रेष्ठ वृक्ष, भगवान विष्णु का प्रिय। इसके स्मरण से गोदान का फल मिलता है, छूने से उसका दुगना और धारण करने से तिगुना। इसलिए सदा इसकी सेवा करो; यह सब पाप हरता है।’"

"‘इसकी जड़ में विष्णु रहते हैं, उसके ऊपर ब्रह्मा, तने में भगवान रुद्र, शाखाओं में सब मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में भी देवता, फूलों में मरुद्गण, और फलों में सब प्रजापति। यह धात्री सब देवताओं से भरी है, इसलिए विष्णु के भक्तों के लिए परम पूज्य है।’ ऋषियों ने पूछा, ‘आप कौन हैं? देवता हैं या कोई और?’ वाणी बोली, ‘जो सब प्राणियों और सब लोकों का कर्ता है, वही सनातन विष्णु मैं हूँ।’"

"यह सुनकर ब्रह्मा के पुत्र उन ऋषियों ने अनादि-अनंत भगवान की स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवान ने पूछा, ‘तुम्हें क्या वर दूँ?’ ऋषि बोले, ‘भगवन्, हमारे हित के लिए कोई ऐसा व्रत बताइए जो स्वर्ग और मोक्ष दे, धन-धान्य दे, थोड़े श्रम में बहुत फल दे, और जिससे मनुष्य विष्णु-लोक में सम्मान पाए।’"

"भगवान विष्णु बोले, ‘फाल्गुन शुक्ल पक्ष में यदि द्वादशी पुष्य नक्षत्र से युक्त हो, तो वह बड़ा पुण्य देने वाली और बड़े पापों का नाश करने वाली होती है। आमलकी एकादशी को आँवले के पास जाकर रात को जागरण करो; इससे मनुष्य सब पापों से छूटता है और हज़ार गायों के दान का फल पाता है।’ ऋषियों के पूछने पर भगवान ने इसकी पूरी विधि बताई, जो ऊपर दी गई है: संकल्प, मिट्टी लगाकर स्नान, परशुराम जी की प्रतिमा, आँवले के नीचे कलश-पूजा, जागरण और परिक्रमा, और द्वादशी को दान और भोजन।"

"भगवान ने कहा कि इस विधि से व्रत करने पर सब तीर्थों और सब दानों का पुण्य, और सब यज्ञों से भी अधिक फल मिलता है। इतना कहकर वे वहीं अंतर्धान हो गए, और उन सब ऋषियों ने यह व्रत पूरी विधि से किया।" वसिष्ठ बोले, "राजेंद्र, तुम्हें भी यह व्रत करना चाहिए।" अंत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह कठिन व्रत मनुष्य को सब पापों से मुक्त करता है।

बहेलिया और राजा वसुरथ: लोक में प्रचलित कथा

यह कथा पद्म पुराण के आमलकी अध्याय में नहीं है। यह Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की Ekadasi पुस्तक में मिलती है, जिनमें वसिष्ठ इसे मांधाता को सुनाते हैं। ISKCON की पुस्तक इसे ब्रह्मांड पुराण की बताती है; हमने इसे वहाँ नहीं जाँचा, इसलिए इसे लोक में प्रचलित कथा के रूप में दे रहे हैं।

लोक में प्रचलित कथा के अनुसार वैदिश नाम का एक नगर था, जहाँ चारों वर्णों के लोग सुख से रहते थे और सदा वेद-पाठ गूँजता था। वहाँ कोई पापी या नास्तिक न था। वहाँ चंद्रवंशी राजा चैत्ररथ राज करते थे, जो विद्वान और धर्मात्मा थे। उनके राज्य में कोई दरिद्र या कंजूस न था, और बच्चे-बूढ़े सब भगवान विष्णु के भक्त थे और हर एकादशी का व्रत करते थे।

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। राजा और सारी प्रजा ने प्रसन्नता से व्रत रखा। सब मंदिर में गए, कलश स्थापित किया, और धूप, दीप, नैवेद्य और पंचरत्न से आँवले की पूजा की। उन्होंने प्रार्थना की, "हे धात्री, तुम सब पापों का नाश करने वाली हो; हमारा अर्घ्य स्वीकार करो।" रात को सबने वहीं जागरण किया।

उसी रात वहाँ एक बहेलिया आया। वह जीवों को मारकर अपने परिवार का पेट पालता था और बड़ा पापी था। भूख-प्यास से व्याकुल वह कुछ खाने को मिलने की आशा में मंदिर के एक कोने में बैठ गया। वहाँ बैठे-बैठे वह भगवान विष्णु की कथा और एकादशी का माहात्म्य सुनता रहा, और दूसरों की तरह सारी रात जागता रहा।

सुबह सब अपने घर चले गए, और बहेलिया भी घर जाकर भोजन कर लिया। कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। जीव-हिंसा के कारण उसे नरक मिलना था, पर उस रात के उपवास और जागरण के पुण्य से उसका जन्म राजा विदूरथ के घर हुआ और उसका नाम वसुरथ रखा गया।

बड़ा होकर वसुरथ राजा बना। वह तेज में सूर्य जैसा, कांति में चंद्रमा जैसा, पराक्रम में विष्णु जैसा और क्षमा में पृथ्वी जैसा था। वह धर्मात्मा, सत्यवादी और विष्णु-भक्त था, प्रजा को समान भाव से पालता था और रोज़ दान करता था।

एक दिन वसुरथ शिकार पर गया और वन में रास्ता भटक गया। थककर वह एक पेड़ के नीचे सो गया। तभी कुछ हथियारबंद लोग आए जो उसे अपना शत्रु मानते थे, और बोले, "इसी राजा ने हमारे परिवार वालों को मारा और हमें देश से निकाला; आज इसे मार डालो।" वे उस पर तरह-तरह के हथियार चलाने लगे।

पर उनके हथियार राजा के शरीर को छूते ही नष्ट हो जाते, और उसे फूलों जैसे लगते। फिर उनके हथियार उल्टे उन्हीं पर पड़ने लगे और वे बेसुध होने लगे। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं: बहुत सुंदर, आभूषणों से सजी, पर भौंहें तनी हुईं और आँखों से क्रोध की ज्वाला निकलती हुई। उन्होंने पल भर में उन सब शत्रुओं को मार डाला।

राजा जागा तो चारों ओर शत्रुओं को मरा देखकर चकित हुआ: "इन्हें किसने मारा? इस वन में मेरा हितैषी कौन है?" तभी आकाशवाणी हुई, "राजन्, भगवान विष्णु के सिवा तुम्हारी रक्षा और कौन कर सकता है?" यह सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया, अपने नगर लौटा और सुख से राज करने लगा।

कथा के अंत में वसिष्ठ कहते हैं कि यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था; जो इसका व्रत करता है, वह हर काम में सफल होता है और अंत में विष्णु-लोक जाता है।

कथा के अलग-अलग रूप

  • पद्म पुराण के संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में इस अध्याय में बहेलिए या वसुरथ की कथा नहीं है; वहाँ आँवले की उत्पत्ति, उसकी महिमा और व्रत की विधि ही है। बहेलिए की कथा Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की पुस्तक में है।
  • राजा का नाम Drik Panchang में चैत्ररथ, भक्ति भारत में चैतरथ, और ISKCON की पुस्तक में पाशबिंदुक है, जिन्हें चित्ररथ भी कहा गया। ISKCON की पुस्तक वसुरथ का राज्य जयंती बताती है; Drik Panchang और भक्ति भारत उसे दस हज़ार गाँवों का पालक कहते हैं।
  • ISKCON की पुस्तक में बहेलिया छिपकर उत्सव देखता है, और देवी अपने जलते चक्र से शत्रुओं को मारती हैं; उसमें पूजा परशुराम जी की भी होती है। Drik Panchang और भक्ति भारत में शत्रुओं के हथियार उन्हीं पर उलट जाते हैं।
  • जिस बूँद से आँवला उत्पन्न हुआ, वह गीता प्रेस और Drik Panchang के अनुसार भगवान विष्णु के मुख से गिरी; देशपांडे का अनुवाद इसे ब्रह्मा के मुख से गिरी बूँद पढ़ता है। संस्कृत पाठ में यहाँ “ब्रह्ममुखात्” है, जिसे दोनों तरह पढ़ा गया है।
  • पद्म पुराण में आँवले के पत्तों में देवताओं का वास बताया गया है; गीता प्रेस यहाँ वसुओं का नाम लेता है। संस्कृत पाठ आँवले को धारण करने से तिगुना पुण्य बताता है; गीता प्रेस फल खाने से। गीता प्रेस परशुराम जी के अर्घ्य का एक मंत्र भी देता है, जो संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में नहीं है।

कथा के बाद

कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, और रात को आँवले के पास जागरण और परिक्रमा की जाती है। व्रत अगले दिन द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय आमलकी एकादशी के पन्ने पर है।

एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आमलकी एकादशी की कथा किस पुराण में है?

पद्म पुराण के उत्तर खंड में आँवले की उत्पत्ति और व्रत की विधि है, जो वसिष्ठ मुनि राजा मांधाता को बताते हैं (संस्कृत विकिस्रोत और देशपांडे में अध्याय 45, गीता प्रेस में 47)। बहेलिए और राजा वसुरथ की कथा उसमें नहीं है; ISKCON की पुस्तक उसे ब्रह्मांड पुराण की बताती है, जिसे हमने नहीं जाँचा।

आमलकी एकादशी पर आँवले की पूजा क्यों होती है?

पद्म पुराण के अनुसार आँवला परमात्मा के मुख से गिरी बूँद से उत्पन्न हुआ, उसकी जड़ में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा और तने में रुद्र का वास है, और स्वयं भगवान ने इस दिन आँवले के नीचे जागरण का व्रत बताया।

आमलकी एकादशी पर परशुराम जी की पूजा क्यों?

पद्म पुराण में इस व्रत की विधि में आँवले के नीचे कलश पर परशुराम (जामदग्न्य) की सोने की प्रतिमा रखकर पूजा करने और अगले दिन उसे दान करने को कहा गया है, यह भावना करते हुए कि परशुराम के रूप में भगवान केशव प्रसन्न हों।

आमलकी एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?

परंपरा में एकादशी के दिन आँवले और भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले, और रात के जागरण में।

स्रोत

  1. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 45, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है; गीता प्रेस के संस्करण में 47)
  2. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 45, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
  3. गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य, संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 26–31 (पद्म पुराण पर आधारित)
  4. ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: आमलकी एकादशी (iskcondesiretree.com)
  5. Drik Panchang: आमलकी एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
  6. भक्ति भारत: आमलकी एकादशी व्रत कथा (bhaktibharat.com)

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