जया एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। इंद्र की सभा में गाते समय गंधर्व माल्यवान और पुष्पवती एक-दूसरे पर मोहित होकर सुर और ताल भूल जाते हैं, और इंद्र उन्हें पिशाच होने का शाप देते हैं। हिमालय की ठंड में दुख भोगते हुए माघ शुक्ल एकादशी को वे बिना कुछ खाए-पिए पीपल के नीचे बैठे रहते हैं और रात भर जागते हैं। अगली सुबह, द्वादशी को, भगवान विष्णु की कृपा से उनका पिशाच रूप छूट जाता है और वे स्वर्ग लौट जाते हैं।
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जया एकादशी माघ शुक्ल एकादशी को आती है। पद्म पुराण इसे सब पापों को हरने वाली, और पिशाच और प्रेत योनि से छुड़ाने वाली एकादशी कहता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और उपवास होता है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है। ISKCON के कैलेंडर में इसे भैमी एकादशी भी कहते हैं।
यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है, जहाँ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण इसे सुनाते हैं। हमने इसे संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर, और Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक से तुलना करके, अपने शब्दों में लिखा है।
व्रत और कथा की विधि
- पद्म पुराण में इस एकादशी की अलग से कोई विस्तृत विधि नहीं दी गई; व्रत सामान्य एकादशी की तरह भगवान विष्णु की पूजा, उपवास और रात्रि जागरण से किया जाता है।
- कथा में माल्यवान और पुष्पवती उस दिन न अन्न खाते हैं, न जल पीते हैं, न किसी जीव को मारते हैं, न फल-पत्ते खाते हैं, और रात भर जागते रहते हैं; ग्रंथ इसे ही उनका व्रत और जागरण मानता है।
माल्यवान और पुष्पवती की कथा
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 43 के अनुसार (गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है); संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।
युधिष्ठिर ने कहा, "श्रीकृष्ण, आप ही आदिदेव हैं; आप ही सब जीवों के रचने वाले, पालने वाले और संहार करने वाले हैं। आपने माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी बताई। अब कृपा करके बताइए कि शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है, उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा होती है?"
श्रीकृष्ण बोले, "राजेंद्र, माघ के शुक्ल पक्ष की एकादशी जया नाम से प्रसिद्ध है। यह सब पापों को हरने वाली, पवित्र करने वाली, इच्छाएँ पूरी करने वाली और मोक्ष देने वाली है। यह ब्रह्महत्या के पाप को भी दूर करती है और पिशाच-योनि का नाश करती है; इसका व्रत करने वाला कभी प्रेत नहीं बनता। इसलिए इसे यत्न से करना चाहिए। अब इसकी पुरानी शुभ कथा सुनो।"
एक बार स्वर्ग में इंद्र राज्य कर रहे थे। देवता वहाँ सुख से रहते थे, अमृत पीते थे और अप्सराएँ उनकी सेवा करती थीं। पारिजात के पेड़ों से भरे नंदन वन में एक दिन इंद्र ने प्रसन्न होकर नृत्य और गान का आयोजन किया। वहाँ गंधर्व पुष्पदंत और चित्रसेन गा रहे थे।
चित्रसेन की पत्नी मालिनी की एक बेटी थी, पुष्पवती। पुष्पदंत गंधर्व का बेटा था माल्यवान। माल्यवान पुष्पवती के रूप पर मोहित था, और पुष्पवती ने भी अपनी चितवन से उसका मन बाँध लिया था। उस दिन दोनों इंद्र को प्रसन्न करने के लिए वहाँ गाने आए थे।
गाते हुए दोनों एक-दूसरे को ही देखते रहे। मन भटक गया, तो वे शुद्ध गान न गा सके: कभी ताल टूट जाती, कभी गीत रुक जाता। इंद्र समझ गए कि दोनों का मन कहाँ है, और इसे अपना अपमान मानकर क्रोधित हो उठे।
इंद्र ने शाप दिया, "धिक्कार है तुम दोनों मूर्खों पर! तुमने मेरी आज्ञा तोड़ी है। तुम पति-पत्नी के रूप में पिशाच बनकर मृत्युलोक जाओ और अपने कर्म का फल भोगो।"
शाप से दुखी वे दोनों हिमालय पर्वत पर जा पहुँचे और पिशाच बन गए। वे भूल गए कि वे कभी गंधर्व थे। उन्हें न रात में नींद आती, न चैन मिलता। एक-दूसरे से अपना दुख कहते हुए वे पहाड़ की गुफाओं में भटकते रहते। बर्फ़ की ठंड से उनके दाँत किटकिटाते और रोंगटे खड़े रहते।
एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी से कहा, "हमने ऐसा कौन-सा भयानक पाप किया कि अपने ही बुरे कर्म से यह पिशाच-योनि मिली? नरक भयानक है, और पिशाच होना भी उतना ही दुखदायी है। इसलिए पूरे प्रयत्न से पाप से बचना चाहिए।" इसी चिंता में वे दुख से सूखते जा रहे थे।
संयोग से माघ मास की शुक्ल एकादशी आई, जो जया नाम से प्रसिद्ध है। उस दिन दुख के कारण दोनों ने न कुछ खाया, न जल पिया। उन्होंने न किसी जीव को मारा, न कोई पत्ता या फल खाया। वे दिन भर एक पीपल के पेड़ के पास दुखी बैठे रहे।
सूरज डूब गया और भयानक, प्राण लेने वाली ठंडी रात आई। काँपते हुए वे एक-दूसरे से लिपटकर धरती पर लेटे रहे, पर न नींद आई, न कोई सुख मिला। इस तरह इंद्र के शाप से पीड़ित उनकी वह रात बीती, और द्वादशी के दिन सूरज निकला।
श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैंने मन में उनकी मुक्ति का निश्चय कर लिया था, क्योंकि उनसे जया का व्रत और रात का जागरण पूरा हो गया था।" द्वादशी के दिन, भगवान विष्णु के प्रभाव से, उनका पिशाच रूप छूट गया। पुष्पवती और माल्यवान फिर अपने पहले रूप में आ गए, उसी पुराने प्रेम और उन्हीं आभूषणों के साथ, और विमान पर बैठकर स्वर्ग चले गए।
उन्होंने जाकर प्रसन्नता से इंद्र को प्रणाम किया। उन्हें इस रूप में देखकर इंद्र चकित हुए और बोले, "बताओ, किस पुण्य से तुम्हारा पिशाच रूप छूटा? तुम मेरे शाप में बँधे थे; तुम्हें किस देवता ने छुड़ाया?" माल्यवान बोला, "स्वामी, भगवान वासुदेव की कृपा और जया एकादशी के व्रत से हमारा पिशाच रूप छूटा है।"
इंद्र बोले, "तब तुम दोनों पवित्र हो गए हो और मेरे लिए भी वंदनीय हो। जो हरि के दिन का व्रत करते हैं और भगवान की शरण में रहते हैं, वे मनुष्य हम देवताओं के लिए भी पूज्य हैं। अब पुष्पवती के साथ सुख से स्वर्ग में रहो।"
कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं, "इसलिए राजन्, एकादशी का व्रत करना चाहिए। जया ब्रह्महत्या का पाप भी हर लेती है। जिसने जया का व्रत किया, उसने मानो सब दान दे दिए और सब यज्ञ कर लिए।" कथा के अनुसार व्रती बहुत लंबे समय तक वैकुंठ में आनंद पाता है, और इस कथा को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- पुष्पवती का नाम पद्म पुराण के संस्कृत पाठ में “पुष्पदंती” है, गीता प्रेस में “पुष्पवंती”, और Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक में “पुष्पवती”; हमने प्रचलित नाम लिया है।
- संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में माल्यवान गंधर्व पुष्पदंत का बेटा है और पुष्पवती चित्रसेन और मालिनी की बेटी। ISKCON की पुस्तक में माल्यवान चित्रसेन और मालिनी का बेटा है और पुष्पवती एक अप्सरा; Drik Panchang पुष्पवती को गंधर्व-कन्या कहता है।
- संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में उस दिन दोनों फल भी नहीं खाते; Drik Panchang में वे केवल फल-फूल खाकर दिन बिताते हैं।
- Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक में इंद्र कहते हैं कि भगवान विष्णु और भगवान शिव, दोनों के भक्त देवताओं के लिए भी वंदनीय हैं; संस्कृत पाठ में यहाँ केवल हरि के भक्तों की बात है। गीता प्रेस में इंद्र उन्हें अमृत पीने को कहते हैं।
- व्रत का फल संस्कृत पाठ में करोड़ों कल्पों तक वैकुंठ का आनंद है; Drik Panchang में हज़ार वर्ष तक स्वर्ग। Drik Panchang के रूप में श्रीकृष्ण यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं। ISKCON की पुस्तक इसे भविष्योत्तर पुराण की बताती है, पर उसी में श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि यह प्रसंग वे पद्म पुराण में कह चुके हैं, जैसा संस्कृत पाठ में भी है।
कथा के बाद
कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, और रात को जागरण किया जाता है। व्रत अगले दिन द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय जया एकादशी के पन्ने पर है।
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जया एकादशी की कथा किस पुराण में है?
पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। संस्कृत विकिस्रोत और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 43 है; गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है।
जया एकादशी का व्रत क्यों किया जाता है?
पद्म पुराण के अनुसार यह सब पापों को हरती है और पिशाच और प्रेत योनि से मुक्ति देती है; कथा में इसी व्रत से माल्यवान और पुष्पवती इंद्र के शाप से छूटते हैं।
जया एकादशी को भैमी एकादशी क्यों कहते हैं?
ISKCON का कैलेंडर और उसकी Ekadasi पुस्तक माघ शुक्ल एकादशी को भैमी एकादशी भी कहते हैं। इस नाम का कारण पद्म पुराण के इस अध्याय में नहीं दिया गया, इसलिए हम उस पर कुछ नहीं जोड़ते।
जया एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?
परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले। पद्म पुराण के अनुसार इसे पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
स्रोत
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 43, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 43, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
- गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य, संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 21–23 (पद्म पुराण पर आधारित)
- ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: भैमी (जया) एकादशी (iskcondesiretree.com)
- Drik Panchang: जया एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
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