मोक्षदा एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। चंपक नगर के राजा वैखानस ने सपने में अपने पिता और पितरों को नरक में दुख भोगते देखा। पर्वत मुनि ने ध्यान लगाकर बताया कि पिछले जन्म में पिता ने अपनी पत्नी के प्रति पति का धर्म नहीं निभाया था, और उपाय बताया: मार्गशीर्ष शुक्ल की मोक्षदा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य पिता को दे दो। राजा ने ऐसा ही किया, और पुण्य देते ही उनके पिता नरक से छूटकर स्वर्ग चले गए।
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मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को आती है। पद्म पुराण इसे सब पापों को हरने वाली और मोक्ष देने वाली एकादशी कहता है, और बताता है कि इसका पुण्य देने से अपने पापों के कारण नरक में पड़े पितर भी मुक्त हो जाते हैं। इस दिन भगवान दामोदर की पूजा और उपवास होता है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है। परंपरा के अनुसार इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है, पर पद्म पुराण के इस अध्याय में गीता का कोई उल्लेख नहीं है।
यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है, जहाँ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण इसे सुनाते हैं। हमने इसे संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर, और Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की पुस्तक से तुलना करके, अपने शब्दों में लिखा है।
व्रत और कथा की विधि
- पद्म पुराण के अनुसार इस दिन भगवान दामोदर की पूजा यत्न से तुलसी की मंजरियों, धूप और दीप से की जाती है; दशमी और एकादशी के नियम सामान्य एकादशी-व्रत की तरह निभाए जाते हैं।
- ग्रंथ रात में नृत्य, गीत और भगवान की स्तुति के साथ जागरण करने को कहता है।
- कथा में राजा मुनि के कहे अनुसार व्रत करके उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित करता है; Drik Panchang की कथा में यह संकल्प करके किया जाता है। पितरों के लिए पुण्य अर्पित करने की विधि अपने कुल-पुरोहित से पूछ लेना अच्छा है।
राजा वैखानस की कथा
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 39 के अनुसार (गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है); संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर, Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की पुस्तक से तुलना करके।
युधिष्ठिर ने भगवान विष्णु को प्रणाम करके श्रीकृष्ण से कहा, “हे देवों के देव, सब लोगों के हित के लिए और पापों के नाश के लिए मैं आपसे पूछता हूँ। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा होती है? स्वामी, यह सब मुझे विस्तार से बताइए।”
श्रीकृष्ण बोले, “राजन्, तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी मैं तुम्हें पहले बता चुका हूँ। अब शुक्ल पक्ष की एकादशी सुनो। यह मोक्षदा नाम से जानी जाती है और सब पापों को हरने वाली है। इस दिन भगवान दामोदर की पूजा तुलसी की मंजरियों, धूप और दीप से यत्न से करनी चाहिए।”
“इस एकादशी के पुण्य का दान करने से वे पितर भी मोक्ष पाते हैं जो अपने पापों के कारण नरक में या नीची योनि में पड़े हों; इसमें कोई संदेह नहीं। अब इसकी पुरानी, पवित्र कथा सुनो।”
वैष्णवों से सुशोभित सुंदर चंपक नगर में वैखानस नाम के राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान की तरह करते थे। उनके नगर में वेदों के जानकार बहुत-से ब्राह्मण रहते थे।
एक रात राजा ने सपने में देखा कि उनके पिता और पितर नरक में दुख भोग रहे हैं। वे बार-बार रोते हुए राजा से कह रहे थे, “तुम हमारे पुत्र हो; हमें इस दुख से छुड़ाओ।” यह देखकर राजा का मन विस्मय और व्याकुलता से भर गया। सुबह उन्होंने ब्राह्मणों को सपने की सारी बात कह सुनाई।
राजा बोले, “ब्राह्मणो, जब से मैंने यह देखा है, मुझे चैन नहीं है। यह बड़ा राज्य, ये हाथी-घोड़े, मेरी पत्नी और बेटे, अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरा मन घुट रहा है। कृपा करके वह व्रत, वह तप या वह साधन बताइए जिससे मेरे पूर्वज तुरंत मुक्त हो जाएँ। अगर पुत्र जीवित और बलवान हो, फिर भी उसका पिता घोर नरक में पड़ा रहे, तो ऐसे पुत्र का क्या लाभ?”
ब्राह्मणों ने कहा, “राजन्, यहाँ से पास ही पर्वत मुनि का बड़ा आश्रम है। वे भूत और भविष्य, दोनों जानते हैं। आप उन्हीं के पास जाइए।”
यह सुनकर राजा वैखानस तुरंत पर्वत मुनि के आश्रम गए। वहाँ वेदों का पाठ करने वाले बहुत-से मुनि थे, और उनके बीच पर्वत मुनि मानो दूसरे ब्रह्मा जैसे लग रहे थे। राजा ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया। मुनि ने राजा से उनके राज्य के सातों अंगों का कुशल पूछा, यानी पूरे राज्य का हाल, और यह भी कि राज्य निष्कंटक है और राजा सुखी हैं या नहीं।
राजा बोले, “स्वामी, आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है। पर मैंने सपने में अपने पितरों को नरक में पड़ा देखा है। बताइए, किस पुण्य के बल से उन्हें मुक्ति मिलेगी? यही पूछने मैं आपके पास आया हूँ। कोई उपाय बताइए।”
यह सुनकर पर्वत मुनि ने आँखें स्थिर करके ध्यान लगाया। थोड़ी देर ध्यान में रहकर वे बोले, “राजन्, मैंने तुम्हारे पिता के पिछले कर्म जान लिए हैं। पिछले जन्म में उन्होंने अपनी पत्नी के प्रति पति का धर्म नहीं निभाया था: ऋतुकाल में, जब पत्नी को पति के साथ का अधिकार होता है, उन्होंने उसे उसका वह अधिकार नहीं दिया। उसी पाप के कारण तुम्हारे पिता नरक में पड़े हैं।”
राजा वैखानस ने फिर पूछा, “मुनिवर, किस व्रत के प्रभाव से उनकी मुक्ति होगी?” मुनि बोले, “मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में मोक्षदा नाम की एकादशी आती है। उसका व्रत करो और उसका पुण्य अपने पिता को दे दो। उस पुण्य के प्रभाव से उनकी मुक्ति हो जाएगी।”
मुनि की बात सुनकर राजा अपने घर लौट आए। जब मार्गशीर्ष का महीना आया, तो उन्होंने मुनि के कहे अनुसार अपने परिवार के साथ मोक्षदा एकादशी का व्रत किया, और उसका सारा पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दिया।
पुण्य अर्पित करते ही आकाश से फूल बरसने लगे। राजा के पिता, अपने पितरों के साथ, नरक से छूट गए। स्वर्ग की ओर जाते हुए उन्होंने आकाश से अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया, “बेटा, तुम्हारा कल्याण हो, कल्याण हो।” इतना कहकर वे स्वर्ग चले गए।
कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं, “राजन्, जो इस तरह शुभ मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष मिलता है। मोक्ष देने वाली इससे बढ़कर कोई एकादशी नहीं। यह मनुष्यों के लिए चिंतामणि जैसी है।” पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत के पुण्य की गिनती नहीं हो सकती, और इसकी कथा पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- पद्म पुराण के संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में राजा का नगर चंपक है; भक्ति भारत में गोकुल, और Drik Panchang में नगर का नाम नहीं है। संस्कृत पाठ और गीता प्रेस इस एकादशी को अधिकतर “मोक्षा” कहते हैं; अध्याय के अंत में नाम “मोक्षदा” है।
- संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में राजा सपने में अपने पितरों को नरक में देखते हैं, और आगे पिता पितरों के साथ नरक में बताए गए हैं; Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की पुस्तक में राजा केवल अपने पिता को देखते हैं।
- पिता के पाप का वर्णन अलग-अलग है। संस्कृत पाठ में वे पिछले जन्म में राज्य के गर्व वाले क्षत्रिय थे, जो ऋतुकाल में पत्नी को छोड़कर काम से दूसरे गाँव चले गए। Drik Panchang और भक्ति भारत में उन्होंने बड़ी रानी के कहने पर दूसरी पत्नी को उसका अधिकार नहीं दिया। ISKCON की पुस्तक में पत्नी के प्रति एक और कठोर अपराध बताया गया है। गीता प्रेस के पाठ में पाप का कारण दिया ही नहीं गया। हमने वही बात ली है जो कई स्रोतों में समान है।
- संस्कृत पाठ में मुनि कहते हैं कि “सब” यह व्रत करें, और राजा “सबके साथ” पुण्य देते हैं; देशपांडे इसे “सबके साथ” पढ़ते हैं, जबकि गीता प्रेस में राजा पुण्य “समस्त पितरों सहित पिता को” देते हैं। Drik Panchang, भक्ति भारत और ISKCON की पुस्तक में राजा परिवार के साथ व्रत करते हैं।
- फूलों की वर्षा संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में है, Drik Panchang और भक्ति भारत में नहीं। कथा सुनने का फल संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में वाजपेय यज्ञ है, ISKCON की पुस्तक में अश्वमेध यज्ञ, और Drik Panchang में “अनंत फल”।
- Drik Panchang के रूप में श्रीकृष्ण यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं। ISKCON की पुस्तक इसे ब्रह्मांड पुराण की बताती है (हमने वह पाठ नहीं देखा)। ISKCON की पुस्तक और भक्ति भारत इसी दिन गीता जयंती बताते हैं; पद्म पुराण के इस अध्याय में गीता का उल्लेख नहीं है।
कथा के बाद
कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, और रात को जागरण किया जाता है। व्रत अगले दिन द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय मोक्षदा एकादशी के पन्ने पर है।
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मोक्षदा एकादशी की कथा किस पुराण में है?
पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। संस्कृत विकिस्रोत और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 39 है; गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है। ISKCON की पुस्तक इसे ब्रह्मांड पुराण की बताती है।
इसे मोक्षदा एकादशी क्यों कहते हैं?
मोक्षदा का अर्थ है मोक्ष देने वाली। पद्म पुराण के अनुसार यह व्रत करने वाले को मृत्यु के बाद मोक्ष देती है, और इसका पुण्य देने से नरक में पड़े पितर भी मुक्त होते हैं, जैसे कथा में राजा वैखानस के पिता।
क्या मोक्षदा एकादशी की कथा में गीता का उल्लेख है?
नहीं। पद्म पुराण के इस अध्याय में, और गीता प्रेस और Drik Panchang की कथा में, गीता या गीता जयंती की कोई बात नहीं है। परंपरा के अनुसार इसी दिन गीता जयंती मनाई जाती है, और ISKCON की पुस्तक और भक्ति भारत इस दिन को गीता से जोड़ते हैं।
क्या इस व्रत का पुण्य पितरों को दिया जा सकता है?
कथा में राजा वैखानस पर्वत मुनि के कहने पर व्रत करके उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित करते हैं, और पद्म पुराण कहता है कि इस एकादशी के पुण्य-दान से पितर मुक्त होते हैं। ऐसा संकल्प कैसे करें, यह अपने कुल-पुरोहित से पूछ लें।
स्रोत
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 39, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 39, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
- गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य, संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 11–13 (पद्म पुराण पर आधारित)
- ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: मोक्षदा एकादशी (iskcondesiretree.com)
- Drik Panchang: मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
- भक्ति भारत: मोक्षदा एकादशी व्रत कथा, bhaktibharat.com
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