सफला एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। चंपावती के राजा माहिष्मत अपने बड़े बेटे लुंपक को उसके पापों के कारण राज्य से निकाल देते हैं। वन में पीपल के एक पुराने पेड़ के नीचे रहते हुए लुंपक पौष कृष्ण दशमी की रात ठंड से बेसुध हो जाता है, एकादशी को भूखा रहता है, शाम को बटोरे हुए फल पेड़ की जड़ में भगवान को अर्पित करता है और रात भर जागता है। भगवान इसे ही उसका व्रत, पूजा और जागरण मान लेते हैं; उसका रूप और मन बदल जाता है और उसे राज्य वापस मिलता है।
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सफला एकादशी पौष कृष्ण एकादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में मार्गशीर्ष कृष्ण) को आती है। “सफला” का अर्थ है फल देने वाली, सफल करने वाली; इस दिन भगवान नारायण की पूजा फलों से करने की विधि है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है।
यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है, जहाँ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण एक-एक एकादशी की महिमा बताते हैं। हमने इसे संस्कृत मूल, एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर, और Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक के रूपों से तुलना करके, अपने शब्दों में लिखा है। जहाँ इनमें अंतर है, वह नीचे बताया गया है।
व्रत और कथा की विधि
- पद्म पुराण के अनुसार इस दिन पहले बताई गई एकादशी की विधि से उपवास रखा जाता है और नाम-मंत्रों के साथ भगवान नारायण (श्रीहरि) की पूजा होती है।
- पूजा फलों से होती है: ग्रंथ नारियल, सुपारी, बिजौरा और जंबीरी नींबू, अनार, आँवला, लौंग, बेर और विशेष रूप से आम का नाम लेता है। आज जो फल मिलें, वही श्रद्धा से चढ़ाएँ।
- धूप और दीप से पूजा होती है, और सफला एकादशी पर दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है।
- रात को वैष्णवों के साथ जागरण किया जाता है। ग्रंथ कहता है कि एकाग्र मन से किए इस जागरण का फल हज़ारों वर्षों के तप से भी नहीं मिलता।
राजकुमार लुंपक की कथा
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 40 के अनुसार (गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है); संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "स्वामी, पौष मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है, और उस दिन किस देवता की पूजा होती है? मुझे विस्तार से बताइए।"
श्रीकृष्ण बोले, "राजेंद्र, तुम्हारे स्नेह के कारण मैं बताता हूँ। बहुत दक्षिणा वाले यज्ञों से भी मुझे उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी एकादशी के व्रत से होती है; इसलिए पूरे प्रयत्न से हरि के इस दिन का व्रत करना चाहिए। पौष के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम सफला है। उस दिन विधि से भगवान नारायण की पूजा करो। जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़ और देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सब व्रतों में एकादशी श्रेष्ठ है।"
"सफला एकादशी पर भगवान की पूजा फलों से करो, धूप और दीप से उनकी अर्चना करो, और इस दिन विशेष रूप से दीपदान करो। रात को भक्तों के साथ जागरण करो। अब सफला की शुभ कथा सुनो।"
चंपावती नाम की एक प्रसिद्ध नगरी राजर्षि माहिष्मत की राजधानी थी। उनके पाँच बेटे थे। सबसे बड़ा बेटा हमेशा पाप के कामों में लगा रहता था: वह पराई स्त्रियों के पास जाता, वेश्याओं में रमा रहता और शराब पीता था। उसने पिता का धन बुरे कामों में उड़ा दिया। वह ब्राह्मणों, भगवान के भक्तों और देवताओं की निंदा करता रहता था।
बेटे को ऐसा देखकर राजा ने राजकुमारों के बीच उसका नाम ही लुंपक (लुटेरा) रख दिया, और पिता और भाइयों ने मिलकर उसे राज्य से निकाल दिया। सबके छोड़ देने पर लुंपक ने सोचा, "पिता और बंधुओं ने मुझे त्याग दिया है। अब मैं घने वन में रहूँगा और वहीं से पिता का सारा नगर लूटूँगा।"
वह वन में चला गया। वहाँ वह जीवों को मारता, और चोरी और जुए में डूबा रहता; उसने नगर को खूब लूटा। एक रात चोरी करते हुए नगर के पहरेदारों ने उसे पकड़ लिया, पर जब उसने बताया कि वह राजा माहिष्मत का बेटा है, तो उन्होंने उसे छोड़ दिया। वह फिर वन लौट आया और मांस और पेड़ों के फल खाकर रहने लगा।
उसका ठिकाना एक बहुत पुराने पीपल के पेड़ के पास था। उस वन में वह पेड़ बड़ा पवित्र माना जाता था, और भगवान वासुदेव का स्थान उसके पास ही था। पापी लुंपक वहीं रहता था।
बहुत समय बीत गया। फिर, किसी पुराने पुण्य के कारण, पौष के कृष्ण पक्ष की दशमी आई। उस दिन लुंपक ने पेड़ों के फल खाए। रात को उसके पास तन ढकने को कपड़े न थे; कड़ाके की ठंड में वह उस पवित्र पेड़ के पास काँपता रहा। न नींद आई, न चैन मिला; दाँत भींचे वह मरे जैसा पड़ा रहा। सूरज निकलने पर भी उसे होश नहीं आया।
सफला एकादशी के दिन वह बेसुध पड़ा रहा और दोपहर को उसे होश आया। वह इधर-उधर देखकर उठा और लंगड़े की तरह लड़खड़ाता हुआ वन में गया। भूख से वह बहुत कमज़ोर था; उस दिन उसमें किसी जीव को मारने की भी शक्ति न थी। उसने बस कुछ फल इकट्ठे किए, और जब तक वह अपने ठिकाने पर लौटा, सूरज डूब चुका था।
"हाय पिता, अब मेरा क्या होगा!" कहकर वह रोने लगा। फिर उसने वे सारे फल पीपल की जड़ में रख दिए और कहा, "इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान हरि प्रसन्न हों।" उस रात भी उसे नींद नहीं आई।
भगवान विष्णु ने उसकी रात भर की जाग को सफला का जागरण, और पेड़ की जड़ में रखे फलों को सफला की फलों से पूजा मान लिया। इस तरह अनजाने में ही लुंपक से यह व्रत पूरा हो गया।
सुबह होते ही आकाशवाणी हुई, "सफला एकादशी की कृपा से तुम्हें राज्य और पुत्र मिलेगा।" लुंपक ने कहा, "ऐसा ही हो," और उसी क्षण उसका रूप दिव्य हो गया। उसका मन पूरी तरह भगवान विष्णु की भक्ति में लग गया।
दिव्य आभूषणों से सजे लुंपक को बिना किसी बाधा के राज्य मिला, और उसने पंद्रह वर्ष तक राज किया। श्रीकृष्ण की कृपा से उसे सुंदर पत्नी और पुत्र मिले। फिर उसने राज्य का मोह छोड़कर उसे अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं श्रीकृष्ण के धाम चला गया, जहाँ पहुँचकर कोई शोक नहीं करता।
कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं, "राजन्, जो इस तरह सफला का उत्तम व्रत करता है, वह इस लोक में सुख पाकर मृत्यु के बाद मोक्ष पाता है। जो सफला के व्रत में लगे रहते हैं, वे धन्य हैं और उनका जन्म सफल है।" कथा के अनुसार इसे पढ़ने, सुनने और यह व्रत करने से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- पद्म पुराण, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में यह कथा श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं। Drik Panchang के हिंदी और अंग्रेज़ी रूप में वे इसे अर्जुन को सुनाते हैं।
- राजा के बेटे पद्म पुराण के संस्कृत पाठ, देशपांडे और गीता प्रेस में पाँच हैं; Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक में चार। गीता प्रेस बेटे का नाम “लुम्भक” लिखता है, बाकी स्रोत “लुंपक”। Drik Panchang राजा को “महिष्मान” कहता है।
- लुंपक का पेड़ संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और Drik Panchang में पीपल (अश्वत्थ) है; ISKCON की पुस्तक में बरगद।
- अंत अलग-अलग है। पद्म पुराण और गीता प्रेस में आकाशवाणी के बाद लुंपक का रूप दिव्य होता है और उसे राज्य मिलता है। Drik Panchang में सुबह एक दिव्य रथ आता है और लुंपक पिता के पास जाकर सब बताता है, तब पिता राज्य सौंपकर वन चले जाते हैं; ISKCON की पुस्तक में रथ की जगह एक घोड़ा आता है और लुंपक उस पर बैठकर नगर लौटता है।
- गीता प्रेस लुंपक के पुत्र का नाम “मनोज्ञ” देता है; संस्कृत पाठ में यहाँ नाम साफ़ नहीं है (देशपांडे “सुंदर पुत्र” पढ़ते हैं), और दूसरे स्रोत कोई नाम नहीं देते।
- जागरण का फल संस्कृत पाठ में “हज़ारों वर्षों का तप” है; Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक में “पाँच हज़ार वर्ष का तप”। ISKCON की पुस्तक यह कथा भविष्योत्तर पुराण की बताती है; हमने इसे वहाँ नहीं जाँचा।
कथा के बाद
कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, दीपदान किया जाता है और रात को जागरण होता है। व्रत अगले दिन द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय सफला एकादशी के पन्ने पर है।
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सफला एकादशी की कथा किस पुराण में है?
पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। संस्कृत विकिस्रोत और एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 40 है; गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है।
सफला एकादशी पर पूजा में क्या चढ़ाएँ?
पद्म पुराण के अनुसार फल: नारियल, सुपारी, बिजौरा, नींबू, अनार, आँवला, लौंग, बेर और विशेषकर आम; साथ में धूप और दीप। इस दिन दीपदान का विशेष महत्व है। कथा में लुंपक ने भी बस बटोरे हुए फल ही अर्पित किए थे।
सफला एकादशी का नाम सफला क्यों है?
“सफला” का अर्थ है फल देने वाली। इस दिन फलों से पूजा होती है, और कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो इस व्रत में लगे रहते हैं, उनका जन्म सफल है।
सफला एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?
परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले। पद्म पुराण के अनुसार इस कथा को पढ़ने या सुनने से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।
स्रोत
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 40, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 40, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
- गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य (26 एकादशियों की कथाएँ), संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 14–16 (पद्म पुराण पर आधारित)
- ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: सफला एकादशी (iskcondesiretree.com)
- Drik Panchang: सफला एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
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