विजया एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है, जहाँ ब्रह्मा जी इसे नारद को सुनाते हैं। सीता की खोज के बाद लंका जाने से पहले श्रीराम समुद्र तट पर सोचते हैं कि इतना गहरा समुद्र कैसे पार हो। लक्ष्मण के कहने पर वे पास के द्वीप पर रहने वाले बकदाल्भ्य मुनि के पास जाते हैं, जो उन्हें फाल्गुन कृष्ण एकादशी का व्रत कलश-पूजा की विधि से करने को कहते हैं। श्रीराम वानर सेनापतियों के साथ यह व्रत करते हैं, और कथा के अनुसार उसी से उन्हें लंका पर विजय मिलती है।
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विजया एकादशी फाल्गुन कृष्ण एकादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में माघ कृष्ण) को, महाशिवरात्रि से कुछ दिन पहले आती है। जैसा नाम है, पद्म पुराण इसे विजय देने वाली एकादशी कहता है। इस दिन भगवान नारायण की कलश पर पूजा, उपवास और रात्रि जागरण होता है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है।
यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है: युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण बताते हैं कि यही प्रश्न कभी नारद ने ब्रह्मा जी से पूछा था, और ब्रह्मा जी ने यह कथा सुनाई थी। हमने इसे संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर, और Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक से तुलना करके, अपने शब्दों में लिखा है।
व्रत और कथा की विधि
- दशमी: सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टी का एक कलश लेकर उसमें जल भरें, पल्लव (आम आदि के पत्ते) लगाएँ और उसे सजाकर स्थापित करें। उसके नीचे सात धान्य रखें और ऊपर जौ, और उस पर भगवान नारायण की सोने की प्रतिमा रखें।
- एकादशी: सुबह स्नान करके कलश को स्थिर रखें और माला, चंदन, सुपारी, नारियल, गंध, धूप, दीप और तरह-तरह के नैवेद्य से उसकी पूजा करें। दिन कलश के सामने अच्छी कथाओं में बिताएँ, रात को उसके सामने जागरण करें, और व्रत अखंड रहे इसके लिए घी का दीपक जलाएँ।
- द्वादशी: सूर्योदय पर कलश को नदी, झरने या तालाब के किनारे ले जाकर स्थापित करें, विधि से पूजा करें, और प्रतिमा सहित कलश वेद जानने वाले ब्राह्मण को दान कर दें। ग्रंथ कलश के साथ और बड़े दान देने को भी कहता है।
- कलश-पूजा की बारीकियाँ परिवार और क्षेत्र की परंपरा से बदलती हैं; अपने पुरोहित से पूछ लें।
श्रीराम और बकदाल्भ्य मुनि की कथा
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 44 के अनुसार (गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है); संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।
युधिष्ठिर ने पूछा, "वासुदेव, फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी आती है? कृपा करके बताइए।" श्रीकृष्ण बोले, "एक बार देवर्षि नारद ने कमल के आसन पर बैठे ब्रह्मा जी से यही पूछा था: फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का पुण्य क्या है?"
ब्रह्मा जी बोले, "नारद, सुनो। यह पाप हरने वाली उत्तम कथा मैंने आज तक किसी को नहीं सुनाई। विजया का व्रत बहुत पुराना, पवित्र और पापों का नाश करने वाला है। यह राजाओं को विजय देता है, इसमें कोई संदेह नहीं।"
"बहुत पहले श्रीराम चौदह वर्ष के लिए वन गए और सीता और लक्ष्मण के साथ पंचवटी में रहने लगे। वहीं रावण ने सीता का हरण कर लिया। उस दुख से व्याकुल होकर श्रीराम सीता को खोजते हुए वन-वन भटके। उन्हें जटायु मिले, जिनकी आयु पूरी हो चुकी थी। फिर उन्होंने वन में कबंध का वध किया, और सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई।"
"श्रीराम के लिए वानरों की सेनाएँ जुटीं। हनुमान जी ने लंका के उपवन में सीता जी को देखा, उन्हें श्रीराम की निशानी दी, और लौटकर श्रीराम को सारा हाल सुनाया। यह सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव की सहमति से लंका की ओर कूच करने का निश्चय किया।"
"समुद्र के किनारे पहुँचकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, ‘सुमित्रानंदन, यह समुद्र अथाह है और भयानक जल-जीवों से भरा है। किस पुण्य से इसे पार किया जाए? मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जिससे यह सहज ही पार हो सके।’"
"लक्ष्मण बोले, ‘आप ही आदिदेव और पुराण पुरुषोत्तम हैं। यहाँ एक द्वीप पर बकदाल्भ्य नाम के मुनि रहते हैं; उनका आश्रम यहाँ से आधे योजन की दूरी पर है, और वहाँ और भी बहुत-से ब्राह्मण हैं। रघुनंदन, उन प्राचीन मुनि के पास जाकर उन्हीं से उपाय पूछिए।’"
"लक्ष्मण की यह बात सुनकर श्रीराम बकदाल्भ्य मुनि से मिलने गए और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। मुनि जान गए कि ये पुराण पुरुषोत्तम ही हैं, जिन्होंने किसी कारण से मनुष्य का शरीर धारण किया है। प्रसन्न होकर उन्होंने पूछा, ‘श्रीराम, आपका यहाँ आना कैसे हुआ?’"
"श्रीराम बोले, ‘ब्रह्मन्, आपकी कृपा से मैं सेना के साथ समुद्र के किनारे आया हूँ, राक्षसों सहित लंका को जीतने। आपकी अनुकूलता से जिस उपाय से मैं समुद्र पार कर सकूँ, वह बताइए; इसीलिए मैं आपके दर्शन को आया हूँ।’"
"बकदाल्भ्य मुनि प्रसन्न होकर बोले, ‘राम, व्रतों में उत्तम एक व्रत करो, जिससे तुम्हें शीघ्र विजय मिलेगी; तुम लंका और राक्षसों को जीतकर निर्मल यश पाओगे। फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में विजया एकादशी आती है। एकाग्र मन से उसका व्रत करो; उसके प्रभाव से तुम निश्चय ही वानरों सहित समुद्र पार कर लोगे।’ फिर मुनि ने उसकी वह विधि बताई जो ऊपर दी गई है: दशमी को कलश की स्थापना, एकादशी को उसकी पूजा और जागरण, और द्वादशी को जलाशय के किनारे पूजा करके प्रतिमा सहित कलश का दान।"
"मुनि ने कहा, ‘राम, अपने यूथपतियों के साथ इस विधि से यत्न करके यह व्रत करो; तुम्हारी विजय होगी।’ यह सुनकर श्रीराम ने वैसा ही व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वे विजयी हुए: युद्ध में रावण मारा गया, लंका जीती गई और सीता जी वापस मिलीं।"
ब्रह्मा जी बोले, "बेटा, जो इस विधि से यह व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय मिलती है और परलोक भी अक्षय रहता है। इसलिए विजया का व्रत करना चाहिए।" कथा के अनुसार विजया का यह माहात्म्य सब पापों का नाश करता है, और इसे पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- पद्म पुराण, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं; Drik Panchang में अर्जुन को। सब स्रोतों में भीतर की कथा ब्रह्मा जी नारद को सुनाते हैं।
- संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और ISKCON की पुस्तक में श्रीराम जटायु से मिलने के बाद कबंध को मारते हैं; Drik Panchang में कबंध नहीं है, वहाँ सुग्रीव से मित्रता के बाद बाली के वध की बात है।
- मुनि का आश्रम संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में आधे योजन दूर एक द्वीप पर है; Drik Panchang उसे “कुमारी द्वीप” पर बताता है, और ISKCON की पुस्तक चार मील दूर। Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक जोड़ते हैं कि मुनि ने अनेक ब्रह्माओं को आते-जाते देखा था; यह संस्कृत पाठ में नहीं है।
- ISKCON की पुस्तक में कलश की पूजा और जागरण दशमी की रात से ही शुरू होते हैं। कथा पढ़ने-सुनने का फल संस्कृत पाठ, गीता प्रेस और Drik Panchang में वाजपेय यज्ञ के बराबर है, ISKCON की पुस्तक में अश्वमेध यज्ञ के बराबर। ISKCON की पुस्तक यह कथा स्कंद पुराण की बताती है; हमने इसे वहाँ नहीं जाँचा।
कथा के बाद
कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, और रात को कलश के सामने जागरण किया जाता है। व्रत अगले दिन द्वादशी को कलश-दान के बाद पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय विजया एकादशी के पन्ने पर है।
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विजया एकादशी की कथा किस पुराण में है?
पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि ब्रह्मा जी ने यह कथा नारद को सुनाई थी। संस्कृत विकिस्रोत और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 44 है; गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय संख्या दो आगे चलती है।
क्या श्रीराम ने विजया एकादशी का व्रत किया था?
पद्म पुराण की इस कथा के अनुसार हाँ: लंका जाने से पहले समुद्र तट पर बकदाल्भ्य मुनि के कहने पर श्रीराम ने अपने सेनापतियों के साथ यह व्रत किया था।
विजया एकादशी की कलश विधि क्या है?
दशमी को जल भरा कलश सात धान्य पर रखकर ऊपर जौ और भगवान नारायण की प्रतिमा रखी जाती है; एकादशी को उसकी पूजा और रात को जागरण होता है; द्वादशी को जलाशय के किनारे पूजा करके प्रतिमा सहित कलश ब्राह्मण को दान किया जाता है। पूरी विधि ऊपर दी गई है।
विजया एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?
परंपरा में एकादशी के दिन कलश और भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले। पद्म पुराण के अनुसार इसे पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
स्रोत
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 44, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 44, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
- गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य, संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 23–26 (पद्म पुराण पर आधारित)
- ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: विजया एकादशी (iskcondesiretree.com)
- Drik Panchang: विजया एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
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