भरद्वाज वर्तमान मन्वंतर के सात ऋषियों में एक हैं (विष्णु पुराण 3.1; भागवत 8.13.5)। भागवत (9.20.35-39) और विष्णु पुराण (4.19) उन्हें देवगुरु बृहस्पति और ममता का पुत्र बताते हैं, जिन्हें मरुतों ने राजा भरत को पुत्र के रूप में सौंपा। परंपरा ऋग्वेद के छठे मंडल के अधिकतर सूक्त उनके नाम मानती है। वाल्मीकि रामायण में गंगा-यमुना के संगम पर, प्रयाग में उनका आश्रम है जहाँ वनवास जाते राम ठहरे, और महाभारत में वे द्रोणाचार्य के पिता हैं।
- जन्म
- पिता बृहस्पति, माता ममता, जो बृहस्पति के भाई उतथ्य की पत्नी थीं (भागवत 9.20.36-39; विष्णु पुराण 4.19); रामायण (अयोध्याकांड, सर्ग 89) भी उन्हें बृहस्पति का पुत्र कहता है
- दत्तक
- मरुतों ने उन्हें राजा भरत (दुष्यंत के पुत्र) को दिया; भरत के यहाँ नाम वितथ (भागवत 9.20.35, 39; विष्णु पुराण 4.19)
- ऋग्वेद में
- छठा मंडल: ग्रिफ़िथ के अनुसार कुछ को छोड़ सब सूक्त भरद्वाज के नाम; 1.112.13 में अश्विनों ने भरद्वाज की रक्षा की
- आश्रम
- प्रयाग, गंगा और यमुना का संगम (वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड, सर्ग 54, शास्त्री का अनुवाद)
- संतान और शिष्य
- पुत्र द्रोणाचार्य (महाभारत, आदिपर्व) और यवक्रीत (वनपर्व); शिष्य अग्निवेश, जिन्हें उन्होंने आग्नेय अस्त्र सिखाया
- आयुर्वेद
- ऋषियों की ओर से इंद्र के पास गए, उनसे आयुर्वेद सीखकर ऋषियों को दिया (चरक संहिता, सूत्रस्थान 1.3-26)
जन्म और नाम: ‘भर द्वाजम्’
भागवत (9.20.36-38) कहता है कि ममता बृहस्पति के भाई उतथ्य की पत्नी थीं, और यह पुत्र बृहस्पति से उनकी इच्छा के विरुद्ध जन्मा। जन्म के बाद दोनों एक-दूसरे से कहते रहे कि ‘दो से जन्मे इस बालक का तुम भरण करो’ (भर द्वाजम्), और दोनों उसे छोड़कर चले गए; इसी से नाम भरद्वाज पड़ा। विष्णु पुराण (4.19) यही व्युत्पत्ति देता है।
उसी समय पुरु वंश के सम्राट भरत (दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र) का वंश संकट में था, क्योंकि उनके पुत्र जीवित नहीं रहे थे। भरत पुत्र के लिए मरुतों का यज्ञ (मरुत्स्तोम) कर रहे थे, और मरुतों ने, जिन्होंने उस छोड़े हुए बालक को पाला था, उसे भरत को दे दिया (भागवत 9.20.34-35, 39; विष्णु पुराण 4.19)। भरत के पुत्र के रूप में उनका नाम वितथ हुआ, और उन्हीं से भरत का वंश आगे चला: उनके पुत्र मन्यु, और उसी वंश में रंतिदेव (भागवत 9.21.1-2)।
प्रयाग का आश्रम: राम और भरत
वाल्मीकि रामायण (अयोध्याकांड, सर्ग 54) में वनवास के रास्ते राम, सीता और लक्ष्मण साँझ को गंगा-यमुना के संगम पर भरद्वाज के आश्रम पहुँचे। ऋषि शिष्यों के बीच अग्निहोत्र कर रहे थे। उन्होंने अर्घ्य, मधुपर्क और फल-मूल से सत्कार किया और कहा कि वनवास के वर्ष यहीं बिताओ। राम ने कहा कि यह स्थान बस्तियों के पास है और लोग देखने आते रहेंगे; तब ऋषि ने उन्हें चित्रकूट पर्वत पर रहने को कहा, और अगली सुबह यमुना पार करने का रास्ता बताकर पिता की तरह आशीर्वाद दिया (सर्ग 55)।
राम को लौटाने निकले भरत भी यहाँ आए (सर्ग 90)। वे सेना को दूर छोड़कर, शस्त्र और राजसी वस्त्र उतारकर वसिष्ठ के पीछे पैदल आए। ऋषि ने पूछा कि कहीं वे राम का बुरा तो नहीं चाहते; भरत की आँखें भर आईं, तब ऋषि ने कहा कि वे उनके मन को जानते थे और केवल उनका निश्चय सबके सामने लाने के लिए पूछा था। अगले सर्ग (91) में ग्रंथ कहता है कि भरद्वाज ने मंत्र और तप के बल से विश्वकर्मा और देवताओं का आवाहन करके भरत की पूरी सेना का भोज और विश्राम कराया। लौटते हुए भरत ने उन्हें बताया कि वे राम की पादुकाएँ लेकर जा रहे हैं (सर्ग 113)।
द्रोण, आयुर्वेद और ऋग्वेद
महाभारत (आदिपर्व, अध्याय 131 और 168, गांगुली का क्रम) के अनुसार भरद्वाज गंगा के पहाड़ों से निकलने के स्थान के पास कठोर व्रत के साथ रहते थे। अप्सरा घृताची को देखकर उनका जो वीर्य गिरा, उसे उन्होंने एक कलश (द्रोण) में रखा, और उसी से द्रोण जन्मे; इसी से उनका नाम पड़ा। भरद्वाज ने अपने शिष्य अग्निवेश को आग्नेय अस्त्र सिखाया था, और अग्निवेश ने वही अस्त्र गुरु-पुत्र द्रोण को दिया। पांचाल राजा पृषत के पुत्र द्रुपद भरद्वाज के आश्रम में द्रोण के साथ खेलते और पढ़ते थे।
चरक संहिता (सूत्रस्थान 1.3-26) कहती है कि जब रोग तप, उपवास, अध्ययन और जीवन में बाधा बनने लगे, तो हिमालय पर ऋषियों की सभा हुई और भरद्वाज ने स्वयं इंद्र के पास जाने का प्रस्ताव रखा। आयुर्वेद ब्रह्मा से प्रजापति, फिर अश्विनीकुमारों और फिर इंद्र को मिला था; इंद्र ने भरद्वाज को हेतु, लक्षण और औषध, इन तीन सूत्रों में आयुर्वेद दिया, और भरद्वाज ने उसे जैसा पाया वैसा ही ऋषियों को सिखाया। आगे (1.30-31) आत्रेय पुनर्वसु ने यह विद्या अग्निवेश आदि छह शिष्यों को दी। महाभारत के शांतिपर्व (अध्याय 182 से) में भरद्वाज के प्रश्नों पर भृगु सृष्टि, वर्ण और धर्म के बारे में बताते हैं।
ऋग्वेद के छठे मंडल के बारे में ग्रिफ़िथ लिखते हैं कि कुछ को छोड़ उसके सब सूक्त भरद्वाज के नाम हैं, और 1.112.13 में अश्विनों से कहा गया है कि उन्होंने भरद्वाज की रक्षा की। परंपरा के अनुसार भरद्वाज गोत्र के लोग इन्हीं ऋषि के वंशज माने जाते हैं।
स्रोतों में अंतर
- आश्रम कहाँ: रामायण में प्रयाग में, गंगा-यमुना के संगम पर; महाभारत (आदिपर्व) में गंगा के पहाड़ों से मैदान में उतरने के स्थान के पास। विकिपीडिया के अनुसार जेम्स लॉकटेफ़ेल्ड रामायण के भरद्वाज को पाणिनि में आए वैदिक ऋषि से अलग मानते हैं। रामायण के बालकांड (सर्ग 2) में वाल्मीकि के एक शिष्य का नाम भी भरद्वाज है, जो प्रयाग वाले ऋषि नहीं हैं।
- पुत्र: आदिपर्व में द्रोण भरद्वाज के पुत्र हैं, पर वनपर्व (अध्याय 135) की यवक्रीत कथा में कहा गया है कि भरद्वाज का एक ही पुत्र था, यवक्रीत। भागवत और विष्णु पुराण में भरत के दत्तक के रूप में उनका पुत्र मन्यु (विष्णु पुराण में भवन्मन्यु) है। विल्सन की टिप्पणी के अनुसार हरिवंश में भरद्वाज बालक नहीं, यज्ञ कराने वाले ऋषि के रूप में भरत के पास आते हैं।
- ऋग्वेद और आयुर्वेद के भरद्वाज: परंपरा छठे मंडल को भरद्वाज बार्हस्पत्य का मानती है; विकिपीडिया के अनुसार विद्वान मानते हैं कि इनमें से बहुत से सूक्त भरद्वाज परिवार के बाद के ऋषियों ने रचे। चरक संहिता भरद्वाज को बृहस्पति का पुत्र नहीं कहती, केवल ‘भरद्वाज’ कहती है, और उसमें ‘कुमारशिरा भरद्वाज’ नाम के एक और आचार्य भी आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भरद्वाज ऋषि के पिता कौन थे?
देवगुरु बृहस्पति; माता ममता थीं (भागवत 9.20.36-39; विष्णु पुराण 4.19)। बाद में मरुतों ने उन्हें राजा भरत को सौंपा, जिनके वे दत्तक पुत्र वितथ कहलाए।
भरद्वाज ऋषि का आश्रम कहाँ था?
वाल्मीकि रामायण (अयोध्याकांड, सर्ग 54) के अनुसार प्रयाग में, गंगा और यमुना के संगम पर। वहीं वनवास जाते राम ठहरे और वहीं से उन्हें चित्रकूट जाने को कहा गया।
द्रोणाचार्य के पिता कौन थे?
ऋषि भरद्वाज। महाभारत (आदिपर्व, अध्याय 131, गांगुली का क्रम) के अनुसार द्रोण एक कलश (द्रोण) से जन्मे, इसी से उनका नाम द्रोण पड़ा।
भरद्वाज गोत्र किसका है?
परंपरा के अनुसार भरद्वाज गोत्र के लोग इन्हीं ऋषि के वंशज माने जाते हैं; विकिपीडिया इस गोत्र के प्रवर आंगिरस, बार्हस्पत्य और भारद्वाज बताता है। अपने गोत्र और प्रवर के बारे में अपने कुल-पुरोहित से पूछना ठीक रहेगा।
स्रोत
- भागवत पुराण 8.13.5, 9.20.34-39, 9.21.1-2 (जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, मोतीलाल बनारसीदास, archive.org: bhagavata-purana-motilal-english-full)
- विष्णु पुराण 3.1, 4.19 और उस पर विल्सन की टिप्पणी (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, archive.org: thevishnupuranacomplete6bookssethoracehaymanwilson)
- वाल्मीकि रामायण, बालकांड सर्ग 1-2; अयोध्याकांड सर्ग 54-55, 89-91, 113 (हरि प्रसाद शास्त्री का अंग्रेज़ी अनुवाद, दक्षिणी पाठ, archive.org: the-ramayana-of-valmiki-3-trans-hari-prasad-shastri); समीक्षित संस्करण में राम का आश्रम पहुँचना 2.48 है
- महाभारत, आदिपर्व अध्याय 131, 168; वनपर्व अध्याय 135-138; शांतिपर्व अध्याय 182, 208 (के. एम. गांगुली का अंग्रेज़ी अनुवाद, उसी की अध्याय-संख्या, archive.org)
- ऋग्वेद 1.112.13 और छठा मंडल, 6.1 पर टिप्पणी (आर. टी. एच. ग्रिफ़िथ का अनुवाद, archive.org: rigvedacomplete)
- चरक संहिता, सूत्रस्थान 1.3-31 (अविनाश चंद्र कविरत्न का अंग्रेज़ी अनुवाद, archive.org: BIUSante_47357; और पी. वी. शर्मा का अनुवाद, गेब्रियल वैन लून के संपादन में, archive.org: GabrielVanLoonCharakaSamhitaVol1Eng)
- विकिपीडिया: “Bharadvaja” (छठे मंडल पर विद्वानों का मत, गोत्र-प्रवर, लॉकटेफ़ेल्ड का मत)
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