ऋषि और संत

विश्वामित्र ऋषि

संक्षेप में

विश्वामित्र राजा गाधि के पुत्र थे और कुश के वंश में जन्म के कारण कौशिक कहलाए (वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 34; विष्णु पुराण 4.7)। वे पहले क्षत्रिय राजा थे; वसिष्ठ से हारकर उन्होंने तप किया और ब्रह्मर्षि बने (रामायण, बालकांड, सर्ग 51-65; भागवत 9.16.28)। वे वर्तमान मन्वंतर के सप्तर्षियों में से एक हैं (विष्णु पुराण 3.1)। ऋग्वेद का तीसरा मंडल उन्हें और उनके परिवार को समर्पित माना जाता है, जिसमें गायत्री मंत्र (3.62.10) है। रामायण में वे ही राम और लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए ले गए।

पिता और वंश
राजा गाधि; कुश के वंश के कारण ‘कौशिक’ (रामायण, बालकांड, सर्ग 34; विष्णु पुराण 4.7; भागवत 9.15.4)
परिवार
बड़ी बहन सत्यवती ऋचीक की पत्नी थीं और उनके पुत्र जमदग्नि, परशुराम के पिता (विष्णु पुराण 4.7; भागवत 9.15.5-13)
संतान
मधुच्छंदा आदि पुत्र; शुनःशेप को देवरात नाम से पुत्र माना (विष्णु पुराण 4.7; भागवत 9.16.29-36); मेनका से पुत्री शकुंतला (महाभारत, आदि पर्व 72; भागवत 9.20.13)
ऋग्वेद में
तीसरे मंडल के ऋषि; परंपरा उन्हें गायत्री मंत्र (3.62.10) का ऋषि मानती है
रामायण में
राम-लक्ष्मण को यज्ञ-रक्षा के लिए ले गए, ताड़का वध, दिव्य अस्त्र दिए, मिथिला ले गए (बालकांड, सर्ग 18-31, 67)
प्रसिद्ध कथाएँ
वसिष्ठ की गाय, त्रिशंकु का स्वर्ग, शुनःशेप की रक्षा, मेनका (रामायण, बालकांड, सर्ग 51-65)
सप्तर्षि
वर्तमान मन्वंतर के सात ऋषियों में एक (विष्णु पुराण 3.1)

राजा से ब्रह्मर्षि

वाल्मीकि रामायण (बालकांड, सर्ग 51-65) में जनक के पुरोहित शतानंद राम को विश्वामित्र की पूरी कथा सुनाते हैं। राजा विश्वामित्र वसिष्ठ की कामधेनु शबला को बलपूर्वक नहीं ले जा सके और वसिष्ठ के ब्रह्मदंड के आगे उनके सारे अस्त्र विफल हुए; तब उन्होंने कहा कि सच्चा बल तप का है (सर्ग 56)। महाभारत (आदि पर्व, चैत्ररथ उपपर्व) में भी यही कथा है, जहाँ गाय का नाम नंदिनी है और अंत में कहा गया है कि तप से वे ब्राह्मण बने।

रामायण के अनुसार हज़ार वर्ष के तप के बाद ब्रह्मा ने उन्हें राजर्षि कहा (सर्ग 57), फिर और तप के बाद ऋषि (सर्ग 63)। पुष्कर में अप्सरा मेनका के साथ दस वर्ष बीत गए तो पछतावे के साथ उन्होंने फिर तप किया और महर्षि कहलाए (सर्ग 63)। इंद्र की भेजी रंभा पर क्रोध में शाप देकर उन्हें फिर पछतावा हुआ, और उन्होंने मौन रहकर क्रोध को जीतने का व्रत लिया (सर्ग 64)। हज़ार वर्ष के मौन तप के बाद देवताओं ने उन्हें ब्रह्मर्षि कहा, और उनके कहने पर वसिष्ठ ने भी उन्हें ब्रह्मर्षि माना और उनसे मित्रता की (सर्ग 65)। भागवत (9.16.28) भी कहता है कि तप से उन्होंने क्षत्रिय-भाव पार कर ब्राह्मणत्व पाया।

त्रिशंकु और शुनःशेप

इक्ष्वाकु राजा त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। रामायण (बालकांड, सर्ग 57-60) के अनुसार वसिष्ठ और फिर उनके पुत्रों ने मना किया, और पुत्रों के शाप से राजा चांडाल हो गए। विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराया और अपने तप से उन्हें स्वर्ग भेजा; देवताओं ने उन्हें लौटा दिया तो विश्वामित्र ने दक्षिण आकाश में नए तारों का एक मंडल रच दिया, जहाँ त्रिशंकु सिर नीचे किए तारों के बीच रहते हैं। विष्णु पुराण (4.3) और भागवत (9.7.5-6) भी कहते हैं कि विश्वामित्र के तप-बल से त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग गए।

शुनःशेप की कथा सबसे पहले ऐतरेय ब्राह्मण (7.13-18) में मिलती है: राजा हरिश्चंद्र के यज्ञ में बलि के लिए खरीदे गए अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप ने देवताओं की स्तुति की और उसके बंधन खुल गए; उस यज्ञ में विश्वामित्र होता थे, और उन्होंने उसे देवरात नाम से अपना पुत्र बना लिया (7.16-17)। भागवत (9.16.30-36) भी यही कहता है और बताता है कि विश्वामित्र ने अपने पुत्रों से उसे बड़ा भाई मानने को कहा। रामायण (बालकांड, सर्ग 61-62) में यह यज्ञ राजा अंबरीष का है और शुनःशेप ऋचीक के पुत्र हैं; विश्वामित्र उसे रक्षा के मंत्र सिखाते हैं।

राम और लक्ष्मण के गुरु

वाल्मीकि रामायण (बालकांड, सर्ग 18-22) में विश्वामित्र अयोध्या आकर दशरथ से कहते हैं कि मारीच और सुबाहु नाम के राक्षस उनके यज्ञ को बिगाड़ते हैं, और यज्ञ के दस दिनों के लिए राम को माँगते हैं। दशरथ हिचके, पर वसिष्ठ की सलाह पर उन्होंने राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। रास्ते में विश्वामित्र ने राम को बला और अतिबला विद्या सिखाई (सर्ग 22), उनके कहने पर राम ने ताड़का को मारा (सर्ग 26), और प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने उन्हें दिव्य अस्त्र दिए और उनका प्रयोग सिखाया (सर्ग 27-28)। सिद्धाश्रम में राम ने यज्ञ की रक्षा की (सर्ग 30), और फिर विश्वामित्र दोनों भाइयों को जनक के यज्ञ में मिथिला ले गए (सर्ग 31), जहाँ उनके कहने पर शिव का धनुष राम को दिखाया गया और राम ने उसे तोड़ा (सर्ग 67)।

स्रोतों में अंतर

  • गाधि के पिता: विष्णु पुराण (4.7) और भागवत (9.15.4, तगारे का अनुवाद) में कुशांब; रामायण (बालकांड, सर्ग 34) में कुशनाभ। विष्णु पुराण यह भी कहता है कि कुशांब के तप से डरकर इंद्र स्वयं गाधि बनकर जन्मे।
  • त्रिशंकु के चांडाल होने का कारण: रामायण (सर्ग 58) में वसिष्ठ के पुत्रों का शाप; भागवत (9.7.5-6) में पिता का शाप। विष्णु पुराण (4.3) के अनुसार विश्वामित्र ने उन्हें इसलिए स्वर्ग भेजा कि अकाल के बारह वर्षों में त्रिशंकु ने विश्वामित्र की पत्नी और बच्चों को भोजन पहुँचाया था।
  • वसिष्ठ से वैर: ग्रिफ़िथ की टिप्पणी के अनुसार ऋग्वेद में दोनों की होड़ के संकेत हैं, और बाद की कथाएँ शायद इस वैदिक बात पर टिकी हैं कि राजा सुदास ने वसिष्ठ को पुरोहित रखकर विश्वामित्र से भी यज्ञ कराए। विद्वान मिशेल विट्ज़ेल मानते हैं कि सुदास के पुरोहित पहले विश्वामित्र थे; स्टेफ़नी जेमिसन ऋग्वेद में वैर का प्रमाण नहीं मानतीं (विकिपीडिया)। भागवत के अनुवादक तगारे की टिप्पणी (9.16) के अनुसार शायद अलग-अलग युगों के कई विश्वामित्रों की कथाएँ पुराणों में एक व्यक्ति पर जुड़ गई हैं।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 7 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गायत्री मंत्र के ऋषि कौन हैं?

गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल (3.62.10) में है, और यह सूक्त विश्वामित्र का माना जाता है (ग्रिफ़िथ की टिप्पणी), इसलिए परंपरा विश्वामित्र को इसका ऋषि मानती है। मंत्र के देवता सविता हैं।

विश्वामित्र के पिता कौन थे?

कुश वंश के राजा गाधि (रामायण, बालकांड, सर्ग 34; विष्णु पुराण 4.7)। इसी वंश के कारण वे कौशिक भी कहलाते हैं।

शकुंतला के पिता कौन थे?

महाभारत (आदि पर्व, संभव उपपर्व, अध्याय 71-72) के अनुसार विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री शकुंतला थीं, जिन्हें जन्म के बाद मालिनी नदी के तट पर छोड़ा गया और कण्व ऋषि ने पाला। भागवत (9.20.13) भी उन्हें विश्वामित्र और मेनका की पुत्री बताता है।

विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को क्यों ले गए?

अपने यज्ञ की रक्षा के लिए, जिसे मारीच और सुबाहु राक्षस बार-बार बिगाड़ते थे। यज्ञ में लगे रहते हुए वे क्रोध कर शाप नहीं देना चाहते थे (रामायण, बालकांड, सर्ग 19)।

स्रोत

  1. वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 18-22, 26-31, 34, 51-65, 67 (दक्षिणी पाठ, हरि प्रसाद शास्त्री का अनुवाद, archive.org)
  2. ऋग्वेद, तीसरा मंडल, 3.62.10 (आर. टी. एच. ग्रिफ़िथ का अनुवाद और टिप्पणियाँ, archive.org: rigvedacomplete)
  3. ऐतरेय ब्राह्मण 7.13-18, शुनःशेप की कथा (ए. बी. कीथ का अनुवाद, हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज़ 25, उसी archive.org फ़ाइल में)
  4. विष्णु पुराण 3.1, 4.3, 4.7 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, archive.org)
  5. भागवत पुराण 9.7.5-6, 9.15.4-13, 9.16.28-37, 9.20.13 (जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, मोतीलाल बनारसीदास, archive.org)
  6. महाभारत, आदि पर्व 71-72 (संभव उपपर्व) और चैत्ररथ उपपर्व (किसरी मोहन गांगुली का अनुवाद, archive.org)
  7. विकिपीडिया: “Gayatri Mantra”, “Battle of the Ten Kings”, “Shunahshepa” (विद्वानों के मत)

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