तीर्थ और धाम

कुंभ मेले के चार स्थान

संक्षेप में

कुंभ मेला चार स्थानों पर लगता है: प्रयागराज (गंगा-यमुना का संगम, उत्तर प्रदेश), हरिद्वार (गंगा, उत्तराखंड), उज्जैन (क्षिप्रा, मध्य प्रदेश) और नासिक-त्र्यंबकेश्वर (गोदावरी, महाराष्ट्र)। हर स्थान पर यह लगभग बारह वर्ष में एक बार बृहस्पति और सूर्य की राशि देखकर लगता है; उज्जैन और नासिक का कुंभ "सिंहस्थ" कहलाता है, क्योंकि तब बृहस्पति सिंह राशि में होते हैं। अगला कुंभ नासिक-त्र्यंबकेश्वर का सिंहस्थ है, जिसका ध्वजारोहण 31 अक्टूबर 2026 को घोषित है।

नामनदीराज्ययोग (परंपरा)पिछला और अगला
प्रयागराजप्रयाग, तीर्थराजगंगा और यमुना का संगम; परंपरा के अनुसार अदृश्य सरस्वती भी (त्रिवेणी)उत्तर प्रदेशमाघ मास, सूर्य मकर में; बृहस्पति की राशि पर स्रोत दो मत देते हैंमहाकुंभ 13 जनवरी–26 फ़रवरी 2025; अगले की घोषणा नहीं मिली
हरिद्वारमायापुरी, गंगाद्वारगंगा (हर की पौड़ी, ब्रह्मकुंड)उत्तराखंडबृहस्पति कुंभ राशि मेंकुंभ 2021; अर्धकुंभ 2027 (स्नान 14 जनवरी–20 अप्रैल 2027, घोषित)
उज्जैनअवंतिका, उज्जयिनीक्षिप्रा (रामघाट)मध्य प्रदेशबृहस्पति सिंह राशि में (सिंहस्थ)सिंहस्थ 2016; अगला 2028 (राज्य सरकार की तैयारी; तिथियाँ अधिसूचित नहीं मिलीं)
नासिक-त्र्यंबकेश्वरनासिक का रामकुंड और त्र्यंबक का कुशावर्तगोदावरीमहाराष्ट्रबृहस्पति सिंह राशि में (सिंहस्थ)सिंहस्थ 2015-16; सिंहस्थ 2027: ध्वजारोहण 31 अक्टूबर 2026, पहला अमृत स्नान 2 अगस्त 2027 (घोषित)

अमृत-कलश की कथा और इतिहासकारों का मत

परंपरा की कथा यह है कि समुद्र-मंथन से निकले अमृत-कलश को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ, और उस समय कलश की बूँदें इन चार स्थानों पर गिरीं। हरिद्वार ज़िला प्रशासन के अनुसार अमृत की बूँदें हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड में गिरीं और कलश हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में रखा गया, इसलिए कुंभ इन्हीं चार स्थानों पर होता है; मध्य प्रदेश पर्यटन भी सिंहस्थ की कथा इसी रूप में देता है। कलश किसने छलकाया, इस पर कथा के रूप अलग हैं: मोहिनी, धन्वंतरि, गरुड़ या इंद्र।

समुद्र-मंथन की कथा पुराणों में है (देखें कूर्म अवतार)। पर इतिहासकार बताते हैं कि मंथन की पुरानी कथाओं में कलश के चार स्थानों पर छलकने और किसी मेले का उल्लेख नहीं है; विकिपीडिया के सार के अनुसार काम मैक्लीन (2008) और जॉर्जियो बोनाज़ोली इसे पुरानी कथा को बाद की प्रथा से जोड़ना मानते हैं। प्रयाग के माघ मेले की परंपरा बहुत पुरानी है, पर "कुंभ" नाम पहले हरिद्वार के बारह-वर्षीय मेले के लिए आता है: मुग़ल-काल की "ख़ुलासत-उत-तवारीख़" (1695-99) हरिद्वार में हर बारह वर्ष पर कुंभ और बृहस्पति के सिंह में आने पर त्र्यंबक में मेला बताती है। मैक्लीन के अनुसार प्रयाग में "कुंभ मेला" के नाम से पहला आयोजन 1870 में हुआ।

कुंभ, अर्धकुंभ, महाकुंभ और सिंहस्थ

हर स्थान पर पूर्ण कुंभ लगभग बारह वर्ष पर आता है, क्योंकि बृहस्पति को राशिचक्र का एक चक्कर लगाने में लगभग 11.86 वर्ष लगते हैं; इसलिए लगभग सौ वर्ष में एक बार कुंभ ग्यारह वर्ष बाद ही आ जाता है। प्रयागराज और हरिद्वार में बीच में, छह वर्ष पर, अर्धकुंभ भी होता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2017 के एक अध्यादेश से प्रयागराज के अर्धकुंभ को "कुंभ" और कुंभ को "महाकुंभ" नाम दिया; 2025 का प्रयागराज मेला इसी अर्थ में महाकुंभ था।

उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर का कुंभ बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर लगता है, इसलिए "सिंहस्थ" कहलाता है (मध्य प्रदेश पर्यटन; नासिक ज़िला)। नासिक ज़िले के अनुसार शैव और उदासीन अखाड़े त्र्यंबकेश्वर के कुशावर्त में और वैष्णव अखाड़े नासिक के रामकुंड में स्नान करते हैं।

अखाड़े और अमृत स्नान

कुंभ के मुख्य स्नान-पर्वों पर अखाड़ा परिषद के 13 अखाड़े तय क्रम में शोभायात्रा के साथ स्नान करते हैं, जिसे पहले "शाही स्नान" और 2025 के प्रयागराज महाकुंभ से "अमृत स्नान" कहा जाता है; इनमें नागा संन्यासी सबसे आगे चलते हैं। अखाड़ों, स्नान के क्रम और 2027 के सिंहस्थ और हरिद्वार अर्धकुंभ की घोषित तिथियों का पूरा ब्योरा 13 अखाड़ों के पन्ने पर है।

स्रोतों में अंतर

  • ग्रहों का योग: विकिपीडिया की तालिका (2013 के प्रयाग कुंभ की आधिकारिक वेबसाइट के हवाले से) प्रयाग के लिए "बृहस्पति मेष में, सूर्य-चंद्र मकर में" या "बृहस्पति वृष में, सूर्य मकर में", नासिक के लिए "बृहस्पति और सूर्य सिंह में" या "बृहस्पति, सूर्य, चंद्र कर्क में", और उज्जैन के लिए "बृहस्पति सिंह में, सूर्य मेष में" या "तीनों तुला में" देती है। हमने हर स्थान का वही योग लिखा है जो उस स्थान का अपना सरकारी स्रोत देता है।
  • और "कुंभ": कुंभकोणम का महामहम, कुरुक्षेत्र, वृंदावन या त्रिवेणी (बांसबेरिया) जैसे मेलों को भी कहीं-कहीं कुंभ कहा जाता है, पर प्रचलित गिनती के चार कुंभ-स्थान यही हैं।
  • अगली तिथियाँ सरकारों की घोषणा पर आधारित हैं (नासिक: 1 जून 2025, हरिद्वार: 28 नवंबर 2025 और 14 अप्रैल 2026)। उज्जैन का अगला सिंहस्थ 2028 में है (विकिपीडिया की वर्ष-तालिका; राज्य सरकार की तैयारी की ख़बरें), पर अधिसूचित स्नान-तिथियाँ हमें नहीं मिलीं। यात्रा से पहले मेला प्रशासन की नई सूचना देख लें।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कुंभ मेला कहाँ-कहाँ लगता है?

चार स्थानों पर: प्रयागराज (गंगा-यमुना संगम), हरिद्वार (गंगा), उज्जैन (क्षिप्रा) और नासिक-त्र्यंबकेश्वर (गोदावरी)।

अगला कुंभ मेला कब और कहाँ है?

नासिक-त्र्यंबकेश्वर का सिंहस्थ: घोषणा के अनुसार ध्वजारोहण 31 अक्टूबर 2026 को और पहला अमृत स्नान 2 अगस्त 2027 को। हरिद्वार का अर्धकुंभ 2027 में (14 जनवरी से 20 अप्रैल तक स्नान-पर्व), और उज्जैन का सिंहस्थ 2028 में।

सिंहस्थ कुंभ किसे कहते हैं?

उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर का कुंभ, जो बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर लगता है; "सिंहस्थ" का अर्थ है "सिंह में स्थित"।

कुंभ, अर्धकुंभ और महाकुंभ में क्या अंतर है?

कुंभ हर स्थान पर लगभग बारह वर्ष पर आता है और अर्धकुंभ प्रयागराज व हरिद्वार में बीच के छठे वर्ष। प्रयागराज में 2017 से अर्धकुंभ को "कुंभ" और बारह-वर्षीय कुंभ को "महाकुंभ" कहा जाता है (उत्तर प्रदेश सरकार का अध्यादेश)।

कुंभ चार ही स्थानों पर क्यों लगता है?

परंपरा के अनुसार समुद्र-मंथन के अमृत-कलश की बूँदें इन्हीं चार स्थानों पर गिरी थीं (हरिद्वार ज़िला; मध्य प्रदेश पर्यटन)। इतिहासकारों के अनुसार कलश के छलकने की यह कड़ी मंथन की पुरानी कथाओं में नहीं मिलती।

स्रोत

  1. ज़िला हरिद्वार (उत्तराखंड सरकार): About Kumbh, haridwar.nic.in/about-kumbh/ (हरिद्वार के मंदिर-पन्ने के लिए अक्टूबर 2026 में पढ़ा)
  2. मध्य प्रदेश पर्यटन: The Legend of Simhastha, mptourism.com/the-legend-of-simhastha.html (उज्जैन के मंदिर-पन्ने के लिए पढ़ा)
  3. नासिक ज़िला (महाराष्ट्र सरकार): त्र्यंबकेश्वर, nashik.gov.in; PTI (द वीक, 1 जून 2025) और ETV भारत (1 जून 2025): सिंहस्थ 2027 की घोषित तिथियाँ
  4. PTI (द वीक, 28 नवंबर 2025; तेलंगाना टुडे, 15 अप्रैल 2026): हरिद्वार अर्धकुंभ 2027 के 10 स्नान-पर्व
  5. विकिपीडिया: Kumbh Mela (17 अक्टूबर 2026 को पढ़ा; इसकी वर्ष-तालिका में उज्जैन 2028 भी), जो काम मैक्लीन, Pilgrimage and Power: The Kumbh Mela in Allahabad, 1765–1954 (ऑक्सफ़र्ड, 2008) और 2013 के प्रयाग कुंभ की आधिकारिक वेबसाइट का हवाला देता है

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ