सम्प्रदाय

13 अखाड़े: शैव संन्यासी, वैष्णव बैरागी और उदासीन

संक्षेप में

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद 13 अखाड़े मानती है, जो तीन परंपराओं में बँटे हैं। सात शैव संन्यासी (दशनामी) अखाड़े: जूना, निरंजनी, महानिर्वाणी, अटल, आनंद, आवाहन और अग्नि। तीन वैष्णव बैरागी अखाड़े, जिन्हें “अनी” कहते हैं: निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी। और तीन उदासीन परंपरा के अखाड़े: बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल। कुंभ और सिंहस्थ मेलों में यही 13 अखाड़े एक तय क्रम में अमृत स्नान (पहले नाम शाही स्नान) करते हैं। कुंभ मेले की सरकारी वेबसाइट के अनुसार सदस्यों की संख्या में जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है, उसके बाद निरंजनी और महानिर्वाणी।

नामपरंपराइष्टदेवमुख्य केंद्रस्थापना (अखाड़े की परंपरा के अनुसार)
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ाजूना अखाड़ा; पहला नाम भैरव अखाड़ाशैव, दशनामी संन्यासीगुरु दत्तात्रेयहनुमान घाट, वाराणसीवि.सं. 1202 (लगभग 1146 ई.), कर्णप्रयाग, उत्तराखंड
श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनीनिरंजनी अखाड़ाशैव, दशनामी संन्यासीकार्तिकेयदारागंज, प्रयागराजवि.सं. 960 (लगभग 904 ई.), मांडवी, कच्छ
श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणीमहानिर्वाणी अखाड़ा; सरकार (1959) में “निर्वाणी अखाड़ा”शैव, दशनामी संन्यासीकपिल मुनिदारागंज, प्रयागराजवि.सं. 805 (लगभग 749 ई.), कुंडा (पलामू क्षेत्र, झारखंड)
श्री शंभु पंचायती अटल अखाड़ाअटल अखाड़ाशैव, दशनामी संन्यासीगणेश (गजानन)कटुआपुरा, वाराणसीवि.सं. 703 (लगभग 647 ई.), गोंडवाना क्षेत्र
श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायतीआनंद अखाड़ाशैव, दशनामी संन्यासीसूर्य (सूर्यनारायण)त्र्यंबकेश्वर, नासिकवि.सं. 912 (856 ई.), बरार
श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ाआवाहन (आह्वान) अखाड़ाशैव, दशनामी संन्यासीभैरवदशाश्वमेध घाट, वाराणसीवि.सं. 603 (लगभग 547 ई.)
श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ाअग्नि (पंचाग्नि) अखाड़ाशैव; रीतियाँ नागा संन्यासियों से अलगगायत्रीकाशी; एक सूची में गिरनार, जूनागढ़1136 ई.
श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ानिर्मोही अनीवैष्णव बैरागीश्रीराम और श्रीकृष्णधीर समीर मंदिर, वृंदावनरामानंदी बालानंद जी द्वारा; एक स्रोत में रामानंद
श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ादिगंबर अनीवैष्णव बैरागीश्रीराम और श्रीकृष्णशामलाजी, साबरकांठा (गुजरात)रामानंदी बालानंद जी द्वारा
श्री पंच निर्वाणी अनी अखाड़ानिर्वाणी अनीवैष्णव बैरागीश्रीराम और श्रीकृष्णहनुमानगढ़ी, अयोध्यासंत अभयरामदास द्वारा; एक स्रोत में बालानंद जी
श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीनबड़ा उदासीन (निर्वाण) अखाड़ाउदासीनश्रीचंदकीडगंज, प्रयागराज1825 ई., हरिद्वार, प्रीतमदास द्वारा; एक स्रोत में 1788 ई.
श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीननया उदासीन अखाड़ाउदासीनश्रीचंदकनखल, हरिद्वार1902 में अलग हुआ; पंजीकरण 6 जून 1913
श्री निर्मल पंचायती अखाड़ानिर्मल अखाड़ानिर्मल (निर्मला) परंपरागुरु ग्रंथ साहिबकनखल, हरिद्वार; एक स्रोत में कीडगंज, प्रयागराज1862 ई., पटियाला; एक स्रोत में 1912 का हरिद्वार कुंभ

अखाड़ा क्या है

हिंदी का “अखाड़ा” शब्द प्लैट्स के कोश के अनुसार संस्कृत “अक्षपाट” से है, जिसका अर्थ मोनियर-विलियम्स कुश्ती या प्रतियोगिता का मैदान देते हैं। प्लैट्स इसके अर्थों में अभ्यास की जगह, सभा और “हिंदू साधुओं का एक सम्प्रदाय” भी गिनाते हैं। कुंभ मेले की सरकारी वेबसाइट और PIB इस शब्द को “अखंड” (जो बँट न सके) से जोड़ते हैं।

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार अखाड़े एक जैसे आचार और विचार वाले साधुओं को एक संगठन में जोड़ने के लिए बने, और उनके साधु शास्त्र और शस्त्र, दोनों के जानकार होते थे। परंपरा इनकी शुरुआत आदि शंकराचार्य से जोड़ती है। इतिहासकार जदुनाथ सरकार (1959) लिखते हैं कि लगभग 1750 से पहले अखाड़ों के इतिहास का कोई समकालीन लेख नहीं मिलता, और DD न्यूज़ (दिसंबर 2024) के अनुसार जूना अखाड़े के प्रवक्ता ने बताया कि अखाड़ों का आज का रूप 12वीं सदी से पहले का नहीं है और नागा अखाड़े अकबर से औरंगज़ेब के समय के बीच धीरे-धीरे बने।

तीन परंपराएँ: संन्यासी, बैरागी और उदासीन

सात शैव अखाड़े शंकराचार्य की दशनामी संन्यासी परंपरा के हैं; कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार इनके आराध्य शिव हैं, जिनकी पूजा हर अखाड़ा अपनी मान्यता के अनुसार अलग रूप में करता है। PIB (2025) के अनुसार इन अखाड़ों की अगुवाई नागा संन्यासी करते हैं। अग्नि अखाड़े की रीतियाँ, UP पर्यटन निगम (UPSTDC) के अनुसार, दूसरे शैव अखाड़ों और नागा संन्यासियों से अलग हैं।

तीन वैष्णव अखाड़े बैरागी (वैरागी) साधुओं के हैं। ब्रिटानिका के अनुसार बैरागी विष्णु के किसी रूप के उपासक हैं, प्रायः सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं और उनका तिलक कभी भस्म का नहीं, हमेशा खड़ा होता है; उनमें जो नागा बैरागी हैं, वे अपने अलग अखाड़े बनाते हैं। DD न्यूज़ के अनुसार रामानंदी सम्प्रदाय के बालानंद जी ने तीनों अनी, दिगंबर, निर्मोही और निर्वाणी, बनाईं, और निर्मोही अखाड़े के अध्यक्ष के अनुसार इन तीन अनियों के भीतर 18 अखाड़े हैं, जिनमें 7 श्रीराम के और 11 श्रीकृष्ण के उपासक हैं।

उदासीन अखाड़ों को कुंभ मेले की वेबसाइट सिखों के पहले गुरु के पुत्र श्रीचंद से जोड़ती है और बताती है कि उनके अनुयायी मुख्यतः “ॐ” की उपासना करते हैं; DD न्यूज़ दोनों उदासीन अखाड़ों के इष्टदेव श्रीचंद और निर्मल अखाड़े के गुरु ग्रंथ साहिब बताता है। UPSTDC नया उदासीन और निर्मल अखाड़ों को सिख धर्म के उदासी और निर्मला सम्प्रदायों की संस्थाएँ कहता है। ये तीनों अखाड़ा परिषद के 13 अखाड़ों में गिने जाते हैं और कुंभ में अमृत स्नान करते हैं।

अखाड़े के पद: श्रीपंच, महंत और महामंडलेश्वर

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार अखाड़े का प्रबंध पाँच सदस्यों की एक समिति (श्रीपंच) देखती है, जिसके सदस्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश और शक्ति के प्रतिनिधि माने जाते हैं। महामंडलेश्वर अखाड़ों की अगुवाई करते हैं, और वही नए साधुओं को गुरु-मंत्र दे सकते हैं। पेशवाई और स्नान की शोभायात्रा में महामंडलेश्वर सजे रथों पर श्रीमहंत के साथ चलते हैं, उनके पीछे सचिव हाथियों पर, नागा संन्यासी घोड़ों पर और बाकी साधु पैदल।

सरकार (1959) के अनुसार शास्त्र और चरित्र, दोनों के लिए प्रसिद्ध संन्यासियों को पहले परमहंस कहा जाता था, और लगभग 1800 ई. से उन्हें मंडलेश्वर कहा जाने लगा; यह उपाधि दशनामियों के सात अखाड़ों में से कोई अखाड़ा, या कोई मठ, तिलक लगाकर और चादर भेंट करके देता है। एक अखाड़े में कई मंडलेश्वर हो सकते हैं; उनमें सबसे विद्वान को अखाड़े का आचार्य बनाया जाता है, और सरकार के अनुसार यह उपाधि सबसे ऊँची है। आज के समाचारों में यह पद “आचार्य महामंडलेश्वर” कहलाता है (जैसे IANS, नवंबर 2024, जूना अखाड़े के बारे में)। PIB (2025) के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़ा महिलाओं को महामंडलेश्वर बनाने वाला पहला अखाड़ा है।

अखाड़ा परिषद और अमृत स्नान का क्रम

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अखाड़ों में आपसी मेल और विवादों के निपटारे के लिए बनी है। परिषद मेला समिति (मंडलायुक्त, ज़िलाधिकारी और मेला अधिकारी) से सलाह करके शाही स्नान और पेशवाई की तिथि, समय और अखाड़ों का क्रम तय करती है। ब्रिटानिका के अनुसार स्नान में पहले जाने को लेकर इतिहास में रक्तरंजित झगड़े हुए हैं, और अब सरकार एक तय क्रम लागू करती है। सरकार (1959) लिखते हैं कि अंग्रेज़ी शासन ने पुरानी रीति की जाँच करके क्रम तय किया: पहले नागा गोसाईं (शैव अखाड़े), फिर वैष्णव बैरागी, फिर उदासी और अंत में निर्मल।

द वीक (14 जनवरी 2025) के अनुसार प्रयागराज महाकुंभ के पहले अमृत स्नान में यह क्रम था: महानिर्वाणी और अटल; फिर निरंजनी और आनंद; फिर जूना, आवाहन और अग्नि; फिर बैरागी निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी अनी; और अंत में उदासीन अखाड़े, सबसे आख़िर में निर्मल। इसी रिपोर्ट के अनुसार हरिद्वार में निरंजनी पहले स्नान करता है, और उज्जैन और नासिक में जूना आगे रहता है। “शाही स्नान” का नाम 2025 के प्रयागराज महाकुंभ में “अमृत स्नान” किया गया, और PTI के अनुसार 1 जून 2025 की नासिक बैठक में सिंहस्थ के लिए भी यही नाम माना गया।

नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ 2027: घोषित तिथियाँ

PTI और ETV भारत (1 जून 2025) के अनुसार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने नासिक में 13 अखाड़ों के संतों के साथ बैठक के बाद ये तिथियाँ घोषित कीं: ध्वजारोहण 31 अक्टूबर 2026 (शनिवार) को, दोपहर 12:02 बजे नासिक के रामकुंड पर और त्र्यंबकेश्वर में कुशावर्त पर; नगर प्रदक्षिणा 29 जुलाई 2027; पहला अमृत स्नान 2 अगस्त 2027 (सोमवार, सोमवती अमावस्या); दूसरा अमृत स्नान 31 अगस्त 2027 (मंगलवार, अमावस्या); तीसरा अमृत स्नान नासिक में 11 सितंबर 2027 (भाद्रपद शुक्ल एकादशी) और त्र्यंबकेश्वर में 12 सितंबर 2027 (द्वादशी); और ध्वज उतारकर समापन 24 जुलाई 2028। फ़्री प्रेस जर्नल (20 सितंबर 2026) ने यही तिथियाँ दोहराईं। हमारे पंचांग से ये तिथियाँ मेल खाती हैं; अमांत गणना में 2 अगस्त की अमावस्या आषाढ़ की और 31 अगस्त की श्रावण की है, पूर्णिमांत में श्रावण और भाद्रपद की।

नासिक ज़िले के अनुसार शैव और उदासीन अखाड़े त्र्यंबकेश्वर में और वैष्णव अखाड़े नासिक में स्नान करते हैं। ये तिथियाँ सरकार की घोषणा पर आधारित हैं; 8 अक्टूबर 2026 तक नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेला प्राधिकरण की कोई अलग अधिसूचना हमें नहीं मिली, इसलिए यात्रा से पहले प्राधिकरण या नासिक ज़िला प्रशासन की नई सूचना देख लें।

हरिद्वार अर्धकुंभ 2027: घोषित स्नान

PTI के अनुसार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने 28 नवंबर 2025 को हरिद्वार में 13 अखाड़ों के प्रतिनिधियों से मिलकर अर्धकुंभ 2027 के 10 स्नान पर्व घोषित किए, और मेला प्रशासन ने 14 अप्रैल 2026 को यही सूची दोहराई: 14 जनवरी (मकर संक्रांति), 6 फ़रवरी (मौनी अमावस्या), 11 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 20 फ़रवरी (माघ पूर्णिमा), 6 मार्च (महाशिवरात्रि, अमृत स्नान), 8 मार्च (फाल्गुन अमावस्या, अमृत स्नान), 7 अप्रैल (नव संवत्सर), 14 अप्रैल (मेष संक्रांति, अमृत स्नान), 15 अप्रैल (राम नवमी) और 20 अप्रैल (चैत्र पूर्णिमा)। PTI के अनुसार किसी अर्धकुंभ में अखाड़ों का अमृत स्नान पहली बार होगा।

हमारे पंचांग में सूर्य 14 जनवरी 2027 को रात लगभग 9:16 बजे मकर राशि में जाता है, इसलिए हमारे कैलेंडर में मकर संक्रांति 15 जनवरी को है; मेला प्रशासन ने पहला स्नान 14 जनवरी को घोषित किया है। बाकी नौ तिथियाँ हमारे पंचांग से मेल खाती हैं।

किन्नर अखाड़ा

नेशनल जियोग्राफ़िक (मई 2019) के अनुसार किन्नर अखाड़ा 2015 में बना; 2016 के उज्जैन सिंहस्थ में अखाड़ा परिषद ने उसे शाही स्नान की अनुमति नहीं दी, और 2019 के प्रयागराज कुंभ में वह जूना अखाड़े के साथ जुड़कर स्नान में शामिल हुआ। द टेलीग्राफ़ (जनवरी 2021) के अनुसार परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष ने कहा कि किन्नर अखाड़ा जूना के साथ स्नान कर सकता है, पर अलग “14वें अखाड़े” के रूप में नहीं। PIB (2025) और ब्रिटानिका कुंभ में उसकी उपस्थिति का उल्लेख करते हैं। इसलिए यहाँ उसे 13 की सूची में नहीं रखा गया है।

स्रोतों में अंतर

  • “अखाड़ा” शब्द: प्लैट्स और मोनियर-विलियम्स इसे संस्कृत “अक्षपाट” (कुश्ती का मैदान) से जोड़ते हैं, और ब्रिटानिका भी इसे कुश्ती के मैदान के हिंदी शब्द से निकला बताता है; कुंभ मेले की वेबसाइट और PIB इसे “अखंड” का बिगड़ा रूप कहते हैं।
  • स्थापना की तिथियाँ: छह शैव अखाड़ों की तिथियाँ एक भाट-पोथी से हैं, जो सरकार (1959) के अनुसार केवल एक अखाड़े (महानिर्वाणी) के भाटों की परंपरा है, और जिसकी हस्तलिखित प्रति उनके समय में 50 वर्ष से पुरानी नहीं थी; सरकार सावधान करते हैं कि दूसरे अखाड़ों के भाट अलग कथा कह सकते थे, और कुछ वर्षों में हज़ार का अंक छूटा हो सकता है (जैसे आवाहन का वि.सं. 1603, यानी 1547 ई.; महानिर्वाणी का 1805, यानी 1749 ई.)। ईसवी वर्ष यहाँ विक्रम संवत से 56 घटाकर दिए गए हैं, सरकार की तरह। DD न्यूज़ इन्हीं तिथियों को अखाड़ों के प्रवक्ताओं के हवाले से देता है, पर उसमें अटल का संवत 703 की जगह 603 छपा है।
  • सबसे पुराना अखाड़ा: भाट-पोथी में आवाहन (वि.सं. 603) सबसे पहले है; पर महानिर्वाणी के महंत लक्ष्मण गिरि के 1929 के लिखित विवरण में, जिसे सरकार उद्धृत करते हैं, अटल को सात अखाड़ों में सबसे पुराना कहा गया है। UPSTDC आवाहन को आदि शंकराचार्य द्वारा छठी सदी में स्थापित, अटल का इतिहास लगभग 1,400 वर्ष और निरंजनी का एक हज़ार वर्ष से अधिक बताता है; PIB के अनुसार आवाहन 1,200 वर्षों से अधिक से कुंभ में आता रहा है।
  • अग्नि अखाड़ा: DD न्यूज़ इसकी स्थापना 1136 ई. और प्रधान केंद्र काशी बताता है (उसमें संवत 1992 छपा है, जो 1136 ई. से मेल नहीं खाता); भारतकोश की अखाड़ों की सूची में इसका पता गिरनार की तलहटी, जूनागढ़ (गुजरात) है।
  • वैष्णव अनी: DD न्यूज़ तीनों अनी का संस्थापक रामानंदी बालानंद जी को बताता है; UPSTDC निर्मोही अखाड़े का संस्थापक रामानंद को और निर्वाणी अनी का संत अभयरामदास को बताता है, और दिगंबर अनी को तीनों में सबसे बड़ा कहता है। इष्टदेव: DD न्यूज़ श्रीराम और श्रीकृष्ण बताता है; UPSTDC निर्मोही की राम-भक्ति बताता है; PIB के अनुसार इन अखाड़ों के धर्मध्वज पर हनुमान का चित्र होता है।
  • उदासीन और निर्मल: बड़ा उदासीन की स्थापना UPSTDC के अनुसार 1825 ई. में हरिद्वार में निर्वाण बाबा प्रीतमदास ने की, DD न्यूज़ के अनुसार 1788 ई. में श्री प्रीतमदास ने। नया उदासीन UPSTDC के अनुसार 1902 के मतभेदों से बना और 6 जून 1913 को पंजीकृत हुआ; DD न्यूज़ के अनुसार 1902 में प्रयागराज में। निर्मल अखाड़ा UPSTDC के अनुसार 1862 ई. में पटियाला में पटियाला, नाभा और जींद के शासकों ने बनाया; DD न्यूज़ के अनुसार इसकी रूपरेखा 1816 में बनी और 1912 के हरिद्वार कुंभ में इसकी स्थापना हुई, और इसका मुख्य केंद्र कीडगंज, प्रयागराज है।
  • मुख्य केंद्र: तालिका के पते भारतकोश की अखाड़ों की सूची से हैं; आवाहन (दशाश्वमेध घाट) और निर्वाणी अनी (हनुमानगढ़ी) का केंद्र UPSTDC भी देता है, और महानिर्वाणी का दारागंज, प्रयागराज सरकार (1959) भी। भारतकोश की सूची में कई अखाड़ों के दूसरे पते भी हैं, जैसे दिगंबर अनी का तपोवन (नासिक) और अग्नि अखाड़े का हरिद्वार।
  • नाम: सरकार (1959) जिसे “निर्वाणी अखाड़ा” कहते हैं, वह दारागंज, प्रयागराज का महानिर्वाणी अखाड़ा है, वैष्णव निर्वाणी अनी नहीं। आवाहन को आह्वान और अनी को अणि भी लिखा जाता है।
  • सिंहस्थ 2027 का तीसरा स्नान: PTI के अनुसार नासिक में 11 सितंबर और त्र्यंबकेश्वर में 12 सितंबर; ETV भारत की सूची में त्र्यंबकेश्वर के पहले दो अमृत स्नान भी 2 और 31 अगस्त दिए गए हैं, और उसमें 12 सितंबर को शनिवार लिखा है, जबकि उस दिन रविवार है।
  • हरिद्वार 2027 के अमृत स्नान: PTI और मेला प्रशासन तीन बताते हैं (6 मार्च, 8 मार्च, 14 अप्रैल); स्वराज्य पत्रिका की एक रिपोर्ट चार अमृत स्नान लिखती है।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 15 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

13 अखाड़े कौन से हैं?

सात शैव संन्यासी अखाड़े: जूना, निरंजनी, महानिर्वाणी, अटल, आनंद, आवाहन और अग्नि; तीन वैष्णव बैरागी अनी अखाड़े: निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी; और तीन उदासीन परंपरा के अखाड़े: बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद इन्हीं 13 को मानती है।

सबसे बड़ा अखाड़ा कौन सा है?

कुंभ मेले की सरकारी वेबसाइट और PIB के अनुसार सदस्यों की संख्या में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है; वेबसाइट के अनुसार उसके बाद निरंजनी और महानिर्वाणी आते हैं। वैष्णव अनियों में UPSTDC दिगंबर अनी को सबसे बड़ा बताता है।

अखाड़ा परिषद क्या है?

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद 13 अखाड़ों का साझा संगठन है। कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार यह अखाड़ों में मेल और विवादों के निपटारे के लिए बनी है, और मेला समिति से सलाह करके स्नान और पेशवाई की तिथि, समय और अखाड़ों का क्रम तय करती है।

शाही स्नान और अमृत स्नान में क्या अंतर है?

दोनों एक ही स्नान के नाम हैं: कुंभ के मुख्य पर्वों पर अखाड़ों का शोभायात्रा के साथ तय क्रम में स्नान। 2025 के प्रयागराज महाकुंभ में इसे “अमृत स्नान” कहा गया, और PTI के अनुसार 1 जून 2025 की नासिक बैठक में सिंहस्थ 2027 के लिए भी यही नाम माना गया।

महामंडलेश्वर कौन होते हैं?

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार महामंडलेश्वर अखाड़ों की अगुवाई करते हैं, नए साधुओं को गुरु-मंत्र देते हैं और स्नान की शोभायात्रा में रथों पर चलते हैं। सरकार (1959) के अनुसार यह उपाधि विद्या और चरित्र के लिए प्रसिद्ध संन्यासी को अखाड़ा देता है, और कई मंडलेश्वरों में सबसे विद्वान अखाड़े का आचार्य बनता है, जिसे आज आचार्य महामंडलेश्वर कहते हैं।

सिंहस्थ कुंभ 2027 के अमृत स्नान कब हैं?

घोषणा (PTI, 1 जून 2025) के अनुसार: 2 अगस्त 2027 और 31 अगस्त 2027, और तीसरा नासिक में 11 सितंबर और त्र्यंबकेश्वर में 12 सितंबर 2027। ध्वजारोहण 31 अक्टूबर 2026 को है और समापन 24 जुलाई 2028 को।

क्या किन्नर अखाड़ा 13 अखाड़ों में है?

नहीं। रिपोर्टों के अनुसार 2019 के प्रयागराज कुंभ से किन्नर अखाड़ा जूना अखाड़े के साथ स्नान करता है, पर अखाड़ा परिषद ने उसे अलग 14वें अखाड़े के रूप में नहीं माना (द टेलीग्राफ़, जनवरी 2021)।

स्रोत

  1. कुंभ मेला 2025 की वेबसाइट (प्रयागराज मेला प्राधिकरण; सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उत्तर प्रदेश): “Spiritual Gurus”, kumbh.gov.in/en/spiritualgurus
  2. PIB रिसर्च यूनिट (संस्कृति मंत्रालय): “Spiritual Powerhouses: Akharas at the Forefront of Maha Kumbh 2025”, 22 जनवरी 2025
  3. उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (UPSTDC): “Maha Kumbh – Akhara Walk Tour”, upstdc.co.in/web/aakhara
  4. DD न्यूज़: “महाकुंभ 2025: जानें, कब हुई अखाड़ों की स्थापना और कौन हैं उनके इष्टदेव”, 31 दिसंबर 2024
  5. जदुनाथ सरकार: A History of Dasnami Naga Sanyasis (श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी, दारागंज, इलाहाबाद, 1959), खंड 1, अध्याय 4 और 6
  6. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Kumbh Mela”, “vairagin”, “dashnami sannyasin”
  7. भारतकोश (bharatdiscovery.org): “अखाड़ा”, भारत के प्रसिद्ध अखाड़ों की सूची
  8. जॉन टी. प्लैट्स: A Dictionary of Urdu, Classical Hindi, and English (1884), “akhāṛā”; मोनियर-विलियम्स संस्कृत-अंग्रेज़ी कोश: “akṣapāṭa”
  9. PTI (द वीक, 1 जून 2025): “Simhastha Kumbh Mela to begin in Nashik-Trimbakeshwar on Oct 31 next year”; ETV भारत (1 जून 2025): सिंहस्थ की पूरी सूची; फ़्री प्रेस जर्नल (20 सितंबर 2026)
  10. PTI (द वीक, 28 नवंबर 2025): “Haridwar Ardh Kumbh 2027 will be celebrated as grandly as Purna Kumbh”; PTI (तेलंगाना टुडे, 15 अप्रैल 2026): “Ardh Kumbh 2027 in Haridwar to feature 10 bathing festivals”
  11. द वीक (14 जनवरी 2025): “Order of snan at Mahakumbh for 13 akharas revealed”
  12. IANS (3 नवंबर 2024): जूना अखाड़े की नगर प्रवेश यात्रा
  13. नेशनल जियोग्राफ़िक (30 मई 2019): “Transgender spiritual order finally finds acceptance at Hindu pilgrimage”; द टेलीग्राफ़ (जनवरी 2021): “Sadhus divided over transgender sect”
  14. नासिक ज़िला (महाराष्ट्र सरकार): त्र्यंबकेश्वर, nashik.gov.in
  15. सनातनबोध पंचांग (नई दिल्ली और नासिक के लिए): घोषित तिथियों की तिथि और संक्रांति की जाँच; ड्रिक पंचांग 2027 अमावस्या सूची

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