सम्प्रदाय

नागा साधु (नागा संन्यासी)

संक्षेप में

नागा साधु वे संन्यासी हैं जो अखाड़ों में रहते हैं और वस्त्र त्याग देते हैं; “नागा” का अर्थ ही “नग्न” है। ब्रिटानिका के अनुसार वे शंकराचार्य की दशनामी संन्यासी परंपरा के हैं, और ब्रिटानिका उन्हें संन्यासियों में सबसे जुझारू बताता है। PIB (2025) के अनुसार शैव अखाड़ों की अगुवाई नागा संन्यासी करते हैं, और जूना अखाड़े में दीक्षित नागाओं की संख्या सबसे अधिक है। वैष्णव बैरागियों में भी नागा होते हैं, जो अपने अलग अखाड़े बनाते हैं (ब्रिटानिका)। कुंभ के अमृत स्नान में अखाड़ों के जुलूस में नागा संन्यासी आगे रहते हैं, और नए नागाओं की दीक्षा भी कुंभ के अखाड़ा-शिविरों में होती है।

शब्द का अर्थ
“नागा” यानी नग्न; दशनामी संन्यासियों में वे जो वस्त्र त्याग देते हैं (ब्रिटानिका)
परंपरा
शंकराचार्य की दशनामी संन्यासी परंपरा (शैव); वैष्णव बैरागियों में भी नागा
अखाड़े
शैव संन्यासी अखाड़े, सबसे अधिक जूना में (PIB 2025); तीन वैष्णव अनी
उपासना
शिव (PIB 2025); सरकार (1959) के अनुसार संन्यासी शिव और शक्ति की उपासना करते हैं
पहचान
पूरे शरीर पर भस्म, जिसे शिव की विभूति माना जाता है (सरकार 1959); जटा; रुद्राक्ष की माला (ब्रिटानिका)
दीक्षा
अखाड़े में गुरु से; कुंभ के शिविर में मुंडन, पितरों के साथ स्वयं का भी पिंडदान, स्नान और व्रत (AP 2025)
कुंभ में
अमृत स्नान के जुलूस में घोड़ों पर, अखाड़े के साथ सबसे पहले स्नान (कुंभ मेला वेबसाइट, द वीक)
मुख्य केंद्र
अखाड़ों के मठ: वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार आदि; कुंभ के चार स्थान

नागा कौन होते हैं

ब्रिटानिका के अनुसार दशनामी संन्यासी, जो शंकर के स्थापित दस नामों (गिरि, पुरी, भारती आदि) में से किसी एक के होते हैं, प्रायः गेरुए वस्त्र पहनते हैं, माथे पर भस्म की तीन आड़ी रेखाओं का तिलक लगाते हैं और 108 रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। उनमें से कुछ वस्त्र नहीं पहनते; वे नागा (नग्न) संन्यासी कहलाते हैं। सरकार (1959) के अनुसार नागा और तपस्वी पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं, जबकि दूसरे संन्यासी केवल माथे और शरीर के कुछ स्थानों पर त्रिपुंड लगाते हैं।

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार हर नागा किसी न किसी अखाड़े से जुड़ा होता है, और नागा साधु एक ओर शास्त्र जानते हैं और दूसरी ओर युद्ध-कला में निपुण होते हैं। सरकार की पुस्तक की भूमिका में के. एम. मुंशी लिखते हैं कि दशनामी दो वर्गों में बँटे हैं, शास्त्रधारी, जो शास्त्र पढ़ते-पढ़ाते हैं, और अस्त्रधारी, जो शस्त्र रखते हैं; अस्त्रधारी वर्ग अखाड़ों में संगठित है। AP (2025) के अनुसार नागा आज भी तलवार, भाले जैसे शस्त्र रखते हैं, पर अब प्रतीक के रूप में।

किन अखाड़ों में नागा होते हैं

PIB (2025) के अनुसार शैव अखाड़ों की अगुवाई नागा संन्यासी करते हैं, जो शिव के उपासक हैं, और कुंभ के जुलूसों में भाले और तलवार लेकर चलते हैं; जूना अखाड़े में दीक्षित नागा संन्यासियों की संख्या सबसे अधिक है। अग्नि अखाड़े की रीतियाँ UPSTDC के अनुसार नागा संन्यासियों से अलग हैं।

वैष्णव परंपरा में भी नागा हैं। ब्रिटानिका के अनुसार अधिकांश बैरागी, जब यात्रा पर नहीं होते, “स्थानों” नाम के मठों में रहते हैं, पर नागा बैरागी, जो वैष्णव साधुओं में जुझारू रहे हैं, अपने अलग अखाड़े बनाते हैं। आज ये तीन वैष्णव अनी अखाड़े हैं: निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी।

दीक्षा: स्रोत क्या बताते हैं

सरकार (1959) दो छपी हुई पद्धतियों, परमहंस गोपालानंद की “संन्यास-ग्रहण पद्धति” और विश्वेश्वर सरस्वती के “यतिधर्म संग्रह”, के आधार पर दशनामी संन्यास-दीक्षा का क्रम देते हैं: शुद्धि के लिए चार कृच्छ्र व्रत और संकल्प; फिर सात-आठ दिनों तक सब पितरों का श्राद्ध; शिखा छोड़कर सिर, दाढ़ी और मूँछ का मुंडन; कौपीन, दंड और कमंडलु के सिवा सब कुछ दान; पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) के मंत्रों से विरजा होम; जल में खड़े होकर तीन बार यह घोषणा कि “मैं संन्यासी हो गया”, और यह संकल्प कि कोई प्राणी उससे न डरे; फिर यज्ञोपवीत और शिखा का त्याग; और अंत में आचार्य शिष्य को कौपीन, दंड और कमंडलु देते हैं। यह संन्यास का सामान्य क्रम है; सरकार नागा दीक्षा का अलग क्रम नहीं देते।

AP (फ़रवरी 2025) ने प्रयागराज महाकुंभ में नागा दीक्षा का वर्णन इस तरह किया: अखाड़ों के शिविरों में मुख्य पुरोहित दीक्षा देते हैं; दीक्षा लेने वाले अपने पितरों के लिए पिंड अर्पित करते हैं और साथ में स्वयं को भी मृतकों में गिनते हैं, जिससे सांसारिक बंधन टूटने का भाव है; उनका मुंडन होता है और नया नाम मिलता है; वे संगम में स्नान करते हैं और सांसारिक सुख छोड़ने का व्रत लेते हैं; उन्हें तीन धागों वाला जनेऊ मिलता है, जो बाएँ कंधे पर पहना जाता है; और अंत में गुरु उनके कान में एक गुप्त उपदेश देते हैं।

स्त्रियों के बारे में PIB (22 जनवरी 2025) लिखता है कि जूना अखाड़े ने 200 से अधिक महिलाओं को संन्यास दीक्षा दी है और अपनी संन्यासिनियों के संगठन का नाम “संन्यासिनी श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा” रखा है। PIB इसे संन्यास दीक्षा कहता है; इनमें कितनी नागा दीक्षा थीं, यह वह अलग से नहीं बताता।

इतिहास

परंपरा अखाड़ों की शुरुआत आदि शंकराचार्य से जोड़ती है। इतिहासकार जदुनाथ सरकार (1959), जिनकी पुस्तक महानिर्वाणी अखाड़े ने छापी, लिखते हैं कि लगभग 1750 में गोसाईं राजेंद्र गिरि के समय से पहले अखाड़ों के उद्भव और इतिहास का कोई समकालीन लेख नहीं मिलता; उसके बाद से लड़ाकू नागा साधुओं के विस्तृत विवरण मिलते हैं। ब्रिटानिका के अनुसार नागा संन्यासी पहले कभी-कभी मुस्लिम लड़ाकों से और दूसरे सम्प्रदायों के नग्न साधुओं से लड़े, और नागा संगठनों के सदस्य पहले भाड़े के सैनिक और व्यापारी के रूप में भी जीविका चलाते थे।

सरकार के अनुसार 1751 में, जब बंगश अफ़ग़ानों ने इलाहाबाद के क़िले को घेर रखा था, राजेंद्र गिरि के नेतृत्व में नागा संन्यासियों ने फ़रवरी से अप्रैल तक क़िले के रक्षकों का साथ दिया; उसके बाद राजेंद्र गिरि अपने अनुयायियों के साथ अवध के नवाब वज़ीर की सेना में शामिल हुए, और सरकार के शब्दों में नागा संन्यासी उत्तर भारत की राजनीति में एक शक्ति बनकर उभरे। सरकार की पुस्तक का दूसरा खंड उनके शिष्य अनूपगिरि (हिम्मत बहादुर) की जाटों, बुंदेलखंड, अवध और मुग़ल बादशाह की सेवा का वर्णन करता है।

कुंभ में स्नान के क्रम को लेकर पहले रक्तरंजित झगड़े हुए। सरकार अंग्रेज़ अफ़सर कैप्टन हार्डविक का 1796 के हरिद्वार कुंभ का विवरण उद्धृत करते हैं: मेले में संख्या और शक्ति में गोसाईं सबसे आगे थे और मेले की व्यवस्था उन्हीं के महंतों के हाथ में थी; 10 अप्रैल 1796 को घुड़सवार सिख दल से संघर्ष में हार्डविक के अनुसार लगभग 5,000 साधु मारे गए। सरकार के अनुसार बाद में अंग्रेज़ी शासन ने स्नान का क्रम तय किया, और ब्रिटानिका के अनुसार आज सरकार यही तय क्रम लागू करती है।

नागा साधु कहाँ रहते हैं

कुंभ मेले की वेबसाइट के अनुसार हर नागा किसी अखाड़े से जुड़ा होता है, और अखाड़ों के मुख्य केंद्र वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार, त्र्यंबकेश्वर और दूसरे स्थानों पर हैं (13 अखाड़ों की सूची देखें)। सरकार 1840 का एक विवरण उद्धृत करते हैं जिसके अनुसार निर्वाणी और निरंजनी अखाड़ों के नागा छह वर्ष में इलाहाबाद, गया, जगन्नाथ पुरी, गोदावरी, गंगासागर, हरिद्वार और दूसरे तीर्थों की यात्रा का एक चक्र पूरा करते थे। AP (2025) के अनुसार कुंभ में वे अखाड़ों के शिविरों में गुरुओं की देखरेख में सादगी से रहते हैं।

स्रोतों में अंतर

  • दीक्षा का क्रम: सरकार (1959) दो छपी पद्धतियों से दशनामी संन्यास का सामान्य क्रम देते हैं, और AP (2025) कुंभ में नागा दीक्षा का वर्णन; दोनों में श्राद्ध या पिंडदान, मुंडन, स्नान और व्रत हैं, पर क्रम और ब्योरा अलग है, और अखाड़ों की अपनी रीतियाँ भी अलग हो सकती हैं।
  • शुरुआत: कुंभ मेले की वेबसाइट, PIB और UPSTDC अखाड़ों की शुरुआत आदि शंकराचार्य के समय से मानते हैं; सरकार (1959) के अनुसार लगभग 1750 से पहले का कोई समकालीन लेख नहीं है; और DD न्यूज़ (2024) के अनुसार जूना अखाड़े के प्रवक्ता ने कहा कि नागा अखाड़े अकबर से औरंगज़ेब के समय के बीच धीरे-धीरे बने।
  • उपासना: PIB (2025) नागा संन्यासियों को शिव के उपासक कहता है; सरकार (1959) के अनुसार संन्यासी शिव की सामान्य पूजा करते हैं और शक्ति की एक विशेष गुप्त विधि से।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 8 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नागा साधु कौन होते हैं?

शंकराचार्य की दशनामी संन्यासी परंपरा के वे साधु जो वस्त्र त्याग देते हैं; “नागा” का अर्थ “नग्न” है। वे अखाड़ों से जुड़े होते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं, और कुंभ के अमृत स्नान में अखाड़ों के आगे चलते हैं। वैष्णव बैरागियों में भी नागा होते हैं।

नागा साधु कैसे बनते हैं?

किसी अखाड़े में गुरु से दीक्षा लेकर। सरकार (1959) संन्यास-दीक्षा में पितरों का श्राद्ध, मुंडन, सब कुछ दान, विरजा होम, जल में खड़े होकर संन्यास की घोषणा और यज्ञोपवीत व शिखा का त्याग बताते हैं। AP (2025) के अनुसार कुंभ में नागा दीक्षा में स्वयं का भी पिंडदान, मुंडन, नया नाम, संगम-स्नान, व्रत और गुरु का कान में दिया उपदेश होता है।

नागा साधु कहाँ रहते हैं?

अपने अखाड़ों के मठों और आश्रमों में, जिनके मुख्य केंद्र वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार और त्र्यंबकेश्वर जैसे स्थानों पर हैं; कुंभ के समय वे अखाड़ों के शिविरों में रहते हैं। सरकार के उद्धृत 1840 के विवरण के अनुसार कुछ अखाड़ों के नागा छह वर्ष के चक्र में तीर्थों की यात्रा करते थे।

क्या वैष्णवों में भी नागा होते हैं?

हाँ। ब्रिटानिका के अनुसार नागा बैरागी वैष्णव साधुओं में जुझारू रहे हैं और अपने अलग अखाड़े बनाते हैं। आज ये तीन वैष्णव अनी अखाड़े हैं: निर्मोही, दिगंबर और निर्वाणी।

कुंभ में नागा साधु सबसे पहले स्नान क्यों करते हैं?

यह अखाड़ों के स्नान का पुराना क्रम है। सरकार (1959) के अनुसार स्नान में पहले जाने को लेकर पहले रक्तरंजित झगड़े होते थे, और अंग्रेज़ी शासन ने पुरानी रीति देखकर क्रम तय किया: पहले नागा गोसाईं (शैव अखाड़े), फिर वैष्णव बैरागी, फिर उदासी और निर्मल। आज अखाड़ा परिषद मेला प्रशासन के साथ यह क्रम तय करती है।

क्या महिलाएँ भी अखाड़ों में संन्यास लेती हैं?

हाँ। PIB (जनवरी 2025) के अनुसार जूना अखाड़े ने 200 से अधिक महिलाओं को संन्यास दीक्षा दी है और उनके संगठन का नाम “संन्यासिनी श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा” रखा है; महानिर्वाणी अखाड़ा महिलाओं को महामंडलेश्वर बनाने वाला पहला अखाड़ा है।

स्रोत

  1. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “dashnami sannyasin”, “vairagin”, “Kumbh Mela”
  2. जदुनाथ सरकार: A History of Dasnami Naga Sanyasis (श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी, दारागंज, इलाहाबाद, 1959), के. एम. मुंशी की भूमिका; खंड 1, अध्याय 5–6; खंड 2, अध्याय 1
  3. PIB रिसर्च यूनिट (संस्कृति मंत्रालय): “Spiritual Powerhouses: Akharas at the Forefront of Maha Kumbh 2025”, 22 जनवरी 2025
  4. कुंभ मेला 2025 की वेबसाइट (प्रयागराज मेला प्राधिकरण): “Spiritual Gurus”, kumbh.gov.in/en/spiritualgurus
  5. एसोसिएटेड प्रेस (AP), प्रयागराज, 5 फ़रवरी 2025: “Hundreds join an order of naked, armed holy men at Hindu festival”
  6. उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम (UPSTDC): “Maha Kumbh – Akhara Walk Tour”
  7. DD न्यूज़: “महाकुंभ 2025: जानें, कब हुई अखाड़ों की स्थापना और कौन हैं उनके इष्टदेव”, 31 दिसंबर 2024
  8. द वीक (14 जनवरी 2025): “Order of snan at Mahakumbh for 13 akharas revealed”

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