नाथ सम्प्रदाय योगियों की शैव परंपरा है, जो शिव को आदिनाथ, यानी पहला नाथ और पहला गुरु, मानती है; ब्रिग्स के अनुसार इसकी सभी गुरु-परंपराएँ गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) से पहले दो गुरु रखती हैं: आदिनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ। “नाथ” का अर्थ है स्वामी, और दीक्षित योगी अपने नाम के अंत में “नाथ” लगाते हैं। दीक्षा के अंतिम चरण में कान के बीच का भाग चिरवाकर बड़े कुंडल (मुद्रा) पहनने के कारण इन्हें कनफटा योगी भी कहा जाता है। हठयोग की परंपरा गोरखनाथ और इन योगियों से जुड़ी मानी जाती है। इसके मठ और योगी उत्तर भारत, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और नेपाल तक फैले हैं, और गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर इसका सबसे प्रसिद्ध केंद्र है।
- आदि गुरु
- शिव, आदिनाथ के रूप में
- प्रमुख गुरु
- मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ), गोरखनाथ (गोरक्षनाथ); जालंधरनाथ, कानिफनाथ, चर्पटनाथ, गहिनीनाथ आदि
- परंपरा
- नौ नाथ और चौरासी सिद्ध (सूचियाँ अलग-अलग); बारह पंथ
- साधना
- हठयोग और काया-साधना (योग से शरीर को पूर्ण बनाने की साधना)
- मुख्य ग्रंथ
- परंपरा से गोरखनाथ के नाम से जुड़े गोरक्ष-शतक और सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति; पुरानी हिंदी में गोरखबोध; स्वात्माराम की हठयोग-प्रदीपिका
- चिह्न
- कानों में बड़े कुंडल: चपटे “दर्शन” या गोल “कुंडल”; दीक्षा पूरी होने से पहले के योगी औघड़ कहलाते हैं
- मुख्य केंद्र
- गोरखपुर का गोरखनाथ मठ; धिनोधर (कच्छ), टिल्ला (आज पाकिस्तान में), देवी पाटन; नेपाल
नाथ सम्प्रदाय क्या है
ब्रिग्स (1938) के अनुसार पंजाब, हिमालय, बंबई और दूसरी जगहों पर इन योगियों को प्रायः “नाथ” कहा जाता है, जिसका अर्थ स्वामी है, और स्त्रियों को “नाथनी”; पश्चिमी भारत में गोरखनाथ के एक प्रसिद्ध शिष्य के नाम पर इन्हें धरमनाथी भी कहते हैं, और दूसरी जगहों पर कनफटा और गोरखनाथी। विकिपीडिया के अनुसार यह भारत और नेपाल में शैव धर्म की एक उप-परंपरा है, जो शिव को पहला स्वामी मानती है।
ब्रिग्स के अनुसार कनफटा सम्प्रदाय के विशेष चिह्न चिरे हुए कान और बड़े कुंडल हैं। दीक्षा के अंतिम चरण में एक विशेष रूप से चुना गया गुरु दोनों कानों के बीच का भाग चीरता है, और घाव भरने पर कुंडल (मुद्रा) पहनाए जाते हैं, जो योगी की आस्था के प्रतीक हैं। कुंडल दो प्रकार के होते हैं: चपटे, जिन्हें “दर्शन” कहते हैं, और गोल, जिन्हें “कुंडल”। जो अनुयायी अभी इस चरण तक नहीं पहुँचे, वे औघड़ कहलाते हैं। परंपरा के अनुसार कान चीरने की प्रथा गोरखनाथ से शुरू हुई।
संक्षिप्त इतिहास
नाथ परंपरा शिव को आदिनाथ मानकर उनसे मत्स्येन्द्रनाथ और फिर गोरखनाथ तक अपनी गुरु-परंपरा बताती है। विकिपीडिया के अनुसार मत्स्येन्द्रनाथ का नाम एक सिद्ध के रूप में 10वीं सदी के अभिनवगुप्त के तंत्रालोक में आता है। गोरखनाथ के समय पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं; ब्रिग्स सारे प्रमाण तौलकर लिखते हैं कि वे 1200 ई. के बाद के नहीं, संभवतः 11वीं सदी के आरंभ के थे, और मूल रूप से पूर्वी बंगाल से आए थे।
विकिपीडिया के अनुसार जेम्स मैलिन्सन बताते हैं कि मत्स्येन्द्र और गोरक्ष के सबसे पुराने उल्लेख अधिकतर दक्कन और प्रायद्वीपीय भारत से हैं, और एक संगठित सम्प्रदाय के रूप में नाथ परंपरा के लिखित उल्लेख 17वीं सदी से मिलते हैं, यद्यपि नाथ योगियों के उल्लेख उससे बहुत पहले के शिलालेखों, ग्रंथों और मूर्तियों में हैं। परंपरा बारह पंथों में बँटी है; ब्रिग्स के अनुसार इन बारह पंथों के प्रतिनिधि हर बारह वर्ष हरिद्वार के कुंभ मेले में मिलते हैं।
नाथ परंपरा ने भक्ति के संतों को भी प्रभावित किया। महाराष्ट्र के वारकरी संत ज्ञानेश्वर के गुरु उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ थे, जिन्हें नाथ योगी गहिनीनाथ से दीक्षा मिली थी; इस प्रकार वारकरी परंपरा अपनी गुरु-परंपरा गहिनीनाथ, गोरक्षनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ तक बताती है (विवरण वारकरी सम्प्रदाय के पन्ने पर)। विकिपीडिया के अनुसार कबीर और नामदेव जैसे संत भी नाथ योगियों से प्रभावित थे।
विश्वास और साधना
नाथ योगियों की साधना का केंद्र योग है। शशिभूषण दासगुप्त इस परंपरा की विशेषता काया-साधना बताते हैं: योग की प्रक्रियाओं से शरीर को पूर्ण और अविकारी बनाकर अमर आध्यात्मिक जीवन पाना, और लिखते हैं कि नाथ परंपरा सिद्ध परंपरा का ही एक चरण है। विकिपीडिया के अनुसार कई विद्वान हठयोग का आरंभ नाथ योगियों, विशेषकर गोरखनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ से जोड़ते हैं, यद्यपि हठयोग का मूल विवादित है; ब्रिग्स स्वात्माराम की हठयोग-प्रदीपिका और गोरक्ष-शतक जैसे ग्रंथों को इसी धारा में रखते हैं।
नौ नाथों और चौरासी सिद्धों की परंपरा प्रसिद्ध है, पर दासगुप्त लिखते हैं कि नौ नाथों की सूचियों में भी कोई सहमति नहीं है, और उनके बारे में तरह-तरह की कथाएँ मिलती हैं। विकिपीडिया के अनुसार नौ नाथ गुरुओं का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख 15वीं सदी के तेलुगु ग्रंथ नवनाथ चरित्र में है, और अलग-अलग ग्रंथ 4, 9, 18 या 25 गुरु गिनते हैं।
नाथ परंपरा में संन्यासी योगियों के मठों के साथ गृहस्थ नाथों का बड़ा समुदाय भी है (विकिपीडिया)। ब्रिग्स के अनुसार कुछ गोरखनाथी कहते हैं कि वे केवल द्विजों को दीक्षा देते हैं, पर कई क्षेत्रों से हर वर्ग के लोगों को योगी बनाए जाने की सूचनाएँ हैं; नए योगी को पहले औघड़ के रूप में गुरु की सेवा करनी होती है, और कान चीरने के बाद ही वह पूर्ण योगी माना जाता है।
प्रमुख केंद्र
गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) का नाम गोरखनाथ से है, और वहाँ का गोरखनाथ मठ इस परंपरा का सबसे प्रसिद्ध केंद्र है; विकिपीडिया के अनुसार मकर संक्रांति पर हज़ारों श्रद्धालु वहाँ गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं, और नेपाल के गोरखा ज़िले का नाम भी गोरखनाथ से जोड़ा जाता है। ब्रिग्स गोरखपुर, देवी पाटन, कच्छ के धिनोधर और झेलम के पास के टिल्ला (आज पाकिस्तान में) को अपने समय के प्रमुख केंद्र बताते हैं।
स्रोतों में अंतर
- गोरखनाथ का समय: ब्रिग्स 1200 ई. से पहले, संभवतः 11वीं सदी का आरंभ मानते हैं; विकिपीडिया के अनुसार अनुमान ब्रिग्स के 11वीं–12वीं सदी से ग्रियर्सन के 14वीं सदी तक जाते हैं; ब्रिग्स कुछ परंपराओं का 7वीं–8वीं सदी का मत भी दर्ज करते हैं।
- संस्थापक: विकिपीडिया का लेख मत्स्येन्द्रनाथ को संस्थापक लिखता है और परंपरा गोरखनाथ को संन्यासी योगियों की परंपरा का प्रवर्तक मानती है; नाथ स्वयं शिव (आदिनाथ) को पहला गुरु मानते हैं। मैलिन्सन के अनुसार “नाथ” नाम 18वीं सदी से पहले “योगी” या “जोगी” कहलाने वाले कई समूहों के लिए बाद में प्रचलित हुआ।
- नौ नाथों की सूची: सूचियाँ अलग हैं। दासगुप्त एक सूची में गोरक्षनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, चर्पटनाथ, मंगलनाथ, घुगोनाथ, गोपीनाथ, प्राणनाथ, सूरतनाथ और चंबानाथ देते हैं, और दूसरी सूचियों में जालंधर, नागार्जुन, दत्तात्रेय और जड़भरत जैसे नाम हैं; विकिपीडिया के अनुसार दक्कन में दत्तात्रेय को नाथ गुरु के रूप में मैलिन्सन 18वीं सदी से मानते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नाथ सम्प्रदाय क्या है?
शिव को आदिनाथ (पहला गुरु) मानने वाले योगियों की शैव परंपरा, जिसके प्रमुख गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ हैं। इसके दीक्षित योगी नाम के अंत में “नाथ” लगाते हैं और कानों में बड़े कुंडल पहनते हैं।
गोरखनाथ कौन थे?
नाथ परंपरा के सबसे प्रसिद्ध योगी, मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य, जिन्हें गोरक्षनाथ भी कहते हैं। परंपरा कनफटा योगियों की दीक्षा और हठयोग की परंपरा उनसे जोड़ती है। उनके समय पर मतभेद है; ब्रिग्स उन्हें 1200 ई. से पहले, संभवतः 11वीं सदी का मानते हैं। गोरखपुर का नाम उन्हीं से है।
कनफटा योगी किसे कहते हैं?
नाथ योगी, जिनके कान दीक्षा के अंतिम चरण में चीरकर बड़े कुंडल पहनाए जाते हैं; “कनफटा” का अर्थ है फटे या चिरे कान वाला। ब्रिग्स के अनुसार यह नाम आरंभ में बाहर के लोगों ने अनादर से दिया था; कई क्षेत्रों में इन्हें नाथ या गोरखनाथी कहा जाता है।
नवनाथ कौन हैं?
परंपरा नौ नाथ गुरुओं को मानती है, पर उनकी सूचियाँ अलग-अलग हैं। लगभग सभी में मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ हैं; दूसरे नाम, जैसे जालंधरनाथ, चर्पटनाथ या कानिफनाथ, क्षेत्र और ग्रंथ के साथ बदलते हैं।
नाथ सम्प्रदाय और हठयोग का क्या संबंध है?
कई विद्वान हठयोग का आरंभ नाथ योगियों, विशेषकर गोरखनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ से जोड़ते हैं, और गोरक्ष-शतक जैसे ग्रंथ परंपरा से गोरखनाथ के नाम से जुड़े हैं। हठयोग का मूल विवादित है, पर नाथ परंपरा में शरीर की साधना (काया-साधना) केंद्र में है।
स्रोत
- जॉर्ज वेस्टन ब्रिग्स, Gorakhnāth and the Kānphaṭa Yogīs (1938) (archive.org)
- शशिभूषण दासगुप्त, Obscure Religious Cults as Background of Bengali Literature (1946), नाथ सम्प्रदाय पर अध्याय (archive.org)
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Natha Sampradaya” (जेम्स मैलिन्सन, Brill Encyclopedia of Hinduism, के आधार पर), “Gorakhnath”, “Gorakhnath Math”
- वारकरी सम्प्रदाय की गुरु-परंपरा: इसी कोश का वारकरी पन्ना (रानडे और देलेरी के आधार पर)
कुछ गलत लगा? गलती बताएँ