- दोहा
गणपति गिरजा पुत्र को सुमिरूँ बारम्बार।
हाथ जोड़ विनती करूँ शारद नाम आधार॥
गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणपति का मैं बार-बार स्मरण करता हूँ। शारदा (सरस्वती) के नाम का सहारा लेकर मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।
- चौपाई 1
जय जय गोरखनाथ अविनाशी।
कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी॥
अविनाशी गोरखनाथ की जय हो। हे प्रकाश देने वाले गुरुदेव, कृपा कीजिए।
- चौपाई 2
जय जय जय गोरख गुण ज्ञानी।
इच्छा रूप योगी वरदानी॥
गुणों के ज्ञाता गोरख की जय हो। आप इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाले योगी हैं और वरदान देने वाले हैं।
- चौपाई 3
अलख निरंजन तुम्हरो नामा।
सदा करो भक्तन हित कामा॥
आपका नाम ‘अलख निरंजन’ है, यानी जो आँखों से दिखता नहीं और जिस पर कोई मैल नहीं। आप सदा भक्तों के हित के काम करते हैं।
- चौपाई 4
नाम तुम्हारा जो कोई गावे।
जन्म जन्म के दुःख मिट जावे॥
चालीसा कहती है कि जो कोई आपका नाम गाता है, उसके जन्म-जन्म के दुःख मिट जाते हैं।
- चौपाई 5
जो कोई गोरख नाम सुनावे।
भूत पिशाच निकट नहीं आवे॥
चालीसा कहती है कि जो कोई गोरख का नाम सुनाता है, भूत और पिशाच उसके पास नहीं आते।
- चौपाई 6
ज्ञान तुम्हारा योग से पावे।
रूप तुम्हारा लख्या न जावे॥
आपका ज्ञान योग से ही मिलता है। आपका रूप आँखों से देखा नहीं जा सकता।
- चौपाई 7
निराकार तुम हो निर्वाणी।
महिमा तुम्हारी वेद न जानी॥
आप निराकार हैं और निर्वाण (मोक्ष) को पाए हुए हैं। आपकी महिमा को वेद भी पूरी तरह नहीं जान पाए।
- चौपाई 8
घट घट के तुम अन्तर्यामी।
सिद्ध चौरासी करे प्रणामी॥
आप हर शरीर (घट) के भीतर की बात जानने वाले हैं। चौरासी सिद्ध आपको प्रणाम करते हैं।
- चौपाई 9
भस्म अंग गल नाद विराजे।
जटा शीश अति सुन्दर साजे॥
आपके अंगों पर भस्म है और गले में नाद शोभित है। सिर पर जटाएँ बहुत सुंदर लगती हैं। (परंपरा में नाथ योगी गले के धागे में एक छोटी सीटी, ‘सिंगी नाद’, पहनते हैं।)
- चौपाई 10
तुम बिन देव और नहीं दूजा।
देव मुनि जन करते पूजा॥
आपके सिवा दूसरा कोई देव नहीं है। देवता, मुनि और सब लोग आपकी पूजा करते हैं।
- चौपाई 11
चिदानन्द सन्तन हितकारी।
मंगल करण अमंगल हारी॥
आप चेतना और आनंद के स्वरूप (चिदानंद) हैं और संतों का भला करने वाले हैं। आप मंगल करने वाले और अमंगल को हरने वाले हैं।
- चौपाई 12
पूर्ण ब्रह्म सकल घट वासी।
गोरखनाथ सकल प्रकाशी॥
आप पूर्ण ब्रह्म हैं जो सब शरीरों में बसते हैं। गोरखनाथ सबको प्रकाश देने वाले हैं।
- चौपाई 13
गोरख गोरख जो कोई ध्यावे।
ब्रह्म रूप के दर्शन पावे॥
चालीसा कहती है कि जो कोई ‘गोरख गोरख’ कहकर ध्यान करता है, उसे ब्रह्म के स्वरूप के दर्शन होते हैं।
- चौपाई 14
शंकर रूप धर डमरू बाजे।
कानन कुण्डल सुन्दर साजे॥
आप शंकर का रूप धारण करते हैं और डमरू बजता है। आपके कानों में सुंदर कुंडल सजे हैं। (परंपरा में नाथ योगी कानों में बड़े कुंडल पहनते हैं, इसलिए उन्हें ‘कनफटा’ भी कहा जाता है।)
- चौपाई 15
नित्यानन्द है नाम तुम्हारा।
असुर मार भक्तन रखवारा॥
आपका नाम नित्यानंद (सदा आनंद में रहने वाले) है। आप असुरों को मारकर भक्तों की रक्षा करते हैं।
- चौपाई 16
अति विशाल है रूप तुम्हारा।
सुर नर मुनि जन पावें न पारा॥
आपका रूप बहुत विशाल है। देवता, मनुष्य और मुनि भी उसका अंत नहीं पा सकते।
- चौपाई 17
दीन बन्धु दीनन हितकारी।
हरो पाप हम शरण तुम्हारी॥
आप दीनों के बंधु और उनका भला करने वाले हैं। हमारे पाप हर लीजिए, हम आपकी शरण में हैं।
- चौपाई 18
योग युक्ति में हो प्रकाशा।
सदा करो सन्तन तन वासा॥
योग की विधि में आप ही प्रकाश बनकर रहते हैं। आप सदा संतों के शरीर (हृदय) में वास करते हैं।
- चौपाई 19
प्रातःकाल ले नाम तुम्हारा।
सिद्धि बढ़े अरु योग प्रचारा॥
चालीसा कहती है कि जो सुबह आपका नाम लेता है, उसकी सिद्धि बढ़ती है और योग का प्रसार होता है।
- चौपाई 20
हठ हठ हठ गोरक्ष हठीले।
मार मार वैरी के कीले॥
हे दृढ़ निश्चय वाले (हठीले) गोरक्ष, शत्रुओं को मारकर कील दीजिए, यानी उन्हें बाँधकर निष्क्रिय कर दीजिए।
- चौपाई 21
चल चल चल गोरख विकराला।
दुश्मन मार करो बेहाला॥
हे प्रचंड रूप वाले गोरख, आइए, आइए। शत्रु को मारकर उसे बेहाल कर दीजिए।
- चौपाई 22
जय जय जय गोरख अविनाशी।
अपने जन की हरो चौरासी॥
अविनाशी गोरख की जय हो। अपने भक्त को चौरासी (लाख योनियों में जन्म-मरण के चक्र) से छुड़ाइए।
- चौपाई 23
अचल अगम है गोरख योगी।
सिद्धि देवो हरो रस भोगी॥
योगी गोरख अडिग हैं और उन तक पहुँचना कठिन है। हे गोरख, सिद्धि दीजिए और मेरे भीतर के विषय-भोग की लालसा को हर लीजिए।
- चौपाई 24
काटो मार्ग यम को तुम आई।
तुम बिन मेरा कौन सहाई॥
आप आकर मेरे लिए यम का मार्ग काट दीजिए। आपके बिना मेरा सहायक कौन है?
- चौपाई 25
अजर अमर है तुम्हरी देहा।
सनकादिक सब जोरहिं नेहा॥
आपका शरीर न बूढ़ा होता है, न मरता है। सनक आदि सभी ऋषि आपसे प्रेम जोड़ते हैं।
- चौपाई 26
कोटिन रवि सम तेज तुम्हारा।
है प्रसिद्ध जगत उजियारा॥
आपका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है। आपका प्रकाश सारे जगत में प्रसिद्ध है।
- चौपाई 27
योगी लखे तुम्हारी माया।
पार ब्रह्म से ध्यान लगाया॥
योगी आपकी माया को पहचानते हैं और परब्रह्म में ध्यान लगाते हैं।
- चौपाई 28
ध्यान तुम्हारा जो कोई लावे।
अष्टसिद्धि नव निधि घर पावे॥
चालीसा कहती है कि जो कोई आपका ध्यान करता है, वह आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ घर बैठे पाता है।
- चौपाई 29
शिव गोरख है नाम तुम्हारा।
पापी दुष्ट अधम को तारा॥
आपका नाम ‘शिव गोरख’ है। आपने पापियों, दुष्टों और नीच कहे जाने वालों का भी उद्धार किया है।
- चौपाई 30
अगम अगोचर निर्भय नाथा।
सदा रहो सन्तन के साथा॥
आप अगम (जहाँ पहुँचना कठिन है), अगोचर (इंद्रियों से परे) और निर्भय स्वामी हैं। आप सदा संतों के साथ रहते हैं।
- चौपाई 31
शंकर रूप अवतार तुम्हारा।
गोपीचन्द भरथरी को तारा॥
आपका अवतार शंकर का ही रूप है। आपने गोपीचंद और भरथरी का उद्धार किया। (लोक परंपरा में भरथरी उज्जैन के राजा और गोपीचंद बंगाल के राजा माने जाते हैं, जिन्होंने राजपाट छोड़कर योग का मार्ग अपनाया।)
- चौपाई 32
सुन लीजो प्रभु अरज हमारी।
कृपासिन्धु योगी ब्रह्मचारी॥
हे प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए। आप कृपा के सागर, योगी और ब्रह्मचारी हैं।
- चौपाई 33
पूर्ण आस दास की कीजे।
सेवक जान ज्ञान को दीजे॥
इस दास की आशा पूरी कीजिए। मुझे अपना सेवक जानकर ज्ञान दीजिए।
- चौपाई 34
पतित पावन अधम अधारा।
तिनके हेतु तुम लेत अवतारा॥
आप गिरे हुओं को पवित्र करने वाले और दीन-हीन का सहारा हैं। उन्हीं के लिए आप अवतार लेते हैं।
- चौपाई 35
अलख निरंजन नाम तुम्हारा।
अगम पन्थ जिन योग प्रचारा॥
आपका नाम अलख निरंजन है। आपने ही योग का वह पंथ फैलाया, जिस पर चलना कठिन है।
- चौपाई 36
जय जय जय गोरख भगवाना।
सदा करो भक्तन कल्याना॥
भगवान गोरख की जय हो। आप सदा भक्तों का कल्याण करते हैं।
- चौपाई 37
जय जय जय गोरख अविनाशी।
सेवा करें सिद्ध चौरासी॥
अविनाशी गोरख की जय हो। चौरासी सिद्ध आपकी सेवा करते हैं।
- चौपाई 38
जो ये पढ़हि गोरख चालीसा।
होय सिद्ध साक्षी जगदीशा॥
चालीसा कहती है कि जो यह गोरख चालीसा पढ़ता है, वह सिद्ध हो जाता है, और इसके साक्षी स्वयं जगदीश हैं।
- चौपाई 39
हाथ जोड़कर ध्यान लगावे।
और श्रद्धा से भेंट चढ़ावे॥
पाठ करने वाला हाथ जोड़कर ध्यान लगाए और श्रद्धा से भेंट चढ़ाए।
- चौपाई 40
बारह पाठ पढ़े नित जोई।
मनोकामना पूर्ण होई॥
चालीसा कहती है कि जो रोज़ इसके बारह पाठ करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।
- समापन दोहा 1
सुने सुनावे प्रेम वश पूजे अपने हाथ।
मन इच्छा सब कामना पूरे गोरखनाथ॥
चालीसा कहती है कि जो प्रेम से इसे सुनता और सुनाता है और अपने हाथों से पूजा करता है, गोरखनाथ उसके मन की सब इच्छाएँ पूरी करते हैं।
- समापन दोहा 2
अगम अगोचर नाथ तुम पारब्रह्म अवतार।
कानन कुण्डल सिर जटा अंग विभूति अपार॥
हे नाथ, आप अगम और अगोचर हैं, परब्रह्म के अवतार हैं। आपके कानों में कुंडल, सिर पर जटा और अंगों पर अपार विभूति (भस्म) है।
- समापन दोहा 3
सिद्ध पुरुष योगेश्वरो दो मुझको उपदेश।
हर समय सेवा करूँ सुबह शाम आदेश॥
हे सिद्ध पुरुष, हे योगियों के ईश्वर, मुझे उपदेश दीजिए। मैं हर समय आपकी सेवा करूँ और सुबह-शाम आपको ‘आदेश’ कहकर प्रणाम करूँ। (परंपरा में नाथ योगी एक-दूसरे को ‘आदेश’ कहकर प्रणाम करते हैं।)
यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृ. 95 से 99) का पाठ दिया गया है, जिसे द्रिक पंचांग और गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर की वेबसाइट के पाठ से मिलाया गया। पुस्तक में ‘अविनासी’ और ‘अविनाशी’ दोनों वर्तनियाँ हैं; यहाँ हर जगह ‘अविनाशी’ लिखा गया है। चौपाई 17 में पुस्तक ‘हरो पाप हर शरण तुम्हारी’ पढ़ती है; द्रिक पंचांग और गोरखनाथ मंदिर के पाठ में ‘हम शरण’ है, जो यहाँ लिया गया। समापन दोहा 2 में पुस्तक में ‘अगर अगोचर’ छपा है, जो छपाई की भूल है; बाकी स्रोतों में ‘अगम अगोचर’ है। गोरखनाथ मंदिर का पाठ (‘श्री गोरक्ष चालीसा’) कई जगह अलग है: नाम प्रायः ‘गोरक्ष’, दोहे में ‘गिरिजा’, ‘सिमरूँ’ और ‘अधार’; चौपाई 1 ‘जय जय जय गोरख अविनाशी’; चौपाई 4 ‘जन्म जन्म के दुःख नशावे’; चौपाई 7 ‘महिमा तुम्हरी वेद बखानी’; चौपाई 11 ‘मंगल करे’; चौपाई 25 ‘तुम्हरो देहा’ और ‘जोहहिं नेहा’; चौपाई 31 ‘गोपीचन्द भर्तृहरि’; चौपाई 32 ‘सुन लीजो गुरु’। मंदिर के पाठ में अंत का क्रम भी अलग है: ‘बारह पाठ पढ़े नित्य जोई’ पहले आता है, और फिर ‘और श्रद्धा से रोट चढ़ावे, हाथ जोड़कर ध्यान लगावे’, यानी वहाँ ‘भेंट’ की जगह ‘रोट’ (भोग की मोटी रोटी) है।