सम्प्रदाय

वारकरी सम्प्रदाय (वारकरी पंथ)

संक्षेप में

वारकरी सम्प्रदाय महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा है, जो पंढरपुर (सोलापुर ज़िला) के विट्ठल, जिन्हें विठोबा और पांडुरंग भी कहते हैं, की उपासना करती है; विट्ठल को विष्णु का, और वारकरी परंपरा में विशेषकर श्रीकृष्ण का, रूप माना जाता है। “वारकरी” का अर्थ है “वारी करने वाला”, यानी तय समय पर बार-बार पंढरपुर की यात्रा करने वाला: परंपरा के अनुसार वारकरी हर वर्ष कम से कम दो बार, आषाढ़ और कार्तिक की शुक्ल एकादशी पर, हो सके तो पैदल, पंढरपुर जाता है। इसके प्रमुख संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम हैं, और इसका मुख्य ग्रंथ ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी है।

आराध्य
पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा, पांडुरंग), ईंट पर खड़े, दोनों हाथ कमर पर; साथ में रखुमाई (रुक्मिणी)
प्रमुख संत
ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) और उनके भाई-बहन निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, मुक्ताबाई; नामदेव, जनाबाई, चोखामेळा; एकनाथ; तुकाराम, बहिणाबाई
संस्थापक
कोई एक संस्थापक नहीं; परंपरा पुंडलिक को विट्ठल के पंढरपुर आने का कारण मानती है, और ज्ञानेश्वर को पंथ का पहला बड़ा आचार्य
दर्शन
भक्ति-मार्ग, भागवत धर्म; ज्ञानेश्वरी अद्वैत वेदांत की परंपरा में मानी जाती है
परंपरा
ज्ञानेश्वर के गुरु उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ थे, जिन्हें नाथ योगी गहिनीनाथ से दीक्षा मिली थी: मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, गहिनीनाथ, निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर
मुख्य ग्रंथ
ज्ञानेश्वरी (भगवद्गीता पर मराठी टीका, 1290) और अमृतानुभव; संतों के अभंग, विशेषकर तुकाराम की गाथा; एकनाथी भागवत
मुख्य केंद्र
पंढरपुर (भीमा या चंद्रभागा के तट पर); आलंदी (ज्ञानेश्वर), देहू (तुकाराम), पैठण (एकनाथ), त्र्यंबकेश्वर (निवृत्तिनाथ), सासवड (सोपानदेव)
चिह्न
तुलसी की माला, जिसे वारकरी कभी नहीं उतारता; यह शाकाहार के व्रत का भी चिह्न है
मुख्य पर्व
आषाढ़ी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल 11) और कार्तिकी एकादशी (कार्तिक शुक्ल 11) की पंढरपुर यात्रा; हर एकादशी का व्रत

वारकरी सम्प्रदाय क्या है

जी. ए. डेल्युरी (The Cult of Vithoba, 1960) प्रिंसिपल एस. वी. दांडेकर के हवाले से “वारकरी” शब्द को “वारी” और “करी” से समझाते हैं: “वार” का अर्थ है नियत समय पर बार-बार होने वाली बात, यानी पंढरपुर की नियमित यात्रा, और “करी” का अर्थ है करने वाला। वारकरी को “माळकरी”, यानी माला पहनने वाला, भी कहते हैं, क्योंकि वह गले में तुलसी की माला पहनता है; और पंथ को “भागवत पंथ” भी कहा जाता है, क्योंकि वह भक्ति को मोक्ष का मार्ग मानता है।

डेल्युरी के अनुसार वारकरी पंथ कोई केंद्रीय संस्था नहीं है: इसमें न पदक्रम है, न कोई एक गुरु-पीठ; यह अलग-अलग गुरुओं के आसपास बने भक्त-समूहों का समुदाय है, और इसका एकमात्र सार्वजनिक रूप पंढरपुर की यात्रा है। वारकरी को घर-परिवार या काम छोड़ना नहीं होता; अधिकतर वारकरी गाँवों के किसान, कारीगर और व्यापारी रहे हैं। पंथ सबके लिए खुला माना जाता है, और इसके संत अलग-अलग जातियों से आए: नामदेव दर्ज़ी थे, गोरा कुम्हार, सावता माली, नरहरि सुनार, चोखामेळा महार, और तुकाराम एक निर्धन शूद्र परिवार से।

संक्षिप्त इतिहास

वारकरी परंपरा विट्ठल और पुंडलिक के नाम साथ लेती है: प्रचलित कथा के अनुसार पुंडलिक की माता-पिता की सेवा से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण पंढरपुर आए, पुंडलिक के कहने पर ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे, और विट्ठल नाम से वहीं रहे। “पुंडलिक वरदा हरि विट्ठल” की पुकार इसी से है। डेल्युरी के अनुसार पुंडलिक कब हुए, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता; पर ज्ञानेश्वर और नामदेव के अभंगों में यह परंपरा पहले से स्थापित दिखती है, इसलिए वे मानते हैं कि पंथ ज्ञानेश्वर से पहले, लगभग 1250 तक, बन चुका था।

ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) को परंपरा पंथ का पहला और सबसे बड़ा आचार्य मानती है; बहिणाबाई के एक अभंग में कहा गया है कि ज्ञानदेव ने पंथ की नींव रखी। उन्होंने 1290 में नेवासा में भगवद्गीता पर मराठी टीका ज्ञानेश्वरी लिखी, और बाद में अमृतानुभव। आर. डी. रानडे (Mysticism in Maharashtra, 1933) के अनुसार परंपरा उनका जन्म 1275 और समाधि 1296 में आलंदी में बताती है; जनाबाई की परंपरा जन्म 1271 देती है। नामदेव (रानडे के अनुसार लगभग 1270–1350) ने कीर्तन से विट्ठल का नाम दूर तक पहुँचाया; उनके कुछ पद सिखों के गुरु ग्रंथ साहिब में भी हैं।

पैठण के एकनाथ (रानडे के अनुसार सबसे संभावित 1533–1599) ने भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध पर मराठी टीका, एकनाथी भागवत, लिखी, जो 1573 में पूरी हुई। देहू के तुकाराम (डेल्युरी 1598–1650 देते हैं) के अभंग आज वारी में सबसे अधिक गाए जाते हैं; डेल्युरी के अनुसार उन्होंने आषाढ़ी एकादशी की वार्षिक यात्रा को नई ऊर्जा दी। वारी में “ज्ञानबा तुकाराम” का जप इन्हीं दोनों संतों के नाम से है।

संतों की पादुकाएँ पालकी में रखकर पंढरपुर ले जाने की प्रथा पुरानी है। डेल्युरी के अनुसार आलंदी से ज्ञानेश्वर की पालकी सबसे पुरानी और सबसे प्रमुख है, और इसकी आज की व्यवस्था, पालकी, बैलगाड़ी और दिंडियों (भजन-मंडलियों) का संगठन, सातारा के आरफळ गाँव के हैबतराव की देन है। 1951 की वारी में उन्होंने लगभग 40 पालकियाँ गिनी थीं।

विश्वास और साधना

वारी: डेल्युरी के अनुसार वारकरी को हर वर्ष कम से कम दो बार, आषाढ़ और कार्तिक की शुक्ल एकादशी पर, पंढरपुर जाना होता है; कुछ हर एकादशी पर जाते हैं। नामदेव के एक अभंग में “आषाढ़ी और कार्तिकी न छोड़ने” की बात है, और ज्ञानेश्वर के एक अभंग में तुलसी माला पहने, गेरुआ पताका लिए और वीणा, ताल और मृदंग बजाते यात्रियों का वर्णन है। आषाढ़ी वारी में आलंदी से ज्ञानेश्वर की और देहू से तुकाराम की पालकी पैदल पंढरपुर पहुँचती है।

तुलसी माला: डेल्युरी के अनुसार पंथ में शामिल होने की कोई विस्तृत दीक्षा नहीं है, पर एक सरल रीति है: इच्छुक व्यक्ति किसी वारकरी साथी के साथ गुरु के पास तुलसी की माला लेकर जाता है, माला ज्ञानेश्वरी पर रखी जाती है, वह नियत तिथियों पर पंढरपुर जाने और धर्म के अनुसार सीधा जीवन जीने का संकल्प लेता है, और गुरु माला उसके गले में पहनाते हैं। यह माला वारकरी कभी नहीं उतारता; यह कृष्ण के प्रति भक्ति और मांस न खाने के व्रत, दोनों का चिह्न है।

भजन, कीर्तन और संत-संग: वारकरी स्वयं को “संत-सज्जनांची मांदी”, यानी संतों के समाज में रहने वाले, कहते हैं; जीवित संतों के साथ वारी में चलना और पुराने संतों के अभंग पढ़ना-याद करना पंथ की मुख्य साधना है। डेल्युरी के अनुसार गुरु दीक्षा के समय संतों की सेवा और हर सोमवार, दोनों एकादशियों और दोनों प्रदोषों के व्रत का भी उपदेश देते हैं। दर्शन की दृष्टि से डेल्युरी ज्ञानेश्वरी को शंकर के अद्वैत की परंपरा में रखते हैं: भक्ति का मार्ग, अद्वैत की नींव पर।

नाथ परंपरा से संबंध

रानडे के अनुसार निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर स्वयं अपनी रचनाओं में अपने को गहिनीनाथ की परंपरा का बताते हैं: निवृत्तिनाथ को गहिनीनाथ से, गहिनीनाथ को गोरक्षनाथ से और गोरक्षनाथ को मत्स्येन्द्रनाथ से ज्ञान मिला। डेल्युरी भी लिखते हैं कि ज्ञानेश्वर को आध्यात्मिक दीक्षा देने वाले उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ त्र्यंबक के एक नाथ योगी के शिष्य थे। इस तरह वारकरी भक्ति में नाथ योगियों की धारा भी जुड़ी है।

प्रमुख केंद्र

पंढरपुर, सोलापुर ज़िले में भीमा नदी के तट पर (जिसे यहाँ चंद्रभागा भी कहते हैं), विट्ठल का मुख्य मंदिर है; रखुमाई (रुक्मिणी) का अपना मंदिर है, और डेल्युरी के अनुसार यात्री विट्ठल की पूजा के बाद रखुमाई के मंदिर में पूजा करते हैं। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन एंड एथिक्स (1917) विट्ठल की मूर्ति को एक ही पत्थर से बनी, कमर पर हाथ रखे, बाएँ हाथ में शंख और दाएँ में चक्र लिए बताता है, और लिखता है कि मूल मंदिर के निर्माण की तिथि ज्ञात नहीं है।

संतों से जुड़े स्थान भी वारकरियों के तीर्थ हैं: आलंदी (पुणे के पास), जहाँ ज्ञानेश्वर ने समाधि ली; देहू, तुकाराम का गाँव; पैठण, एकनाथ का घर; त्र्यंबकेश्वर (नासिक के पास), जहाँ निवृत्तिनाथ ने समाधि ली; सासवड (सोपानदेव) और खानदेश में मेहुण (मुक्ताबाई)। डेल्युरी के अनुसार इन्हीं स्थानों से संतों की पालकियाँ पंढरपुर के लिए निकलती हैं।

स्रोतों में अंतर

  • ज्ञानेश्वर का जन्म: परंपरा 1275 बताती है (समाधि 1296, 22 वर्ष की आयु में); जनाबाई के अभंग की परंपरा 1271 (रानडे)। रानडे के अनुसार ज्ञानेश्वरी का 1290 में लिखा जाना सबसे निश्चित तिथि है; एक पाठ 1284 भी देता है।
  • जन्मस्थान: वारकरी परंपरा ज्ञानेश्वर का जन्म आलंदी में मानती है; दूसरी परंपरा गोदावरी के तट पर आपेगाँव बताती है, और डेल्युरी आपेगाँव को अधिक संभव मानते हैं।
  • नामदेव और ज्ञानेश्वर: परंपरा दोनों को समकालीन और साथ तीर्थयात्रा करने वाला मानती है (रानडे यही मत रखते हैं, नामदेव 1270–1350); डेल्युरी लिखते हैं कि नामदेव के जीवन की तिथियाँ परंपरा पर टिकी हैं और वे ज्ञानेश्वर के बहुत बाद तक जीवित रहे।
  • एकनाथ: रानडे जन्म के लिए 1528, 1533 और 1548, और देहांत के लिए 1599 और 1609 के मत गिनाते हैं, और 1533–1599 को सबसे संभावित मानते हैं।
  • तुकाराम: देहांत 1650 (अधिकतर जीवनीकार; रानडे) या 1649 (देहू की एक पांडुलिपि)। जन्म पर चार मत हैं: 1568, 1577, 1598 (देहू और पंढरपुर की पारिवारिक वंशावलियाँ; डेल्युरी भी यही देते हैं) और 1608 (पांगारकर)।
  • कौन-सी यात्रा बड़ी: डेल्युरी के अनुसार भानुदास के समय से पहले आषाढ़ी यात्रा अधिक प्रमुख थी; परंपरा के अनुसार भानुदास विट्ठल की मूर्ति कार्तिकी एकादशी पर वापस पंढरपुर लाए, जिससे कार्तिकी का महत्त्व बढ़ा। तुकाराम ने फिर आषाढ़ी यात्रा को नई ऊर्जा दी।
  • माथे का तिलक: डेल्युरी लिखते हैं कि तुलसी माला के अलावा वारकरी के शरीर या माथे पर कोई अनिवार्य सम्प्रदाय-चिह्न नहीं है; कुछ विवरण वारकरियों के गोपीचंदन के तिलक का उल्लेख करते हैं। हमें इसका कोई ऐसा वर्णन नहीं मिला जिसे हम स्वयं जाँच सकें, इसलिए यहाँ तिलक का रूप नहीं दिया गया।
  • ज्ञानेश्वर के पिता: रानडे एक मत देते हैं कि उनके पिता विट्ठलपंत काशी में रामानंद (या श्रीपाद रामानंद) के शिष्य थे; पर निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर की अपनी गुरु-परंपरा गहिनीनाथ की नाथ परंपरा है।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वारकरी सम्प्रदाय क्या है?

महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा, जो पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना करती है और जिसके अनुयायी हर वर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की यात्रा (वारी) करते हैं। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम इसके प्रमुख संत हैं।

पंढरपुर वारी क्या है और कब होती है?

“वारी” नियत समय पर पंढरपुर की नियमित यात्रा है। परंपरा के अनुसार वारकरी आषाढ़ शुक्ल एकादशी (आषाढ़ी) और कार्तिक शुक्ल एकादशी (कार्तिकी) पर पंढरपुर जाते हैं, हो सके तो पैदल। आषाढ़ी वारी में आलंदी से ज्ञानेश्वर की और देहू से तुकाराम की पालकी चलती है।

वारकरी तुलसी की माला क्यों पहनते हैं?

तुलसी की माला वारकरी का मुख्य चिह्न है: पंथ में आने पर गुरु इसे गले में पहनाते हैं और फिर यह कभी नहीं उतारी जाती। डेल्युरी के अनुसार यह कृष्ण के प्रति भक्ति का और मांस न खाने के व्रत का चिह्न है।

संत ज्ञानेश्वर कौन थे?

वारकरी पंथ के पहले बड़े आचार्य, जिन्होंने 1290 में भगवद्गीता पर मराठी टीका ज्ञानेश्वरी लिखी। परंपरा उनका जीवन 1275–1296 बताती है; उन्होंने आलंदी में समाधि ली। उनके गुरु उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ थे, जो नाथ परंपरा के गहिनीनाथ के शिष्य थे।

विट्ठल (विठोबा) कौन हैं?

पंढरपुर के देवता, जिन्हें पांडुरंग भी कहते हैं और विष्णु का, विशेषकर श्रीकृष्ण का, रूप माना जाता है। वे ईंट पर खड़े, दोनों हाथ कमर पर रखे दिखाए जाते हैं; प्रचलित कथा के अनुसार वे भक्त पुंडलिक के लिए पंढरपुर आए और वहीं ठहर गए।

स्रोत

  1. जी. ए. डेल्युरी, The Cult of Vithoba (डेक्कन कॉलेज, पुणे, 1960), अध्याय “The Varkari Panth” और “The Pilgrimage”
  2. आर. डी. रानडे, Mysticism in Maharashtra (History of Indian Philosophy, खंड 7, पुणे, 1933): ज्ञानदेव, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम के जीवन और तिथियाँ
  3. एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन एंड एथिक्स, खंड 9: “Pandharpur” (डब्ल्यू. क्रूक, 1917)

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