चालीसाहनुमान

हनुमान चालीसा

रचना: गोस्वामी तुलसीदास (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: मंगलवार और शनिवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंगलवार की शाम हनुमान मंदिर में सिंदूरी हनुमान प्रतिमा के सामने हाथ जोड़े पाठ करती भक्त, सामने दीया और लड्डू
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा 1

    श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

    श्री गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को निर्मल करके मैं श्री रघुवीर (राम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) देने वाला है।

  2. दोहा 2

    बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

    अपने को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे कष्ट और मन के विकार दूर कीजिए।

  3. चौपाई 1

    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

    ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान जी की जय हो। तीनों लोकों में प्रसिद्ध वानरों के स्वामी (कपीश) की जय हो।

  4. चौपाई 2

    राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

    आप श्री राम के दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप अंजनि-पुत्र और पवनसुत नाम से जाने जाते हैं।

  5. चौपाई 3

    महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

    आप महावीर, पराक्रमी और वज्र जैसे अंगों वाले (बजरंगी) हैं। आप बुरी बुद्धि को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि के साथी हैं।

  6. चौपाई 4

    कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

    आपका रंग सोने जैसा है और आप सुंदर वेश में शोभित हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।

  7. चौपाई 5

    हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

    आपके हाथों में वज्र और ध्वजा शोभित हैं, और कंधे पर मूँज घास का जनेऊ सजा है।

  8. चौपाई 6

    संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥

    आप शंकर-सुवन (परंपरा में शिव के अंश माने जाने वाले) और केसरी के पुत्र हैं। आपका तेज और प्रताप महान है, सारा जगत आपकी वंदना करता है।

  9. चौपाई 7

    विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

    आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत चतुर हैं, और श्री राम के काम करने को सदा उत्सुक रहते हैं।

  10. चौपाई 8

    प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

    आप प्रभु राम की कथा सुनने के प्रेमी हैं। राम, लक्ष्मण और सीता आपके मन में बसते हैं।

  11. चौपाई 9

    सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

    आपने छोटा रूप धरकर सीता जी को दर्शन दिए और विकराल रूप धरकर लंका जलाई। यह सुंदरकाण्ड का प्रसंग है।

  12. चौपाई 10

    भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

    आपने विशाल और भयंकर रूप धरकर असुरों का संहार किया और श्री रामचंद्र के काम पूरे किए।

  13. चौपाई 11

    लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

    आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को फिर से जीवित किया, तो श्री रघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया। यह लंका के युद्ध में लक्ष्मण के मूर्च्छित होने का प्रसंग है।

  14. चौपाई 12

    रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

    श्री रघुपति ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो।

  15. चौपाई 13

    सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

    “हजार मुखों वाले (शेषनाग) तुम्हारा यश गाएँ”, ऐसा कहकर श्रीपति (श्री राम) ने आपको गले लगा लिया।

  16. चौपाई 14

    सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

    सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद, सरस्वती (शारदा) और शेषनाग भी आपका यश गाते हैं।

  17. चौपाई 15

    जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

    जब यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक (दिक्पाल) भी आपका यश पूरा नहीं कह पाते, तो कवि और विद्वान उसे कैसे कह सकते हैं?

  18. चौपाई 16

    तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

    आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्री राम से मिलाया और इस तरह उन्हें राजपद दिलाया। यह किष्किन्धाकाण्ड का प्रसंग है।

  19. चौपाई 17

    तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

    विभीषण ने आपकी सलाह मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।

  20. चौपाई 18

    जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

    हजारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया। यह हनुमान जी के बचपन का प्रसिद्ध प्रसंग है।

  21. चौपाई 19

    प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

    प्रभु राम की अँगूठी मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यह सीता जी की खोज का प्रसंग है।

  22. चौपाई 20

    दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

    संसार के जितने भी कठिन काम हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।

  23. चौपाई 21

    राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

    आप श्री राम के द्वार के रखवाले हैं। आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

  24. चौपाई 22

    सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥

    आपकी शरण में आने वाला सब सुख पाता है। जब आप रक्षक हैं, तो किसी का डर नहीं रहता।

  25. चौपाई 23

    आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

    अपने तेज को आप स्वयं ही सँभाल सकते हैं। आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठते हैं।

  26. चौपाई 24

    भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

    इस चौपाई में कहा गया है कि जहाँ महावीर हनुमान का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत और पिशाच पास नहीं आते।

  27. चौपाई 25

    नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

    इस चौपाई में कहा गया है कि वीर हनुमान का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।

  28. चौपाई 26

    संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

    जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे संकटों से छुड़ा लेते हैं।

  29. चौपाई 27

    सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

    तपस्वी राजा श्री राम सबसे ऊपर हैं, और उनके सारे काम आपने ही पूरे किए।

  30. चौपाई 28

    और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥

    जो कोई भी और कोई इच्छा लेकर आपके पास आता है, वह जीवन में उसका असीम फल पाता है।

  31. चौपाई 29

    चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

    चारों युगों में आपका प्रताप है। आपका यश संसार में प्रसिद्ध है और जगत को प्रकाशित करता है।

  32. चौपाई 30

    साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

    आप साधु-संतों के रक्षक, असुरों का नाश करने वाले और श्री राम के दुलारे हैं।

  33. चौपाई 31

    अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

    माता जानकी (सीता) ने आपको ऐसा वर दिया है कि आप आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं।

  34. चौपाई 32

    राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

    राम-भक्ति रूपी रसायन (अमृत) आपके पास है। आप सदा श्री रघुपति के सेवक बने रहते हैं।

  35. चौपाई 33

    तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

    आपके भजन से भक्त श्री राम को पाता है और जन्म-जन्म के दुख भूल जाता है।

  36. चौपाई 34

    अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

    ऐसा भक्त अंत समय में श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी फिर जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।

  37. चौपाई 35

    और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

    किसी और देवता का ध्यान न करने पर भी, केवल हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं।

  38. चौपाई 36

    संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

    जो बलवान वीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।

  39. चौपाई 37

    जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

    हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा कीजिए।

  40. चौपाई 38

    जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

    इस चौपाई के अनुसार जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधन से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है।

  41. चौपाई 39

    जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

    जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि (सफलता) मिलती है। इसके साक्षी स्वयं गौरीश (भगवान शिव) हैं।

  42. चौपाई 40

    तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

    तुलसीदास सदा हरि का सेवक है। हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।

  43. समापन दोहा

    पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

    हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगल की मूर्ति! हे देवताओं में श्रेष्ठ, आप राम, लक्ष्मण और सीता सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/hanuman-chalisa/

संक्षेप में

हनुमान चालीसा अवधी भाषा में हनुमान जी की स्तुति है। परंपरा इसे रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। घरों और मंदिरों में इसका पाठ प्रतिदिन होता है, और मंगलवार, शनिवार तथा हनुमान जयंती पर विशेष रूप से किया जाता है।

यहाँ प्रचलित मानक पाठ दिया गया है। अलग-अलग छपे संस्करणों में कुछ शब्दों की वर्तनी थोड़ी भिन्न मिलती है, जैसे ‘बरनउँ/बरनऊँ’, ‘बुद्धि/बुधि’, ‘सम्हारो/संहारो’ और ‘रच्छक/रक्षक’। कुछ संस्करणों में चौपाई 6 का पाठ ‘संकर सुवन’ की जगह ‘संकर स्वयं’ मिलता है। पहला दोहा तुलसीदास के रामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड का भी पहला दोहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमान चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें 40 चौपाइयाँ हैं, और साथ में आरंभ में 2 दोहे और अंत में 1 दोहा है। ‘चालीसा’ नाम इन्हीं चालीस चौपाइयों से बना है।

हनुमान चालीसा किसने लिखी?

परंपरा के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने। चौपाई 40 में ‘तुलसीदास सदा हरि चेरा’ पंक्ति में उनका नाम आता है। इसकी रचना की सही तिथि किसी प्रामाणिक स्रोत से ज्ञात नहीं है।

हनुमान चालीसा किस भाषा में है?

यह अवधी में है, जो तुलसीदास के रामचरितमानस की भी भाषा है।

हनुमान चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती को इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

पहला दोहा “श्रीगुरु चरन सरोज रज” कहाँ से है?

यही दोहा तुलसीदास के रामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड के आरंभ में आता है। चालीसा इसी से शुरू होती है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. गोस्वामी तुलसीदास रचित (परंपरा अनुसार)
  3. पहला दोहा: रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड का आरंभ

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