आरतीदुर्गा

विंध्येश्वरी आरती: सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
साँझ में गंगा किनारे पहाड़ी पर ध्वजाओं वाला देवी मंदिर और दीयों से सजी सीढ़ियाँ
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, कोई तेरा पार न पाया॥

    हे पर्वत पर वास करने वाली मेरी देवी, मेरी पुकार सुनो। तुम्हारी महिमा का पार कोई नहीं पा सका।

  2. पद 2

    पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया॥

    पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल लेकर मैंने तुम्हें भेंट चढ़ाई है।

  3. पद 3

    सुवा चोली तेरे अंग विराजे, केसर तिलक लगाया॥

    तुम्हारे अंग पर रंगीन (सुवा) चोली शोभित है और माथे पर केसर का तिलक लगा है।

  4. पद 4

    नंगे पग माँ अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया॥

    हे माँ, आरती कहती है कि बादशाह अकबर नंगे पाँव तुम्हारे दरबार आया और सोने का छत्र चढ़ाया। यह ज्वाला देवी से जुड़ी एक लोककथा का संकेत है।

  5. पद 5

    ऊँचे ऊँचे पर्वत भयो देवालय, नीचे शहर बसाया॥

    ऊँचे पर्वत पर तुम्हारा मंदिर बना है और उसके नीचे नगर बसा है।

  6. पद 6

    सतयुग त्रेता द्वापर मध्ये, कलियुग राज सवाया॥

    सतयुग, त्रेता और द्वापर में तुम्हारी महिमा रही, और कलियुग में तुम्हारा राज और भी सवाया (बढ़कर) है।

  7. पद 7

    धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया॥

    धूप, दीप, नैवेद्य और आरती के साथ तुम्हें मोहन भोग (हलवे का भोग) चढ़ाया गया है।

  8. पद 8

    ध्यानू भगत मैया तेरे गुण गावैं, मनवांछित फल पाया॥

    हे मैया, ध्यानू भगत तुम्हारे गुण गाते हैं। आरती कहती है कि उन्होंने मनचाहा फल पाया।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/vindhyeshwari-aarti/

संक्षेप में

“सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी” माँ विंध्येश्वरी (विंध्यवासिनी) की प्रसिद्ध आरती है। विंध्य पर्वत पर विराजने वाली इन देवी का प्रमुख धाम उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर के पास गंगा तट पर विंध्याचल में है। आरती में भेंट, श्रृंगार और भोग के साथ अकबर और ध्यानू भगत की लोककथा का उल्लेख है। यह नवरात्रि, माता की चौकी और जागरण में गाई जाती है।

यह आरती अलग-अलग संग्रहों में थोड़े अलग रूप में मिलती है। कुछ में टेक ‘सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया’ है, और गाते समय पंक्तियों के अंत में ‘माँ’ जोड़ा जाता है। द्रिक पंचांग का पाठ दो-दो पंक्तियों को जोड़कर चार पद बनाता है और हर पद के बाद ‘जय विन्ध्येश्वरी माता’ गाता है। अन्य अंतर: ‘सुवा चोली’ की जगह ‘साड़ी चोली’, ‘नंगे पग माँ अकबर आया’ की जगह ‘नंगे पांव अकबर जाकर’, ‘ऊँचे ऊँचे पर्वत भयो देवालय’ की जगह ‘ऊँचे पर्वत बन्यो देवालय’, और ‘गुण गावैं’ की जगह ‘गुण गाया’। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है। अंतिम पद में ध्यानू भगत का नाम भक्त के रूप में आता है; आरती के रचयिता ज्ञात नहीं हैं।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

माँ विंध्येश्वरी कौन हैं?

विंध्य पर्वत पर निवास करने वाली देवी, जिन्हें विंध्यवासिनी भी कहते हैं। दुर्गा सप्तशती (11.41 और 11.42) में देवी कहती हैं कि वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में जब शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो और महादैत्य जन्म लेंगे, तब वे नंद गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर विंध्याचल में निवास करेंगी और उनका नाश करेंगी। उनका प्रमुख मंदिर मिर्ज़ापुर के पास विंध्याचल में है।

आरती में अकबर और ध्यानू भगत का उल्लेख क्यों है?

यह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में ज्वाला देवी (ज्वालामुखी) मंदिर से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथा है। कथा के अनुसार अकबर ने भक्त ध्यानू की परीक्षा ली, फिर देवी की महिमा मानकर सोने का छत्र चढ़ाया। यह लोक-परंपरा की कथा है, किसी समकालीन ऐतिहासिक स्रोत से प्रमाणित नहीं।

क्या यह आरती केवल विंध्येश्वरी माता की है?

यह विंध्येश्वरी आरती के नाम से प्रसिद्ध है, पर ‘पर्वतवासिनी’ संबोधन के कारण यही आरती पर्वत पर विराजने वाली अन्य देवियों, जैसे मैहर की शारदा माता और हिंगलाज माता, की पूजा में भी गाई जाती है।

यह आरती कब गाई जाती है?

शारदीय और चैत्र नवरात्रि में, विंध्याचल धाम की पूजा में, और माता की चौकी और जागरण में।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. विंध्याचलनिवासिनी: दुर्गा सप्तशती 11.41 और 11.42
  3. अकबर और ज्वाला देवी की कथा: लोक परंपरा

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