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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/om-purnamadah/
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्” बृहदारण्यक उपनिषद् के पाँचवें अध्याय का पहला मंत्र (5.1.1) है। इसमें कहा गया है कि वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है, और पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही बचता है। परंपरा में ईशावास्य और बृहदारण्यक उपनिषद् के पाठ से पहले और बाद में इसे शांति मंत्र के रूप में बोला जाता है।
पाठ के बारे में: बृहदारण्यक उपनिषद् (5.1.1) में यह मंत्र आगे “ॐ खं ब्रह्म” वाले वाक्यों के साथ चलता है; शांतिपाठ में केवल पहली दो पंक्तियाँ और ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ बोले जाते हैं। यह मंत्र शुक्ल यजुर्वेद के 40वें अध्याय (ईशावास्य उपनिषद्) के मूल पाठ में नहीं है, पर परंपरा से ईशावास्य उपनिषद् का पाठ इसी से आरंभ होता है। कुछ लोकप्रिय पाठों में ‘पूर्णमुच्यते’ मिलता है; उपनिषद् का पाठ ‘पूर्णमुदच्यते’ (प्रकट होता है) है। एक प्रचलित व्याख्या में ‘वह’ से परब्रह्म और ‘यह’ से उससे प्रकट जगत् समझा जाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह मंत्र किस ग्रंथ से है?
बृहदारण्यक उपनिषद् 5.1.1 से, जो शुक्ल यजुर्वेद का उपनिषद् है। परंपरा में यही ईशावास्य उपनिषद् का शांतिपाठ भी है।
‘पूर्ण में से पूर्ण निकालने पर पूर्ण बचता है’ का क्या अर्थ है?
एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार परब्रह्म पूर्ण है और उससे प्रकट जगत् भी पूर्ण है; जगत् के प्रकट होने से उसकी पूर्णता में कोई कमी नहीं आती।
यह मंत्र कब बोला जाता है?
परंपरा में ईशावास्य और बृहदारण्यक उपनिषद् के पाठ के आरंभ और अंत में शांति मंत्र के रूप में। कई लोग इसे पूजा या अध्ययन के अंत में भी बोलते हैं।
स्रोत
- बृहदारण्यक उपनिषद् 5.1.1 (sanskritdocuments.org का पाठ; wisdomlib.org पर स्वामी माधवानंद का संस्करण)
- ईशावास्य उपनिषद् का शांतिपाठ (shlokam.org)
- जाँचा गया: शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयि संहिता, अध्याय 40 (संस्कृत विकिस्रोत)
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पाठ का मिलान: sanskritdocuments.org, wisdomlib.org, shlokam.org, sa.wikisource.org
