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गणेश जी की आरती: जय गणेश जय गणेश देवा

परंपरा में: बुधवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 1 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
लाल वस्त्र वाली गणेश प्रतिमा के सामने परिवार की आरती: दीये की थाली, घंटी, मोदक और दूर्वा
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

    हे गणेश देव, आपकी जय हो, जय हो। आपकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव (शिव) हैं।

  2. पद 2

    एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी। माथे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥

    आप एक दाँत वाले, दयालु और चार भुजाओं वाले हैं। आपके माथे पर सिंदूर शोभित है और आप मूषक (चूहे) की सवारी करते हैं।

  3. पद 3

    पान चढ़े, फल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥

    आपको पान, फल और मेवे चढ़ाए जाते हैं, लड्डुओं का भोग लगता है और संत आपकी सेवा करते हैं।

  4. पद 4

    अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

    आरती कहती है कि आप अंधों को आँखें, कोढ़ से पीड़ितों को निरोगी काया, निःसंतानों को संतान और निर्धनों को धन देते हैं।

  5. पद 5

    ‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

    ‘सूर’ श्याम आपकी शरण में आए हैं; हे पार्वती और महादेव के पुत्र, उनकी सेवा सफल कीजिए।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ganesh-aarti/

संक्षेप में

“जय गणेश जय गणेश देवा” भगवान गणेश की सबसे प्रचलित हिंदी आरती है। इसमें गणेश जी के माता-पिता, उनके एकदंत और चार भुजाओं वाले रूप, मूषक वाहन और लड्डुओं के भोग का सरल वर्णन है। यह गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव में, दीपावली के लक्ष्मी-गणेश पूजन में, और प्रतिदिन की पूजा में गाई जाती है।

कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे ‘पान चढ़े फूल चढ़े’ या ‘हार चढ़े फूल चढ़े’, ‘माथे पर तिलक सोहे’ और ‘अँधे को आँख देत’। कई प्रचलित संस्करणों में एक पद और गाया जाता है: ‘दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥’ गाते समय पहली दो पंक्तियाँ (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती हैं। अंतिम पद में ‘सूर’ नाम आने से कुछ लोग इसे सूरदास से जोड़ते हैं, पर रचयिता निश्चित रूप से स्थापित नहीं है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश जी की यह आरती किसने लिखी?

रचयिता निश्चित नहीं है। अंतिम पद में ‘सूर’ श्याम नाम आता है, इसलिए कई लोग इसे सूरदास से जोड़ते हैं, पर यह स्थापित नहीं है।

यह आरती कब गाई जाती है?

गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव में, दीपावली के लक्ष्मी-गणेश पूजन में, संकष्टी चतुर्थी पर, और प्रतिदिन की पूजा में।

क्या यह आरती ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ से अलग है?

हाँ। ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ मराठी में एक अलग आरती है, जिसे संत समर्थ रामदास से जोड़ा जाता है। ‘जय गणेश देवा’ हिंदी में गाई जाने वाली आरती है।

क्या इस आरती में और पद भी हैं?

कई संस्करणों में ‘दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी’ से शुरू होने वाला एक पद और गाया जाता है। यहाँ प्रचलित मूल पाँच पद दिए गए हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, prabhatkhabar.com