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दुर्गा-काली माता की आरती: अम्बे तू है जगदम्बे काली PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ambe-tu-hai-jagdambe/
“अम्बे तू है जगदम्बे काली” देवी दुर्गा की सबसे लोकप्रिय आरतियों में से एक है, जिसमें देवी को अम्बे, जगदम्बा, काली और खप्पर वाली दुर्गा कहकर पुकारा गया है। इसकी भाषा सरल आधुनिक हिंदी है और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। नवरात्रि के नौ दिनों, दुर्गा अष्टमी, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार की पूजा में इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
इस आरती के दो प्रचलित पाठ मिलते हैं। कुछ संग्रहों (जैसे द्रिक पंचांग) में पद 2 की पंक्ति ‘दुष्टों को तू ही ललकारती’ है और पद 4 में ‘हम तो माँगें तेरे चरणों में छोटा सा कोना’; कई अन्य संग्रहों में ‘दुष्टों को पल में संहारती’ और ‘माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना’ मिलता है। ‘भीर’ की जगह ‘भीड़’, ‘गावें’ की जगह ‘गाएँ’ और ‘दरसाने’ की जगह ‘दर्शाने’ भी छपा मिलता है। पाँचवाँ पद (‘चरण शरण में खड़े तुम्हारी’) कुछ संग्रहों में नहीं है। गाते समय पहली दो पंक्तियाँ (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह आरती “जय अम्बे गौरी” से कैसे अलग है?
दोनों देवी दुर्गा की आरतियाँ हैं, पर अलग-अलग रचनाएँ हैं। “जय अम्बे गौरी” पुरानी शैली की आरती है, जिसमें देवी के श्रृंगार और असुर-वध का वर्णन है और अंतिम पद में शिवानन्द स्वामी का नाम आता है। “अम्बे तू है जगदम्बे काली” सरल आधुनिक हिंदी में है और इसमें माँ और संतान के नाते का भाव प्रमुख है।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है और किसी पद में कवि का नाम (छाप) नहीं आता। यह अनुराधा पौडवाल समेत कई गायकों की आवाज़ में लोकप्रिय हुई है।
“पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता” का भाव कहाँ से आया है?
यही भाव देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र की प्रसिद्ध पंक्ति ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’ (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती) में है। परंपरा इस स्तोत्र को आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।
यह आरती कब गाई जाती है?
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में, दुर्गा अष्टमी पर, माता की चौकी और जागरण में, शुक्रवार की देवी पूजा में, और काली पूजा में।
इस आरती में कितने पद हैं?
पहली टेक के अलावा तीन पद सब संग्रहों में मिलते हैं। कई संग्रहों में एक और पद ‘चरण शरण में खड़े तुम्हारी’ भी है, जो यहाँ पद 5 के रूप में दिया गया है।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
- “कुमाता न भवति” का भाव: देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र (परंपरा से शंकराचार्य रचित)
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