आरतीदुर्गा

दुर्गा-काली माता की आरती: अम्बे तू है जगदम्बे काली

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
दुर्गा पूजा पंडाल में ढाक की थाप के बीच धुनुची लेकर माँ की आरती करते पुजारी
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली। तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

    हे अम्बे, तुम ही जगदम्बा और काली हो; हे खप्पर धारण करने वाली दुर्गा, तुम्हारी जय हो। भारती (वाणी) तुम्हारे ही गुण गाती है; हे मैया, हम सब तुम्हारी आरती उतारते हैं।

  2. पद 2

    तेरे भक्त जनों पर माता, भीर पड़ी है भारी। दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥ सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली, दुष्टों को पल में संहारती। ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

    हे माता, तुम्हारे भक्तों पर भारी संकट (भीर) आ पड़ा है; सिंह पर सवार होकर दानवों के दल पर टूट पड़ो। तुम सौ-सौ सिंहों से भी बलवान हो, आठ भुजाओं वाली हो और दुष्टों का पल भर में संहार करती हो।

  3. पद 3

    माँ-बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता। पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता॥ सब पे करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली, दुखियों के दुखड़े निवारती। ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

    इस संसार में माँ और बेटे का नाता बहुत निर्मल है। बेटे कपूत (बुरे) निकलते तो सुने हैं, पर माता कभी कुमाता नहीं सुनी। तुम सब पर करुणा दिखाने वाली और अमृत बरसाने वाली हो, और दुखियों के दुख दूर करती हो।

  4. पद 4

    नहीं माँगते धन और दौलत, न चाँदी न सोना। हम तो माँगें माँ तेरे मन में, एक छोटा सा कोना॥ सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली, सतियों के सत को सँवारती। ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

    हम धन-दौलत नहीं माँगते, न चाँदी, न सोना; हम तो बस तुम्हारे मन में एक छोटा-सा कोना माँगते हैं। तुम सबकी बिगड़ी बात बनाने वाली और लाज बचाने वाली हो, और सतियों के सत (सच्चाई और पवित्रता) को सँवारती हो।

  5. पद 5

    चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली। वरद हस्त सर पर रख दो माँ, संकट हरने वाली॥ माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली, भक्तों के कारज तू ही सारती। ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

    हम पूजा की थाली लेकर तुम्हारे चरणों की शरण में खड़े हैं; हे संकट हरने वाली माँ, हमारे सिर पर वरदान देने वाला हाथ रख दो। हे अष्टभुजा माँ, हमारी भक्ति-रस की प्याली भर दो; भक्तों के काम तुम ही पूरे करती हो।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ambe-tu-hai-jagdambe/

संक्षेप में

“अम्बे तू है जगदम्बे काली” देवी दुर्गा की सबसे लोकप्रिय आरतियों में से एक है, जिसमें देवी को अम्बे, जगदम्बा, काली और खप्पर वाली दुर्गा कहकर पुकारा गया है। इसकी भाषा सरल आधुनिक हिंदी है और इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। नवरात्रि के नौ दिनों, दुर्गा अष्टमी, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार की पूजा में इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

इस आरती के दो प्रचलित पाठ मिलते हैं। कुछ संग्रहों (जैसे द्रिक पंचांग) में पद 2 की पंक्ति ‘दुष्टों को तू ही ललकारती’ है और पद 4 में ‘हम तो माँगें तेरे चरणों में छोटा सा कोना’; कई अन्य संग्रहों में ‘दुष्टों को पल में संहारती’ और ‘माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना’ मिलता है। ‘भीर’ की जगह ‘भीड़’, ‘गावें’ की जगह ‘गाएँ’ और ‘दरसाने’ की जगह ‘दर्शाने’ भी छपा मिलता है। पाँचवाँ पद (‘चरण शरण में खड़े तुम्हारी’) कुछ संग्रहों में नहीं है। गाते समय पहली दो पंक्तियाँ (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह आरती “जय अम्बे गौरी” से कैसे अलग है?

दोनों देवी दुर्गा की आरतियाँ हैं, पर अलग-अलग रचनाएँ हैं। “जय अम्बे गौरी” पुरानी शैली की आरती है, जिसमें देवी के श्रृंगार और असुर-वध का वर्णन है और अंतिम पद में शिवानन्द स्वामी का नाम आता है। “अम्बे तू है जगदम्बे काली” सरल आधुनिक हिंदी में है और इसमें माँ और संतान के नाते का भाव प्रमुख है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है और किसी पद में कवि का नाम (छाप) नहीं आता। यह अनुराधा पौडवाल समेत कई गायकों की आवाज़ में लोकप्रिय हुई है।

“पूत-कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता” का भाव कहाँ से आया है?

यही भाव देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र की प्रसिद्ध पंक्ति ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’ (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती) में है। परंपरा इस स्तोत्र को आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।

यह आरती कब गाई जाती है?

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में, दुर्गा अष्टमी पर, माता की चौकी और जागरण में, शुक्रवार की देवी पूजा में, और काली पूजा में।

इस आरती में कितने पद हैं?

पहली टेक के अलावा तीन पद सब संग्रहों में मिलते हैं। कई संग्रहों में एक और पद ‘चरण शरण में खड़े तुम्हारी’ भी है, जो यहाँ पद 5 के रूप में दिया गया है।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. “कुमाता न भवति” का भाव: देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र (परंपरा से शंकराचार्य रचित)

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