मंत्रआत्मा

ॐ सह नाववतु

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. शांति मंत्र

    ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

    शब्दार्थ: सह = साथ-साथ; नौ = हम दोनों (गुरु और शिष्य) की; अवतु = रक्षा करें; भुनक्तु = पालन करें; वीर्यं करवावहै = हम दोनों पराक्रम (परिश्रम) करें; तेजस्वि = तेज से भरा; नौ अधीतम् = हम दोनों का पढ़ा हुआ; अस्तु = हो; मा विद्विषावहै = हम आपस में द्वेष न करें; शान्तिः = शांति। भावार्थ: वे (परमात्मा) हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, साथ-साथ हमारा पालन करें। हम दोनों साथ मिलकर परिश्रम करें। हमारा पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम कभी एक-दूसरे से द्वेष न करें। ॐ शांति, शांति, शांति।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/om-saha-navavatu/

संक्षेप में

“ॐ सह नाववतु” तैत्तिरीय उपनिषद् का शांति मंत्र है, जो उसकी ब्रह्मानन्दवल्ली के आरंभ में आता है। इसमें गुरु और शिष्य साथ मिलकर प्रार्थना करते हैं कि दोनों की रक्षा हो, दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो और उनमें कभी द्वेष न हो। परंपरा में वेद, उपनिषद् या किसी शास्त्र के अध्ययन और प्रवचन के आरंभ में यह मंत्र बोला जाता है।

पाठ के बारे में: संस्कृत विकिस्रोत के तैत्तिरीय उपनिषद् पाठ में यह मंत्र ब्रह्मानन्दवल्ली के पहले अनुवाक (“ब्रह्मविदाप्नोति परम्”) से पहले, बिना क्रम-संख्या के, शांतिपाठ के रूप में है। मंत्र में रक्षा करने वाले का नाम नहीं है; परंपरा में ‘वे’ से परमात्मा समझा जाता है। तीन बार ‘शान्तिः’ कहने को परंपरा में तीन प्रकार के कष्टों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) की शांति से जोड़ा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह मंत्र किस उपनिषद् में है?

तैत्तिरीय उपनिषद् में, जो कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का उपनिषद् है। यह उसकी ब्रह्मानन्दवल्ली के आरंभ में शांतिपाठ के रूप में आता है।

इस मंत्र में ‘हम दोनों’ कौन हैं?

गुरु और शिष्य। ‘नौ’ संस्कृत में ‘हम दोनों’ के लिए द्विवचन का शब्द है। यह प्रार्थना दोनों साथ मिलकर करते हैं।

यह मंत्र कब बोला जाता है?

परंपरा में वेद, उपनिषद् या किसी शास्त्र के अध्ययन और प्रवचन के आरंभ में। आज बहुत से विद्यालयों और कक्षाओं में भी पढ़ाई से पहले यह बोला जाता है।

‘शान्तिः’ तीन बार क्यों कहा जाता है?

परंपरा में इसे तीन प्रकार के कष्टों की शांति से जोड़ा जाता है: अपने शरीर और मन से होने वाले (आध्यात्मिक), दूसरे प्राणियों से होने वाले (आधिभौतिक) और प्रकृति या दैवी शक्तियों से होने वाले (आधिदैविक)।

स्रोत

  1. तैत्तिरीय उपनिषद्, ब्रह्मानन्दवल्ली का शांतिपाठ (संस्कृत विकिस्रोत)
  2. पाठ का मिलान: shlokam.org

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पाठ का मिलान: sa.wikisource.org, shlokam.org