सरस्वती जी की आरती: ॐ जय सरस्वती माता

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श्वेत कमल पर वीणा बजाती माँ सरस्वती की प्रतिमा, पास में हंस और पुस्तकें
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता। सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥

    हे सरस्वती माँ, आपकी जय हो। आप सद्गुणों के वैभव से सुशोभित हैं और तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।

  2. पद 2

    चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी। सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥

    आपका मुख चंद्रमा जैसा है, आप कमल पर विराजती हैं और आपकी कांति मंगल करने वाली है। शुभ हंस आपकी सवारी है और आप अतुलनीय तेज धारण करती हैं।

  3. पद 3

    बाएँ कर में वीणा, दाएँ कर माला। शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥

    आपके बाएँ हाथ में वीणा और दाएँ हाथ में माला है। सिर पर मणि जड़ा मुकुट और गले में मोतियों की माला शोभित है।

  4. पद 4

    देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया। पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

    हे देवी, जो आपकी शरण आए, आपने उनका उद्धार किया। आप दासी मंथरा की बुद्धि में जा बैठीं, और इसी से आगे चलकर रावण का संहार हुआ। रामचरितमानस (अयोध्याकाण्ड, दोहा 11 और 12) में देवताओं की विनती पर शारदा मंथरा की मति फेरती हैं।

  5. पद 5

    विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो। मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥

    हे विद्या और ज्ञान देने वाली माँ, हमें ज्ञान के प्रकाश से भर दीजिए। संसार से मोह, अज्ञान और अंधकार का नाश कीजिए।

  6. पद 6

    धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो। ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥

    हे माँ, धूप, दीप, फल और मेवे की यह भेंट स्वीकार कीजिए। हमें ज्ञान की आँखें (ज्ञानचक्षु) दीजिए और संसार को पार लगाइए।

  7. पद 7

    माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे। हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥

    माँ सरस्वती की यह आरती हित और सुख देने वाली है; जो कोई इसे गाता है, वह ज्ञान और भक्ति पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/saraswati-aarti/

संक्षेप में

“जय सरस्वती माता” विद्या, वाणी और संगीत की देवी सरस्वती की सबसे प्रचलित आरती है। इसमें देवी के हंस वाहन, वीणा, माला और मुकुट का वर्णन है और उनसे अज्ञान का अंधकार मिटाने की प्रार्थना की गई है। यह वसंत पंचमी पर, शारदीय नवरात्रि की सरस्वती पूजा में, विद्यारंभ के समय और विद्यालयों में गाई जाती है। इसके रचयिता ज्ञात नहीं हैं।

यहाँ प्रचलित पाठ दिया गया है। कई पुस्तकों और गायकों के यहाँ आरती ‘ॐ जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता’ से शुरू होती है, और इसी से इसका नाम ‘ॐ जय सरस्वती माता’ प्रचलित है। कुछ पाठों में पद 3 में ‘दाएँ कर में माला’ मिलता है। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है। किसी पद में कवि का नाम नहीं आता।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरस्वती जी की यह आरती कब गाई जाती है?

वसंत पंचमी पर, शारदीय नवरात्रि में सरस्वती आवाहन और सरस्वती पूजा के दिनों में, विद्यारंभ संस्कार के समय, और विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं में।

“पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया” का क्या अर्थ है?

रामचरितमानस (अयोध्याकाण्ड, दोहा 11 और 12) के अनुसार राम के राज्याभिषेक से पहले देवताओं ने शारदा (सरस्वती) से विनती की, और वे कैकेयी की दासी मंथरा की मति फेरकर चली गईं। इसी से राम का वनवास हुआ, जो आगे चलकर रावण-वध तक पहुँचा। आरती इसी प्रसंग को याद करती है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता ज्ञात नहीं है। इसके किसी पद में कवि का नाम (छाप) नहीं आता।

यह “या कुन्देन्दुतुषारहारधवला” से कैसे अलग है?

“या कुन्देन्दुतुषारहारधवला” संस्कृत का सरस्वती वंदना श्लोक है, जो प्रायः पूजा या पढ़ाई की शुरुआत में बोला जाता है। “जय सरस्वती माता” हिंदी की आरती है, जो पूजा के अंत में दीप घुमाते हुए गाई जाती है। “ओइम् जय वीणे वाली” सरस्वती जी की एक और अलग आरती है।

इस आरती में कितने पद हैं?

प्रचलित पाठ में पहली टेक समेत सात पद हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. मंथरा प्रसंग: रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 11 और 12

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