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श्री राम स्तुति: श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shri-ramchandra-kripalu/
“श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन” गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका का 45वाँ पद है (गीता प्रेस क्रम), जो राग गौरी में है। इसके पाँच छंदों में श्रीराम के रूप, गुण और पराक्रम का वर्णन करके मन से उनका भजन करने को कहा गया है। इसे राम स्तुति और राम आरती के रूप में दशहरा, दीपावली, राम नवमी और रामायण पाठ के अंत में गाया जाता है।
यहाँ गीता प्रेस की विनय पत्रिका (पद 45) का पाठ दिया गया है। कुछ संस्करणों में ‘नवनील-नीरद’ की जगह ‘नव नील नीरज’ और ‘कुरु’ की जगह ‘करु’ मिलता है, और गाते समय ‘भजु मन’ प्रायः ‘भजमन’ बोला जाता है। लोकप्रिय गायन में इसके बाद प्रायः ‘मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो’ वाला छंद और ‘जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि’ वाला सोरठा भी गाया जाता है। ये पंक्तियाँ विनय पत्रिका की नहीं, रामचरितमानस के बालकाण्ड (दोहा 236) की हैं, जहाँ गौरी (पार्वती) सीता को आशीर्वाद देती हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह स्तुति किसने लिखी और किस ग्रंथ में है?
गोस्वामी तुलसीदास ने। यह उनकी विनय पत्रिका का 45वाँ पद है (गीता प्रेस क्रम), जो राग गौरी में है। पाँचवें छंद में ‘इति वदति तुलसीदास’ पंक्ति में उनका नाम आता है।
दशहरा और दीपावली पर इसे क्यों गाया जाता है?
दशहरा रावण पर श्रीराम की विजय की स्मृति का और दीपावली उनके अयोध्या लौटने की स्मृति का पर्व माना जाता है। इन अवसरों पर राम की पूजा और रामलीला में यह स्तुति प्रायः राम आरती के रूप में गाई जाती है, और इसमें दैत्य-वंश के नाश और खर-दूषण पर विजय का भी उल्लेख है।
क्या “मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु” वाली पंक्तियाँ इसी स्तुति का भाग हैं?
नहीं। ये रामचरितमानस के बालकाण्ड (दोहा 236) की पंक्तियाँ हैं, जहाँ जनकपुर में गौरी (पार्वती) सीता को मनचाहा वर मिलने का आशीर्वाद देती हैं। लोकप्रिय गायन में इन्हें इस स्तुति के बाद जोड़ दिया जाता है।
इस स्तुति की भाषा कौन सी है?
विनय पत्रिका ब्रजभाषा में है। इस पद में संस्कृत शब्दों की बहुलता है और पंक्तियाँ ‘दारुणं’, ‘सुंदरं’ जैसे संस्कृत रूपों पर समाप्त होती हैं, इसलिए यह संस्कृत स्तोत्र जैसी सुनाई देती है।
इसमें कितने छंद हैं?
पाँच छंद हैं, हर छंद में दो पंक्तियाँ। अंतिम छंद में कवि का नाम आता है।
स्रोत
- गोस्वामी तुलसीदास, विनय पत्रिका, पद 45 (राग गौरी), गीता प्रेस
- बाद में गाई जाने वाली पंक्तियाँ: रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 236
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पाठ का मिलान: archive.org, sanskritdocuments.org, kavitakosh.org, bhaktibharat.com, sanskritdocuments.org
