बृहस्पति देव की आरती: ॐ जय बृहस्पति देवा

परंपरा में: गुरुवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
गुरुवार व्रत: पीली साड़ी में स्त्री केले के पौधे में हल्दी-जल चढ़ाती हुई, पास में चने की दाल, गुड़ और केले
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा। छिन-छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥

    हे बृहस्पति देव, आपकी जय हो। मैं बार-बार आपको केले (कदली फल) और मेवे का भोग लगाता हूँ।

  2. पद 2

    तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥

    आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके भीतर रहकर सब जानने वाले (अंतर्यामी) हैं। आप जगत के पिता, जगत के ईश्वर और सबके स्वामी हैं।

  3. पद 3

    चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥

    आपका निर्मल चरणामृत सब पापों को हरने वाला है। आप सारी मनोकामनाएँ पूरी करने वाले हैं; हे पालनहार, कृपा कीजिए।

  4. पद 4

    तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े। प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥

    जो व्यक्ति तन, मन और धन अर्पित करके आपकी शरण में आता है, उसके लिए प्रभु स्वयं प्रकट होकर उसके द्वार पर आ खड़े होते हैं।

  5. पद 5

    दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी। पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी॥

    आप दीनों पर दया करने वाले, दया के भंडार और भक्तों का हित करने वाले हैं। आप सब पाप और दोष हरते हैं और संसार के बंधन काटते हैं।

  6. पद 6

    सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो। विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥

    आप सारी मनोकामनाएँ पूरी करने वाले हैं; हमें सब संशयों से पार उतारिए। हे संतों को सुख देने वाले, इंद्रिय-विषयों से उपजे विकार मिटाइए।

  7. पद 7

    जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे। जेष्टानन्द बन्द सो, सो निश्चय पावे॥

    आरती कहती है कि जो कोई प्रेम सहित आपकी आरती गाता है, वह निश्चय ही फल पाता है। इस पंक्ति में ‘जेष्टानन्द’ नाम आता है; ‘बन्द सो’ का अर्थ स्पष्ट नहीं है (टिप्पणी देखें)।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/brihaspati-aarti/

संक्षेप में

“ॐ जय बृहस्पति देवा” देवताओं के गुरु बृहस्पति देव की आरती है। इसमें उन्हें पूर्ण परमात्मा, जगतपिता और दीनदयाल कहकर पुकारा गया है और केले व मेवे के भोग का उल्लेख है। यह गुरुवार (बृहस्पतिवार) के व्रत में, व्रत कथा के बाद गाई जाती है। गुरुवार को बहुत से घरों में भगवान विष्णु की पूजा भी होती है।

यहाँ वह पाठ दिया गया है जिस पर अधिकतर स्रोत सहमत हैं। कुछ संस्करणों में ‘तुम पूरण परमात्मा’ और पद 6 में ‘सब संशय हारो’ या ‘हारी’ मिलता है। अंतिम पंक्ति दो रूपों में मिलती है: ‘जेष्टानन्द बन्द सो, सो निश्चय पावे’ और ‘जेठानन्द (या ज्येष्ठानंद) आनन्दकर, सो निश्चय पावे’। ‘जेष्टानन्द’ या ‘जेठानन्द’ आरती के कवि की छाप लगती है, पर उनके बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। बहुत से लोग आरती के बाद ‘बोलो विष्णु भगवान की जय, बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय’ का जयकारा लगाते हैं। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बृहस्पति देव कौन हैं?

बृहस्पति देवताओं के गुरु और पुरोहित हैं। ऋग्वेद में उनकी स्तुति के सूक्त हैं (जैसे 4.50), और महाभारत (आदि पर्व 76) के अनुसार देवताओं ने उन्हें अपना पुरोहित चुना, जबकि असुरों ने शुक्राचार्य को। नवग्रहों में गुरु (बृहस्पति ग्रह) उन्हीं के नाम से है और गुरुवार उन्हीं का दिन है।

यह आरती कब गाई जाती है?

गुरुवार (बृहस्पतिवार) को, विशेषकर गुरुवार के व्रत में व्रत कथा सुनने के बाद।

आरती में ‘कदली फल’ का क्या अर्थ है?

कदली यानी केला। गुरुवार की पूजा में केले का भोग लगाने की, और कई जगह केले के पौधे की पूजा करने की परंपरा है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

रचयिता निश्चित नहीं है। अंतिम पंक्ति में ‘जेष्टानन्द’ (कुछ पाठों में ‘जेठानन्द’) नाम आता है, जो कवि की छाप लगता है, पर उनके बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. देवताओं के पुरोहित: महाभारत, आदि पर्व 76
  3. बृहस्पति की स्तुति: ऋग्वेद 4.50

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