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बृहस्पति देव की आरती: ॐ जय बृहस्पति देवा PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/brihaspati-aarti/
“ॐ जय बृहस्पति देवा” देवताओं के गुरु बृहस्पति देव की आरती है। इसमें उन्हें पूर्ण परमात्मा, जगतपिता और दीनदयाल कहकर पुकारा गया है और केले व मेवे के भोग का उल्लेख है। यह गुरुवार (बृहस्पतिवार) के व्रत में, व्रत कथा के बाद गाई जाती है। गुरुवार को बहुत से घरों में भगवान विष्णु की पूजा भी होती है।
यहाँ वह पाठ दिया गया है जिस पर अधिकतर स्रोत सहमत हैं। कुछ संस्करणों में ‘तुम पूरण परमात्मा’ और पद 6 में ‘सब संशय हारो’ या ‘हारी’ मिलता है। अंतिम पंक्ति दो रूपों में मिलती है: ‘जेष्टानन्द बन्द सो, सो निश्चय पावे’ और ‘जेठानन्द (या ज्येष्ठानंद) आनन्दकर, सो निश्चय पावे’। ‘जेष्टानन्द’ या ‘जेठानन्द’ आरती के कवि की छाप लगती है, पर उनके बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। बहुत से लोग आरती के बाद ‘बोलो विष्णु भगवान की जय, बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय’ का जयकारा लगाते हैं। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बृहस्पति देव कौन हैं?
बृहस्पति देवताओं के गुरु और पुरोहित हैं। ऋग्वेद में उनकी स्तुति के सूक्त हैं (जैसे 4.50), और महाभारत (आदि पर्व 76) के अनुसार देवताओं ने उन्हें अपना पुरोहित चुना, जबकि असुरों ने शुक्राचार्य को। नवग्रहों में गुरु (बृहस्पति ग्रह) उन्हीं के नाम से है और गुरुवार उन्हीं का दिन है।
यह आरती कब गाई जाती है?
गुरुवार (बृहस्पतिवार) को, विशेषकर गुरुवार के व्रत में व्रत कथा सुनने के बाद।
आरती में ‘कदली फल’ का क्या अर्थ है?
कदली यानी केला। गुरुवार की पूजा में केले का भोग लगाने की, और कई जगह केले के पौधे की पूजा करने की परंपरा है।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
रचयिता निश्चित नहीं है। अंतिम पंक्ति में ‘जेष्टानन्द’ (कुछ पाठों में ‘जेठानन्द’) नाम आता है, जो कवि की छाप लगता है, पर उनके बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
- देवताओं के पुरोहित: महाभारत, आदि पर्व 76
- बृहस्पति की स्तुति: ऋग्वेद 4.50
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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, hindi.webdunia.com, bhaktibharat.com, en.wikisource.org, sa.wikisource.org
