मंत्रगायत्री

गायत्री मंत्र

रचना: ऋषि विश्वामित्र (ऋग्वेद 3.62)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
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  1. मंत्र

    ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

    शब्दार्थ: ॐ = प्रणव, पवित्र अक्षर; भूः, भुवः, स्वः = पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग (इन तीन शब्दों को व्याहृतियाँ कहते हैं); तत् = उस; सवितुः = सविता देव के; वरेण्यम् = वरण करने योग्य, श्रेष्ठ; भर्गः = तेज; देवस्य = देव के; धीमहि = हम ध्यान करते हैं; धियः = बुद्धियों को; यः = जो; नः = हमारी; प्रचोदयात् = प्रेरित करें। भावार्थ: हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं; वे सविता हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/gayatri-mantra/

संक्षेप में

गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल का मंत्र (3.62.10) है, जिसके ऋषि विश्वामित्र और देवता सविता (सूर्य) हैं। यह गायत्री छंद में है, इसीलिए इसका नाम गायत्री पड़ा। इसमें सविता के श्रेष्ठ तेज का ध्यान और बुद्धि को प्रेरणा देने की प्रार्थना है। परंपरा में इसका जप सुबह, दोपहर और शाम की संध्या में होता है, और उपनयन संस्कार में यही मंत्र दिया जाता है।

पाठ के बारे में: ऋग्वेद (3.62.10) में मंत्र “तत्सवितुर्वरेण्यं” से आरंभ होता है; ‘ॐ’ और ‘भूर्भुवः स्वः’ उसमें नहीं हैं। शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (36.3) में यही मंत्र ‘भूर्भुवः स्वः’ के साथ आता है, और आरंभ का ‘ॐ’ परंपरा से जोड़ा जाता है। वाजसनेयि संहिता 3.35 में भी यह मंत्र है। छंद की दृष्टि से पहले चरण में आठ के स्थान पर सात ही अक्षर गिने जाते हैं; कई विद्वान ‘वरेण्यम्’ को ‘वरेणियम्’ पढ़कर आठ अक्षर पूरे करते हैं। वेद के सस्वर पाठ के स्वर-चिह्न यहाँ सरलता के लिए छोड़ दिए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गायत्री मंत्र किस वेद में है?

ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त का दसवाँ मंत्र (3.62.10) है। इसके ऋषि विश्वामित्र और देवता सविता हैं। शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (3.35 और 36.3) में भी यह मंत्र आता है।

क्या ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ ऋग्वेद के मंत्र का हिस्सा है?

नहीं। ऋग्वेद में मंत्र “तत्सवितुर्वरेण्यं” से शुरू होता है। ‘भूर्भुवः स्वः’ वाला रूप वाजसनेयि संहिता (36.3) में मिलता है, और आरंभ का ‘ॐ’ परंपरा से जोड़ा जाता है। जप में प्रायः यही पूरा रूप बोला जाता है।

गायत्री मंत्र का जप कब किया जाता है?

परंपरा में सुबह, दोपहर और शाम की संध्या-वंदना में, और उपनयन संस्कार में, जहाँ यही मंत्र दिया जाता है। बहुत से लोग माला पर 108 बार जप करते हैं; यह संख्या परंपरा की है, मंत्र में इसका उल्लेख नहीं है।

इस मंत्र का नाम गायत्री क्यों है?

क्योंकि यह गायत्री छंद में है, जिसमें आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण माने जाते हैं। भगवद्गीता (10.35) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि छंदों में मैं गायत्री हूँ। आगे चलकर इसी मंत्र को देवी रूप में गायत्री माता या वेदमाता कहा गया।

स्रोत

  1. ऋग्वेद 3.62.10 (शाकल संहिता): संस्कृत विकिस्रोत और भारत सरकार का वैदिक हेरिटेज पोर्टल
  2. शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता 3.35 और 36.3 (संस्कृत विकिस्रोत)
  3. भगवद्गीता 10.35

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पाठ का मिलान: sa.wikisource.org, vedicheritage.gov.in, sa.wikisource.org