गायत्री माता की आरती: जयति जय गायत्री माता

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भोर की संध्या: नदी में खड़ा युवक अंजलि में जल लिए उगते सूर्य की ओर
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  1. टेक

    जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता॥

    हे गायत्री माता, आपकी जय हो, जय हो।

  2. पद 1

    आदि शक्ति तुम अलख निरंजन, जग पालन कर्त्री। दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दारिद्र्य, दैन्य हर्त्री॥

    आप आदिशक्ति हैं, अलख (जिन्हें देखा न जा सके) और निरंजन (निर्मल) हैं, और जगत का पालन करती हैं। आप दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दरिद्रता और दीनता को हरती हैं।

  3. पद 2

    ब्रह्मरूपिणी, प्रणत पालिनी, जगद्धातृ अम्बे। भव-भय हारी, जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥

    हे अम्बे, आप ब्रह्म का रूप हैं, शरण में झुके हुए लोगों का पालन करती हैं और जगत को धारण करती हैं। हे जगदम्बा, आप संसार का भय हरने वाली, लोगों का हित करने वाली और सुख देने वाली हैं।

  4. पद 3

    भयहारिणि, भवतारिणि, अनघे, अज आनन्द राशी। अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥

    आप भय हरने वाली, संसार-सागर से पार उतारने वाली, निष्पाप, अजन्मा और आनंद का भंडार हैं। आप विकार-रहित, पाप हरने वाली, अडिग, निर्मल और अविनाशी हैं।

  5. पद 4

    कामधेनु सत्-चित्-आनन्दा, जय गंगा गीता। सविता की शाश्वती शक्ति, तुम सावित्री सीता॥

    आप कामधेनु की तरह इच्छाएँ पूरी करने वाली और सत्, चित् और आनंद स्वरूप हैं; गंगा और गीता के रूप में आपकी जय हो। आप सविता (सूर्य) की शाश्वत शक्ति हैं, आप ही सावित्री और सीता हैं।

  6. पद 5

    ऋग्, यजु, साम, अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे। कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्ना, शोभा गुण गरिमे॥

    आप ऋग्, यजु, साम और अथर्व, चारों वेदों की प्रिय हैं और प्रणव (ॐ) की महान महिमा हैं। आप कुंडलिनी, सहस्रार और सुषुम्ना के रूप में हैं, और शोभा और गुणों की गरिमा हैं।

  7. पद 6

    स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी। जय सतरूपा, वाणी, विद्या, कमला, कल्याणी॥

    आप ही स्वाहा और स्वधा (देवताओं और पितरों को अर्पण के उच्चारण), शची, ब्रह्माणी, राधा और रुद्राणी हैं। सतरूपा, वाणी (सरस्वती), विद्या, कमला (लक्ष्मी) और कल्याणी के रूप में आपकी जय हो।

  8. पद 7

    जननी हम हैं दीन, हीन, दुःख, दारिद के घेरे। यदपि कुटिल, कपटी कपूत, तऊ बालक हैं तेरे॥

    हे माता, हम दीन-हीन हैं और दुःख और दरिद्रता से घिरे हैं। भले ही हम कुटिल, कपटी और बुरी संतान हैं, फिर भी हम आपके ही बालक हैं।

  9. पद 8

    स्नेह सनी करुणामयि माता, चरण शरण दीजै। बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे, दया दृष्टि कीजै॥

    हे स्नेह से भरी, करुणामयी माता, हमें अपने चरणों की शरण दीजिए। हम आपके छोटे बच्चे बिलख रहे हैं; हम पर दया की दृष्टि कीजिए।

  10. पद 9

    काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव, द्वेष हरिये। शुद्ध बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥

    हमारे काम, क्रोध, मद (अहंकार), लोभ, दंभ, बुरे भाव और द्वेष को हर लीजिए। हमें शुद्ध बुद्धि और निष्पाप हृदय दीजिए और मन को पवित्र कीजिए।

  11. पद 10

    तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि, त्राता। सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥

    आप हर प्रकार से समर्थ हैं; आप पार उतारने वाली, संतोष (तुष्टि) और पोषण (पुष्टि) देने वाली और रक्षा करने वाली हैं। हमें सत्य के उस मार्ग पर चलाइए जो सच्चा सुख देता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/gayatri-aarti/

संक्षेप में

“जयति जय गायत्री माता” वेदमाता गायत्री की आरती है। यह अखिल विश्व गायत्री परिवार की पूजा-पुस्तकों में छपती है और उसकी यज्ञ-पद्धति का हिस्सा है। इसमें गायत्री को आदिशक्ति, सविता की शक्ति और चारों वेदों से जुड़ी देवी कहा गया है। यह किसी विशेष वार से बँधी नहीं है; गायत्री जप, हवन और गायत्री जयंती पर गाई जाती है।

यहाँ अखिल विश्व गायत्री परिवार की पुस्तकों ‘गायत्री चालीसा’ और ‘कर्मकांड प्रदीप’ में छपा पाठ दिया गया है। कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे ‘जगत धातृ’, ‘भवहारिणी’, ‘अघहारी’, ‘प्रणविनी’, ‘दुःख दरिद्र’, ‘सत् मार्ग’ और पद 10 में ‘तुष्टि, पुष्टि माता’। कुछ स्रोतों में टेक के साथ ‘सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता’ पंक्ति भी जोड़ी जाती है। आरती में किसी कवि का नाम नहीं आता। गाते समय टेक हर पद के बाद दोहराई जाती है। गायत्री माता की एक और आरती ‘आरती श्री गायत्रीजी की, ज्ञानदीप और श्रद्धा की बाती’ भी गाई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस आरती में कितने पद हैं?

टेक के अलावा दस पद हैं। गाते समय टेक ‘जयति जय गायत्री माता’ हर पद के बाद दोहराई जाती है।

यह आरती कब गाई जाती है?

गायत्री मंत्र के जप, हवन या यज्ञ के बाद, गायत्री जयंती पर, और गायत्री परिवार के संस्कारों और सत्संगों में। यह किसी विशेष वार से बँधी नहीं है।

गायत्री माता और गायत्री मंत्र का क्या संबंध है?

गायत्री मंत्र ऋग्वेद (3.62.10) का मंत्र है, जो गायत्री छंद में है और जिसके देवता सविता (सूर्य) हैं। इसी मंत्र को देवी रूप में गायत्री माता या वेदमाता के नाम से पूजा जाता है। आरती भी उन्हें ‘सविता की शाश्वती शक्ति’ कहती है।

गायत्री जयंती कब होती है?

इसकी तिथि पर परंपराएँ अलग हैं: कहीं ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, कहीं ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (गंगा दशहरा) और कहीं श्रावण पूर्णिमा को गायत्री जयंती मनाई जाती है।

स्रोत

  1. अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रकाशन: ‘गायत्री चालीसा’ और ‘कर्मकांड प्रदीप’
  2. गायत्री मंत्र: ऋग्वेद 3.62.10

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