चालीसापार्वती

पार्वती चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    जय गिरी तनये दक्षजे शंभु प्रिये गुणखानि। गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥

    हे पर्वतराज की पुत्री, दक्ष की पुत्री (सती), शंभु की प्रिया, गुणों की खान, आपकी जय हो। हे गणपति की माता पार्वती! हे अम्बे! हे शक्ति! हे भवानी!

  2. चौपाई 1

    ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे। पंच बदन नित तुमको ध्यावे॥

    ब्रह्मा भी आपका रहस्य नहीं जान पाते। पाँच मुख वाले (शिव) नित्य आपका ध्यान करते हैं।

  3. चौपाई 2

    षड्मुख कहि न सकत यश तेरो। सहसबदन श्रम करत घनेरो॥

    छह मुख वाले (कार्तिकेय) भी आपका यश नहीं कह पाते, और हजार मुख वाले (शेषनाग) बहुत परिश्रम करते हैं।

  4. चौपाई 3

    तेऊ पार न पावत माता। स्थित रक्षा लय हित सजाता॥

    हे माता, वे भी आपका पार नहीं पाते। संसार की स्थिति, रक्षा और लय के लिए आप ही सब रचती हैं।

  5. चौपाई 4

    अधर प्रवाल सदृश अरुणारे। अति कमनीय नयन कजरारे॥

    आपके होंठ मूँगे जैसे लाल हैं, और काजल लगे नेत्र अत्यंत सुंदर हैं।

  6. चौपाई 5

    ललित ललाट विलेपित केशर। कुंकुम अक्षत शोभा मनहर॥

    सुंदर माथे पर केसर का लेप है, और कुंकुम तथा अक्षत की शोभा मन हर लेती है।

  7. चौपाई 6

    कनक बसन कंचुकी सजाए। कटि मेखला दिव्य लहराए॥

    आप सुनहरे वस्त्र और कंचुकी धारण किए हैं, और कमर में दिव्य मेखला लहराती है।

  8. चौपाई 7

    कंठ मदार हार की शोभा। जाहि देखि सहजहि मन लोभा॥

    गले में मदार के फूलों का हार शोभित है, जिसे देखकर मन सहज ही मोहित हो जाता है।

  9. चौपाई 8

    बालारुण अनन्त छबि धारी। आभूषण की शोभा प्यारी॥

    आप उगते सूरज जैसी अनंत छवि धारण करती हैं, और आपके आभूषणों की शोभा प्यारी है।

  10. चौपाई 9

    नाना रत्न जटित सिंहासन। तापर राजति हरि चतुरानन॥

    आप अनेक रत्नों से जड़े सिंहासन पर विराजती हैं, और हरि (विष्णु) तथा चतुरानन (ब्रह्मा) भी वहाँ शोभित होते हैं।

  11. चौपाई 10

    इन्द्रादिक परिवार पूजित। जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥

    इंद्र आदि देवताओं का परिवार आपकी पूजा करता है, और संसार के पशु, नाग और यक्ष आपका गुणगान करते हैं।

  12. चौपाई 11

    गिर कैलास निवासिनी जय जय। कोटिक प्रभा विकासिन जय जय॥

    कैलास पर्वत पर रहने वाली, आपकी जय हो, जय हो। करोड़ों ज्योतियों जैसी प्रभा फैलाने वाली, आपकी जय हो, जय हो।

  13. चौपाई 12

    त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी। अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥

    तीनों लोक आपका ही परिवार हैं, और अणु-अणु में आपका ही प्रकाश है।

  14. चौपाई 13

    हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे। त्रिभुवन के जो नित रखवारे॥

    जो नित्य तीनों लोकों के रखवाले हैं, वे महेश आपके प्राणनाथ हैं।

  15. चौपाई 14

    उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब। सुकृत पुरातन उदित भए तब॥

    जब आपने उन्हें पति के रूप में पाया, तब आपके पुराने पुण्य फलित हुए।

  16. चौपाई 15

    बूढ़ा बैल सवारी जिनकी। महिमा का गावे कोउ तिनकी॥

    जिनकी सवारी बूढ़ा बैल है, उनकी महिमा कोई क्या गाए?

  17. चौपाई 16

    सदा श्मशान बिहारी शंकर। आभूषण है भुजंग भयंकर॥

    शंकर सदा श्मशान में विचरते हैं, और भयंकर सर्प उनके आभूषण हैं।

  18. चौपाई 17

    कण्ठ हलाहल को छबि छायी। नीलकण्ठ की पदवी पायी॥

    उनके कंठ में हलाहल विष का रंग छाया है, जिससे उन्होंने नीलकंठ की पदवी पाई।

  19. चौपाई 18

    देव मगन के हित अस कीन्हों। विष लै आपु तिनहि अमि दीन्हों॥

    देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने ऐसा किया: विष स्वयं ले लिया और उन्हें अमृत दे दिया।

  20. चौपाई 19

    ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि। दुरित विदारिणि मंगल कारिणि॥

    आप उन्हीं की सुंदर पत्नी हैं; आप पाप का नाश करने वाली और मंगल करने वाली हैं।

  21. चौपाई 20

    देखि परम सौन्दर्य तिहारो। त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥

    आपका परम सौंदर्य तीनों लोकों को चकित कर देने वाला है।

  22. चौपाई 21

    भय भीता सो माता गंगा। लज्जा मय है सलिल तरंगा॥

    उसे देखकर माता गंगा भयभीत हो गईं, और उनकी जल-तरंगें लज्जा से भर गईं।

  23. चौपाई 22

    सौत समान शम्भु पहआयी। विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥

    वे विष्णु के चरण-कमल छोड़कर सौत की तरह शम्भु के पास दौड़ी आईं।

  24. चौपाई 23

    तेहिकों कमल बदन मुरझायो। लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो॥

    उनका कमल जैसा मुख मुरझा गया; यह देखकर शिव ने तुरंत उन्हें अपने सिर पर धारण कर लिया।

  25. चौपाई 24

    नित्यानन्द करी बरदायिनी। अभय भक्त कर नित अनपायिनि॥

    आप नित्य आनंद देने वाली और वर देने वाली हैं; आप भक्तों को अभय करती हैं और सदा अविनाशी हैं।

  26. चौपाई 25

    अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि। माहेश्वरी हिमालय नन्दिनि॥

    आप सारे पाप और तीनों ताप (शरीर के, भाग्य के और संसार के) मिटाने वाली हैं; आप माहेश्वरी और हिमालय की पुत्री हैं।

  27. चौपाई 26

    काशी पुरी सदा मन भायी। सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥

    काशी नगरी आपको सदा प्रिय रही, और आपने उसे सिद्ध पीठ बनाया।

  28. चौपाई 27

    भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री। कृपा प्रमोद सनेह विधात्री॥

    हे भगवती, आप (अन्नपूर्णा रूप में) प्रतिदिन भिक्षा देने वाली हैं, और कृपा, आनंद तथा स्नेह रचने वाली हैं।

  29. चौपाई 28

    रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे। वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥

    शत्रुओं का नाश करने वाली अम्बे, आपकी जय हो, जय हो। हे सबका सहारा, भक्त की वाणी को सिद्ध कीजिए।

  30. चौपाई 29

    गौरी उमा शंकरी काली। अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली॥

    आप गौरी, उमा, शंकरी और काली हैं; आप अन्नपूर्णा हैं और जगत का पालन करती हैं।

  31. चौपाई 30

    सब जन की ईश्वरी भगवती। पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥

    आप सब लोगों की ईश्वरी भगवती हैं; आप पति को प्राणों के समान मानने वाली परमेश्वरी सती हैं।

  32. चौपाई 31

    तुमने कठिन तपस्या कीनी। नारद सों जब शिक्षा लीनी॥

    जब आपने नारद से उपदेश लिया, तब कठिन तपस्या की।

  33. चौपाई 32

    अन्न न नीर न वायु अहारा। अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥

    आपने न अन्न लिया, न जल, न वायु; आपका शरीर हड्डियों का ढाँचा भर रह गया।

  34. चौपाई 33

    पत्र घास को खाद्य न भायउ। उमा नाम तब तुमने पायउ॥

    आपने पत्ते और घास तक खाना छोड़ दिया; चालीसा कहती है कि तब आपका नाम ‘उमा’ पड़ा।

  35. चौपाई 34

    तप बिलोकि रिषि सात पधारे। लगे डिगावन डिगी न हारे॥

    आपका तप देखकर सात ऋषि आए और आपको डिगाने लगे; आप नहीं डिगीं, वे ही हार गए।

  36. चौपाई 35

    तब तव जय जय जय उच्चारेउ। सप्तरिषी निज गेह सिधारेउ॥

    तब उन्होंने आपकी जय-जयकार की और सप्तर्षि अपने घर लौट गए।

  37. चौपाई 36

    सुर विधि विष्णु पास तब आए। वर देने के वचन सुनाए॥

    तब देवता, ब्रह्मा और विष्णु आपके पास आए और वर देने की बात कही।

  38. चौपाई 37

    मांगे उमा वर पति तुम तिनसों। चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों॥

    हे उमा, आपने उनसे वह पति माँगा, जिनसे तीनों लोक अपनी निधि चाहते हैं (यानी शिव)।

  39. चौपाई 38

    एवमस्तु कहि ते दोऊ गए। सुफल मनोरथ तुमने लए॥

    ‘ऐसा ही हो’ कहकर वे दोनों चले गए, और आपका मनोरथ सफल हुआ।

  40. चौपाई 39

    करि विवाह शिव सों हे भामा। पुनः कहाई हर की बामा॥

    हे भामिनी, शिव से विवाह करके आप फिर से हर (शिव) की पत्नी कहलाईं।

  41. चौपाई 40

    जो पढ़िहै जन यह चालीसा। धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥

    चालीसा कहती है कि जो इस चालीसा को पढ़ेगा, ईश्वर उसे धन, परिवार और सुख देंगे।

  42. समापन दोहा

    कूट चंद्रिका सुभग शिर जयति जयति सुख खानि। पार्वती निज भक्त हित रहहु सदा वरदानि॥

    जिनके सिर पर चंद्रमा की सुंदर कला शोभित है, उन सुख की खान की जय हो, जय हो। हे पार्वती, अपने भक्तों के लिए सदा वर देने वाली बनी रहिए।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/parvati-chalisa/

संक्षेप में

पार्वती चालीसा शिव की पत्नी देवी पार्वती की स्तुति है, जो ‘जय गिरी तनये दक्षजे’ दोहे से शुरू होती है। इसमें माता के श्रृंगार, शिव के स्वरूप, गंगा के प्रसंग और पार्वती के कठोर तप तथा शिव से विवाह की कथा है। परंपरा में इसका पाठ हरतालिका तीज, मंगला गौरी व्रत और करवा चौथ जैसे सौभाग्य के व्रतों पर होता है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

यह पाठ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की पुस्तक ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृष्ठ 246 से 249) से लिया गया है; ड्रिक पंचांग पर भी यही पाठ है, और भक्ति भारत का पाठ कुछ शब्दों को छोड़कर इससे मिलता है। पाठभेद (भक्ति भारत): चौपाई 3 में ‘हित’ की जगह ‘हिय’, चौपाई 11 में ‘विकासिन’ की जगह ‘विकासिनी’ और चौपाई 35 में ‘तब तव’ की जगह ‘तब तब’। चौपाई 19 में छपी पुस्तक और ड्रिक पंचांग ‘दूरित’ छापते हैं; यहाँ भक्ति भारत की तरह ‘दुरित’ (पाप) लिखा गया है, जो अर्थ के अनुसार सही शब्द है। चौपाई 33 में ‘उमा’ नाम का कारण चालीसा के अपने कथन के रूप में दिया गया है। चालीसा में किसी कवि का नाम नहीं आता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पार्वती चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें आरंभ में एक दोहा, 40 चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है।

पार्वती चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में हरतालिका तीज, श्रावण के मंगलवारों को होने वाले मंगला गौरी व्रत और करवा चौथ जैसे सौभाग्य के व्रतों पर, शिव-पार्वती की पूजा के साथ इसका पाठ होता है।

चालीसा में पार्वती की कौन सी कथा है?

चौपाई 31 से 39 में कथा है: नारद से उपदेश लेकर पार्वती का अन्न, जल और पत्ते तक छोड़कर कठोर तप, सप्तर्षियों का उनकी परीक्षा लेना और हारकर जय-जयकार करना, ब्रह्मा और विष्णु का वर देना, और शिव से विवाह। चौपाई 21 से 23 में गंगा का प्रसंग चालीसा के अपने काव्य के रूप में है।

पार्वती चालीसा और अन्नपूर्णा चालीसा में क्या संबंध है?

दोनों अलग रचनाएँ हैं। पार्वती चालीसा भी चौपाई 27 और 29 में देवी को काशी में प्रतिदिन भिक्षा देने वाली और अन्नपूर्णा कहती है। अन्नपूर्णा चालीसा में सती के देह-त्याग से लेकर गिरिजा के शिव को पाने तक की कथा है।

स्रोत

  1. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृष्ठ 246 से 249
  2. ड्रिक पंचांग: पार्वती माता चालीसा
  3. भक्ति भारत: पार्वती माता की चालीसा

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