चालीसापार्वती

अन्नपूर्णा चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
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  1. दोहा

    विश्वेश्वर-पदपद्म की रज-निज शीश-लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश बरनौं कवि-मतिलाय॥

    विश्वेश्वर (काशी के शिव) के चरण-कमलों की धूल अपने सिर पर लगाकर, हे अन्नपूर्णा, मैं अपनी कवि-बुद्धि लगाकर आपका सुयश वर्णन करता हूँ।

  2. चौपाई 1

    नित्य आनंद करिणी माता। वर अरु अभय भाव प्रख्याता॥

    हे माता, आप नित्य आनंद देने वाली हैं, और वर तथा अभय देने के लिए प्रसिद्ध हैं।

  3. चौपाई 2

    जय! सौंदर्य सिंधु जग-जननी। अखिल पाप हर भव-भय हरनी॥

    सौंदर्य की सागर, जगत की जननी, आपकी जय हो। आप सारे पाप और संसार का भय हरने वाली हैं।

  4. चौपाई 3

    श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि। संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि॥

    आपके गोरे शरीर पर श्वेत वस्त्र हैं। संत, ऋषि और मुनि आपके चरणों की सेवा करते हैं।

  5. चौपाई 4

    काशी पुराधीश्वरी माता। माहेश्वरी सकल जग-त्राता॥

    हे माता, आप काशी नगरी की अधीश्वरी हैं, माहेश्वरी हैं और सारे जगत की रक्षा करने वाली हैं।

  6. चौपाई 5

    वृषभारूढ़ नाम रुद्राणी। विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥

    बैल पर सवार होने से आप रुद्राणी कहलाती हैं। सारे विश्व में विचरने वाली, कल्याण करने वाली, आपकी जय हो।

  7. चौपाई 6

    पतिदेवता सुतीत शिरोमणि। पदवी प्राप्त कीन्ह गिरि-नंदिनि॥

    हे पर्वतराज की पुत्री, आपने पति को देवता मानने वाली स्त्रियों में शिरोमणि की पदवी पाई।

  8. चौपाई 7

    पति-विछोह दुःख सहि नहिं पावा। योग अग्नि तब बदन जरावा॥

    सती के रूप में आप पति से बिछड़ने का दुख सह न सकीं, तब आपने योग की अग्नि से अपना शरीर जला दिया।

  9. चौपाई 8

    देह तजत शिव-चरण सनेहू। राखेहु जात हिमगिरि-गेहू॥

    शरीर छोड़ते समय भी आपने शिव के चरणों में प्रेम बनाए रखा, और फिर हिमालय के घर जन्म लिया।

  10. चौपाई 9

    प्रकटी गिरिजा नाम धरायो। अति आनंद भवन मँह छायो॥

    आप प्रकट हुईं और आपका नाम गिरिजा रखा गया; हिमालय के घर में बहुत आनंद छा गया।

  11. चौपाई 10

    नारद ने तब तोहिं भरमायहु। ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥

    तब नारद ने आपको भरमाया और विवाह के लिए उपदेश दिया।

  12. चौपाई 11

    ब्रह्मा-वरुण-कुबेर-गनाये। देवराज आदिक कहि गाये॥

    उन्होंने ब्रह्मा, वरुण और कुबेर गिनाए, और देवराज इंद्र आदि का गुणगान किया।

  13. चौपाई 12

    सब देवन को सुजस बखानी। मति पलटन की मन मँह ठानी॥

    सब देवताओं का यश बखानकर उन्होंने मन में आपका निश्चय बदलने की ठानी।

  14. चौपाई 13

    अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या। कीन्ही सिद्ध हिमाचल कन्या॥

    हे धन्य हिमाचल-कन्या, आप अपने प्रण पर अडिग रहीं और उसे सिद्ध किया।

  15. चौपाई 14

    निज कौ तब नारद घबराये। तब प्रण-पूरण मंत्र पढ़ाये॥

    तब नारद स्वयं घबरा गए, और उन्होंने आपको प्रण पूरा करने वाला मंत्र सिखाया।

  16. चौपाई 15

    करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ। संत-बचन तुम सत्य परेखेहु॥

    उन्होंने आपको तप करने का उपदेश दिया, और आपने संत के वचन को सत्य माना।

  17. चौपाई 16

    गगनगिरा सुनि टरी न टारे। ब्रह्मा तब तुव पास पधारे॥

    आकाशवाणी सुनकर भी आप टाले न टलीं; तब ब्रह्मा आपके पास आए।

  18. चौपाई 17

    कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा। देहुँ आज तुव मति अनुरूपा॥

    उन्होंने कहा, ‘पुत्री, कोई अनुपम वर माँगो; आज मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार दूँगा।’

  19. चौपाई 18

    तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी। कष्ट उठायहु अति सुकुमारी॥

    ‘तुमने अलौकिक और कठोर तप किया है; अत्यंत सुकुमार होकर भी बहुत कष्ट उठाया है।’

  20. चौपाई 19

    अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों। है सौगंध नहीं छल तोसों॥

    ‘अब संदेह छोड़कर मुझसे कुछ माँगो; मैं शपथ लेकर कहता हूँ, तुमसे कोई छल नहीं।’

  21. चौपाई 20

    करत वेद विद ब्रह्मा जानहु। वचन मोर यह सांचा मानहु॥

    ‘मुझे वेदों को रचने और जानने वाला ब्रह्मा समझो; मेरी इस बात को सच मानो।’

  22. चौपाई 21

    तजि संकोच कहहु निज इच्छा। देहौं मैं मनमानी भिक्षा॥

    ‘संकोच छोड़कर अपनी इच्छा कहो; मैं तुम्हें मनचाहा दान दूँगा।’

  23. चौपाई 22

    सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी। मुख सों कछु मुसुकाय भवानी॥

    ब्रह्मा की मधुर वाणी सुनकर भवानी थोड़ा मुस्कराईं।

  24. चौपाई 23

    बोली तुम का कहहु विधाता। तुम तो जगके स्रष्टाधाता॥

    वे बोलीं, ‘हे विधाता, आप क्या कहते हैं? आप तो जगत के रचयिता और धारण करने वाले हैं।’

  25. चौपाई 24

    मम कामना गुप्त नहिं तोंसों। कहवावा चाहहु का मोसों॥

    ‘मेरी कामना आपसे छिपी नहीं है; फिर मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं?’

  26. चौपाई 25

    दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा। शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥

    ‘दक्ष के यज्ञ में देह त्यागते समय मेरी यही चाह थी कि शंभुनाथ फिर मेरे हों।’

  27. चौपाई 26

    सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये। कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥

    ‘वही मनचाहे पति अब मुझे मिलें।’ ब्रह्मा ‘तथास्तु’ कहकर अपने धाम चले गए।

  28. चौपाई 27

    तब गिरिजा शंकर तव भयऊ। फल कामना संशयो गयऊ॥

    हे गिरिजा, तब शंकर आपके हो गए; आपकी कामना फलित हुई और संशय मिट गया।

  29. चौपाई 28

    चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा। तब आनन महँ करत निवासा॥

    करोड़ों चंद्रमाओं और करोड़ों सूर्यों का प्रकाश आपके मुख में निवास करता है।

  30. चौपाई 29

    माला पुस्तक अंकुश सोहै। कर मँह अपर पाश मन मोहै॥

    आपके हाथों में माला, पुस्तक और अंकुश शोभित हैं, और दूसरे हाथ का पाश मन मोह लेता है।

  31. चौपाई 30

    अन्नपूर्णे! सदापूर्णे। अज-अनवद्य अनंत पूर्णे॥

    हे अन्नपूर्णा! हे सदा परिपूर्ण! आप अजन्मा, निर्दोष, अनंत और पूर्ण हैं।

  32. चौपाई 31

    कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ। भव-विभूति आनंद भरी माँ॥

    हे माँ, आप कृपा की सागर हैं और कल्याण करने वाली हैं; आप संसार के वैभव और आनंद से भरी हैं।

  33. चौपाई 32

    कमल बिलोचन विलसित भाले। देवि कालिके! चण्डि कराले॥

    कमल जैसे नेत्रों और दीप्त माथे वाली! हे देवी कालिका! हे चण्डी! हे कराली!

  34. चौपाई 33

    तुम कैलास मांहि ह्वै गिरिजा। विलसी आनंद साथ सिंधुजा॥

    कैलास पर आप गिरिजा होकर रहती हैं, और सिंधुजा (समुद्र से जन्मी लक्ष्मी) बनकर आनंद से शोभित होती हैं।

  35. चौपाई 34

    स्वर्ग-महालछमी कहलायी। मर्त्य-लोक लछमी पदपायी॥

    स्वर्ग में आप महालक्ष्मी कहलाईं, और मृत्युलोक में लक्ष्मी का पद पाया।

  36. चौपाई 35

    विलसी सब मँह सर्व सरूपा। सेवत तोहिं अमर पुर-भूपा॥

    आप सबमें, सब रूपों में विराजती हैं; देवलोक के राजा (इंद्र) आपकी सेवा करते हैं।

  37. चौपाई 36

    जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा। फल पाइहहिं शुभ साखी ईसा॥

    चालीसा कहती है कि जो आपकी यह चालीसा पढ़ेंगे, वे शुभ फल पाएँगे; ईश (शिव) इसके साक्षी हैं।

  38. चौपाई 37

    प्रात समय जो जन मन लायो। पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अधिकायो॥

    जो लोग सुबह के समय मन लगाकर, भक्ति और बढ़ती हुई रुचि के साथ इसे पढ़ेंगे,

  39. चौपाई 38

    स्त्री-कलत्र पति मित्र-पुत्र युत। परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥

    वे पत्नी या पति, मित्रों और पुत्रों के साथ अद्भुत परम ऐश्वर्य पाएँगे, ऐसा चालीसा कहती है।

  40. चौपाई 39

    राज विमुख को राज दिवावै। जस तेरो जन-सुजस बढ़ावै॥

    चालीसा के अनुसार आपका यश राज से वंचित व्यक्ति को राज दिलाता है और लोगों में उसका सुयश बढ़ाता है।

  41. चौपाई 40

    पाठ महा मुद मंगल दाता। भक्त मनोवांछित निधि पाता॥

    यह पाठ बड़ा आनंद और मंगल देने वाला है; चालीसा कहती है कि भक्त मनचाही निधि पाता है।

  42. समापन दोहा

    जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावैंगे माथ। तिनके कारज सिद्ध सब साखी काशीनाथ॥

    चालीसा कहती है कि जो इस सुंदर चालीसा को पढ़कर माथा नवाएँगे, उनके सब काम सिद्ध होंगे; काशीनाथ (शिव) इसके साक्षी हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/annapurna-chalisa/

संक्षेप में

अन्नपूर्णा चालीसा काशी की अधीश्वरी, अन्न देने वाली देवी अन्नपूर्णा की स्तुति है, जो ‘विश्वेश्वर-पदपद्म की रज’ दोहे से शुरू होती है। इसमें सती के देह-त्याग, गिरिजा के रूप में जन्म, कठोर तप और ब्रह्मा से वर पाकर शिव को फिर पाने की कथा है। परंपरा में इसका पाठ मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मनाई जाने वाली अन्नपूर्णा जयंती पर विशेष रूप से होता है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

यहाँ नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली की पुस्तिका ‘अन्नपूर्णा चालीसा एवं स्तोत्र’ (2004, पृष्ठ 3 से 17) का पाठ लिया गया है, और रणधीर प्रकाशन के ‘51 चालीसा संग्रह’ (पृष्ठ 241 से 244) से शब्दशः मिलाया गया है। दोनों पुस्तकों का पाठ एक ही है; रणधीर प्रकाशन में कई छपाई की भूलें हैं, जैसे ‘पदिदेवता’, ‘इज्ञ यज्ञ’ (दक्ष यज्ञ) और ‘स्त्री-कलत्र पनि’, और ड्रिक पंचांग पर यही भूलें दोहराई गई हैं। पाठभेद (रणधीर प्रकाशन): चौपाई 1 में ‘अनंद’, 8 में ‘जाते’, 11 में ‘गाय’, 14 में ‘तव’, 18 में ‘उठायेहु’, 20 में ‘सांचो’, 30 में ‘सदपूर्णे … अनंत अपूर्णे’, 31 में ‘कृपा सगरी’, 32 में ‘विलसित बाले’ और अंतिम दोहे में ‘नावहिंगे’। दोनों पुस्तकें ‘कीन्ह’ और ‘कीन्ही’ को ‘कीह्न’ और ‘कीह्नी’ छापती हैं। चौपाई 28 का ‘तब’ यहाँ ‘तव’ (आपका) के अर्थ में है। चालीसा की पहली चौपाइयाँ परंपरा से आदि शंकराचार्य की मानी जाने वाली अन्नपूर्णा स्तोत्र की पहली पंक्ति ‘नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी’ से मिलती हैं, और उसमें भी देवी को ‘काशीपुराधीश्वरी’ कहा गया है। चालीसा में किसी कवि का नाम नहीं आता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अन्नपूर्णा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें आरंभ में एक दोहा, 40 चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है।

अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में अन्नपूर्णा जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। ड्रिक पंचांग के अनुसार अन्नपूर्णा जयंती मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है, और देवी का मुख्य मंदिर वाराणसी में है।

चालीसा में कौन सी कथा है?

चौपाई 6 से 27 में कथा है: दक्ष के यज्ञ में सती का योगाग्नि से देह-त्याग, हिमालय के घर गिरिजा के रूप में जन्म, नारद का उनके निश्चय की परीक्षा लेना, कठोर तप, ब्रह्मा का वर देना और गिरिजा का फिर शिव को पाना। इस तरह चालीसा अन्नपूर्णा को पार्वती का ही रूप मानती है।

अन्नपूर्णा स्तोत्र से इस चालीसा का क्या संबंध है?

दोनों अलग रचनाएँ हैं। संस्कृत का अन्नपूर्णा स्तोत्र परंपरा से आदि शंकराचार्य का माना जाता है और ‘नित्यानन्दकरी वराभयकरी’ से शुरू होता है। चालीसा की पहली चौपाइयाँ (नित्य आनंद, वर-अभय, सौंदर्य-सिंधु, काशी पुराधीश्वरी, माहेश्वरी) उसी स्तोत्र के शब्दों से मिलती हैं।

स्रोत

  1. नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली: ‘अन्नपूर्णा चालीसा एवं स्तोत्र’ (2004), पृष्ठ 3 से 17
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृष्ठ 241 से 244
  3. अन्नपूर्णा स्तोत्र (परंपरा अनुसार आदि शंकराचार्य): sanskritdocuments.org
  4. अन्नपूर्णा जयंती: ड्रिक पंचांग

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