चालीसाशिव

शिव चालीसा

रचना: अयोध्यादास (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: सोमवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

    हे गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश, आपकी जय हो। आप सब मंगलों के मूल और परम ज्ञानी हैं। अयोध्यादास विनती करते हैं: मुझे निर्भय होने का वरदान दीजिए।

  2. चौपाई 1

    जय गिरिजापति दीनदयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

    गिरिजा के स्वामी, दीनों पर दया करने वाले शिव, आपकी जय हो। आप सदा संतों की रक्षा और पालन करते हैं।

  3. चौपाई 2

    भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

    आपके माथे पर चंद्रमा सुंदर शोभा दे रहा है, और कानों में नाग के फन के कुंडल हैं।

  4. चौपाई 3

    अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥

    आपका शरीर गोरा है और सिर से गंगा बह रही है। गले में मुंडों की माला है और शरीर पर भस्म (छार) लगी है।

  5. चौपाई 4

    वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

    बाघ की खाल का वस्त्र आप पर शोभा देता है। आपकी छवि देखकर नागों का मन भी मोहित हो जाता है।

  6. चौपाई 5

    मैना मातु की ह्वै दुलारी। वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

    माता मैना की लाडली बेटी (पार्वती) आपके बाएँ अंग में विराजती हैं, और उनकी छवि अनोखी है।

  7. चौपाई 6

    कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

    आपके हाथ में त्रिशूल बड़ी शोभा देता है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।

  8. चौपाई 7

    नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

    वहाँ नंदी और गणेश ऐसे शोभा देते हैं, जैसे सागर के बीच कमल खिले हों।

  9. चौपाई 8

    कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

    साथ में कार्तिकेय और गणों के राजा भी हैं। इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

  10. चौपाई 9

    देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहीं दुख प्रभु आप निवारा॥

    जब भी देवताओं ने आपके पास जाकर पुकार की, हे प्रभु, आपने तभी उनका दुख दूर किया।

  11. चौपाई 10

    किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

    जब तारकासुर ने भारी उपद्रव किया, तो सब देवताओं ने मिलकर आपसे प्रार्थना की।

  12. चौपाई 11

    तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महँ मारि गिरायउ॥

    आपने तुरंत छह मुख वाले कार्तिकेय (षडानन) को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही उसे मार गिराया।

  13. चौपाई 12

    आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

    आपने जलंधर नाम के असुर का संहार किया। आपका सुयश सारा संसार जानता है।

  14. चौपाई 13

    त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

    आपने त्रिपुरासुर से युद्ध किया और कृपा करके सबको बचा लिया।

  15. चौपाई 14

    किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

    भगीरथ ने भारी तप किया, तो हे पुरारि (त्रिपुर के शत्रु), आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की। यह गंगा को धरती पर लाने का प्रसंग है, जब शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया।

  16. चौपाई 15

    दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

    दानियों में आपके समान कोई नहीं है। आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।

  17. चौपाई 16

    वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

    वेदों ने आपके नाम की महिमा गाई है, पर आप अकथनीय और अनादि हैं; वे भी आपका रहस्य नहीं पा सके।

  18. चौपाई 17

    प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

    समुद्र मंथन में (विष की) ज्वाला प्रकट हुई, जिसकी जलन से देवता और असुर दोनों व्याकुल हो गए।

  19. चौपाई 18

    कीन्ही दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

    तब आपने दया करके उनकी सहायता की (विष पी लिया), और तभी से आप नीलकंठ कहलाए।

  20. चौपाई 19

    पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

    जब श्री रामचंद्र ने आपकी पूजा की, तो उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।

  21. चौपाई 20

    सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

    जब राम हज़ार कमलों से पूजा कर रहे थे, तब पुरारि शिव ने उनकी परीक्षा ली।

  22. चौपाई 21

    एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

    प्रभु ने एक कमल छिपा लिया। तब कमल जैसे नेत्रों वाले राम ने उसकी जगह अपने नेत्र से पूजा करनी चाही।

  23. चौपाई 22

    कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

    ऐसी कठिन भक्ति देखकर प्रभु शंकर प्रसन्न हुए और मनचाहा वर दिया।

  24. चौपाई 23

    जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

    हे अनंत, अविनाशी शिव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।

  25. चौपाई 24

    दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

    सारे दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं। मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।

  26. चौपाई 25

    त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

    हे नाथ, मैं ‘बचाओ, बचाओ’ पुकार रहा हूँ। इसी समय आकर मुझे उबार लीजिए।

  27. चौपाई 26

    लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

    त्रिशूल लेकर शत्रुओं को मारिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।

  28. चौपाई 27

    मात-पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

    माता-पिता, भाई, सब कोई हैं, पर संकट में कोई हाल नहीं पूछता।

  29. चौपाई 28

    स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

    हे स्वामी, मुझे बस आपकी ही आशा है। आकर मेरे भारी संकट को हर लीजिए।

  30. चौपाई 29

    धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

    आप निर्धन को सदा धन देते हैं। जो कोई आपसे माँगता है, वह फल पाता है।

  31. चौपाई 30

    अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

    मैं किस तरह आपकी स्तुति करूँ? हे नाथ, मेरी भूलों को क्षमा कीजिए।

  32. चौपाई 31

    शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

    हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल करने वाले और विघ्नों को मिटाने वाले हैं।

  33. चौपाई 32

    योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

    योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं। शारदा (सरस्वती) और नारद आपको सिर झुकाते हैं।

  34. चौपाई 33

    नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

    आपको बार-बार नमस्कार है, आपकी जय हो, ‘नमः शिवाय’। ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।

  35. चौपाई 34

    जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत हैं शम्भु सहाई॥

    चालीसा कहती है कि जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, शम्भु उसकी सहायता करते हैं।

  36. चौपाई 35

    ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

    चालीसा के अनुसार कर्ज़ से दबा कोई व्यक्ति भी इसका पाठ करे, तो वह पवित्र (भार से मुक्त) हो जाता है।

  37. चौपाई 36

    पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

    चालीसा कहती है कि जिसे पुत्र नहीं है और वह पुत्र की इच्छा रखता है, उस पर निश्चय ही शिव का प्रसाद (कृपा) होता है।

  38. चौपाई 37

    पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

    त्रयोदशी के दिन पंडित को बुलाकर ध्यान और श्रद्धा से हवन कराए।

  39. चौपाई 38

    त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। तन नहिं ताके रहै कलेशा॥

    चालीसा कहती है कि जो सदा त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।

  40. चौपाई 39

    धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

    धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) चढ़ाकर शंकर के सामने इसका पाठ करे।

  41. चौपाई 40

    जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

    चालीसा के अनुसार ऐसा करने वाला जन्म-जन्म के पापों को नष्ट करता है और अंत में शिवलोक में स्थान पाता है।

  42. समापन चौपाई

    कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

    अयोध्यादास कहते हैं: मुझे आपकी ही आशा है। यह जानकर मेरे सारे दुख हर लीजिए।

  43. समापन दोहा 1

    नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीस। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

    मैं नियम से रोज़ सुबह इस चालीसा का पाठ करता हूँ। हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।

  44. समापन दोहा 2

    मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

    जानिए कि हेमंत ऋतु में मगसर (मार्गशीर्ष) की छठ को, संवत ‘चौंसठ’ में, शिव की यह स्तुति-चालीसा सबके कल्याण के लिए पूरी की गई। (शताब्दी नहीं दी गई है, इसलिए वर्ष तय नहीं होता।)

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shiv-chalisa/

संक्षेप में

शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति है, जो ‘जय गिरिजापति दीनदयाला’ से शुरू होती है। इसमें आरंभ का एक दोहा, चालीस चौपाइयाँ, कवि के नाम वाली एक समापन चौपाई और अंत में दो दोहे हैं। कवि का नाम अयोध्यादास दोहे और समापन चौपाई में आता है। परंपरा में सोमवार, सावन के महीने, प्रदोष और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

यहाँ अयोध्यादास की वह शिव चालीसा दी गई है जो सबसे अधिक गाई जाती है। पाठ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की छपी पुस्तक ‘51 चालीसा संग्रह’ और नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ की पुरानी पुस्तिका ‘शिवस्तुति चालीसा’ के स्कैन तथा चार वेबसाइटों से शब्द-शब्द मिलाया गया है; जहाँ स्रोत बँटे हैं, वहाँ अधिकतर स्रोतों का पाठ और बराबरी पर छपी पुस्तक का पाठ लिया गया है। गीता प्रेस की ‘श्रीशिवचालीसा’ (पुस्तक कोड 228) एक अलग रचना है, जो ‘अज अनादि अविगत अलख’ और ‘जय शिव शंकर औढरदानी’ से शुरू होती है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 3 में कई स्रोत ‘क्षार’ पढ़ते हैं (छपी पुस्तकों में ‘छार’; दोनों का अर्थ भस्म है); चौपाई 4 में रणधीर प्रकाशन ‘नाग मुनि मोहे’ पढ़ता है; चौपाई 5 का ‘ह्वै’ (होकर) अधिकतर स्रोतों में ‘हवे’ छपा है; चौपाई 13 में एक स्रोत ‘तबहिं कृपा’ पढ़ता है; चौपाई 16 में कई स्रोत ‘वेद माहि महिमा तुम गाई’ पढ़ते हैं; चौपाई 27 में कुछ स्रोत ‘सब होई’ पढ़ते हैं; चौपाई 32 में रणधीर प्रकाशन ‘नारद शारद’ पढ़ता है; चौपाई 36 में ‘पुत्र हीन’ की जगह ‘पुत्र होन (होने) की इच्छा’ भी मिलता है; चौपाई 38 में एक स्रोत ‘ताके तन नहीं रहै कलेशा’ पढ़ता है; चौपाई 40 में रणधीर प्रकाशन ‘अन्त वास’ पढ़ता है। पहले समापन दोहे में कुछ स्रोत ‘नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा’ पढ़ते हैं; ‘चालीस’ पाठ छपी पुस्तकों का है और ‘जगदीश’ से तुक मिलाता है। दूसरा समापन दोहा (‘मगसर छठि…’) कुछ स्रोतों में नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव चालीसा किसने लिखी?

आरंभ के दोहे (‘कहत अयोध्यादास तुम’) और समापन चौपाई (‘कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी’) में कवि का नाम अयोध्यादास आता है, और परंपरा इसे उन्हीं की रचना मानती है। उनके स्थान या समय के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। अंतिम दोहा रचना को मगसर की छठ, ‘संवत चौसठ’ में पूरा बताता है, पर शताब्दी नहीं देता।

शिव चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में सोमवार, सावन का महीना, प्रदोष (त्रयोदशी) और महाशिवरात्रि इसके लिए विशेष माने जाते हैं। चालीसा की चौपाई 37 और 38 में स्वयं त्रयोदशी के व्रत और हवन का उल्लेख है।

चालीसा में शिव की किन कथाओं का उल्लेख है?

कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध (शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड), जलंधर और त्रिपुरासुर का संहार (रुद्र संहिता, युद्ध खंड), भगीरथ के तप से गंगा का शिव की जटाओं में आना (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 42 और 43), समुद्र मंथन का विष पीकर नीलकंठ कहलाना (भागवत पुराण 8.7), और राम द्वारा हज़ार कमलों से शिव की पूजा, जो चालीसा अपने शब्दों में बताती है।

क्या शिव चालीसा के एक से अधिक पाठ हैं?

हाँ। गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तिका ‘श्रीशिवचालीसा’ (कोड 228) में एक अलग चालीसा है, जो ‘जय शिव शंकर औढरदानी’ से शुरू होती है। घरों और मंदिरों में जो चालीसा सबसे अधिक गाई जाती है, वह अयोध्यादास की ‘जय गिरिजापति दीनदयाला’ वाली है, जो इस पेज पर है। इसके भी कुछ शब्द स्रोतों में अलग मिलते हैं; वे ऊपर टिप्पणी में दिए गए हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ (अयोध्यादास)
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 17 से 20
  3. नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ: ‘शिवस्तुति चालीसा’ (पुरानी पुस्तिका, स्कैन आंशिक रूप से पढ़ने योग्य)
  4. गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीशिवचालीसा’ (पुस्तक कोड 228), जिसमें अलग पाठ है
  5. कथाएँ: शिव पुराण, रुद्र संहिता (कुमार खंड और युद्ध खंड); वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 42 और 43; भागवत पुराण 8.7

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