स्तुतिशिव

शिव तांडव स्तोत्र

रचना: रावण (परंपरा अनुसार)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
पत्थर के मंदिर में बेलपत्र और धतूरे से सजे शिवलिंग की आरती, सामने नंदी
चित्र: AI से बनाया गया

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  1. श्लोक 1

    जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥

    Jatatavigalajjalapravahapavitasthale Galevalambya Lambitam Bhujangatungamalikam | Damaddamaddamaddamanninadavaddamarvayam Chakara Chandatandavam Tanotu Nah Shivah Shivam || 1 ||

    जटाओं के वन से बहती गंगा की धारा से जिनका कंठ-स्थल पवित्र हुआ है, उस कंठ में बड़े-बड़े सर्पों की लंबी माला लटकाकर, और “डमड्-डमड्” नाद करते डमरू के साथ जिन्होंने प्रचण्ड ताण्डव किया, वे शिव हमारा कल्याण बढ़ाएँ।

  2. श्लोक 2

    जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

    Jatakatahasambhramabhramannilimpanirjhari- Vilolavichivallarivirajamanamurddhani | Dhagaddhagaddhagajjvalallalatapattapavake Kishorachandrashekhare Ratih Pratikshanam Mama || 2 ||

    जिनका सिर जटाओं के कड़ाह में वेग से घूमती देव-नदी गंगा की चंचल लहरों की लताओं से शोभित है, जिनके माथे पर अग्नि “धगद्-धगद्” जल रही है, और जिनके मस्तक पर बाल चन्द्रमा है, उन शिव में हर क्षण मेरा प्रेम बना रहे।

  3. श्लोक 3

    धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥

    Dharadharendranandinivilasabandhubandhuras- Phuraddigantasantatipramodamanamanase | Kripakatakshadhoraniniruddhadurdharapadi Kvachiddigambare Mano Vinodametu Vastuni || 3 ||

    जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती की लीलाओं के सुंदर साथी हैं, जिनका मन चमकती दिशाओं के विस्तार से आनन्दित रहता है, और जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा कठिन से कठिन विपत्ति को रोक देती है, उस दिगम्बर (दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं) परम तत्त्व में मेरा मन कभी आनन्द पाए।

  4. श्लोक 4

    जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥

    Jatabhujangapingalasphuratphanamaniprabha- Kadambakunkumadravapraliptadigvadhumukhe | Madandhasindhurasphurattvaguttariyamedure Mano Vinodamadbhutam Bibhartu Bhutabhartari || 4 ||

    जटाओं में लिपटे सर्पों के फनों की मणियों की पीली-लाल चमक दिशा-रूपी स्त्रियों के मुखों पर जैसे केसर का लेप कर रही है; मतवाले हाथी की चमकती खाल का उत्तरीय (चादर) ओढ़े हुए उन भूतों के स्वामी शिव में मेरा मन अद्भुत आनन्द पाए।

  5. श्लोक 5

    सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥

    Sahasralochanaprabhrityasheshalekhashekharap- Rasunadhulidhoranividhusaranghripithabhuh | Bhujangarajamalaya Nibaddhajatajutakah Shriyai Chiraya Jayatam Chakorabandhushekharah || 5 ||

    इन्द्र (सहस्रलोचन) आदि सारे देवताओं के प्रणाम करते समय उनके मुकुटों के फूलों की धूल से जिनकी चरण-पीठ धूसर हो गई है, जिनका जटाजूट नागराज की माला से बँधा है, वे चन्द्रशेखर (चकोर के मित्र चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले) शिव हमें चिरस्थायी समृद्धि दें।

  6. श्लोक 6

    ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥६॥

    Lalatachatvarajvaladdhananjayasphulingabha- Nipitapanchasayakam Namannilimpanayakam | Sudhamayukhalekhaya Virajamanashekharam Mahakapali Sampade Shiro Jatalamastu Nah || 6 ||

    जिस मस्तक ने माथे की वेदी पर जलती अग्नि की चिंगारियों के तेज से पाँच बाणों वाले कामदेव को निगल लिया (भस्म कर दिया), जिसे देवताओं के राजा इन्द्र प्रणाम करते हैं, और जो चन्द्रमा की कला से शोभित है, शिव का वह विशाल ललाट वाला, जटाओं वाला सिर हमें समृद्धि दे।

  7. श्लोक 7

    करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥

    Karalabhalapattikadhagaddhagaddhagajjvalad- Dhananjayahutikritaprachandapanchasayake | Dharadharendranandinikuchagrachitrapatrakap- Rakalpanaikashilpini Trilochane Ratirmama || 7 ||

    जिन्होंने अपने भयंकर माथे पर “धगद्-धगद्” जलती अग्नि में प्रचण्ड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के वक्ष पर शृंगार की पत्र-रचना बनाने वाले एकमात्र कलाकार हैं, उन त्रिनेत्र शिव में मेरा प्रेम हो।

  8. श्लोक 8

    नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर- त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥

    Navinameghamandaliniruddhadurdharasphurat- Kuhunishithinitamahprabandhabaddhakandharah | Nilimpanirjharidharastanotu Krittisindhurah Kalanidhanabandhurah Shriyam Jagaddhurandharah || 8 ||

    जिनका कंठ नए मेघों की घटा से घिरी अमावस्या की आधी रात के घने अंधकार जैसा काला है, जो देव-नदी गंगा को धारण करते हैं, हाथी की खाल ओढ़ते हैं, चन्द्रमा से सुंदर लगते हैं और जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमारी समृद्धि बढ़ाएँ।

  9. श्लोक 9

    प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥

    Praphullanilapankajaprapanchakalimaprabha- Valambikanthakandaliruchiprabaddhakandharam | Smarachchhidam Purachchhidam Bhavachchhidam Makhachchhidam Gajachchhidandhakachchhidam Tamantakachchhidam Bhaje || 9 ||

    जिनकी गर्दन खिले हुए नील कमलों के समूह जैसी श्याम आभा से बँधी है, और जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन (भव), दक्ष के यज्ञ, गज (असुर), अन्धकासुर और यम (अन्तक) का भी उच्छेद किया, उन शिव को मैं भजता हूँ।

  10. श्लोक 10

    अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥

    Akharvasarvamangalakalakadambamanjari- Rasapravahamadhurivijrimbhanamadhuvratam | Smarantakam Purantakam Bhavantakam Makhantakam Gajantakandhakantakam Tamantakantakam Bhaje || 10 ||

    जो सर्वमंगला (पार्वती) की कलाओं की कदम्ब-मंजरी के रस-प्रवाह की बढ़ती मधुरता का पान करने वाले भौंरे हैं, और जो काम, त्रिपुर, भव, यज्ञ, गज, अन्धक और यम का भी अन्त करने वाले हैं, उन शिव को मैं भजता हूँ।

  11. श्लोक 11

    जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥

    Jayatvadabhravibhramabhramadbhujangamashvasad- Vinirgamatkramasphuratkaralabhalahavyavat | Dhimiddhimiddhimiddhvananmridangatungamangaladh- Vanikramapravartitaprachandatandavah Shivah || 11 ||

    उन शिव की जय हो, जिनके माथे की भयंकर अग्नि बड़े वेग से घूमते सर्पों की फुफकार से क्रम से भड़कती है, और जिनका प्रचण्ड ताण्डव “धिमिद्-धिमिद्” बजते मृदंग की ऊँची, मंगलमय ध्वनि के ताल पर चल रहा है।

  12. श्लोक 12

    दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥

    Drishadvichitratalpayorbhujangamauktikasrajor- Garishtharatnaloshthayoh Suhridvipakshapakshayoh | Trinaravindachakshushoh Prajamahimahendrayoh Samapravrittikah Kada Sadashivam Bhajamyaham || 12 ||

    पत्थर और सुंदर बिछौने में, साँप और मोतियों की माला में, कीमती रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु पक्ष में, तिनके और कमल-नयनी सुंदरी में, प्रजा और पृथ्वी के महाराजा में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा?

  13. श्लोक 13

    कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥

    Kada Nilimpanirjharinikunjakotare Vasan Vimuktadurmatih Sada Shirahsthamanjalim Vahan | Vilolalolalochano Lalamabhalalagnakah Shiveti Mantramuchcharan Kada Sukhi Bhavamyaham || 13 ||

    गंगा के किनारे किसी कुंज की कोटर में रहता हुआ, बुरे विचारों से मुक्त होकर, सदा सिर पर हाथ जोड़े, चंचल-नम आँखों से, सुंदर ललाट वाले शिव में मन लगाए, “शिव” मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा?

  14. श्लोक 14 (फलश्रुति)

    इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१४॥

    Imam Hi Nityamevamuktamuttamottamam Stavam Pathansmaranbruvannaro Vishuddhimeti Santatam | Hare Gurau Subhaktimashu Yati Nanyatha Gatim Vimohanam Hi Dehinam Sushankarasya Chintanam || 14 ||

    स्तोत्र कहता है: जो मनुष्य इस प्रकार कहे गए इस उत्तम से उत्तम स्तव को नित्य पढ़ता, याद करता और बोलता है, वह सदा शुद्ध होता जाता है और गुरु हर (शिव) में शीघ्र अच्छी भक्ति पाता है; उसकी कोई दूसरी गति नहीं होती, क्योंकि शंकर का चिन्तन देहधारियों का मोह दूर करता है।

  15. श्लोक 15 (फलश्रुति)

    पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥१५॥

    Pujavasanasamaye Dashavaktragitam Yah Shambhupujanaparam Pathati Pradoshe | Tasya Sthiram Rathagajendraturangayuktam Lakshmim Sadaiva Sumukhim Pradadati Shambhuh || 15 ||

    स्तोत्र के अनुसार, जो प्रदोष के समय शिव-पूजा के अंत में दशमुख (रावण) के गाए इस, शम्भु की पूजा को समर्पित स्तोत्र का पाठ करता है, शम्भु उसे रथों, श्रेष्ठ हाथियों और घोड़ों से भरी स्थिर, सदा प्रसन्न लक्ष्मी (समृद्धि) देते हैं।

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shiv-tandav-stotram/

संक्षेप में

शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के ताण्डव नृत्य और उनके रूप का वर्णन करने वाली संस्कृत स्तुति है। परंपरा इसे लंका के राजा रावण की रचना मानती है; गीता प्रेस की पुष्पिका ‘श्रीरावणकृतं’ कहती है और श्लोक 15 इसे ‘दशवक्त्रगीतं’, यानी दस मुख वाले (रावण) का गाया, बताता है। ‘डमड्डमड्’ और ‘धिमिद्धिमिद्’ जैसे ध्वनि-शब्द इसकी पहचान हैं। गीता प्रेस के पाठ में 15 श्लोक हैं, अंतिम दो फलश्रुति।

पाठ के बारे में: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की ‘स्तोत्ररत्नावली’ (शिवस्तोत्राणि, क्रमांक 14, पृष्ठ 41–45) के पन्नों से शब्द-शब्द पढ़ा गया और sanskritdocuments.org के पाठ (गिरीश बीहारी, सुशील डी. शर्मा) से मिलाया गया; गीता प्रेस की ‘शिवस्तोत्ररत्नाकर’ में भी यही पाठ है। अंतर केवल वर्तनी और संधि लिखने के ढंग का है (श्लोक 9 में ‘प्रभा-ऽवलम्बि’)। sanskritdocuments का ‘विस्तृत पाठ’ 17 श्लोकों का है: उसमें श्लोक 13 के बाद दो श्लोक और हैं (‘निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका…’ और ‘प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी…’), जो गीता प्रेस के पाठ में नहीं हैं। उसमें दर्ज पाठभेद: श्लोक 3 में ‘क्वचिच्चिदम्बरे’, 4 में ‘मदान्धसिन्धुरासुर’, 6 में ‘स्फुलिङ्गया निपीत’ और ‘महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः’, 10 में ‘अगर्व’, 11 में ‘जयत्यद’ और ‘धिमिं धिमिं धिमिं ध्वनन्’, 12 में ‘समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे’, 13 में ‘विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं’, और अंतिम श्लोक में ‘लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुः’। रचयिता: गीता प्रेस की पुष्पिका ‘इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्’ है और श्लोक 15 ‘दशवक्त्रगीतं’ कहता है; रावण की रचना होना परंपरा की मान्यता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा?

परंपरा इसे रावण की रचना मानती है। गीता प्रेस की पुष्पिका ‘श्रीरावणकृतं’ कहती है, और स्तोत्र का श्लोक 15 स्वयं इसे ‘दशवक्त्रगीतं’ यानी दस मुख वाले (रावण) का गाया बताता है।

शिव तांडव स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

गीता प्रेस की स्तोत्ररत्नावली में 15 श्लोक हैं, जिनमें अंतिम दो फलश्रुति हैं। कुछ पाठों में श्लोक 13 के बाद दो श्लोक और मिलते हैं, जिससे कुल 17 हो जाते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ कब करें?

स्तोत्र का श्लोक 15 प्रदोष के समय शिव-पूजा के अंत में पाठ की बात कहता है। परंपरा में सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर भी इसे पढ़ा जाता है।

“डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं” का क्या अर्थ है?

यह डमरू की ध्वनि का वर्णन है: “डमड्-डमड्” का नाद करता हुआ डमरू। पूरी पंक्ति कहती है कि ऐसे डमरू के साथ शिव ने प्रचण्ड ताण्डव किया।

स्रोत

  1. स्तोत्ररत्नावली, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘शिवताण्डवस्तोत्रम् (श्रीरावणकृतम्)’, क्रमांक 14
  2. शिवस्तोत्ररत्नाकर, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘शिवताण्डवस्तोत्रम्’
  3. sanskritdocuments.org: शिवताण्डवस्तोत्रम् (गिरीश बीहारी, सुशील डी. शर्मा; 17 श्लोकों का विस्तृत पाठ)

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