जिनके गले में नागराज का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग (लेप) है, जो महेश्वर हैं, नित्य और शुद्ध हैं, और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं (दिगम्बर), उन “न” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।
जिनकी पूजा मंदाकिनी (गंगा) के जल और चन्दन से हुई है, जो नंदीश्वर और प्रमथ गणों के स्वामी महेश्वर हैं, और मंदार तथा अनेक फूलों से जिनकी सुंदर पूजा हुई है, उन “म” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।
श्लोक 3 (शि)
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥३॥
जो कल्याण-स्वरूप हैं, गौरी (पार्वती) के मुख-कमल को खिलाने वाले सूर्य जैसे हैं, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं, जिनका कंठ नीला है और जिनकी ध्वजा पर बैल (वृषभ) है, उन “शि” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।
जिनके मस्तक की पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य (कुम्भोद्भव, घड़े से जन्मे), गौतम जैसे श्रेष्ठ मुनियों और देवताओं ने की है, और चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं, उन “व” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।
जो यक्ष का रूप धारण करते हैं, जटाधारी हैं, हाथ में पिनाक धनुष लिए हैं, सनातन हैं, दिव्य हैं, देव हैं और दिगम्बर हैं, उन “य” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की छोटी संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। पंचाक्षर मंत्र “नमः शिवाय” के पाँच अक्षर हैं: न, म, शि, वा, य। स्तोत्र के पाँच श्लोक इन्हीं पाँच अक्षरों से शिव की वंदना करते हैं, और हर श्लोक “तस्मै … काराय नमः शिवाय” पर पूरा होता है। अंत में एक श्लोक फलश्रुति है। गीता प्रेस और sanskritdocuments.org, दोनों की पुष्पिका इसे शंकराचार्य-रचित कहती है।
पाठ के बारे में: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की ‘शिवस्तोत्ररत्नाकर’ (पृष्ठ 50–51), sanskritdocuments.org (panch.itx, आनंद हुदली) और वाणी विलास प्रेस, श्रीरंगम की ‘शंकराचार्य ग्रंथावली’ खंड 17 (1910, पृष्ठ 119–120) के पन्नों से शब्द-शब्द मिलाया गया, और जहाँ वे अलग थे, वहाँ दो का साझा पाठ लिया गया। वाणी विलास के पाठभेद: श्लोक 1 में ‘विलोचनाय’ (बाकी: ‘त्रिलोचनाय’), श्लोक 2 में ‘मन्दारमुख्यबहुपुष्प’ (बाकी: ‘मन्दारपुष्पबहुपुष्प’) और ‘मकारमहिताय’ (बाकी: ‘मकाराय’); sanskritdocuments.org भी इन दोनों को विकल्प के रूप में देता है। श्लोक 2 का पहला शब्द sanskritdocuments.org में ‘मन्दाकिनि’ है (गीता प्रेस और वाणी विलास: ‘मन्दाकिनी’)। फलश्रुति गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में है, वाणी विलास के खंड में नहीं। गीता प्रेस की पुष्पिका: ‘इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्’।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शिव पंचाक्षर स्तोत्र किसने लिखा?
परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। गीता प्रेस की पुष्पिका ‘श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं’ कहती है और वाणी विलास प्रेस ने इसे शंकराचार्य ग्रंथावली के स्तोत्र-खंड में छापा है।
“पंचाक्षर” का क्या अर्थ है?
पंचाक्षर यानी पाँच अक्षर: “नमः शिवाय” मंत्र के न, म, शि, वा, य। स्तोत्र का हर श्लोक इनमें से एक अक्षर से शुरू होता है और उसी अक्षर के रूप में शिव को नमस्कार करता है।
शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ कब करें?
फलश्रुति शिव के समीप, यानी शिवलिंग के सामने, पाठ की बात कहती है। परंपरा में सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर शिव-पूजा के समय इसे गाया जाता है।
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