स्तुतिशिव

शिव पंचाक्षर स्तोत्र

रचना: आदि शंकराचार्य (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: सोमवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
शिवलिंग के सामने पीतल की आरती में जलता कपूर
चित्र: AI से बनाया गया

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  1. श्लोक 1 (न)

    नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥१॥

    Nagendraharaya Trilochanaya Bhasmangaragaya Maheshvaraya | Nityaya Shuddhaya Digambaraya Tasmai Nakaraya Namah Shivaya || 1 ||

    जिनके गले में नागराज का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग (लेप) है, जो महेश्वर हैं, नित्य और शुद्ध हैं, और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं (दिगम्बर), उन “न” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।

  2. श्लोक 2 (म)

    मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय॥२॥

    Mandakinisalilachandanacharchitaya Nandishvarapramathanathamaheshvaraya | Mandarapushpabahupushpasupujitaya Tasmai Makaraya Namah Shivaya || 2 ||

    जिनकी पूजा मंदाकिनी (गंगा) के जल और चन्दन से हुई है, जो नंदीश्वर और प्रमथ गणों के स्वामी महेश्वर हैं, और मंदार तथा अनेक फूलों से जिनकी सुंदर पूजा हुई है, उन “म” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।

  3. श्लोक 3 (शि)

    शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥३॥

    Shivaya Gaurivadanabjavrindasuryaya Dakshadhvaranashakaya | Shrinilakanthaya Vrishadhvajaya Tasmai Shikaraya Namah Shivaya || 3 ||

    जो कल्याण-स्वरूप हैं, गौरी (पार्वती) के मुख-कमल को खिलाने वाले सूर्य जैसे हैं, दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं, जिनका कंठ नीला है और जिनकी ध्वजा पर बैल (वृषभ) है, उन “शि” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।

  4. श्लोक 4 (वा)

    वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय॥४॥

    Vasishthakumbhodbhavagautamaryamunindradevarchitashekharaya | Chandrarkavaishvanaralochanaya Tasmai Vakaraya Namah Shivaya || 4 ||

    जिनके मस्तक की पूजा वसिष्ठ, अगस्त्य (कुम्भोद्भव, घड़े से जन्मे), गौतम जैसे श्रेष्ठ मुनियों और देवताओं ने की है, और चन्द्रमा, सूर्य तथा अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं, उन “व” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।

  5. श्लोक 5 (य)

    यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय॥५॥

    Yakshasvarupaya Jatadharaya Pinakahastaya Sanatanaya | Divyaya Devaya Digambaraya Tasmai Yakaraya Namah Shivaya || 5 ||

    जो यक्ष का रूप धारण करते हैं, जटाधारी हैं, हाथ में पिनाक धनुष लिए हैं, सनातन हैं, दिव्य हैं, देव हैं और दिगम्बर हैं, उन “य” अक्षर रूप शिव को नमस्कार है।

  6. फलश्रुति

    पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

    Panchaksharamidam Punyam Yah Pathechchhivasannidhau | Shivalokamavapnoti Shivena Saha Modate ||

    स्तोत्र कहता है: जो शिव के समीप (शिवलिंग के सामने) इस पवित्र पंचाक्षर (स्तोत्र) का पाठ करता है, वह शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनंद करता है।

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shiv-panchakshar-stotram/

संक्षेप में

शिव पंचाक्षर स्तोत्र भगवान शिव की छोटी संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। पंचाक्षर मंत्र “नमः शिवाय” के पाँच अक्षर हैं: न, म, शि, वा, य। स्तोत्र के पाँच श्लोक इन्हीं पाँच अक्षरों से शिव की वंदना करते हैं, और हर श्लोक “तस्मै … काराय नमः शिवाय” पर पूरा होता है। अंत में एक श्लोक फलश्रुति है। गीता प्रेस और sanskritdocuments.org, दोनों की पुष्पिका इसे शंकराचार्य-रचित कहती है।

पाठ के बारे में: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की ‘शिवस्तोत्ररत्नाकर’ (पृष्ठ 50–51), sanskritdocuments.org (panch.itx, आनंद हुदली) और वाणी विलास प्रेस, श्रीरंगम की ‘शंकराचार्य ग्रंथावली’ खंड 17 (1910, पृष्ठ 119–120) के पन्नों से शब्द-शब्द मिलाया गया, और जहाँ वे अलग थे, वहाँ दो का साझा पाठ लिया गया। वाणी विलास के पाठभेद: श्लोक 1 में ‘विलोचनाय’ (बाकी: ‘त्रिलोचनाय’), श्लोक 2 में ‘मन्दारमुख्यबहुपुष्प’ (बाकी: ‘मन्दारपुष्पबहुपुष्प’) और ‘मकारमहिताय’ (बाकी: ‘मकाराय’); sanskritdocuments.org भी इन दोनों को विकल्प के रूप में देता है। श्लोक 2 का पहला शब्द sanskritdocuments.org में ‘मन्दाकिनि’ है (गीता प्रेस और वाणी विलास: ‘मन्दाकिनी’)। फलश्रुति गीता प्रेस और sanskritdocuments.org में है, वाणी विलास के खंड में नहीं। गीता प्रेस की पुष्पिका: ‘इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम्’।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव पंचाक्षर स्तोत्र किसने लिखा?

परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। गीता प्रेस की पुष्पिका ‘श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं’ कहती है और वाणी विलास प्रेस ने इसे शंकराचार्य ग्रंथावली के स्तोत्र-खंड में छापा है।

“पंचाक्षर” का क्या अर्थ है?

पंचाक्षर यानी पाँच अक्षर: “नमः शिवाय” मंत्र के न, म, शि, वा, य। स्तोत्र का हर श्लोक इनमें से एक अक्षर से शुरू होता है और उसी अक्षर के रूप में शिव को नमस्कार करता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ कब करें?

फलश्रुति शिव के समीप, यानी शिवलिंग के सामने, पाठ की बात कहती है। परंपरा में सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर शिव-पूजा के समय इसे गाया जाता है।

स्रोत

  1. शिवस्तोत्ररत्नाकर, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्’
  2. sanskritdocuments.org: शिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्तोत्रम् (panch.itx, आनंद हुदली)
  3. The Works of Sri Sankaracharya, खंड 17 (स्तोत्र, भाग 1), वाणी विलास प्रेस, श्रीरंगम, 1910: ‘शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्’

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