स्तुतिशिव

रुद्राष्टकम् (नमामीशमीशान)

रचना: गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
शिवलिंग के सामने पीतल की आरती में जलता कपूर
चित्र: AI से बनाया गया

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  1. छंद 1

    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥१॥

    Namamishamishana Nirvanarupam Vibhum Vyapakam Brahma Vedasvarupam | Nijam Nirgunam Nirvikalpam Niriham Chidakashamakashavasam Bhajeham || 1 ||

    हे ईशान (ईश्वर)! मैं आपको नमस्कार करता हूँ: आप मोक्ष-स्वरूप, सर्व-समर्थ, सब जगह व्याप्त, ब्रह्म और वेद-स्वरूप हैं। अपने आप में स्थित, गुणों से परे, भेद से रहित, इच्छा से रहित, चेतना के आकाश-रूप और आकाश को ही वस्त्र बनाए (दिगम्बर) आपको मैं भजता हूँ।

  2. छंद 2

    निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं। करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥२॥

    Nirakaramonkaramulam Turiyam Gira Gyana Gotitamisham Girisham | Karalam Mahakala Kalam Kripalam Gunagara Sansaraparam Natoham || 2 ||

    जो निराकार हैं, ओंकार के मूल हैं, तुरीय (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे चौथी अवस्था) हैं, वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे हैं, ईश्वर और कैलासपति (गिरीश) हैं; जो विकराल हैं, महाकाल के भी काल हैं, कृपालु हैं, गुणों के धाम हैं और संसार से परे हैं, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ।

  3. छंद 3

    तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥३॥

    Tusharadri Sankasha Gauram Gabhiram Manobhuta Koti Prabha Shri Shariram | Sphuranmauli Kallolini Charu Ganga Lasadbhalabalendu Kanthe Bhujanga || 3 ||

    जो हिमालय जैसे गोरे और गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों जैसी कांति और शोभा है, जिनके सिर पर लहराती सुंदर गंगा चमक रही है, और जिनके माथे पर बाल-चन्द्रमा तथा गले में सर्प शोभित हैं।

  4. छंद 4

    चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥

    Chalatkundalam Bhru Sunetram Vishalam Prasannananam Nilakantham Dayalam | Mrigadhishacharmambaram Mundamalam Priyam Shankaram Sarvanatham Bhajami || 4 ||

    जिनके कानों में कुंडल हिलते हैं, भौंहें सुंदर और नेत्र बड़े हैं, मुख प्रसन्न है, कंठ नीला है और जो दयालु हैं; जो मृगों के राजा (शब्दार्थ सिंह; परंपरा में प्रायः बाघ) की खाल पहनते और मुण्डों की माला धारण करते हैं, सबके प्रिय और सबके नाथ उन शंकर को मैं भजता हूँ।

  5. छंद 5

    प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं। त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥५॥

    Prachandam Prakrishtam Pragalbham Paresham Akhandam Ajam Bhanukotiprakasham | Trayah Shula Nirmulanam Shulapanim Bhajeham Bhavanipatim Bhavagamyam || 5 ||

    जो प्रचण्ड, सबसे श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों जैसे प्रकाश वाले हैं; जो तीनों प्रकार के शूल (परंपरागत अर्थ में दैहिक, दैविक और भौतिक दुःख) को जड़ से मिटाते हैं, हाथ में त्रिशूल रखते हैं और भाव (प्रेम) से ही पाए जाते हैं, उन भवानीपति को मैं भजता हूँ।

  6. छंद 6

    कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी। चिदानंद संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

    Kalatita Kalyana Kalpantakari Sada Sajjananandadata Purari | Chidananda Sandoha Mohapahari Prasida Prasida Prabho Manmathari || 6 ||

    हे प्रभो! आप कलाओं से परे, कल्याण-स्वरूप, कल्प का अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, चेतना और आनन्द के सागर, मोह को हरने वाले और कामदेव के शत्रु हैं; प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।

  7. छंद 7

    न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परे वा नराणां। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥७॥

    Na Yavad Umanatha Padaravindam Bhajantiha Loke Pare Va Naranam | Na Tavatsukham Shanti Santapanasham Prasida Prabho Sarvabhutadhivasam || 7 ||

    हे उमानाथ! जब तक मनुष्य आपके चरण-कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न इस लोक में, न परलोक में सुख और शान्ति मिलती है और न उनके दुःख का नाश होता है। हे सब प्राणियों में बसने वाले प्रभो, प्रसन्न होइए।

  8. छंद 8

    न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥८॥

    Na Janami Yogam Japam Naiva Pujam Natoham Sada Sarvada Shambhu Tubhyam | Jara Janma Duhkhaugha Tatapyamanam Prabho Pahi Apannamamisha Shambho || 8 ||

    मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा। हे शम्भु, मैं सदा-सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। बुढ़ापे, जन्म और दुःखों के समूह से तपते हुए मुझ विपत्ति में पड़े की, हे प्रभो, हे ईश, हे शम्भो, रक्षा कीजिए।

  9. श्लोक (फलश्रुति)

    रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥९॥

    Rudrashtakamidam Proktam Viprena Haratoshaye | Ye Pathanti Nara Bhaktya Tesham Shambhuh Prasidati || 9 ||

    शिव (हर) को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण ने यह रुद्राष्टक कहा। मानस कहता है: जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/rudrashtakam/

संक्षेप में

रुद्राष्टकम् भगवान शिव (रुद्र) की आठ छंदों की संस्कृत स्तुति है, जो गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आती है। गीता प्रेस के मानस में यह दोहा 107 (ख) के बाद ‘छंद’ के रूप में है, फिर एक श्लोक और दोहा 108 (क)। कथा में काकभुशुण्डि गरुड़ को अपने पिछले जन्म की बात बताते हैं: शिव मंदिर में गुरु को प्रणाम न करने पर शिव ने उन्हें शाप दिया, तब उनके ब्राह्मण गुरु ने शिव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तुति की।

स्थान: गीता प्रेस, गोरखपुर के ‘श्रीरामचरितमानस (मूल पाठ)’ में उत्तरकाण्ड, दोहा 107 (क, ख) के बाद ‘छं०’ (पृष्ठ 650–651), फिर ‘श्लोक—रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं…’ और उसके बाद दोहा 108 (क)। मानस में यह आठ छंद संख्या के बिना एक साथ छपे हैं; क्रमांक गीता प्रेस की ‘स्तोत्ररत्नावली’ (शिवस्तोत्राणि, क्रमांक 15) के अनुसार दिए हैं। पाठ के बारे में: पाठ मानस के पन्नों से शब्द-शब्द पढ़ा गया और स्तोत्ररत्नावली तथा sanskritdocuments.org (गिरीश बीहारी) से मिलाया गया। मानस की वर्तनी (‘गिरा ग्यान’, ‘भजंतीह’, शब्द अलग-अलग) रखी गई है; sanskritdocuments संस्कृत वर्तनी में शब्द जोड़कर लिखता है (‘गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्’, ‘भजन्तीह’, ‘नराणाम्’), शब्द वही हैं। स्तोत्ररत्नावली छंद 5 में ‘प्रचंड प्रकृष्टं’ छापती है, मानस और sanskritdocuments ‘प्रचंडं’। sanskritdocuments यह भी लिखता है कि कुछ रूप (‘शंभु’ संबोधन में, ‘बालेन्दु’, ‘भुजंगा’, ‘हरतोषये’, ‘पुरारी’, ‘मन्मथारी’) व्याकरण के नियम से हटकर हैं और लय तथा तुक के लिए रखे गए माने जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रुद्राष्टकम् किसने लिखा?

गोस्वामी तुलसीदास ने। यह उनके रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आता है, जहाँ कथा में काकभुशुण्डि के गुरु, एक ब्राह्मण, शिव को प्रसन्न करने के लिए इसे गाते हैं।

रुद्राष्टकम् रामचरितमानस में कहाँ है?

गीता प्रेस के मानस में उत्तरकाण्ड में दोहा 107 (ख) के बाद ‘छंद’ के रूप में, फिर फलश्रुति का श्लोक ‘रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं…’ और उसके बाद दोहा 108 (क)।

रुद्राष्टकम् संस्कृत में है या अवधी में?

यह संस्कृत में है, यद्यपि रामचरितमानस अवधी में है। मानस में तुलसीदास ने कई स्तुतियाँ संस्कृत में दी हैं। कुछ शब्द-रूप व्याकरण से हटकर लय और तुक के लिए रखे गए माने जाते हैं।

रुद्राष्टकम् का पाठ कब करें?

इसका अंतिम श्लोक कहता है कि जो इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं; कोई विशेष समय नहीं बताया गया। परंपरा में सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

स्रोत

  1. श्रीरामचरितमानस (मूल पाठ), गीता प्रेस, गोरखपुर: उत्तरकाण्ड, दोहा 107 (ख) के बाद का छंद और श्लोक
  2. स्तोत्ररत्नावली, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीरुद्राष्टकम् (गोस्वामिश्रीतुलसीदासस्य)’, क्रमांक 15
  3. sanskritdocuments.org: श्रीरुद्राष्टकं तुलसीदासकृतम् (गिरीश बीहारी)

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