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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/rudrashtakam/
रुद्राष्टकम् भगवान शिव (रुद्र) की आठ छंदों की संस्कृत स्तुति है, जो गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आती है। गीता प्रेस के मानस में यह दोहा 107 (ख) के बाद ‘छंद’ के रूप में है, फिर एक श्लोक और दोहा 108 (क)। कथा में काकभुशुण्डि गरुड़ को अपने पिछले जन्म की बात बताते हैं: शिव मंदिर में गुरु को प्रणाम न करने पर शिव ने उन्हें शाप दिया, तब उनके ब्राह्मण गुरु ने शिव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तुति की।
स्थान: गीता प्रेस, गोरखपुर के ‘श्रीरामचरितमानस (मूल पाठ)’ में उत्तरकाण्ड, दोहा 107 (क, ख) के बाद ‘छं०’ (पृष्ठ 650–651), फिर ‘श्लोक—रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं…’ और उसके बाद दोहा 108 (क)। मानस में यह आठ छंद संख्या के बिना एक साथ छपे हैं; क्रमांक गीता प्रेस की ‘स्तोत्ररत्नावली’ (शिवस्तोत्राणि, क्रमांक 15) के अनुसार दिए हैं। पाठ के बारे में: पाठ मानस के पन्नों से शब्द-शब्द पढ़ा गया और स्तोत्ररत्नावली तथा sanskritdocuments.org (गिरीश बीहारी) से मिलाया गया। मानस की वर्तनी (‘गिरा ग्यान’, ‘भजंतीह’, शब्द अलग-अलग) रखी गई है; sanskritdocuments संस्कृत वर्तनी में शब्द जोड़कर लिखता है (‘गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्’, ‘भजन्तीह’, ‘नराणाम्’), शब्द वही हैं। स्तोत्ररत्नावली छंद 5 में ‘प्रचंड प्रकृष्टं’ छापती है, मानस और sanskritdocuments ‘प्रचंडं’। sanskritdocuments यह भी लिखता है कि कुछ रूप (‘शंभु’ संबोधन में, ‘बालेन्दु’, ‘भुजंगा’, ‘हरतोषये’, ‘पुरारी’, ‘मन्मथारी’) व्याकरण के नियम से हटकर हैं और लय तथा तुक के लिए रखे गए माने जाते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रुद्राष्टकम् किसने लिखा?
गोस्वामी तुलसीदास ने। यह उनके रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आता है, जहाँ कथा में काकभुशुण्डि के गुरु, एक ब्राह्मण, शिव को प्रसन्न करने के लिए इसे गाते हैं।
रुद्राष्टकम् रामचरितमानस में कहाँ है?
गीता प्रेस के मानस में उत्तरकाण्ड में दोहा 107 (ख) के बाद ‘छंद’ के रूप में, फिर फलश्रुति का श्लोक ‘रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं…’ और उसके बाद दोहा 108 (क)।
रुद्राष्टकम् संस्कृत में है या अवधी में?
यह संस्कृत में है, यद्यपि रामचरितमानस अवधी में है। मानस में तुलसीदास ने कई स्तुतियाँ संस्कृत में दी हैं। कुछ शब्द-रूप व्याकरण से हटकर लय और तुक के लिए रखे गए माने जाते हैं।
रुद्राष्टकम् का पाठ कब करें?
इसका अंतिम श्लोक कहता है कि जो इसे भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं; कोई विशेष समय नहीं बताया गया। परंपरा में सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर इसे विशेष रूप से पढ़ा जाता है।
स्रोत
- श्रीरामचरितमानस (मूल पाठ), गीता प्रेस, गोरखपुर: उत्तरकाण्ड, दोहा 107 (ख) के बाद का छंद और श्लोक
- स्तोत्ररत्नावली, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीरुद्राष्टकम् (गोस्वामिश्रीतुलसीदासस्य)’, क्रमांक 15
- sanskritdocuments.org: श्रीरुद्राष्टकं तुलसीदासकृतम् (गिरीश बीहारी)
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पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, sanskritdocuments.org
