जो लिंग ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और देवताओं द्वारा पूजित है, निर्मल कांति से शोभित है और जन्म से होने वाले दुःख का नाश करता है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग श्रेष्ठ देवताओं और मुनियों द्वारा पूजित है, कामदेव को भस्म करने वाला है, करुणा की खान है और रावण का घमंड तोड़ने वाला है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग सब प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से अच्छी तरह लेपित है, बुद्धि को बढ़ाने का कारण है, और सिद्धों, देवताओं तथा असुरों से वंदित है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग सोने और बड़े-बड़े रत्नों से सजा है, नागराज के लिपटे होने से शोभित है, और जिसने दक्ष के यज्ञ का नाश किया, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग कुमकुम और चन्दन से लेपित है, कमलों की माला से सुशोभित है, और (अनेक जन्मों के) इकट्ठे पापों का नाश करता है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 6
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥६॥
जो लिंग देवताओं के समूहों द्वारा पूजित और सेवित है, और भाव तथा भक्ति से ही (पूजा जाता) है, और जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यों जैसी है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग आठ दलों (पंखुड़ियों) के ऊपर स्थित और घिरा हुआ है, जो सबकी उत्पत्ति का कारण है, और जिसने आठ प्रकार की दरिद्रता का नाश किया, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो लिंग देवगुरु (बृहस्पति) और श्रेष्ठ देवताओं से पूजित है, देवताओं के वन के फूलों से सदा पूजा जाता है, जो परे से भी परे और परमात्मा-स्वरूप है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
लिंगाष्टकम् शिवलिंग की आठ श्लोकों की संस्कृत स्तुति है। हर श्लोक में शिवलिंग के गुण गिनाए गए हैं और अंत में टेक आती है: “तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्”, यानी उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। नौवाँ श्लोक फलश्रुति है। इसकी सरल लय के कारण शिव मंदिरों और घरों में यह बहुत गाया जाता है। गीता प्रेस और sanskritdocuments.org, दोनों के पाठ में रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।
पाठ के बारे में: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की ‘शिवस्तोत्ररत्नाकर’ (क्रमांक 41, पृष्ठ 178–179) के पन्नों से शब्द-शब्द पढ़ा गया और sanskritdocuments.org के पाठ (श्रीनिवास सुन्दर) से मिलाया गया। अंतर: श्लोक 7 में गीता प्रेस ‘अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं’ छापती है और sanskritdocuments ‘अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गम्’ (पाठभेद में ‘विनाशित’ भी देता है); हमने गीता प्रेस का पाठ लिया है। sanskritdocuments श्लोक 1 में ‘निर्मलभाषित’ पाठभेद भी लिखता है। बाकी अंतर केवल शब्द अलग या जोड़कर लिखने का है (‘तत् प्रणमामि’, ‘अष्टदलोपरिवेष्टित’)। दोनों पाठों में रचयिता का नाम नहीं है, इसलिए हमने कोई नाम नहीं दिया।
हर सुबह तिथि, राहु काल और आने वाले व्रत-त्योहार, WhatsApp पर एक छोटे संदेश में।चैनल फ़ॉलो करें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लिंगाष्टकम् किसने लिखा?
गीता प्रेस की शिवस्तोत्ररत्नाकर और sanskritdocuments.org, दोनों के पाठ में रचयिता का नाम नहीं दिया गया है। हमें किसी जाँचे हुए स्रोत में इसके रचयिता का नाम नहीं मिला।
लिंगाष्टकम् में कितने श्लोक हैं?
आठ श्लोक, जिनमें से हर एक “तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्” पर समाप्त होता है, और फिर नौवाँ श्लोक फलश्रुति है।
लिंगाष्टकम् का पाठ कब और कहाँ करें?
इसकी फलश्रुति शिव की सन्निधि में, यानी शिवलिंग या शिव मंदिर के सामने, पाठ की बात कहती है। परंपरा में सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
स्रोत
शिवस्तोत्ररत्नाकर, गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘लिङ्गाष्टकम्’, क्रमांक 41
SanatanBodh को फ़ोन में ऐप की तरह जोड़ेंरोज़ का पंचांग और चौघड़िया एक टैप में। मुफ़्त, Play Store की ज़रूरत नहीं।नीचे शेयर बटन दबाएँ, फिर “Add to Home Screen”। कैसे?