स्तुतिदुर्गा

दुर्गा कवच (देव्याः कवचम्)

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नवरात्रि की शाम घर में सिंहवाहिनी दुर्गा प्रतिमा और अखंड ज्योति के सामने लाल साड़ी में स्त्री पाठ करती हुई
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. विनियोग

    ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः। ॐ नमश्चण्डिकायै॥

    इस चण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता चामुण्डा हैं। अंगन्यास में कही गई माताएँ (मातृकाएँ) इसका बीज हैं और दिशाओं को बाँधने वाले देवता इसका तत्त्व। जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए, सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है: यह संकल्प (विनियोग) है। चण्डिका देवी को नमस्कार।

  2. श्लोक 1

    मार्कण्डेय उवाच ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

    मार्कण्डेय ऋषि ने कहा: हे पितामह (ब्रह्मा), इस संसार में जो सबसे गोपनीय है, जो मनुष्यों की हर प्रकार से रक्षा करता है और जिसे आपने अब तक किसी को नहीं बताया, वह मुझे बताइए।

  3. श्लोक 2

    ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥

    ब्रह्मा ने कहा: हे विप्र, ऐसा एक अत्यंत गोपनीय साधन है, जो सब प्राणियों का उपकार करता है: देवी का पवित्र कवच। हे महामुनि, उसे सुनो।

  4. श्लोक 3–5

    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥

    पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा, चौथी कूष्माण्डा, पाँचवीं स्कन्दमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री: ये नवदुर्गा कही गई हैं। ये नाम महात्मा ब्रह्म ने ही बताए हैं (गीता प्रेस का अनुवाद यहाँ ‘ब्रह्म’ का अर्थ वेद लेता है)। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के रूपों की पूजा इसी क्रम से होती है।

  5. श्लोक 6

    अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥

    जो आग में जल रहा हो, युद्ध में शत्रुओं के बीच घिर गया हो, या किसी कठिन और विषम संकट में फँसा हो, ऐसे भय से व्याकुल लोग जो देवी की शरण में आते हैं,

  6. श्लोक 7

    न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥

    उनका युद्ध के संकट में भी कोई अमंगल नहीं होता। (ब्रह्मा कहते हैं:) मैं उन पर कोई विपत्ति नहीं देखता; उन्हें शोक, दुःख और भय नहीं होता।

  7. श्लोक 8

    यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥

    जो भक्ति से देवी का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही उन्नति होती है। हे देवेश्वरी, जो तुम्हें याद करते हैं, तुम उनकी रक्षा करती हो, इसमें संदेह नहीं।

  8. श्लोक 9

    प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥

    चामुण्डा प्रेत (शव) पर विराजती हैं, वाराही भैंसे पर, ऐन्द्री हाथी पर और वैष्णवी गरुड़ पर।

  9. श्लोक 10

    माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥

    माहेश्वरी बैल पर सवार हैं और कौमारी का वाहन मोर है। हरि (विष्णु) की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर बैठी हैं और उनके हाथ में कमल है।

  10. श्लोक 11

    श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥

    श्वेत रूप वाली ईश्वरी देवी बैल पर सवार हैं, और सब आभूषणों से सजी ब्राह्मी हंस पर।

  11. श्लोक 12

    इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥

    ये सब माताएँ (मातृकाएँ) सब योग-शक्तियों से युक्त हैं, और अनेक आभूषणों तथा रत्नों से शोभित हैं।

  12. श्लोक 13–15

    दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥ खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥ दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥

    ये देवियाँ रथों पर आरूढ़ और क्रोध से भरी दिखाई देती हैं। शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मूसल, ढाल (खेटक), तोमर, फरसा, पाश, भाला (कुन्त), त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष: ये आयुध वे दैत्यों के शरीर के नाश के लिए, भक्तों को अभय देने के लिए और देवताओं के हित के लिए धारण करती हैं।

  13. श्लोक 16

    नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥

    हे अत्यंत उग्र रूप वाली, महाभयंकर पराक्रम वाली, महाबली, महान उत्साह वाली और बड़े से बड़े भय को मिटाने वाली देवी, तुम्हें नमस्कार।

  14. श्लोक 17

    त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥

    हे देवी, तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है; तुम शत्रुओं का भय बढ़ाती हो; मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री मेरी रक्षा करें, और आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्नि की शक्ति।

  15. श्लोक 18

    दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

    दक्षिण में वाराही, नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में मृग पर सवार देवी रक्षा करें।

  16. श्लोक 19

    उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥

    उत्तर में कौमारी, ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में शूलधारिणी, ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

  17. श्लोक 20

    एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥

    इस प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में रक्षा करें। जया मेरे आगे और विजया मेरे पीछे रक्षा करें।

  18. श्लोक 21

    अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥

    बाईं ओर अजिता और दाईं ओर अपराजिता रक्षा करें। उद्योतिनी शिखा (चोटी) की रक्षा करें, और उमा सिर पर स्थित होकर रक्षा करें।

  19. श्लोक 22

    मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥

    मालाधरी ललाट की, यशस्विनी भौंहों की, त्रिनेत्रा भौंहों के बीच की और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें।

  20. श्लोक 23

    शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी॥२३॥

    शङ्खिनी आँखों के बीच, द्वारवासिनी दोनों कानों की, कालिका गालों की और शाङ्करी कानों की जड़ की रक्षा करें।

  21. श्लोक 24

    नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥

    नाक में सुगन्धा, ऊपर के होंठ में चर्चिका, नीचे के होंठ में अमृतकला और जीभ में सरस्वती रक्षा करें।

  22. श्लोक 25

    दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥

    कौमारी दाँतों की, चण्डिका कण्ठ की, चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु की रक्षा करें।

  23. श्लोक 26

    कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥

    कामाक्षी ठोड़ी की, सर्वमङ्गला मेरी वाणी की, भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।

  24. श्लोक 27

    नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥

    नीलग्रीवा कण्ठ के बाहरी भाग की, नलकूबरी कण्ठ की नली की, खड्गिनी दोनों कंधों की और वज्रधारिणी मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें।

  25. श्लोक 28

    हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥

    दण्डिनी दोनों हाथों की, अम्बिका उँगलियों की, शूलेश्वरी नखों की और कुलेश्वरी पेट (कुक्षि) की रक्षा करें।

  26. श्लोक 29

    स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी मन की रक्षा करें। हृदय में ललिता देवी और उदर में शूलधारिणी रक्षा करें।

  27. श्लोक 30

    नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥

    कामिनी नाभि की और गुह्येश्वरी गुप्त अंग की रक्षा करें। पूतना और कामिका जननेंद्रिय की, और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें।

  28. श्लोक 31

    कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥

    भगवती कमर की, विन्ध्यवासिनी घुटनों की, और सब कामनाएँ पूरी करने वाली महाबला पिंडलियों की रक्षा करें।

  29. श्लोक 32

    गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥

    नारसिंही टखनों की, तैजसी पैरों के ऊपरी भाग की, श्री पैर की उँगलियों की और तलवासिनी तलवों की रक्षा करें।

  30. श्लोक 33

    नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥

    दंष्ट्राकराली नखों की, ऊर्ध्वकेशिनी बालों की, कौबेरी रोमछिद्रों की और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।

  31. श्लोक 34

    रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥

    पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, हड्डी और मेद की रक्षा करें। कालरात्रि आँतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें।

  32. श्लोक 35

    पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥३५॥

    पद्मावती पद्मकोश में और चूडामणि कफ में रक्षा करें। ज्वालामुखी नखों की चमक की और अभेद्या शरीर के सब जोड़ों में रक्षा करें।

  33. श्लोक 36

    शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

    ब्रह्माणी मेरे वीर्य की और छत्रेश्वरी मेरी छाया की रक्षा करें। धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।

  34. श्लोक 37

    प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

    वज्रहस्ता मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान, इन पाँचों वायुओं की रक्षा करें, और कल्याणशोभना मेरे जीवन (प्राण) की रक्षा करें।

  35. श्लोक 38

    रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥

    योगिनी स्वाद, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श में रक्षा करें। नारायणी सत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों की सदा रक्षा करें।

  36. श्लोक 39

    आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥

    वाराही आयु की और वैष्णवी धर्म की रक्षा करें। चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी (समृद्धि), धन और विद्या की रक्षा करें।

  37. श्लोक 40

    गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥

    इन्द्राणी मेरे कुल (गोत्र) की रक्षा करें; हे चण्डिका, मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।

  38. श्लोक 41

    पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥

    सुपथा रास्ते की और क्षेमकरी यात्रा के मार्ग की रक्षा करें। राजा के द्वार (दरबार) में महालक्ष्मी, और सब ओर स्थित विजया रक्षा करें।

  39. श्लोक 42

    रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥

    जो स्थान कवच में छूट गया है और इसलिए बिना रक्षा के है, हे देवी, तुम जयन्ती और पापनाशिनी हो, मेरे उस सब की रक्षा करो।

  40. श्लोक 43

    पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥

    यहाँ से फलश्रुति आरंभ होती है, यानी पाठ बताता है कि कवच के पाठ का क्या फल है। जो अपना भला चाहे, वह कवच के बिना एक पग भी न चले। कवच से सदा ढका हुआ मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है,

  41. श्लोक 44

    तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥

    वहाँ-वहाँ उसे धन का लाभ और सब इच्छाएँ पूरी करने वाली विजय मिलती है। वह जिस-जिस कामना का चिंतन करता है, उसे निश्चय पाता है। वह मनुष्य इस धरती पर अतुलनीय ऐश्वर्य पाता है।

  42. श्लोक 45

    निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥

    कवच से ढका मनुष्य निर्भय हो जाता है, युद्धों में हारता नहीं और तीनों लोकों में पूजनीय होता है।

  43. श्लोक 46

    इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥

    देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो मनुष्य संयम से, श्रद्धा के साथ प्रतिदिन तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में इसका पाठ करता है,

  44. श्लोक 47

    दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥४७॥

    उसे दैवी कला (दिव्य शक्ति का अंश) प्राप्त होती है, वह तीनों लोकों में अजेय रहता है, और अकाल मृत्यु से बचकर सौ से अधिक वर्ष जीता है।

  45. श्लोक 48

    नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥

    पाठ के अनुसार उसके लूता (मकड़ी के विष से होने वाले रोग), फोड़े आदि सब रोग नष्ट होते हैं; और पौधों-खनिजों का (स्थावर), जीवों का (जंगम) तथा बनाया हुआ (कृत्रिम) विष भी।

  46. श्लोक 49–51

    अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥ सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥ ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥

    धरती पर जितने अभिचार (दूसरों को हानि पहुँचाने के प्रयोग) और मंत्र-यंत्र हैं; भूमि, आकाश और जल में रहने वाले जीव, उपदेश से सिद्ध किए गए प्रयोग; सहज, कुलज और माला नाम की बाधाएँ, डाकिनी, शाकिनी, आकाश में घूमने वाली भयंकर और बलवान डाकिनियाँ; ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड, भैरव आदि,

  47. श्लोक 52

    नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥

    पाठ कहता है कि जिसके हृदय में यह कवच बसा हो, उसे देखते ही ये सब नष्ट हो जाते हैं। राजा से उसे सम्मान मिलता है; यह कवच तेज को बहुत बढ़ाने वाला है।

  48. श्लोक 53

    यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥

    वह कीर्ति से सजी इस धरती पर यश में बढ़ता है। पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती चण्डी का जप करना चाहिए।

  49. श्लोक 54

    यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥

    जब तक पृथ्वी पर्वतों, वनों और जंगलों सहित टिकी रहती है, तब तक उसकी पुत्र-पौत्रों वाली संतति धरती पर बनी रहती है।

  50. श्लोक 55

    देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥

    देह छूटने पर वह मनुष्य महामाया की कृपा से उस नित्य परम स्थान को पाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

  51. श्लोक 56

    लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

    वह परम रूप पाता है और शिव के साथ आनंद करता है। ॐ। यहाँ देवी का कवच पूरा हुआ।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/durga-kavach/

संक्षेप में

दुर्गा कवच, जिसे ‘देव्याः कवचम्’ या चण्डी कवच भी कहते हैं, संस्कृत में 56 श्लोकों का स्तोत्र है। इसमें मार्कण्डेय ऋषि के पूछने पर ब्रह्मा देवी के नौ रूपों (नवदुर्गा) के नाम बताते हैं, फिर हर दिशा और शरीर के हर अंग की रक्षा के लिए देवी के अलग-अलग रूपों का स्मरण करते हैं। गीता प्रेस की दुर्गा सप्तशती में यह पाठ के छह अंगों में पहला है; परंपरा से इसे सप्तशती से पहले, विशेषकर नवरात्रि में, पढ़ा जाता है।

पाठ के बारे में: यह पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की दो दुर्गा सप्तशती (सचित्र, हिंदी अनुवाद तथा पाठ-विधि सहित; और मूल, पाठविधि सहित), sanskritdocuments.org (अहतो यार्वे का पाठ, पी.एस.ए. ईश्वरन द्वारा जाँचा गया) और संस्कृत विकिस्रोत से शब्द-शब्द मिलाया गया है; चारों में एक ही पाठ है, अंतर केवल वर्तनी और संधि लिखने के ढंग का है। एक दूसरी परंपरा का पाठ (मन्त्रमहार्णव, खेमराज 1924, sanskritdocuments.org पर ‘चण्डीकवचम्’) कुछ शब्दों में अलग है: श्लोक 3 में ‘शैलपुत्रीति’, 4 में ‘कालरात्रिश्च’, 6 में ‘दुर्गे’, 8 में ‘तेषां सिद्धिः प्रजायते’, 19 में ‘उदीच्यां रक्ष कौबेरि ईशान्यां’, 20 में ‘जया मे अग्रतः स्थातु विजया स्थातु पृष्ठतः’, 21 में ‘शिखां मे द्योतिनी’, 25 में ‘कण्ठमध्ये’, 28 में ‘चाङ्गुलीस्तथा’ और ‘नलेश्वरी’, 29 में ‘महालक्ष्मीर्मनःशोकविनाशिनी’, 31 में ‘महाबला प्रोक्ता’, 32 में ‘पादौ चामिततेजसी’, 36 में ‘रक्ष मे धर्मचारिणि’, 37 में ‘समानोदानमेव च’, 43 में ‘यत्राधिगच्छति’, 44 में ‘कामयते’, 48 में ‘वापि’ और 50 में ‘सहजाः कुलजा मालाः शाकिनी डाकिनी’। ग्रंथ के बारे में: दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के तेरह अध्याय मार्कण्डेय पुराण का भाग हैं; कवच, अर्गला और कीलक उसके पाठ के साथ पढ़े जाने वाले अंग हैं, स्वयं उन अध्यायों में नहीं। गीता प्रेस की पुष्पिका केवल ‘इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्’ कहती है; दूसरी परंपरा की पुष्पिका इसे ‘श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं’ बताती है। हमने वाराह पुराण के किसी छपे संस्करण में इसे नहीं देखा है। पाठ का क्रम भी परंपराओं में अलग है: गीता प्रेस योगरत्नावली के अनुसार कवच, अर्गला, कीलक का क्रम देती है, और चिदम्बर-संहिता का क्रम (अर्गला, कीलक, फिर कवच) भी बताती है; वह कहती है कि अपने यहाँ जो क्रम चला आया है, वही अपनाना अच्छा है। श्लोक 43 से 56 फलश्रुति हैं, यानी पाठ स्वयं बताता है कि कवच के पाठ का क्या फल है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा कवच किस ग्रंथ से है?

यह दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ पढ़ा जाने वाला अंग है। सप्तशती (देवी माहात्म्य) के तेरह अध्याय मार्कण्डेय पुराण का भाग हैं, पर कवच उन अध्यायों में नहीं है। गीता प्रेस की सप्तशती में कवच, अर्गला, कीलक और तीन रहस्य सप्तशती के छह अंग कहे गए हैं। कुछ छपे पाठों की पुष्पिका इसे वाराह पुराण का बताती है।

दुर्गा कवच में कितने श्लोक हैं?

गीता प्रेस की गिनती में 56 श्लोक हैं, जिनसे पहले विनियोग आता है। श्लोक 44 में तीन पंक्तियाँ हैं। श्लोक 3 से 5 में नवदुर्गा के नाम हैं, 9 से 42 में दिशाओं और अंगों की रक्षा का वर्णन है, और 43 से 56 फलश्रुति हैं।

दुर्गा कवच का पाठ कब किया जाता है?

परंपरा से दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले, विशेषकर नवरात्रि में। कवच का श्लोक 53 स्वयं कहता है कि पहले कवच पढ़कर फिर सप्तशती का जप करे, और श्लोक 46 तीनों संध्याओं में पाठ की बात करता है। पाठ का क्रम परंपराओं में अलग है; अपने घर की परंपरा या अपने पुरोहित से पूछें।

नवदुर्गा के नौ नाम किस श्लोक में हैं?

कवच के श्लोक 3 से 5 में: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के रूपों की पूजा इसी क्रम से की जाती है।

स्रोत

  1. श्रीदुर्गासप्तशती (सचित्र, हिंदी अनुवाद तथा पाठ-विधि सहित), गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘अथ देव्याः कवचम्’
  2. श्रीदुर्गासप्तशती (मूल, पाठविधि सहित), गीता प्रेस, गोरखपुर
  3. sanskritdocuments.org: देवीकवचम् (अहतो यार्वे, पी.एस.ए. ईश्वरन) और दूसरी परंपरा का चण्डीकवचम् (मन्त्रमहार्णव पर आधारित)
  4. संस्कृत विकिस्रोत: देव्याः कवचम्

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