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जय आद्या शक्ति: माँ अंबा की गुजराती आरती PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/jay-adya-shakti/
“जय आद्या शक्ति मा” माँ अंबा की गुजराती आरती है। गुजरात में नवरात्रि के गरबे में और देवी-पूजा में यह आरती गाई जाती है। इसके पद तिथियों के क्रम में चलते हैं, प्रतिपदा (पडवो) से पूनम तक, और अंतिम पद में ‘भणे शिवानंद स्वामी’ की छाप है। यहाँ इसका गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है, हर पद के सरल हिंदी अर्थ के साथ।
यह आरती गुजराती में है; यहाँ इसका मूल गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में अक्षरशः दिया गया है (जैसे ળ को ळ लिखा गया है)। पाठ 1919 से 2019 तक की सात छपी पुस्तकों और एक वेब-पाठ की तुलना करके चुना गया है, और हर शब्द पर अधिकतर स्रोतों का पाठ लिया गया है। मुख्य पाठभेद: पहले पद में ‘निपाव्या’ (रचा) पुरानी पुस्तकों में है, जबकि आज प्रायः ‘दिपाव्या’ (प्रकाशित किया) गाया जाता है; ‘पडवे पंडे मा’ की जगह ‘पडवे पंडित मा’ और ‘पडवे प्रगट थयां’ भी छपा मिलता है; ‘बेय/बेउ स्वरूप’, ‘दया थकी तरवेणी’, ‘पंच तत्त्व त्यां सोहिये’, ‘सावित्री संध्या’ और ‘तारिणी माता’ भी मिलते हैं। टेक ‘जयो जयो मा जगदंबे’ हर पद के बाद गाई जाती है; बहुत लोग इसे ‘ॐ जयो जयो मा जगदंबे’ गाते हैं। गाते समय हर पद की पहली पंक्ति दोहराई जाती है; यहाँ दोहराव नहीं लिखा गया। कई पुस्तकों में अंतिम पद के बाद ‘एकमे एक स्वरूप, अंतर नव धरशो’, ‘भाव न जाणुं भक्ति न जाणुं’ और ‘मानो मंडप लाल गुलाल’ जैसे पद भी छपे हैं; दो स्रोत इन्हें बाद में जोड़ा गया मानते हैं, इसलिए वे यहाँ नहीं दिए गए। कुछ पुरानी पुस्तकों में 14वें से 16वें पद का एक अलग और छोटा रूप भी मिलता है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“जय आद्या शक्ति” आरती किसने लिखी?
परंपरा के अनुसार सूरत के शिवानंद स्वामी (शिवानंद पंड्या) ने। आरती के अंतिम पद में ‘भणे शिवानंद स्वामी’ (शिवानंद स्वामी कहते हैं) उनकी छाप है। उनके समय के बारे में स्रोत एकमत नहीं हैं।
यह आरती किस भाषा में है और कब गाई जाती है?
यह गुजराती में है। गुजरात में नवरात्रि के गरबे में, अंबा माँ की पूजा में और देवी के दूसरे उत्सवों में यह आरती गाई जाती है। यहाँ इसका गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है।
इस आरती में कितने पद हैं?
तुलना की गई अधिकतर पुस्तकों में टेक के साथ 18 पद हैं: पहले पंद्रह पद प्रतिपदा (पडवो) से पूनम तक एक-एक तिथि के हैं, फिर संवत वाला पद, तीन नगरियों वाला पद और अंत में शिवानंद स्वामी की छाप वाला पद। कुछ पुस्तकों में इसके बाद और पद भी जोड़े गए हैं।
‘पडवे पंडित मा’ सही है या ‘पडवे पंडे मा’?
दोनों पाठ छपे मिलते हैं, और ‘पडवे प्रगट थयां’ भी। 1925 में बहुचराजी देवस्थान समिति की छापी पुस्तक में ‘पडवे पंडे थयां’ है, जिसका अर्थ है कि प्रतिपदा को माँ स्वयं प्रकट हुईं। यहाँ ‘पडवे पंडे मा’ दिया गया है।
‘जयो जयो मा जगदंबे’ का क्या अर्थ है?
‘जयो’ का अर्थ है ‘जय हो’। पूरी टेक का अर्थ है: हे जगदंबा (जगत की माँ), आपकी जय हो, जय हो। यह टेक हर पद के बाद गाई जाती है।
स्रोत
- परंपरागत गुजराती आरती पाठ; शिवानंद स्वामी रचित (परंपरा अनुसार)
- हरिचंद लक्ष्मीचंद मेहता, “काश्मीरथी नेपाळ” (1919), पृ. 219–220, “जगदंबानी आरती”
- “बालात्रिपुरा सुंदरी बहुचराम्बा”, बहुचराजी देवस्थान समिति (1925), पृ. 65–67, “आद्य शक्तिनी आरती”
- “भागवत भजन मंजरी”, पं. हिम्मतराम छोटालाल शर्मा (1941), पद 47 “देवीनी आरती”
- “संध्या पाठ”, साधु करसनदासजी, ईश्वर आश्रम, वांढाय; “उमिया माताजी दर्शन”, उमिया माताजी संस्थान, ऊंझा (2007)
- “नवदुर्गा”, स्वामी ब्रह्मवेदांतजी के प्रवचन (2019), आरती की व्याख्या
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