आरतीदुर्गा

जय आद्या शक्ति: माँ अंबा की गुजराती आरती

रचना: सूरत के शिवानंद स्वामी, शिवानंद पंड्या (परंपरा अनुसार)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
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  1. टेक

    जय आद्या शक्ति मा, जय आद्या शक्ति। जयो जयो मा जगदंबे॥

    हे आद्या शक्ति (सबसे पहली, आदि शक्ति) माँ, आपकी जय हो। हे जगदंबा (जगत की माँ), आपकी जय हो, जय हो। यह टेक हर पद के बाद गाई जाती है।

  2. पद 1

    अखंड ब्रह्मांड निपाव्या, पडवे पंडे मा॥

    माँ, आपने यह अखंड ब्रह्मांड रचा (निपाव्या)। पडवे, यानी प्रतिपदा (पहली तिथि) को आप स्वयं (पंडे) प्रकट हुईं।

  3. पद 2

    द्वितीया बे स्वरूप, शिवशक्ति जाणुं। ब्रह्मा गणपति गाये, हर गाये हर मा॥

    द्वितीया को: आपके दो स्वरूप हैं, मैं उन्हें शिव और शक्ति के रूप में जानता हूँ। ब्रह्मा और गणपति आपका गुणगान करते हैं, और हर (शिव) भी आपका गान करते हैं।

  4. पद 3

    तृतीया त्रण स्वरूप, त्रिभुवनमां बेठां। त्रय थकी तरवेणी, तुं तरवेणी मा॥

    तृतीया को: आप तीन स्वरूपों में तीनों लोकों में विराजमान हैं। तीनों के मिलने से त्रिवेणी (तीन धाराओं का संगम) बनती है; माँ, वह त्रिवेणी आप ही हैं। इस पंक्ति के शब्द अलग-अलग पुस्तकों में कुछ भिन्न मिलते हैं।

  5. पद 4

    चोथे चतुरा महालक्ष्मी, मा सचराचर व्याप्यां। चार भुजा चौदिशा, प्रगट्यां दक्षिणमां॥

    चौथ को: आप चतुर महालक्ष्मी हैं, जो सारे चर और अचर जगत में व्याप्त हैं। चार भुजाओं वाली आप चारों दिशाओं में हैं, और दक्षिण में प्रकट हुईं।

  6. पद 5

    पंचमी पंच ऋषि, पंचमी गुण पद्मा। पंच सहस्त्र त्यां सोहिये, पंचे तत्त्वोमां॥

    पंचमी को: पाँच ऋषियों और गुणों से भरी पद्मा (लक्ष्मी) का उल्लेख है। वहाँ पाँच हज़ार शोभित हैं, और आप पाँचों तत्त्वों में हैं। इस पद के कुछ शब्दों का ठीक अर्थ स्पष्ट नहीं है; टीकाकार इसे अलग-अलग ढंग से समझाते हैं।

  7. पद 6

    षष्ठी तुं नारायणी, महिषासुर मार्यो। नरनारीना रूपे, व्याप्यां सघळे मा॥

    षष्ठी को: आप नारायणी हैं, आपने महिषासुर को मारा। माँ, नर और नारी के रूप में आप सब जगह (सघळे) व्याप्त हैं।

  8. पद 7

    सप्तमी सप्त पाताळ, संध्या सावित्री। गौ गंगा गायत्री, गौरी गीता मा॥

    सप्तमी को: सातों पाताल आपके हैं, और आप ही संध्या और सावित्री हैं। माँ, गौ, गंगा, गायत्री, गौरी और गीता भी आप ही हैं।

  9. पद 8

    अष्टमी अष्ट भुजा, आई आनंदा। सुरनर मुनिवर जन्म्या, देव दैत्यो मा॥

    अष्टमी को: आप आठ भुजाओं वाली, आनंद देने वाली आई (माँ) हैं। माँ, देवता और मनुष्य, श्रेष्ठ मुनि, देव और दैत्य, सब आपसे जन्मे।

  10. पद 9

    नवमी नवकुळ नाग, सेवे नवदुर्गा। नवरात्रिनां पूजन, शिवरात्रिनां अर्चन, कीधां हर ब्रह्मा॥

    नवमी को: नौ कुलों के नाग आपकी सेवा करते हैं, आप नवदुर्गा हैं। हर (शिव) और ब्रह्मा ने नवरात्रि में आपका पूजन और शिवरात्रि में आपका अर्चन किया।

  11. पद 10

    दशमी दश अवतार, जय विजयादशमी। रामे राम रमाड्या, रावण रोळ्यो मा॥

    दशमी को: दस अवतारों का स्मरण है, और विजयादशमी पर आपकी जय है। माँ, राम ने (युद्ध का) खेल रचा और रावण को रौंद डाला (रोळ्यो)। 1925 की एक पुस्तक के संपादक ने यहाँ ‘रमाए राम रमाड्या’ पाठ अधिक उचित माना है।

  12. पद 11

    एकादशी अगियारस, कात्यायनी कामा। कामदुर्गा कालिका, श्यामा ने रामा॥

    एकादशी, यानी ग्यारस को: आप कात्यायनी हैं, कामनाएँ पूरी करने वाली। आप ही कामदुर्गा, कालिका, श्यामा और रामा हैं।

  13. पद 12

    बारसे बाळारूप, बहुचरी अंबा मा। बटुक भैरव सोहिये, काळ भैरव सोहिये, तारा छे तुज मा॥

    बारस (द्वादशी) को: माँ, आप बाला (बालिका) रूप वाली बहुचरी और अंबा हैं। बटुक भैरव और काल भैरव शोभा पाते हैं; माँ, वे आपके ही हैं।

  14. पद 13

    तेरसे तुळजारूप, तुं तारुणी माता। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुण तारा गाता॥

    तेरस को: आप तुलजा (भवानी) रूप वाली, तारुणी माता हैं। ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव आपके (तारा) गुण गाते हैं।

  15. पद 14

    चौदशे चौदा रूप, चंडी चामुंडा। भाव भक्ति कंई आपो, चतुराई कंई आपो, सिंहवाहिनी माता॥

    चौदस को: आपके चौदह रूप हैं, आप चंडी और चामुंडा हैं। हे सिंह पर सवार माता, हमें कुछ भाव और भक्ति दीजिए, कुछ समझ (चतुराई) दीजिए।

  16. पद 15

    पूनमे कुंभ भर्यो, सांभळजो करुणा। वसिष्ठ देवे वखाण्या, मार्कंड देवे वखाण्या, गाई शुभ कविता॥

    पूनम को: (पूजा का) कलश भरा गया है; करुणा करके हमारी सुनिए। वसिष्ठ और मार्कंडेय ने आपकी स्तुति की और आपके लिए शुभ कविता गाई।

  17. पद 16

    संवत सोळ सत्तावन, सोळसे बावीस मा। संवत सोळे प्रगट्यां, रेवाने तीरे॥

    इस पद में संवत सोलह सौ सत्तावन और सोलह सौ बाईस का उल्लेख है, और आरती कहती है कि संवत सोलह (सौ) में माँ रेवा (नर्मदा) के तट पर प्रकट हुईं। इन वर्षों का संबंध किस घटना से है, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं; एक टीका इन्हें कवि की साधना के आरंभ और पूर्ण होने के वर्ष मानती है।

  18. पद 17

    त्रंबावटी नगरी, मा रूपावटी नगरी, मा मंछावटी नगरी। सोळ सहस्त्र त्यां सोहिये, क्षमा करो गौरी, मा दया करो गौरी॥

    इस पद में त्रंबावटी, रूपावटी और मंछावटी नगरियों का नाम है, जहाँ सोलह हज़ार (भक्त) शोभा पाते हैं। हे गौरी, क्षमा कीजिए; माँ, दया कीजिए।

  19. पद 18

    शिवशक्तिनी आरती जे कोई गाशे, मा जे भावे गाशे। भणे शिवानंद स्वामी, सुख संपति थाशे, हर कैलासे जाशे, मा अंबा दुःख हरशे॥

    शिवानंद स्वामी कहते हैं (भणे) कि जो कोई शिव-शक्ति की यह आरती गाएगा, जो इसे भाव से गाएगा, उसे सुख और संपत्ति मिलेगी, वह हर (शिव) के कैलास जाएगा, और माँ अंबा उसका दुःख हरेंगी। यह आरती का फल-कथन (फलश्रुति) है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/jay-adya-shakti/

संक्षेप में

“जय आद्या शक्ति मा” माँ अंबा की गुजराती आरती है। गुजरात में नवरात्रि के गरबे में और देवी-पूजा में यह आरती गाई जाती है। इसके पद तिथियों के क्रम में चलते हैं, प्रतिपदा (पडवो) से पूनम तक, और अंतिम पद में ‘भणे शिवानंद स्वामी’ की छाप है। यहाँ इसका गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है, हर पद के सरल हिंदी अर्थ के साथ।

यह आरती गुजराती में है; यहाँ इसका मूल गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में अक्षरशः दिया गया है (जैसे ળ को ळ लिखा गया है)। पाठ 1919 से 2019 तक की सात छपी पुस्तकों और एक वेब-पाठ की तुलना करके चुना गया है, और हर शब्द पर अधिकतर स्रोतों का पाठ लिया गया है। मुख्य पाठभेद: पहले पद में ‘निपाव्या’ (रचा) पुरानी पुस्तकों में है, जबकि आज प्रायः ‘दिपाव्या’ (प्रकाशित किया) गाया जाता है; ‘पडवे पंडे मा’ की जगह ‘पडवे पंडित मा’ और ‘पडवे प्रगट थयां’ भी छपा मिलता है; ‘बेय/बेउ स्वरूप’, ‘दया थकी तरवेणी’, ‘पंच तत्त्व त्यां सोहिये’, ‘सावित्री संध्या’ और ‘तारिणी माता’ भी मिलते हैं। टेक ‘जयो जयो मा जगदंबे’ हर पद के बाद गाई जाती है; बहुत लोग इसे ‘ॐ जयो जयो मा जगदंबे’ गाते हैं। गाते समय हर पद की पहली पंक्ति दोहराई जाती है; यहाँ दोहराव नहीं लिखा गया। कई पुस्तकों में अंतिम पद के बाद ‘एकमे एक स्वरूप, अंतर नव धरशो’, ‘भाव न जाणुं भक्ति न जाणुं’ और ‘मानो मंडप लाल गुलाल’ जैसे पद भी छपे हैं; दो स्रोत इन्हें बाद में जोड़ा गया मानते हैं, इसलिए वे यहाँ नहीं दिए गए। कुछ पुरानी पुस्तकों में 14वें से 16वें पद का एक अलग और छोटा रूप भी मिलता है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

“जय आद्या शक्ति” आरती किसने लिखी?

परंपरा के अनुसार सूरत के शिवानंद स्वामी (शिवानंद पंड्या) ने। आरती के अंतिम पद में ‘भणे शिवानंद स्वामी’ (शिवानंद स्वामी कहते हैं) उनकी छाप है। उनके समय के बारे में स्रोत एकमत नहीं हैं।

यह आरती किस भाषा में है और कब गाई जाती है?

यह गुजराती में है। गुजरात में नवरात्रि के गरबे में, अंबा माँ की पूजा में और देवी के दूसरे उत्सवों में यह आरती गाई जाती है। यहाँ इसका गुजराती पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है।

इस आरती में कितने पद हैं?

तुलना की गई अधिकतर पुस्तकों में टेक के साथ 18 पद हैं: पहले पंद्रह पद प्रतिपदा (पडवो) से पूनम तक एक-एक तिथि के हैं, फिर संवत वाला पद, तीन नगरियों वाला पद और अंत में शिवानंद स्वामी की छाप वाला पद। कुछ पुस्तकों में इसके बाद और पद भी जोड़े गए हैं।

‘पडवे पंडित मा’ सही है या ‘पडवे पंडे मा’?

दोनों पाठ छपे मिलते हैं, और ‘पडवे प्रगट थयां’ भी। 1925 में बहुचराजी देवस्थान समिति की छापी पुस्तक में ‘पडवे पंडे थयां’ है, जिसका अर्थ है कि प्रतिपदा को माँ स्वयं प्रकट हुईं। यहाँ ‘पडवे पंडे मा’ दिया गया है।

‘जयो जयो मा जगदंबे’ का क्या अर्थ है?

‘जयो’ का अर्थ है ‘जय हो’। पूरी टेक का अर्थ है: हे जगदंबा (जगत की माँ), आपकी जय हो, जय हो। यह टेक हर पद के बाद गाई जाती है।

स्रोत

  1. परंपरागत गुजराती आरती पाठ; शिवानंद स्वामी रचित (परंपरा अनुसार)
  2. हरिचंद लक्ष्मीचंद मेहता, “काश्मीरथी नेपाळ” (1919), पृ. 219–220, “जगदंबानी आरती”
  3. “बालात्रिपुरा सुंदरी बहुचराम्बा”, बहुचराजी देवस्थान समिति (1925), पृ. 65–67, “आद्य शक्तिनी आरती”
  4. “भागवत भजन मंजरी”, पं. हिम्मतराम छोटालाल शर्मा (1941), पद 47 “देवीनी आरती”
  5. “संध्या पाठ”, साधु करसनदासजी, ईश्वर आश्रम, वांढाय; “उमिया माताजी दर्शन”, उमिया माताजी संस्थान, ऊंझा (2007)
  6. “नवदुर्गा”, स्वामी ब्रह्मवेदांतजी के प्रवचन (2019), आरती की व्याख्या

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