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दुर्गा चालीसा PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/durga-chalisa/
दुर्गा चालीसा देवी दुर्गा की स्तुति है, जो ‘नमो नमो दुर्गे सुख करनी’ से शुरू होती है। इसमें चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक समापन चौपाई है। इसमें देवी के अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी, काली और कई महाविद्याओं के रूपों का स्मरण है। परंपरा में नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है। इसके रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है।
यहाँ वह पाठ दिया गया है जिस पर छपी पुस्तकों और ऑनलाइन संग्रहों में अधिकतर सहमति है; जहाँ स्रोत बराबर बँटे हैं, वहाँ गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तिका (कोड 1033) का पाठ लिया गया है। गीता प्रेस की वर्तनी पुरानी शैली की है, जैसे ‘सक्ति’, ‘संकर’, ‘बिराजै’ और ‘जस’। मुख्य पाठभेद: चौपाई 1 में कई स्रोत ‘नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी’ पढ़ते हैं; कहीं ‘निरंकार’ की जगह ‘निराकार’ है; चौपाई 11 में कई वेबसाइटों पर ‘हिरण्याक्ष’ है, पर गीता प्रेस सहित तीनों छपी पुस्तकों में ‘हिरणाकुश’ (हिरण्यकशिपु) है, और भागवत पुराण (7.8) के अनुसार नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया था, जबकि हिरण्याक्ष को वराह ने मारा (3.19)। चौपाई 15 में कई स्रोत ‘मातंगी अरु धूमावति माता’ पढ़ते हैं; चौपाई 23 में छपी पुस्तकों में ‘काली को धारा’ है; चौपाई 25 में गीता प्रेस का पाठ ‘अमर पुरी औरों सब लोका’ है, और अधिकतर वेबसाइटों पर ‘तव’ (आपकी) की जगह ‘तब’ छपा है; चौपाई 33 में गीता प्रेस ‘सरनागत ह्वै’ पढ़ता है; चौपाई 36 की दूसरी पंक्ति कई स्रोतों में ‘मोह मदादिक सब बिनशावें’ है; चौपाई 40 में ‘जो कोई गावै’ की जगह ‘जो गावै’, ‘जो नित गावै’ या ‘जो जन गावै’ भी मिलता है। कुछ संस्करणों के अंत में यह दोहा भी है: ‘शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक। मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥’ गीता प्रेस और अधिकतर स्रोतों में यह दोहा नहीं है। समापन चौपाई में ‘देवीदास’ नाम आता है, जो कवि की छाप हो सकती है; रचयिता के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?
इसमें 40 चौपाइयाँ हैं और अंत में एक समापन चौपाई (‘देवीदास शरण निज जानी’) है, जिसे अधिकतर संग्रह चालीस की गिनती से बाहर रखते हैं। कुछ संस्करणों में अंत में एक दोहा भी जोड़ा गया है।
दुर्गा चालीसा किसने लिखी?
रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है। समापन चौपाई में ‘देवीदास’ नाम आता है, जो कवि की छाप हो सकती है, पर उनके बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं मिलती। गीता प्रेस की पुस्तिका में भी रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।
दुर्गा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है; कई लोग मंगलवार को भी पढ़ते हैं।
चालीसा में किन असुरों के वध का उल्लेख है?
शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज और महिषासुर का। इनकी कथाएँ दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण का देवी माहात्म्य) में हैं: महिषासुर की अध्याय 2 से 4 में, रक्तबीज की अध्याय 8 में, और निशुम्भ व शुम्भ की अध्याय 9 और 10 में। चौपाई 10 और 11 में नृसिंह रूप और हिरण्यकशिपु के वध का भी उल्लेख है।
चौपाई 11 में ‘हिरण्याक्ष’ सही है या ‘हिरणाकुश’?
कई वेबसाइटों पर ‘हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो’ मिलता है, पर गीता प्रेस सहित तीनों छपी पुस्तकों में ‘हिरणाकुश’ (हिरण्यकशिपु) है। भागवत पुराण (7.8) के अनुसार नृसिंह ने प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु का वध किया था; उसके भाई हिरण्याक्ष को वराह ने मारा था (3.19)। इसलिए यहाँ ‘हिरणाकुश’ पाठ रखा गया है।
स्रोत
- परंपरागत पाठ
- गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीदुर्गाचालीसा एवं श्रीविन्ध्येश्वरीचालीसा’ (पुस्तक कोड 1033)
- रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004)
- लक्ष्मी पब्लिकेशन: ‘दुर्गा सप्तशती’, भाषा टीका, दुर्गा चालीसा और आरती सहित
- असुर-वध के प्रसंग: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2 से 4 और 8 से 10
- नृसिंह और हिरण्यकशिपु: भागवत पुराण 7.8; वराह और हिरण्याक्ष: भागवत पुराण 3.18 और 3.19
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पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, archive.org, drikpanchang.com, hindi.webdunia.com, hindi.webdunia.com, bhaktibharat.com, sanskritdocuments.org, vignanam.org
