चालीसादुर्गा

दुर्गा चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
नवरात्रि की शाम घर में सिंहवाहिनी दुर्गा प्रतिमा और अखंड ज्योति के सामने लाल साड़ी में स्त्री पाठ करती हुई
चित्र: AI से बनाया गया
PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

  1. चौपाई 1

    नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

    सुख देने वाली हे दुर्गा, आपको बार-बार नमस्कार है। दुःख हरने वाली हे अम्बा, आपको बार-बार नमस्कार है।

  2. चौपाई 2

    निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

    आपकी ज्योति निराकार है, उसका कोई आकार नहीं। उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।

  3. चौपाई 3

    शशि ललाट मुख महा विशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

    आपके ललाट पर चंद्रमा शोभित है और आपका मुख बहुत विशाल है। आपकी आँखें लाल हैं और भौंहें भयंकर हैं।

  4. चौपाई 4

    रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

    माँ का रूप बहुत मनोहर है। उनके दर्शन करके भक्त बहुत सुख पाते हैं।

  5. चौपाई 5

    तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥

    संसार की सारी शक्ति आप ही में लीन है। जगत के पालन के लिए अन्न और धन आपने ही दिया है।

  6. चौपाई 6

    अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

    आप अन्नपूर्णा बनकर जगत का पालन करती हैं। आप ही आदि सुंदरी और बाला हैं।

  7. चौपाई 7

    प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी॥

    प्रलय के समय सबका अंत करने वाली आप ही हैं। आप ही भगवान शिव-शंकर की प्रिय गौरी हैं।

  8. चौपाई 8

    शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

    शिव और योगीजन आपके गुण गाते हैं, और ब्रह्मा तथा विष्णु प्रतिदिन आपका ध्यान करते हैं।

  9. चौपाई 9

    रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

    आपने सरस्वती का रूप धारण किया और ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि देकर उनका उद्धार किया।

  10. चौपाई 10

    धरा रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़ कर खम्बा॥

    हे अम्बा, आपने ही नरसिंह का रूप धारण किया और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं।

  11. चौपाई 11

    रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो॥

    आपने प्रह्लाद की रक्षा करके उसे बचाया और हिरण्यकशिपु (हिरणाकुश) का वध करके उसे स्वर्ग भेज दिया।

  12. चौपाई 12

    लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

    संसार में आपने लक्ष्मी का रूप धारण किया और श्री नारायण (विष्णु) के अंग में समाई रहती हैं।

  13. चौपाई 13

    क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

    आप क्षीरसागर में आनंद से निवास करती हैं। हे दया की सागर, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए।

  14. चौपाई 14

    हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

    हिंगलाज में भवानी के रूप में आप ही विराजती हैं। आपकी महिमा अपार है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। (हिंगलाज माता का प्रसिद्ध मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है।)

  15. चौपाई 15

    मातंगी धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

    आप ही मातंगी, धूमावती माता, भुवनेश्वरी और सुख देने वाली बगला (बगलामुखी) हैं। परंपरा में ये नाम दस महाविद्याओं में गिने जाते हैं।

  16. चौपाई 16

    श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

    आप ही भैरवी और जगत को पार उतारने वाली तारा हैं। छिन्न भाल (कटे सिर वाली छिन्नमस्ता) के रूप में आप संसार के दुःख दूर करती हैं।

  17. चौपाई 17

    केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥

    हे भवानी, आप सिंह के वाहन पर शोभा पाती हैं और वीर लांगुर आपके आगे-आगे चलते हैं। (लोक-परंपरा में लांगुर वीर को हनुमान जी या भैरव माना जाता है।)

  18. चौपाई 18

    कर में खप्पर खड्ग विराजे। जाको देख काल डर भाजे॥

    आपके हाथों में खप्पर और खड्ग (तलवार) शोभित हैं, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।

  19. चौपाई 19

    सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

    आपके पास अस्त्र और त्रिशूल शोभित हैं, जिनसे शत्रुओं के हृदय में पीड़ा उठती है।

  20. चौपाई 20

    नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहूँ लोक में डंका बाजत॥

    नगरकोट (हिमाचल प्रदेश का कांगड़ा) में आप ही विराजती हैं, और तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।

  21. चौपाई 21

    शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥

    आपने शुम्भ और निशुम्भ दानवों को मारा और असंख्य रक्तबीजों का संहार किया। (ये कथाएँ दुर्गा सप्तशती के अध्याय 8 से 10 में हैं।)

  22. चौपाई 22

    महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

    असुरों का राजा महिषासुर बहुत अभिमानी था। उसके पापों के बोझ से धरती व्याकुल हो उठी थी।

  23. चौपाई 23

    रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

    तब आपने काली का भयंकर रूप धारण किया और उसे उसकी सेना सहित मार डाला। (महिषासुर की कथा दुर्गा सप्तशती के अध्याय 2 से 4 में है।)

  24. चौपाई 24

    परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

    जब-जब संतों पर भारी संकट आया, तब-तब हे माँ, आपने उनकी सहायता की।

  25. चौपाई 25

    अमरपुरी अरु बासव लोका। तव महिमा सब रहें अशोका॥

    देवताओं की नगरी अमरपुरी और इंद्र (वासव) का लोक, सब आपकी महिमा से शोक-रहित रहते हैं।

  26. चौपाई 26

    ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर नारी॥

    ज्वाला (ज्वालामुखी) में आपकी ही ज्योति जलती है, और स्त्री-पुरुष सदा आपकी पूजा करते हैं। (परंपरा में हिमाचल प्रदेश के ज्वालामुखी मंदिर की ज्योतियों को देवी का रूप माना जाता है।)

  27. चौपाई 27

    प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

    चालीसा कहती है कि जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाता है, दुःख और दरिद्रता उसके पास नहीं आते।

  28. चौपाई 28

    ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

    यह भी कहा गया है कि जो मन लगाकर आपका ध्यान करता है, वह जन्म और मृत्यु के बंधन से छूट जाता है।

  29. चौपाई 29

    जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

    योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग सिद्ध नहीं होता।

  30. चौपाई 30

    शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

    शंकराचार्य ने तप किया और काम और क्रोध, सबको जीत लिया। (यहाँ से चौपाई 34 तक का प्रसंग चालीसा में जैसा कहा गया है, वैसा दिया है; परंपरा में इन्हें आदि शंकराचार्य समझा जाता है।)

  31. चौपाई 31

    निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

    वे दिन-रात शंकर (शिव) का ध्यान करते रहे, पर उन्होंने कभी भी आपका स्मरण नहीं किया।

  32. चौपाई 32

    शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

    वे शक्ति-स्वरूप का रहस्य नहीं समझ पाए। जब उनकी शक्ति चली गई, तब उनका मन पछताया।

  33. चौपाई 33

    शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

    तब उन्होंने आपकी शरण में आकर आपकी कीर्ति का बखान किया: जय जय जय जगदम्बा भवानी।

  34. चौपाई 34

    भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

    आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और उन्होंने बिना देर किए उन्हें फिर से शक्ति दे दी।

  35. चौपाई 35

    मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

    हे माँ, मुझे भारी कष्टों ने घेर रखा है। आपके बिना मेरा दुःख कौन दूर करेगा?

  36. चौपाई 36

    आशा तृष्णा निपट सतावै। रिपु मूरख मोहि अति डरपावै॥

    आशा और तृष्णा मुझे बहुत सताती हैं, और मूर्ख शत्रु मुझे बहुत डराते हैं।

  37. चौपाई 37

    शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

    हे महारानी, मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए। हे भवानी, मैं एकाग्र मन से आपका स्मरण करता हूँ।

  38. चौपाई 38

    करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥

    हे दयालु माँ, कृपा कीजिए और ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल (धन्य) कर दीजिए।

  39. चौपाई 39

    जब लगि जियौं दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥

    जब तक मैं जीऊँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ और सदा आपका यश सुनाता रहूँ।

  40. चौपाई 40

    दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर परमपद (मोक्ष) पाता है।

  41. समापन चौपाई

    देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

    हे जगदम्बा भवानी, देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर उस पर कृपा कीजिए। (‘देवीदास’ कवि की छाप हो सकती है; शब्द का अर्थ ‘देवी का दास’ भी है।)

दुर्गा चालीसा PDF डाउनलोड करें

विज्ञापन

अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/durga-chalisa/

संक्षेप में

दुर्गा चालीसा देवी दुर्गा की स्तुति है, जो ‘नमो नमो दुर्गे सुख करनी’ से शुरू होती है। इसमें चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक समापन चौपाई है। इसमें देवी के अन्नपूर्णा, सरस्वती, लक्ष्मी, काली और कई महाविद्याओं के रूपों का स्मरण है। परंपरा में नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है। इसके रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है।

यहाँ वह पाठ दिया गया है जिस पर छपी पुस्तकों और ऑनलाइन संग्रहों में अधिकतर सहमति है; जहाँ स्रोत बराबर बँटे हैं, वहाँ गीता प्रेस, गोरखपुर की पुस्तिका (कोड 1033) का पाठ लिया गया है। गीता प्रेस की वर्तनी पुरानी शैली की है, जैसे ‘सक्ति’, ‘संकर’, ‘बिराजै’ और ‘जस’। मुख्य पाठभेद: चौपाई 1 में कई स्रोत ‘नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी’ पढ़ते हैं; कहीं ‘निरंकार’ की जगह ‘निराकार’ है; चौपाई 11 में कई वेबसाइटों पर ‘हिरण्याक्ष’ है, पर गीता प्रेस सहित तीनों छपी पुस्तकों में ‘हिरणाकुश’ (हिरण्यकशिपु) है, और भागवत पुराण (7.8) के अनुसार नृसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया था, जबकि हिरण्याक्ष को वराह ने मारा (3.19)। चौपाई 15 में कई स्रोत ‘मातंगी अरु धूमावति माता’ पढ़ते हैं; चौपाई 23 में छपी पुस्तकों में ‘काली को धारा’ है; चौपाई 25 में गीता प्रेस का पाठ ‘अमर पुरी औरों सब लोका’ है, और अधिकतर वेबसाइटों पर ‘तव’ (आपकी) की जगह ‘तब’ छपा है; चौपाई 33 में गीता प्रेस ‘सरनागत ह्वै’ पढ़ता है; चौपाई 36 की दूसरी पंक्ति कई स्रोतों में ‘मोह मदादिक सब बिनशावें’ है; चौपाई 40 में ‘जो कोई गावै’ की जगह ‘जो गावै’, ‘जो नित गावै’ या ‘जो जन गावै’ भी मिलता है। कुछ संस्करणों के अंत में यह दोहा भी है: ‘शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक। मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥’ गीता प्रेस और अधिकतर स्रोतों में यह दोहा नहीं है। समापन चौपाई में ‘देवीदास’ नाम आता है, जो कवि की छाप हो सकती है; रचयिता के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें 40 चौपाइयाँ हैं और अंत में एक समापन चौपाई (‘देवीदास शरण निज जानी’) है, जिसे अधिकतर संग्रह चालीस की गिनती से बाहर रखते हैं। कुछ संस्करणों में अंत में एक दोहा भी जोड़ा गया है।

दुर्गा चालीसा किसने लिखी?

रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है। समापन चौपाई में ‘देवीदास’ नाम आता है, जो कवि की छाप हो सकती है, पर उनके बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं मिलती। गीता प्रेस की पुस्तिका में भी रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।

दुर्गा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों, दुर्गा अष्टमी और शुक्रवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है; कई लोग मंगलवार को भी पढ़ते हैं।

चालीसा में किन असुरों के वध का उल्लेख है?

शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज और महिषासुर का। इनकी कथाएँ दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण का देवी माहात्म्य) में हैं: महिषासुर की अध्याय 2 से 4 में, रक्तबीज की अध्याय 8 में, और निशुम्भ व शुम्भ की अध्याय 9 और 10 में। चौपाई 10 और 11 में नृसिंह रूप और हिरण्यकशिपु के वध का भी उल्लेख है।

चौपाई 11 में ‘हिरण्याक्ष’ सही है या ‘हिरणाकुश’?

कई वेबसाइटों पर ‘हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो’ मिलता है, पर गीता प्रेस सहित तीनों छपी पुस्तकों में ‘हिरणाकुश’ (हिरण्यकशिपु) है। भागवत पुराण (7.8) के अनुसार नृसिंह ने प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु का वध किया था; उसके भाई हिरण्याक्ष को वराह ने मारा था (3.19)। इसलिए यहाँ ‘हिरणाकुश’ पाठ रखा गया है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. गीता प्रेस, गोरखपुर: ‘श्रीदुर्गाचालीसा एवं श्रीविन्ध्येश्वरीचालीसा’ (पुस्तक कोड 1033)
  3. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004)
  4. लक्ष्मी पब्लिकेशन: ‘दुर्गा सप्तशती’, भाषा टीका, दुर्गा चालीसा और आरती सहित
  5. असुर-वध के प्रसंग: दुर्गा सप्तशती, अध्याय 2 से 4 और 8 से 10
  6. नृसिंह और हिरण्यकशिपु: भागवत पुराण 7.8; वराह और हिरण्याक्ष: भागवत पुराण 3.18 और 3.19

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ

पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, archive.org, drikpanchang.com, hindi.webdunia.com, hindi.webdunia.com, bhaktibharat.com, sanskritdocuments.org, vignanam.org