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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shani-chalisa/
शनि चालीसा शनिदेव की स्तुति है, जिसकी पहली चौपाई ‘जयति जयति शनिदेव दयाला’ है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा है। इसमें शनि के दस नाम, राम, विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र और नल की कथाएँ, और शनि के वाहनों से जुड़ी लोक-मान्यता आती है। 40वीं चौपाई में कवि राम सुन्दर का नाम है। परंपरा में शनिवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है।
चौपाई 27 से 35 में शनि के सात वाहनों और चार ‘चरणों’ (सोना, लोहा, चाँदी, ताँबा) के फल बताए गए हैं। ये पंक्तियाँ एक लोक-ज्योतिषीय मान्यता को दर्शाती हैं। पारंपरिक पाठ पूरा देने के लिए ये यहाँ चालीसा के शब्दों के रूप में दी गई हैं; सनातनबोध न इनका समर्थन करता है, न इनके आधार पर कोई भविष्यवाणी करता है। पाठ तीन छपी पुस्तिकाओं (रणधीर प्रकाशन की ‘51 चालीसा संग्रह’, अमित पॉकेट बुक्स, जालंधर की ‘शनि चालीसा आरती सहित’ और नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली की पुस्तिका) और पाँच वेबसाइटों से शब्द-शब्द मिलाया गया है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 5 में ‘पल में’; चौपाई 14 में ‘वीर का’ और ‘वीर को’; चौपाई 15 में ‘तुहि’ की जगह ‘जब’; चौपाई 17 में ‘तेलहिं’; चौपाई 18 में ‘ह्वै’ की जगह ‘है’; चौपाई 19 में ‘हरिश्चन्द्रहुँ’; चौपाई 27 में ‘जग दिग्गज’ की जगह ‘हय दिग्ज’ (घोड़ा, हाथी); चौपाई 35 में ‘मंगल कारी’; चौपाई 37 में ‘नशि बल’ और ‘नसि-नसि’। अंतिम दोहे में छपी पुस्तक और कई वेबसाइटें ‘की हों भक्त तैयार’ पढ़ती हैं, जबकि कुछ स्रोत ‘कीन्हों विमल तैयार’ पढ़ते हैं; ‘विमल’ वाला दोहा छपी पुस्तकों में एक दूसरी शनि चालीसा (‘शनिदेव मैं सुमिरौं तोही’) के अंत में आता है। नाथ पुस्तक भंडार (2006) के पाठ में चौपाई 27 से 35 की जगह नौ वाहनों वाली अलग चौपाइयाँ और अलग समापन दोहे हैं। गीता प्रेस का कोई संस्करण नहीं मिला।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शनि चालीसा किसने लिखी?
चौपाई 40 में कवि का नाम राम सुन्दर आता है (‘कहत राम सुन्दर प्रभु दासा’), और परंपरा इसे उन्हीं की रचना मानती है। नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली (2006) की पुस्तिका के अंत में लिखा है कि यह प्रयाग के दुर्वासा आश्रम के रामसुन्दर दास की रचना है; इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती। अंतिम दोहे का ‘भक्त’ कवि का उपनाम लगता है।
शनि चालीसा का पाठ कब किया जाता है?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में शनिवार और शनि जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। चालीसा की चौपाई 39 में शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाने और दीपदान का उल्लेख है।
वाहनों और ‘चरणों’ वाली चौपाइयों को कैसे समझें?
चौपाई 27 से 35 में शनि के सात वाहनों और चार धातु-‘चरणों’ के अलग-अलग फल बताए गए हैं, और चालीसा स्वयं कहती है कि ये फल ज्योतिष बताता है। यह एक लोक-मान्यता है। सनातनबोध इन पंक्तियों को चालीसा के पूरे पाठ के हिस्से के रूप में देता है; इनके आधार पर किसी व्यक्ति के लिए कोई भविष्यवाणी नहीं करता।
चालीसा में किन कथाओं का उल्लेख है?
राम का वनवास, सीता-हरण, लक्ष्मण को शक्ति लगना और लंका-दहन; राजा विक्रमादित्य और नौलखा हार की लोककथा; हरिश्चंद्र और नल; शिव और सती; गणेश का सिर (ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड में शनि की दृष्टि से गणेश का सिर कटने की कथा है); और पांडव। चालीसा इन सब कष्टों को शनि की दशा से जोड़ती है; पुराने ग्रंथों में कई जगह कारण अलग है, जैसे महाभारत (वन पर्व) में नल को कलि ने सताया था।
क्या शनि चालीसा एक से अधिक हैं?
हाँ। छपी पुस्तकों में ‘शनिदेव मैं सुमिरौं तोही’, ‘शनिदेव कृपालु रवि-नन्दन’ और ‘जय श्री शनि देव महाराजा’ से शुरू होने वाली दूसरी शनि चालीसा भी मिलती हैं। इस पेज पर वह चालीसा है जो सबसे अधिक पढ़ी जाती है: ‘जयति जयति शनिदेव दयाला’।
स्रोत
- परंपरागत पाठ (राम सुन्दर)
- रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), ‘श्री शनि चालीसा (२)’, पृ. 59 से 62
- अमित पॉकेट बुक्स, जालंधर: ‘शनि चालीसा आरती सहित’, पृ. 22 से 29
- नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली (2006): ‘शनि चालीसा’, पृ. 1 से 11 (अलग पाठ-परंपरा)
- गणेश के सिर की कथा: ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड
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पाठ का मिलान: archive.org, archive.org, archive.org, sanskritdocuments.org, bhaktibharat.com, drikpanchang.com, hindi.webdunia.com
