चालीसाशनिदेव

शनि चालीसा

रचना: राम सुन्दर (परंपरा अनुसार)

परंपरा में: शनिवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा 1

    जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

    हे गिरिजा के पुत्र गणेश, मंगल करने वाले कृपालु, आपकी जय हो। हे नाथ, दीन-दुखियों के दुख दूर करके उन्हें निहाल (प्रसन्न) कीजिए।

  2. दोहा 2

    जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

    हे प्रभु श्री शनिदेव, आपकी जय हो। हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्य के पुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।

  3. चौपाई 1

    जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

    हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो। आप सदा भक्तों की रक्षा और पालन करते हैं।

  4. चौपाई 2

    चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

    आपकी चार भुजाएँ हैं और साँवला शरीर शोभा देता है। माथे पर रत्नों का मुकुट सुंदर लगता है।

  5. चौपाई 3

    परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

    आपका माथा बहुत चौड़ा और मनोहर है। आपकी दृष्टि तिरछी और भौंहें भयंकर हैं।

  6. चौपाई 4

    कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमके॥

    कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं, और छाती पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।

  7. चौपाई 5

    कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

    आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और कुठार (फरसा) है, जिनसे आप पल भर में शत्रु का संहार कर देते हैं।

  8. चौपाई 6

    पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

    पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन,

  9. चौपाई 7

    सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

    सौरि, मंद और शनि: ये सूर्यपुत्र के दस नाम हैं। चालीसा कहती है कि इन नामों से पूजने वालों के सब काम बनते हैं।

  10. चौपाई 8

    जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

    चालीसा के अनुसार जिस पर प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, उस निर्धन को भी वे क्षण भर में राजा बना देते हैं।

  11. चौपाई 9

    पर्वतहू तृण होइ निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

    उनके देखते ही पर्वत तिनका बन जाता है, और वे तिनके को भी पर्वत बना देते हैं।

  12. चौपाई 10

    राज मिलत बन रामहिं दीन्ह्यो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्ह्यो॥

    चालीसा के अनुसार राम को राज मिलने वाला था, तब आपने उन्हें वनवास दे दिया, और कैकेयी की बुद्धि भी हर ली।

  13. चौपाई 11

    बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

    वन में भी कपट का मृग (मायावी हिरन) दिखाई दिया, और माता जानकी चुरा ली गईं।

  14. चौपाई 12

    लखनहिं शक्ति विकल करि डारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

    शक्ति (अस्त्र) ने लक्ष्मण को मूर्च्छित कर दिया, और सेना में हाहाकार मच गया।

  15. चौपाई 13

    रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

    रावण की चाल और बुद्धि बौरा गई, और उसने रामचंद्र से बैर बढ़ा लिया।

  16. चौपाई 14

    दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

    सोने की लंका मिट्टी में मिल गई, और वीर बजरंगबली (हनुमान) का डंका बजा।

  17. चौपाई 15

    नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

    जब आपने राजा विक्रमादित्य पर पाँव रखा (उन पर आपकी दशा आई), तो चित्र में बना मोर हार निगल गया। यह शनि की लोककथा का प्रसंग है।

  18. चौपाई 16

    हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

    नौलखा हार की चोरी का दोष राजा पर लगा, और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।

  19. चौपाई 17

    भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

    आपने उन्हें बहुत बुरी दशा दिखाई, और तेली के घर कोल्हू चलवाया।

  20. चौपाई 18

    विनय राग दीपक महँ कीन्ह्यों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्ह्यों॥

    जब राजा ने राग दीपक में आपकी विनती गाई, तब आपने प्रसन्न होकर उन्हें सुख दिया।

  21. चौपाई 19

    हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुँ भरे डोम घर पानी॥

    चालीसा के अनुसार आपकी दशा में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई, और स्वयं राजा को डोम के घर पानी भरना पड़ा।

  22. चौपाई 20

    तैसे नल पर दशा सिरानी। भूँजी-मीन कूद गई पानी॥

    ऐसे ही राजा नल पर बुरी दशा आई, यहाँ तक कि भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।

  23. चौपाई 21

    श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

    चालीसा के अनुसार जब आपकी दशा ने शंकर को घेरा, तो पार्वती को (अपने पहले जन्म में) सती होना पड़ा।

  24. चौपाई 22

    तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

    गुस्से में आपके ज़रा सा देखते ही गौरी के पुत्र (गणेश) का सिर उड़कर आकाश में चला गया।

  25. चौपाई 23

    पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

    पांडवों पर आपकी दशा आई, तो द्रौपदी निर्वस्त्र होते-होते बचीं।

  26. चौपाई 24

    कौरव के भी गति मति मार्यो। युद्ध महाभारत करि डार्यो॥

    आपने कौरवों की भी चाल और बुद्धि मार दी, और महाभारत का युद्ध करा दिया।

  27. चौपाई 25

    रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि पर्यो पाताला॥

    चालीसा के अनुसार आपने तुरंत सूर्य को मुँह में रख लिया और उन्हें लेकर पाताल में कूद पड़े।

  28. चौपाई 26

    शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

    यह देखकर शेषनाग और देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को मुँह से छोड़ दिया।

  29. चौपाई 27

    वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

    चालीसा के अनुसार प्रभु के सात वाहन हैं: हाथी (दिग्गज), गधा, हिरन, कुत्ता,

  30. चौपाई 28

    जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

    सियार, सिंह और दूसरे नख वाले पशु। चालीसा कहती है कि इनके फल ज्योतिष पुकारकर बताता है।

  31. चौपाई 29

    गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥

    चालीसा के अनुसार हाथी पर आएँ तो घर में लक्ष्मी आती है, और घोड़े पर आएँ तो सुख-संपत्ति होती है।

  32. चौपाई 30

    गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

    चालीसा के अनुसार गधा कई कामों में हानि करता है, और सिंह राज-समाज में सफलता देता है।

  33. चौपाई 31

    जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

    चालीसा के अनुसार सियार बुद्धि नष्ट करता है, और हिरन कष्ट देता है और प्राणों पर संकट लाता है।

  34. चौपाई 32

    जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

    चालीसा के अनुसार जब प्रभु कुत्ते की सवारी पर आते हैं, तो चोरी आदि का बड़ा डर रहता है।

  35. चौपाई 33

    तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

    चालीसा के अनुसार इसी तरह उनके चार ‘चरण’ (पाद) हैं, जिनके नाम हैं: सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।

  36. चौपाई 34

    लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

    चालीसा के अनुसार जब प्रभु लोहे के चरण पर आते हैं, तो धन, परिवार और संपत्ति का नाश कराते हैं।

  37. चौपाई 35

    समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

    चालीसा के अनुसार ताँबा समान (मध्यम) फल देता है, चाँदी शुभ है, और सोना सब सुख और बड़ा मंगल देता है।

  38. चौपाई 36

    जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुँ न दशा निकृष्ट सतावै॥

    चालीसा कहती है कि जो शनि के इस चरित्र को रोज़ गाता है, उसे बुरी दशा कभी नहीं सताती।

  39. चौपाई 37

    अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

    नाथ अद्भुत लीला दिखाते हैं, और शत्रु के बल को नष्ट करके ढीला कर देते हैं।

  40. चौपाई 38

    जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

    जो योग्य पंडित को बुलाकर विधि से शनि ग्रह की शांति कराता है,

  41. चौपाई 39

    पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥

    और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाता है और दीपदान करता है, चालीसा के अनुसार वह बहुत सुख पाता है।

  42. चौपाई 40

    कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

    प्रभु के दास राम सुन्दर कहते हैं: शनि का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।

  43. समापन दोहा

    पाठ शनिश्चर देव को, की हों ‘भक्त’ तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

    शनैश्चर देव का यह पाठ ‘भक्त’ ने तैयार किया है। चालीसा कहती है कि चालीस दिन इसका पाठ करने से मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shani-chalisa/

संक्षेप में

शनि चालीसा शनिदेव की स्तुति है, जिसकी पहली चौपाई ‘जयति जयति शनिदेव दयाला’ है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा है। इसमें शनि के दस नाम, राम, विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र और नल की कथाएँ, और शनि के वाहनों से जुड़ी लोक-मान्यता आती है। 40वीं चौपाई में कवि राम सुन्दर का नाम है। परंपरा में शनिवार को इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

चौपाई 27 से 35 में शनि के सात वाहनों और चार ‘चरणों’ (सोना, लोहा, चाँदी, ताँबा) के फल बताए गए हैं। ये पंक्तियाँ एक लोक-ज्योतिषीय मान्यता को दर्शाती हैं। पारंपरिक पाठ पूरा देने के लिए ये यहाँ चालीसा के शब्दों के रूप में दी गई हैं; सनातनबोध न इनका समर्थन करता है, न इनके आधार पर कोई भविष्यवाणी करता है। पाठ तीन छपी पुस्तिकाओं (रणधीर प्रकाशन की ‘51 चालीसा संग्रह’, अमित पॉकेट बुक्स, जालंधर की ‘शनि चालीसा आरती सहित’ और नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली की पुस्तिका) और पाँच वेबसाइटों से शब्द-शब्द मिलाया गया है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 5 में ‘पल में’; चौपाई 14 में ‘वीर का’ और ‘वीर को’; चौपाई 15 में ‘तुहि’ की जगह ‘जब’; चौपाई 17 में ‘तेलहिं’; चौपाई 18 में ‘ह्वै’ की जगह ‘है’; चौपाई 19 में ‘हरिश्चन्द्रहुँ’; चौपाई 27 में ‘जग दिग्गज’ की जगह ‘हय दिग्ज’ (घोड़ा, हाथी); चौपाई 35 में ‘मंगल कारी’; चौपाई 37 में ‘नशि बल’ और ‘नसि-नसि’। अंतिम दोहे में छपी पुस्तक और कई वेबसाइटें ‘की हों भक्त तैयार’ पढ़ती हैं, जबकि कुछ स्रोत ‘कीन्हों विमल तैयार’ पढ़ते हैं; ‘विमल’ वाला दोहा छपी पुस्तकों में एक दूसरी शनि चालीसा (‘शनिदेव मैं सुमिरौं तोही’) के अंत में आता है। नाथ पुस्तक भंडार (2006) के पाठ में चौपाई 27 से 35 की जगह नौ वाहनों वाली अलग चौपाइयाँ और अलग समापन दोहे हैं। गीता प्रेस का कोई संस्करण नहीं मिला।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनि चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 40 में कवि का नाम राम सुन्दर आता है (‘कहत राम सुन्दर प्रभु दासा’), और परंपरा इसे उन्हीं की रचना मानती है। नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली (2006) की पुस्तिका के अंत में लिखा है कि यह प्रयाग के दुर्वासा आश्रम के रामसुन्दर दास की रचना है; इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती। अंतिम दोहे का ‘भक्त’ कवि का उपनाम लगता है।

शनि चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में शनिवार और शनि जयंती पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है। चालीसा की चौपाई 39 में शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाने और दीपदान का उल्लेख है।

वाहनों और ‘चरणों’ वाली चौपाइयों को कैसे समझें?

चौपाई 27 से 35 में शनि के सात वाहनों और चार धातु-‘चरणों’ के अलग-अलग फल बताए गए हैं, और चालीसा स्वयं कहती है कि ये फल ज्योतिष बताता है। यह एक लोक-मान्यता है। सनातनबोध इन पंक्तियों को चालीसा के पूरे पाठ के हिस्से के रूप में देता है; इनके आधार पर किसी व्यक्ति के लिए कोई भविष्यवाणी नहीं करता।

चालीसा में किन कथाओं का उल्लेख है?

राम का वनवास, सीता-हरण, लक्ष्मण को शक्ति लगना और लंका-दहन; राजा विक्रमादित्य और नौलखा हार की लोककथा; हरिश्चंद्र और नल; शिव और सती; गणेश का सिर (ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड में शनि की दृष्टि से गणेश का सिर कटने की कथा है); और पांडव। चालीसा इन सब कष्टों को शनि की दशा से जोड़ती है; पुराने ग्रंथों में कई जगह कारण अलग है, जैसे महाभारत (वन पर्व) में नल को कलि ने सताया था।

क्या शनि चालीसा एक से अधिक हैं?

हाँ। छपी पुस्तकों में ‘शनिदेव मैं सुमिरौं तोही’, ‘शनिदेव कृपालु रवि-नन्दन’ और ‘जय श्री शनि देव महाराजा’ से शुरू होने वाली दूसरी शनि चालीसा भी मिलती हैं। इस पेज पर वह चालीसा है जो सबसे अधिक पढ़ी जाती है: ‘जयति जयति शनिदेव दयाला’।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ (राम सुन्दर)
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), ‘श्री शनि चालीसा (२)’, पृ. 59 से 62
  3. अमित पॉकेट बुक्स, जालंधर: ‘शनि चालीसा आरती सहित’, पृ. 22 से 29
  4. नाथ पुस्तक भंडार, दिल्ली (2006): ‘शनि चालीसा’, पृ. 1 से 11 (अलग पाठ-परंपरा)
  5. गणेश के सिर की कथा: ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खंड

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