सम्प्रदाय

दादू पंथ (दादूपंथी)

संक्षेप में

दादू पंथ संत दादू दयाल (1544–1603) के अनुयायियों का पंथ है, जिसका मुख्य केंद्र राजस्थान में जयपुर के पास नरैना (नारायणा) का दादूद्वारा है, जहाँ दादू का देहांत हुआ। दादू ने एक निराकार परमेश्वर की भक्ति और उसके नाम का स्मरण सिखाया, जिसे वे राम, हरि, गोविंद जैसे नामों से पुकारते हैं; उनकी साखियों और पदों का संग्रह दादूवाणी (बाणी) कहलाता है, और दादूद्वारों में मूर्ति के स्थान पर इसी ग्रंथ की पूजा होती है। अनुयायी गृहस्थ भी हैं, जिन्हें सेवक कहते हैं, और साधु भी; ट्रेल (1911) और फ़र्क़ुहार (1920) साधुओं की पाँच शाखाएँ गिनाते हैं: खालसा, नागा, उत्तराधी, विरक्त और खाकी।

संस्थापक
दादू दयाल, 1544–1603 (वि.सं. 1601–1660); परंपरा में जन्म अहमदाबाद, देहांत नरैना
उपास्य
एक निराकार परमेश्वर, जिसे दादू राम, हरि, गोविंद, माधव जैसे नामों से पुकारते हैं; ओर (1947) के अनुसार विष्णु, शिव या ब्रह्मा नाम वे परमेश्वर के लिए नहीं लेते
साधना
नाम-स्मरण (राम के नाम का जप); दादूद्वारों में सुबह-शाम वाणी की आरती
मुख्य ग्रंथ
दादूवाणी (बाणी): 37 अंगों में साखियाँ, और रागों में पद; सुंदरदास की रचनाएँ भी पूजा में गाई जाती हैं
मुख्य पीठ
नरैना (नारायणा), जयपुर ज़िला; मान्य दादूद्वारे: नरैना, आमेर, सांभर और भैराणा
शाखाएँ
खालसा, नागा, उत्तराधी, विरक्त, खाकी (ट्रेल, फ़र्क़ुहार); गृहस्थ अनुयायी सेवक कहलाते हैं
प्रमुख शिष्य
गरीबदास और मिस्कीनदास (दादू के पुत्र), रज्जब, सुंदरदास (छोटे), जनगोपाल, बनवारीदास; परंपरा 152 शिष्य और उनमें 52 के “थांभे” गिनाती है

दादू दयाल का जीवन संक्षेप में

डब्ल्यू. जी. ओर (1947) दादू के जीवन का परंपरागत विवरण जनगोपाल की “दादू जन्मलीला” से देते हैं, जिसे वे दादू के देहांत के कुछ ही बाद लिखी मानते हैं। उसके अनुसार दादू का जन्म वि.सं. 1601 (सन् 1544) में अहमदाबाद में हुआ; ग्यारह वर्ष की आयु में एक वृद्ध साधु ने उन्हें आशीर्वाद और उपदेश दिया, और अठारह वर्ष की आयु में वे घर छोड़कर साधना में लग गए। छह वर्ष गुजरात और राजस्थान के बीच घूमने के बाद पच्चीस वर्ष की आयु में वे सांभर में बस गए, फिर आमेर में चौदह वर्ष परिवार के साथ रहे, परंपरा के अनुसार अकबर से मिले (वि.सं. 1642, सन् 1584–85), और वि.सं. 1659 (सन् 1602) में नरैना आए, जहाँ वि.सं. 1660 (सन् 1603) में उनका देहांत हुआ।

ओर लिखते हैं कि 1544 का जन्म-वर्ष संभवतः सही है, और 1603 में 59 वर्ष की आयु में देहांत ऐसी बात नहीं जिसमें शिष्यों से भूल होती; सांभर, आमेर और नरैना से दादू का गहरा संबंध स्थानीय परंपरा से पूरी तरह स्थापित है। देहांत के बाद शिष्य उनका शरीर लगभग बारह मील दूर भैराणा की पहाड़ी पर ले गए। उनके बड़े पुत्र गरीबदास नरैना की गद्दी पर बैठे, पर ओर के अनुसार जल्दी ही पद छोड़कर भजन और साधना में लगे रहे और 1636 में उनका देहांत हुआ; आगे नरैना की गद्दी छोटे पुत्र मिस्कीनदास के वंश में रही।

दादू की शिक्षा

जॉन ट्रेल (1911) दादूवाणी के आधार पर लिखते हैं कि दादू ने जाति और जाति-चिह्नों, मूर्ति-पूजा, तीर्थयात्रा और कर्मकांडी स्नान को नकारा, और बार-बार कहा कि वे न हिंदू हैं न मुसलमान, छह दर्शनों में से किसी के नहीं, वे दयालु परमेश्वर से प्रेम करते हैं। भंडारकर (1913) के अनुसार दादू की उपासना का एकमात्र रूप राम-नाम का जप था; उनका सम्प्रदाय राम की मूर्तियों की पूजा नहीं करता था और मंदिर नहीं बनाता था, और उनकी शिक्षा कबीर से मिलती-जुलती है। ट्रेल के अनुसार दादू ईश्वर को एक, अपरिवर्तनशील, निराकार और सर्वत्र व्याप्त बताते हैं, और उनकी सबसे लंबी रचना “विरह” का अंग है, जिसमें आत्मा ईश्वर से मिलने के लिए तड़पती है।

दादूवाणी और दादूद्वारे की पूजा

ओर के अनुसार परंपरा यह है कि दादू ने अपनी रचनाएँ स्वयं नहीं लिखीं; उनके वचन शिष्यों ने लिखे और याद रखे, जिनमें रज्जब, टीला, मोहन दफ़्तरी, जगन्नाथ और संतदास के नाम विशेष रूप से आते हैं। रज्जब के संपादन में साखियाँ विषय के अनुसार अंगों (अध्यायों) में बाँटी गईं; यह रूप “अंगबंधु बाणी” कहलाता है। वाणी के दो भाग हैं: 37 अंगों में साखियाँ (दोहे), और रागों में बँधे पद। ओर ने जो सबसे पुरानी प्रति देखी, वह वि.सं. 1718 (सन् 1661) की है, और उसका पाठ आज की छपी प्रतियों से बहुत अलग नहीं है।

ओर के अनुसार दादूद्वारे में गद्दी पर रखी वाणी हिंदू मंदिर की मूर्ति का स्थान लेती है। सुबह और शाम आरती होती है: सुबह मंगलाचरण और वाणी के चुने हुए अंशों का पाठ, और शाम को दंडवत, वाणी की आरती, फिर सुंदरदास के पद, और अंत में दंडवत। नरैना के मंदिर में केवल वाणी की एक बहुत पुरानी हस्तलिखित प्रति दिखती है; उसके नीचे दादू के वस्त्र रखे हैं, और फ़र्क़ुहार के अनुसार वहाँ दादू की खड़ाऊँ और वस्त्र पूजे जाते हैं। मंदिर के परिसर में खेजड़ी का वह पेड़ है जिसकी छाया में दादू ने देह छोड़ी; ओर लिखते हैं कि कोई दादूपंथी वहाँ दंडवत किए बिना नहीं लौटता। ओर के अनुसार पंथ में दीक्षा पर कोई गुप्त मंत्र नहीं दिया जाता; वाणी का मंगलाचरण और ईश्वर के चौबीस नाम सिखाए जाते हैं।

पंथ की शाखाएँ

ट्रेल (1911) के अनुसार पंथ में दो वर्ग हैं: गृहस्थ अनुयायी, जो विवाह कर सकते हैं और कोई भी उचित काम कर सकते हैं, और साधु, जो वाणी की शिक्षा में लगे रहते हैं। फ़र्क़ुहार के अनुसार गृहस्थ “सेवक” कहलाते हैं और “दादूपंथी” शब्द साधुओं के लिए है। ट्रेल और फ़र्क़ुहार साधुओं की पाँच शाखाएँ गिनाते हैं, और ओर लिखते हैं कि ये भेद मत के नहीं, स्थान और जीवन-शैली के हैं, और एक-दूसरे से पूरी तरह अलग भी नहीं; सबसे बड़ा भेद युद्ध करने वाले नागा और बाकी साधुओं के बीच रहा।

खालसा: नरैना के मूल दादूद्वारे से, या दादू के सीधे शिष्यों के बसाए थांभों से जुड़े साधु; नरैना में पूरे पंथ के प्रमुख महंत रहते हैं और हर वर्ष बड़ा मेला लगता है (ट्रेल); ओर के अनुसार खालसा सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं और पूरे पंथ की देखरेख उन्हीं के पास है। उत्तराधी: बनवारीदास की शाखा, जिन्होंने हिसार के रतिया में अपना स्थान बनाया; ओर के अनुसार ये राजस्थान की उत्तरी सीमा पार हिसार और रोहतक तक पंथ ले गए, और खेती, वैद्यकी, शिक्षा और व्यापार में लगे रहे। विरक्त: पैसे को न छूने वाले, घूमते रहने वाले और अध्ययन में लगे साधु, जो ट्रेल के अनुसार वाणी के साथ संस्कृत के कठिन ग्रंथ भी पढ़ाते हैं। खाकी: शरीर पर भस्म लगाने वाले, जटाधारी, तप पर ज़ोर देने वाले साधु, जो छोटी टोलियों में घूमते हैं (ट्रेल)।

नागा: हथियार उठाने वाले साधु। परंपरा इनका आरंभ दादू के शिष्य सुंदरदास (बड़े) से मानती है; ओर के अनुसार इनका विधिवत संगठन नरैना के महंत जैत साहब (1693–1732) के समय हुआ, और इतिहास में पहली बार ये 1779 में खाटू की लड़ाई में जयपुर की ओर से लड़ते दिखते हैं। ट्रेल (1911) और फ़र्क़ुहार लिखते हैं कि लगभग 20,000 नागा जयपुर की सीमा पर नौ छावनियों में रहकर राज्य की रक्षा करते थे; ओर के अनुसार 1938 में जयपुर राज्य ने उनकी चार पुरानी जमातें भंग कर दीं, और उनकी संख्या घटाकर 1,140 कर दी गई।

रज्जब और सुंदरदास

रज्जब (रज्जब अली ख़ाँ) आमेर के पास सांगानेर के थे और ओर के अनुसार दादू के बाद पंथ में सबसे अधिक मान उन्हीं का रहा। प्रचलित कथा के अनुसार अपने विवाह के दिन ही उन्होंने संसार छोड़ने का निश्चय किया, और दादू के कहने पर जीवन भर दूल्हे का वेश पहने रहे; ओर बताते हैं कि यह कथा जनगोपाल के विवरण में नहीं है। रज्जब दादू के देहांत के समय नरैना में थे, उन्होंने दादू की वाणी को संभालने और सजाने का काम किया, उनकी अपनी वाणी भी है, और उनके अनुयायी “रज्जबपंथी” या “रज्जबावत” कहलाते हैं। उनका देहांत सांगानेर में बहुत बड़ी आयु में हुआ।

सुंदरदास (छोटे), जिन्हें ओर दादू के शिष्यों में “सबसे छोटे और यश में सबसे बड़े” बताते हैं, 1596 में दौसा में जन्मे और बचपन में दादू से मिले। ओर के अनुसार वे 1606 से 1625 तक काशी में रहकर व्याकरण, काव्य और दर्शन पढ़ते रहे, फिर शेखावाटी के फतेहपुर में बसे, उत्तर भारत, गुजरात, पंजाब और दक्कन तक घूमे, और 1689 में सांगानेर में उनका देहांत हुआ। फ़र्क़ुहार उन्हें हिंदी का प्रसिद्ध कवि बताते हैं; उनके पद आज भी दादूद्वारों की शाम की आरती में गाए जाते हैं।

स्रोतों में अंतर

  • दादू का जन्म और परिवार: परंपरा (जनगोपाल का विवरण) बताती है कि अहमदाबाद के एक व्यापारी को नदी में बहती टोकरी में शिशु मिला, जिसे उन्होंने पाला; ओर लिखते हैं कि व्यापारी का नाम, लोदीराम, जनगोपाल की कविता में नहीं, बाद के साहित्य में आता है। ट्रेल (1911) लोदीराम को दादू का पिता बताते हैं; भंडारकर (1913) लिखते हैं कि दादू अहमदाबाद में रुई धुनने का काम करते थे; और ओर (1947) का मत है कि दादू का आरंभिक जीवन एक मुस्लिम परिवार में बीता।
  • दादू के गुरु: परंपरा के अनुसार ग्यारह वर्ष की आयु में जिस वृद्ध ने दादू को उपदेश दिया, वे स्वयं परमेश्वर थे, और उन्हें “बुड्ढन” (वृद्ध) कहा जाता है; सुंदरदास अपनी “गुरु सम्प्रदाय” रचना में उन्हें “वृद्धानंद” कहकर एक लंबी गुरु-परंपरा देते हैं, जिसे ओर गंभीरता से लिखी हुई नहीं मानते; ओर का अपना मत है कि बुड्ढन सांभर के एक ऐतिहासिक मुस्लिम संत थे।
  • शाखाओं की गिनती: ट्रेल (1911) और फ़र्क़ुहार (1920) पाँच शाखाएँ गिनाते हैं; भंडारकर (1913) तीन वर्ग देते हैं, विरक्त, नागा और गृहस्थ (“विस्तरधारी”); ओर (1947) लिखते हैं कि ये शाखाएँ अलग सम्प्रदाय नहीं हैं, और विरक्त या खाकी किसी भी शाखा से हो सकते हैं।
  • दादूवाणी का आकार: ट्रेल और फ़र्क़ुहार इसे 37 अध्यायों में लगभग 5,000 पद बताते हैं; ओर के अनुसार साखियाँ दो से तीन हज़ार दोहे हैं, जो 37 अंगों में बँटे हैं, और उनके साथ रागों में पद हैं।
  • शिष्यों की संख्या: परंपरा 152 शिष्य और उनमें 52 के “थांभे” (स्थान) गिनाती है (ट्रेल; फ़र्क़ुहार 52 शिष्य कहते हैं); ओर मानते हैं कि अनेक शिष्यों ने सचमुच अपने स्थान बसाए, पर “बावन” की गिनती बाद के संगठन को पीछे के इतिहास पर लगाना है।
  • नागाओं के संस्थापक: ट्रेल सुंदरदास (बड़े) को बीकानेर के एक राजपूत बताते हैं, जिन्होंने अपने अनुयायियों को सैनिक बनाया; ओर लिखते हैं कि उनके बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है, उनकी कथा बाद की है और पहली बार राघवदास के भक्तमाल (1713) में आती है।
  • नरैना की दूरी: ट्रेल के अनुसार जयपुर से लगभग 40 मील दक्षिण-पश्चिम और सांभर से 8 मील; फ़र्क़ुहार के अनुसार जयपुर से 40 मील; भंडारकर के अनुसार जयपुर से लगभग 20 कोस।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दादू पंथ की स्थापना कब और किसने की?

पंथ संत दादू दयाल (1544–1603) के अनुयायियों से बना। ओर (1947) के अनुसार अलग सम्प्रदाय का रूप दादू के देहांत के बाद धीरे-धीरे बना; दादू के पुत्र गरीबदास पहले गद्दी पर बैठे, और नरैना के महंत जैत साहब (1693–1732) के समय पंथ का संगठन पक्का हुआ।

दादू पंथ की प्रमुख पीठ कहाँ है?

नरैना (नारायणा), जयपुर ज़िला, राजस्थान, जहाँ दादू का देहांत हुआ और जहाँ पंथ के प्रमुख महंत रहते हैं। ओर के अनुसार केवल चार दादूद्वारे मान्य हैं, जिनका दादू से सीधा संबंध है: नरैना, आमेर, सांभर और भैराणा।

दादू पंथ की शाखाएँ कौन सी हैं?

ट्रेल (1911) और फ़र्क़ुहार (1920) के अनुसार पाँच: खालसा (नरैना), नागा (हथियारबंद साधु), उत्तराधी (बनवारीदास की शाखा), विरक्त और खाकी। गृहस्थ अनुयायी सेवक कहलाते हैं। भंडारकर तीन वर्ग गिनाते हैं।

दादूवाणी क्या है?

दादू की साखियों (दोहों) और पदों का संग्रह, जिसे उनके शिष्यों ने लिखा और संभाला; रज्जब के संपादन में साखियाँ 37 अंगों में बँटी हैं। दादूद्वारों में यही ग्रंथ पूजा जाता है।

क्या दादू पंथ में मूर्ति-पूजा होती है?

दादू ने मूर्ति-पूजा को नकारा, और दादूद्वारों में मूर्ति के स्थान पर दादूवाणी की पूजा होती है (भंडारकर; ओर)। ओर यह भी लिखते हैं कि नागाओं के कुछ स्थानों पर हिंदू देवताओं की छोटी मूर्तियाँ भी मिलती हैं।

रज्जब और सुंदरदास कौन थे?

दादू के दो प्रसिद्ध शिष्य। सांगानेर के रज्जब ने दादूवाणी को अंगों में सजाया और उनकी अपनी वाणी भी है; सुंदरदास (1596–1689) काशी में पढ़े, हिंदी के प्रसिद्ध कवि हुए, और उनके पद दादूद्वारों की आरती में गाए जाते हैं।

स्रोत

  1. डब्ल्यू. जी. ओर, A Sixteenth-Century Indian Mystic: Dadu and His Followers (लटरवर्थ प्रेस, लंदन, 1947), अध्याय 3–4 (जीवन और ऐतिहासिक आधार), 6 (बाणी), 9–13 (शिष्य, पंथ का इतिहास, नागा, आज का पंथ) (archive.org पर DLI प्रति)
  2. जॉन ट्रेल, “Dadu, Dadupanthis”, Encyclopaedia of Religion and Ethics, खंड 4 (1911), पृ. 385–386
  3. जे. एन. फ़र्क़ुहार, An Outline of the Religious Literature of India (1920), § 406–408 “The Dadupanthis”
  4. आर. जी. भंडारकर, Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems (1913), § 59 (दादू)

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