बिश्नोई पंथ (विश्नोई या विष्णोई सम्प्रदाय) राजस्थान के संत गुरु जम्भेश्वर का चलाया पंथ है, जिन्हें जाम्भोजी या जांभोजी भी कहते हैं। परंपरा के अनुसार, जिसे हीरालाल माहेश्वरी और सूर्यशंकर पारीक दोनों देते हैं, जाम्भोजी का जन्म वि.सं. 1508 (सन् 1451) में नागौर के पीपासर गाँव में हुआ, उन्होंने वि.सं. 1542 (सन् 1485) में बीकानेर के पास समराथल धोरे (रेत के ऊँचे टीले) पर पंथ चलाया, और वि.सं. 1593 (सन् 1536) में उनका देहांत हुआ; उनकी समाधि बीकानेर ज़िले के मुकाम में है। पंथ विष्णु का नाम जपता है और अपने अनुयायियों के लिए 29 नियम रखता है, जिनमें सूतक, स्नान और हवन से लेकर हरे पेड़ न काटना, जीवों पर दया और नशे से दूर रहना तक शामिल है; “बिश्नोई” नाम विष्णु से भी जोड़ा जाता है और बीस और नौ, यानी 29 नियमों से भी।
- आराध्य
- विष्णु; परंपरा जाम्भोजी को विष्णु का अवतार मानती है
- संस्थापक
- गुरु जम्भेश्वर (जाम्भोजी), वि.सं. 1508–1593 (सन् 1451–1536)
- स्थापना
- वि.सं. 1542 (सन् 1485), कार्तिक कृष्ण अष्टमी, समराथल धोरे पर (परंपरा के अनुसार)
- मुख्य ग्रंथ
- सबदवाणी (जम्भवाणी): जाम्भोजी के 120 सबद, मरुभाषा (मारवाड़ी) में
- नियम
- 29 धर्म-नियम, जिन्हें “उनतीस धर्म की आखड़ी” (प्रतिज्ञा) कहते हैं
- दीक्षा
- पाहल: हवन के बाद मंत्र से अभिमंत्रित जल, जो दीक्षा पर और जन्म के 31वें दिन बच्चे को दिया जाता है
- मुख्य स्थान
- मुकाम (समाधि-मंदिर), समराथल धोरा, पीपासर (जन्मस्थान), लालासर, जाम्भोलाव (फलोदी के पास)
- जयंती
- जाम्भोजी का जन्म-दिन भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (परंपरा के अनुसार), वही तिथि जिस पर जन्माष्टमी पड़ती है
- अभिवादन
- “नवण प्रणाम”, जिसके उत्तर में “विष्णु नै, जाम्भोजी नै” कहा जाता है (माहेश्वरी)
बिश्नोई पंथ क्या है
जे. विल्सन की सिरसा सेटलमेंट रिपोर्ट (1883), जिसे रोज़ (1911) और क्रुक (1896) उद्धृत करते हैं, लिखती है कि “बिश्नोई” नाम विष्णु से जुड़ा है, जिन्हें बिश्नोई अपने मत में सबसे ऊँचा स्थान देते हैं, पर बिश्नोई स्वयं कभी-कभी इसे अपने संस्थापक के दिए उनतीस (बीस-नौ) नियमों से जोड़ते हैं। पारीक भी दोनों कारण देते हैं, और यह भी लिखते हैं कि कुछ लोग इसे “विष्णु-स्नेही” शब्द से बना मानते हैं। रिपोर्ट के अनुसार बिश्नोई अपने को प्रह्लादपंथी भी कहते हैं, क्योंकि परंपरा के अनुसार विष्णु ने भक्त प्रह्लाद को दिए वचन को पूरा करने के लिए जाम्भोजी के रूप में जन्म लिया।
माहेश्वरी (1970) के अनुसार बिश्नोइयों ने पंथ की मान्यताओं को एक जीवन-पद्धति के रूप में अपनाया है। पारीक लिखते हैं कि जाम्भोजी का पंथ केवल साधुओं का नहीं था, उसका मूल आधार गृहस्थ समाज था, और उनके शिष्य गृहस्थ भी थे और विरक्त भी। माहेश्वरी के अनुसार समाज में गृहस्थ और साधु दोनों हैं; संस्कारों में कलश-स्थापना और हवन थापन कराते हैं, और गायणे भजन गाते हैं। उनके समय तक बिश्नोई राजस्थान के बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर क्षेत्र, हिसार और फ़ीरोज़पुर, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और कानपुर, और मध्य प्रदेश तक बसे थे।
गुरु जम्भेश्वर (जाम्भोजी)
पारीक के अनुसार जाम्भोजी का जन्म वि.सं. 1508 की भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, सोमवार की आधी रात को हुआ; पंथ के कवि साहबरामजी के “जंभसार” और दूसरे साखीकार यही तिथि देते हैं। उनके पिता लोहटजी और माता हांसा (केसर) थीं। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, माहेश्वरी के ग्रंथ की प्रस्तावना में, लिखते हैं कि परंपरा के अनुसार बचपन में वे बहुत कम बोलते थे, सात वर्ष की आयु के बाद गायें चराने लगे, और उन्होंने विवाह नहीं किया, आजीवन ब्रह्मचारी रहे; चतुर्वेदी के अनुसार वि.सं. 1540 में पिता और फिर माता के देहांत के बाद उन्होंने घर और संपत्ति छोड़ दी और समराथल पर रहने लगे। पारीक के अनुसार 34 वर्ष की आयु में उन्होंने घर पूरी तरह छोड़ा और पीपासर से लगभग चार कोस उत्तर में समराथल धोरे पर जा बैठे, जहाँ वे लोगों को उपदेश देने लगे।
वहीं वि.सं. 1542 (सन् 1485) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी को उन्होंने पंथ चलाया। उसी वर्ष इस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा, और चतुर्वेदी, पारीक और विल्सन की रिपोर्ट, तीनों लिखते हैं कि जाम्भोजी ने अकाल-पीड़ितों की सहायता की और इसी समय बहुत लोग उनके अनुयायी बने। वे लोगों के बीच उपदेश देते और शंकाओं का उत्तर देते; उनकी यही वाणी “सबद” के रूप में सबदवाणी में संग्रहीत है। पारीक के अनुसार उन्होंने दूर-दूर तक यात्राएँ कीं, और माहेश्वरी के अनुसार जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और मेवाड़ के शासक भी उनके संपर्क में आए।
चतुर्वेदी लिखते हैं कि परंपरा के अनुसार लगभग 16 वर्ष की आयु में जाम्भोजी की भेंट गोरखनाथ से हुई; इसे वे ऐतिहासिक तथ्य मानना कठिन बताते हैं, और इसे उस समय के राजस्थान के संतों पर नाथ पंथ के प्रभाव का सूचक मानते हैं। पारीक भी लिखते हैं कि जाम्भोजी की वाणी में गोरख को “अपार गुरु” कहने से यह सिद्ध नहीं होता कि गोरखनाथ उनके गुरु थे, और दोनों का एक समय में होना इतिहास से सिद्ध नहीं है। माहेश्वरी सबदवाणी की तुलना नाथ सिद्धों की वाणियों से करते हैं।
जाम्भोजी का देहांत वि.सं. 1593 (सन् 1536) की मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी को हुआ। पारीक के अनुसार अनुयायी उनकी समाधि जाम्भोलाव में देना चाहते थे, पर मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को उन्हें तालवा गाँव के पास समाधि दी गई, समराथल के निकट; जाम्भोजी का अंतिम विश्राम (“मुकाम”) होने से यह स्थान आगे चलकर मुकाम कहलाया। माहेश्वरी भी यही बताते हैं। पंथ में चलने वाला “जम्भेश्वरीय संवत्” इसी तिथि से गिना जाता है।
बिश्नोई के 29 नियम
पारीक के अनुसार जाम्भोजी के अनुयायियों ने उनकी वाणी के आधार पर उनतीस धार्मिक नियमों को एक क्रम में बाँधा। ये नियम एक छोटे पद में गाए जाते हैं, जिसे “उनतीस धर्म की आखड़ी” कहते हैं (“आखड़ी” यानी प्रतिज्ञा) और जो “तीस दिन सूतक, पाँच ऋतुवंती न्यारो” से शुरू होता है; पारीक लिखते हैं कि यह पद बिश्नोई पंथ की लगभग सभी पुस्तकों में मिलता है, और माहेश्वरी ने इसे लगभग वि.सं. 1850 की एक हस्तलिखित प्रति में भी पाया। चतुर्वेदी ध्यान दिलाते हैं कि जाम्भोजी की अपनी उपलब्ध रचनाओं में ये 29 नियम एक जगह गिनाए हुए नहीं मिलते, यद्यपि वे सब उनकी वाणी में अलग-अलग जगह आते हैं।
नीचे नियम उसी क्रम में हैं जिसमें पारीक (2001) उन्हें देते हैं; उनके अनुसार आज बिश्नोई समाज में यही क्रम प्रचलित और सर्वमान्य है। शब्द हमारे अपने हैं। दूसरी पुस्तकों की गिनती और 1883 का एक पुराना पाठ कहाँ अलग है, यह नीचे “स्रोतों में अंतर” में है।
1. बच्चे के जन्म के बाद तीस दिन तक सूतक मानना।
2. मासिक धर्म के पाँच दिन स्त्री को घर के कामकाज से अलग रखना।
3. रोज़ सवेरे स्नान करना।
4. शील (अच्छा आचरण), संतोष और भीतर-बाहर की शुद्धता रखना।
5. दोनों समय, सुबह और शाम, संध्या-उपासना करना।
6. शाम को आरती करना और भगवान के गुण गाना।
7. प्रेम और श्रद्धा से हवन (होम) करना; पारीक की सूची में सवेरे।
8. पानी, दूध और ईंधन को छानकर और देखकर काम में लेना, ताकि कोई छोटा जीव न मरे।
9. सोच-समझकर और शुद्ध वाणी बोलना।
10. क्षमा, यानी सहनशीलता, रखना।
11. दया रखना, नम्रता से रहना।
12. चोरी न करना।
13. किसी की निंदा न करना।
14. झूठ न बोलना।
15. वाद-विवाद और झगड़ा न करना।
16. अमावस्या का व्रत रखना।
17. विष्णु का भजन करना।
18. सब जीवों पर दया करना।
19. हरे पेड़ न काटना।
20. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को वश में रखना (“अजर को जरना”)।
21. अपना भोजन अपने हाथ से बनाना।
22. “थाट अमर रखना”: पालतू पशुओं, जैसे बकरों, को मारे जाने के लिए न देना और उन्हें जीवित रखना।
23. बैल को बधिया न करवाना।
24. अफ़ीम (अमल) न लेना।
25. तंबाकू न खाना, न पीना।
26. भांग न लेना।
27. शराब न पीना।
28. मांस न खाना।
29. नीले रंग के कपड़े न पहनना।
पेड़ों और जीवों की रक्षा, खेजड़ली 1730
जीवों की रक्षा बिश्नोइयों की पहचान रही है। विल्सन की 1883 की रिपोर्ट लिखती है कि बिश्नोई स्वयं किसी जीव को नहीं मारते, दूसरों को भी रोकने का पूरा प्रयास करते हैं, उनके गाँवों के आसपास हिरण बड़ी संख्या में घूमते हैं, और वे कबूतरों और दूसरे पक्षियों को दाना डालना पुण्य मानते हैं। पारीक के अनुसार पंथ में खेजड़ी का पेड़ “कलियुग की तुलसी” माना जाता है।
सबसे प्रसिद्ध घटना जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव की है। पारीक के अनुसार वि.सं. 1787 (सन् 1730) की भाद्रपद शुक्ल दशमी, मंगलवार को खेजड़ली में बिश्नोइयों ने राज्य के कर्मचारियों द्वारा खेजड़ी के पेड़ काटे जाने का विरोध किया, और 363 लोगों ने प्राण दिए। माहेश्वरी इस घटना का वर्णन कवि गोकलजी की “साखी खेजड़ली की” से देते हैं, जिसे वे आँखों देखा विवरण मानते हैं: जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के राज में राज्य के एक हाकिम, भंडारी गिरधरदास, ने पैसों के लिए खेजड़ली का वन कटवाना चाहा; बिश्नोइयों ने पेड़ों के बदले अपने सिर देने का संकल्प किया; महाराजा ने पूछताछ करके पेड़ काटना अनुचित ठहराया, पर हाकिम ने आज्ञा तोड़कर कटाई शुरू करवा दी; तब अनेक गाँवों के बिश्नोई इकट्ठे हुए, और एक-एक करके कुल 363 स्त्री-पुरुषों ने प्राण दिए। दोनों स्रोत तिथि, स्थान और 363 की संख्या पर एकमत हैं।
आज के लेखन में इस बलिदान की अगुआ अमृता देवी बिश्नोई बताई जाती हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों के साथ पेड़ों से लिपटकर प्राण दिए (सोहेल और नाज़, 2024)। भारत सरकार का पर्यावरण और वन मंत्रालय उनके नाम पर “अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार” देता आया है, जो वन्यजीवों की रक्षा में साहस दिखाने वाले ग्रामीण व्यक्तियों और संस्थाओं को मिलता है। खेजड़ली अकेली घटना नहीं थी: पारीक वि.सं. 1661 (सन् 1604) में रेवासड़ी गाँव की करमां और गौरां का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने धर्म के लिए प्राण दिए, और माहेश्वरी के अनुसार कवि वील्होजी (वि.सं. 1589–1673) की एक साखी में तिलासणी गाँव के बिश्नोइयों का वर्णन है, जिन्होंने खेजड़ी काटे जाने के विरोध में प्राण दिए।
विश्वास और रीतियाँ
हवन पंथ की मुख्य उपासना है। माहेश्वरी के अनुसार हर अमावस्या को गाँव में सामूहिक हवन होता है, लोग प्रायः व्रत रखते हैं और उस दिन व्यापार या खेती का काम नहीं करते; हवन की ज्योति में जाम्भोजी के दर्शन माने जाते हैं। विल्सन की रिपोर्ट भी लिखती है कि अमावस्या से पहले का दिन व्रत और विश्राम का दिन है, और जो रोज़ हवन नहीं कर पाते वे अमावस्या पर मिलकर हवन करते हैं। जन्म के बाद तीस दिन का सूतक रहता है; माहेश्वरी के अनुसार 31वें दिन हवन करके बच्चे का मुंडन होता है और उसे पाहल दिया जाता है। विल्सन की रिपोर्ट दीक्षा का वर्णन करती है: हवन के बाद साधु नए मिट्टी के पात्र में जल लेकर मंत्र पढ़ता है, और सबकी सहमति से यह पाहल दीक्षा लेने वाले की अंजलि में तीन बार डाला जाता है।
होली बिश्नोइयों के लिए उत्सव का नहीं, प्रह्लाद की पीड़ा की याद का दिन है। माहेश्वरी के अनुसार उस दिन सूर्यास्त के बाद सूतक माना जाता है; अगले दिन प्रह्लाद के बच जाने की कथा पढ़कर हवन होता है, पाहल लिया जाता है, और रंग नहीं खेला जाता। विल्सन की रिपोर्ट भी प्रह्लाद की कथा, उपवास, हवन और गुड़ बाँटने का वर्णन करती है। माहेश्वरी और विल्सन दोनों लिखते हैं कि बिश्नोई परंपरा में शव को जलाने के बजाय भूमि में समाधि दी जाती है; माहेश्वरी जोड़ते हैं कि उत्तर प्रदेश के बिश्नोइयों में दाह-संस्कार की रीति भी है।
प्रमुख स्थान
मुकाम (बीकानेर ज़िला) में जाम्भोजी की समाधि पर बना मंदिर है; पारीक के अनुसार यह वि.सं. 1600 (सन् 1543) में बनकर पूरा हुआ। पारीक के अनुसार यहाँ हर वर्ष दो बड़े मेले लगते हैं, फाल्गुन और आश्विन की अमावस्या पर, जिनमें बड़ा हवन होता है; विल्सन की रिपोर्ट भी आसोज और फागुन के मेलों का उल्लेख करती है, जिनमें यात्री समराथल के टीले पर जाकर हवन करते हैं और मोरों और कबूतरों के लिए अनाज डालते हैं। रिपोर्ट के अनुसार किसी जीव को मारने या रोक सकने पर भी मरने देने जैसे दोष पर इकट्ठे हुए बिश्नोई इन्हीं मेलों में दंड तय करते थे, जो मंदिर और वहाँ रखे पशुओं के काम आता था।
समराथल धोरा पीपासर से लगभग चार कोस उत्तर में रेत का ऊँचा टीला है, जहाँ जाम्भोजी रहे और जहाँ पंथ चला; पारीक इसे पंथ का “आदि आसन” कहते हैं। पीपासर (नागौर ज़िला) उनका जन्मस्थान है। पारीक के अनुसार फलोदी (जोधपुर क्षेत्र) से आठ कोस दूर का तालाब जाम्भोलाव (जम्भसर), जो वि.सं. 1566 में पूरा हुआ, जाम्भोजी को समराथल जितना ही प्रिय था, और पंथ में इसका माहात्म्य गंगा आदि तीर्थों के समान माना जाता है। पारीक के अनुसार मुकाम से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर का लालासर वह स्थान है जहाँ परंपरा के अनुसार जाम्भोजी ने देह छोड़ी, इसलिए वह एक प्रमुख साथरी (पवित्र स्थान) मानी जाती है।
स्रोतों में अंतर
- जाम्भोजी का समय: पारीक, माहेश्वरी और चतुर्वेदी, तीनों जन्म वि.सं. 1508, पंथ की स्थापना वि.सं. 1542 और देहांत वि.सं. 1593 देते हैं, यानी सन् 1451, 1485 और 1536; विल्सन की 1883 की रिपोर्ट भी जन्म 1451 और अकाल 1485 देती है। स्थापना के दिन का वार अलग मिलता है: पारीक जंभसार की पंक्ति में मंगलवार और एक दूसरे दोहे में सोमवार उद्धृत करते हैं।
- समराथल कब गए: चतुर्वेदी के अनुसार वि.सं. 1540 में माता-पिता के देहांत के बाद; पारीक के अनुसार 34 वर्ष की आयु में, वि.सं. 1542 की ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एक तिथि को, साहबरामजी के जंभसार के आधार पर।
- देहांत का स्थान: पारीक के अनुसार जाम्भोजी लालासर में देह छोड़कर गए, और सम्प्रदाय में यही बात अधिक प्रचलित है; माहेश्वरी लिखते हैं कि आरंभिक कवियों और वील्होजी की रचनाओं से समराथल की पुष्टि होती है, इसलिए वे समराथल को अधिक संभव मानते हैं।
- नियमों की गिनती और क्रम: पारीक की सूची में शील, संतोष और शुद्धि एक नियम हैं (4), और पानी, दूध और ईंधन छानना आठवाँ नियम है; माहेश्वरी इसी नियम को दसवाँ बताते हैं, यानी उनकी गिनती में पहले के कुछ नियम अलग-अलग गिने गए हैं। पारीक स्वयं पद पर जो अंक लगाते हैं, उनमें भी गिनती सूची से अलग है। इसलिए नियमों का सार एक है, पर उनकी संख्या का बँटवारा पुस्तकों में बदलता है।
- 1883 का पाठ: विल्सन की रिपोर्ट में पद का एक पुराना, कुछ अलग पाठ रोमन लिपि में है। उसके अनुवाद में “बैल को बधिया न करना” के स्थान पर “बैलों से हल न जोतना” है (पारीक के पाठ में “बैल बधिया न करावे” है), “थाट अमर रखना” का अर्थ “बकरों को मारे जाने के लिए न बेचना” दिया गया है, और अंतिम नियम बच्चों को पाहल देकर बिश्नोई बनाना है। उसी रिपोर्ट के अनुसार उस समय भी सब नियम पूरी तरह नहीं माने जाते थे, जैसे खेती में बैलों का उपयोग।
- “बिश्नोई” नाम: विल्सन की रिपोर्ट इसे विष्णु से जोड़ती है और बीस-नौ वाली व्याख्या को बिश्नोइयों की अपनी व्याख्या बताती है; पारीक दोनों कारण साथ देते हैं।
- खेजड़ली में पेड़ किसके कहने पर कटे: माहेश्वरी के बताए गोकलजी के विवरण में हाकिम भंडारी गिरधरदास ने महाराजा के फ़ैसले के विरुद्ध पेड़ कटवाए; आज के कई लेख, जैसे सोहेल और नाज़ (2024), लिखते हैं कि महाराजा अभयसिंह को नए महल के लिए लकड़ी चाहिए थी और बाद में उन्होंने बिश्नोई गाँवों में पेड़ और जीव न मारने का ताम्रपत्र जारी किया। माहेश्वरी के सार में अमृता देवी का नाम नहीं है।
- खेजड़ली की ईसवी तारीख: आज के कई लेख 11 सितंबर 1730 देते हैं। हमारी पंचांग-गणना में यह तारीख वि.सं. 1787 की भाद्रपद शुक्ल दशमी से मेल नहीं खाती, इसलिए यहाँ केवल विक्रम संवत् की तिथि और वर्ष 1730 दिए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बिश्नोई के 29 नियम कौन से हैं?
पारीक के क्रम में: तीस दिन सूतक; मासिक धर्म के पाँच दिन स्त्री को कामकाज से अलग रखना; रोज़ सवेरे स्नान; शील, संतोष और शुद्धि; सुबह-शाम संध्या; शाम की आरती; हवन; पानी, दूध और ईंधन छानकर लेना; सोच-समझकर बोलना; क्षमा; दया; चोरी, निंदा, झूठ और वाद-विवाद न करना; अमावस्या का व्रत; विष्णु का भजन; जीवों पर दया; हरे पेड़ न काटना; काम-क्रोध आदि को वश में रखना; अपना भोजन स्वयं बनाना; पशुओं को मारे जाने के लिए न देना; बैल को बधिया न करवाना; और अफ़ीम, तंबाकू, भांग, शराब और मांस से दूर रहना और नीले कपड़े न पहनना। पूरी क्रमवार सूची ऊपर है।
बिश्नोई पंथ की स्थापना किसने और कब की?
गुरु जम्भेश्वर (जाम्भोजी) ने, परंपरा के अनुसार वि.सं. 1542 (सन् 1485) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी को, बीकानेर के पास समराथल धोरे पर। जाम्भोजी का जीवन वि.सं. 1508–1593 (सन् 1451–1536) माना जाता है।
बिश्नोई नाम का अर्थ क्या है?
दो व्याख्याएँ मिलती हैं: विष्णु के उपासक होने से “विष्णोई” या “बिश्नोई”, और बीस और नौ, यानी 29 नियम मानने से “बिश-नोई”। 1883 की सिरसा रिपोर्ट और पारीक दोनों व्याख्याएँ देते हैं।
मुकाम कहाँ है और वहाँ मेला कब लगता है?
मुकाम राजस्थान के बीकानेर ज़िले में समराथल धोरे के पास है, जहाँ जाम्भोजी की समाधि और मंदिर है। पारीक के अनुसार यहाँ हर वर्ष दो बड़े मेले लगते हैं: फाल्गुन की अमावस्या और आश्विन की अमावस्या पर।
खेजड़ली बलिदान क्या है?
वि.सं. 1787 (सन् 1730) की भाद्रपद शुक्ल दशमी को जोधपुर के पास खेजड़ली गाँव में खेजड़ी के पेड़ों को कटने से बचाने के लिए 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने प्राण दिए। यह विवरण कवि गोकलजी की साखी से माहेश्वरी देते हैं, और पारीक भी यही तिथि और संख्या देते हैं।
गुरु जम्भेश्वर जयंती कब मनाई जाती है?
परंपरा के अनुसार जाम्भोजी का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को हुआ, यानी उसी तिथि पर जिस पर जन्माष्टमी पड़ती है; माहेश्वरी लिखते हैं कि बिश्नोई समाज में इस तिथि की बड़ी मान्यता है। उनका निर्वाण-दिवस मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी (“चिरत नवमी”) भी मनाया जाता है।
स्रोत
- हीरालाल माहेश्वरी, जाम्भोजी, विष्णोई सम्प्रदाय और साहित्य, भाग 1 और 2 (बी. आर. पब्लिकेशन्स, कलकत्ता, 1970; राजस्थान विश्वविद्यालय का डी.लिट. शोध-प्रबंध), आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की प्रस्तावना सहित: जीवन-वृत्त, सम्प्रदाय और साहित्य के अध्याय (archive.org पर DLI प्रति)
- सूर्यशंकर पारीक, जांभोजी की वाणी (विकास प्रकाशन, बीकानेर, 2001), जीवन-चरित्र: पृ. 31–58 (जन्म, गृह-त्याग, स्थापना, 29 धर्म-नियम), 80–90 (जाम्भोलाव, खेजड़ी, खेजड़ली, देहांत और समाधि, प्रमुख स्थान, मुकाम के मेले) (archive.org पर DLI प्रति)
- जे. विल्सन, सिरसा सेटलमेंट रिपोर्ट (1883), पृ. 136, जैसा एच. ए. रोज़, A Glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province, खंड 2 (1911), “Bishnoi”, और डब्ल्यू. क्रुक, The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh, खंड 2 (1896), “Bishnoi”, में उद्धृत
- अमीर सोहेल और फ़रहत नाज़, “The Bishnoi: Revisiting Religious Environmentalism and Traditional Forest and Wildlife Management in the Thar Desert”, Arcadia, अंक 10 (Environment & Society Portal, रेचल कार्सन सेंटर, 2024)
- पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार: “अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार, 2007” के लिए नामांकन की सूचना (moef.gov.in)
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