सम्प्रदाय

कबीर पंथ (कबीरपंथी)

संक्षेप में

कबीर पंथ उन लोगों का पंथ है जो संत कबीर को अपना सद्गुरु मानते हैं और उनकी वाणी पर चलते हैं। कबीर (विद्वानों के अनुसार लगभग 1440–1518; पंथ की परंपरा जन्म 1398 मानती है) ने स्वयं कोई सम्प्रदाय नहीं चलाया; जी. एच. वेस्टकॉट (1907) के अनुसार पंथ की दोनों मुख्य शाखाएँ संभवतः उनके शिष्यों ने बाद में खड़ी कीं: वाराणसी के कबीर चौरा मठ की शाखा, जिसका एक केंद्र मगहर में है, और धर्मदास की शाखा, जिसका केंद्र आज छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा में है। पंथ एक परमेश्वर की भक्ति, सद्गुरु के महत्त्व और सच्चे, सादे आचरण पर ज़ोर देता है; उसका सबसे प्रामाणिक ग्रंथ बीजक है, और उसके अनुयायी गले में तुलसी के मनकों की कंठी पहनते हैं।

सद्गुरु
संत कबीर (विद्वानों के अनुसार लगभग 1440–1518)
संस्थापक
कोई एक नहीं; परंपरा में कबीर चौरा शाखा सुरत गोपाल से और धर्मदासी शाखा धर्मदास से चली
उपास्य
एक परमेश्वर, जिसे कबीर “राम” भी कहते हैं; बर्न (1914) और वेस्टकॉट के अनुसार यह “राम” विष्णु का अवतार नहीं, परम ईश्वर है
मुख्य ग्रंथ
बीजक (रमैनी, सबद और साखी); धर्मदासी शाखा में अनुराग सागर, सुख निधान और अमर मूल भी
मुख्य केंद्र
कबीर चौरा मठ, वाराणसी; मगहर (गोरखपुर के पास); धर्मदासी शाखा: पहले बांधोगढ़ और कुदरमाल, अब दामाखेड़ा (छत्तीसगढ़)
चिह्न
तुलसी के मनकों की कंठी, जो दीक्षा पर महंत पहनाते हैं; प्रार्थना के समय माथे पर तिलक
व्रत
रविवार और पूर्णिमा का उपवास, और शाम को चौका-आरती (वेस्टकॉट)
पर्व
कबीर जयंती, ज्येष्ठ पूर्णिमा (द्रिक पंचांग); कबीर चौरा में जनवरी का वार्षिक मेला (वेस्टकॉट)

कबीर पंथ क्या है

कबीर वाराणसी में रहे संत-कवि थे, जिनका देहांत मगहर में हुआ; उनके दोहे और पद पूरे उत्तर भारत में गाए जाते हैं, और उनकी कुछ रचनाएँ सिखों के गुरु ग्रंथ साहिब में भी हैं (बर्न, 1914)। कबीर के जीवन पर इस कोश में अलग पन्ना बाद में आएगा; यहाँ उनकी शिक्षा पर चलने वाले पंथ की बात है। वेस्टकॉट लिखते हैं कि उपलब्ध जानकारी से यह तय करना संभव नहीं कि पंथ की कोई शाखा कब बनी, पर दोनों मुख्य शाखाएँ संभवतः कबीर के हिंदू शिष्यों ने स्थापित कीं। कबीरपंथी कबीर चौरा शाखा को “बाप” और धर्मदासी शाखा को “माई” कहते हैं, और वेस्टकॉट के अनुसार पुरी का मठ दोनों शाखाओं के लिए तीर्थ है।

बर्न (1914) के अनुसार कबीर की शिक्षा का आधार एक परम सत्ता में विश्वास है: “राम” नाम आता है, पर उसका अर्थ विष्णु का अवतार नहीं; मुक्ति ज्ञान या कर्मकांड से नहीं, भक्ति से मिलती है; कबीर ने बाहरी चिह्नों, जाति-भेद और अनेक देवताओं की पूजा को नकारा, और सद्गुरु को आवश्यक माना, पर ऐसा गुरु जिसे परखकर अपनाया जाए। उनकी शिक्षा में “शब्द”, यानी सच्चे वचन, का स्थान सबसे ऊँचा है। वेस्टकॉट के अनुसार कबीर लोकभाषा में धर्म की शिक्षा और सत्संग पर ज़ोर देते थे, और इसी कारण पंथ में गुरु का स्थान असाधारण रूप से ऊँचा है। बर्न 1901 की जनगणना में मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, मध्य भारत और बंबई में 8,43,171 कबीरपंथी दर्ज होने की बात लिखते हैं, और जोड़ते हैं कि यह संख्या निश्चित रूप से कम है।

कबीर चौरा और मगहर

वेस्टकॉट के अनुसार वाराणसी का कबीर चौरा मठ उस स्थान पर है जहाँ परंपरा के अनुसार कबीर अपने शिष्यों को उपदेश देते थे। मठ में प्रवचन का मंच है, जिस पर गुरु के चरणों के प्रतीक के रूप में लकड़ी की खड़ाऊँ रखी हैं; कबीर की गद्दी है, जिसके पीछे, उस पर नहीं, उनके प्रतिनिधि महंत बैठते हैं; और पुराने महंतों की समाधियाँ हैं। गली के पार का आँगन, जिसे परंपरा नीरू का घर बताती है (नीरू टीला), विरक्त स्त्रियों (“माई लोग”) के लिए है। सुबह-शाम आरती और गुरु के चरण धोने के साथ पूजा होती है, और चरणामृत तुलसी-दल के साथ बाँटा जाता है। मठ की सबसे मूल्यवान वस्तुएँ कबीर की टोपी और ऊन की माला (सेली), खड़ाऊँ, उनका चित्र और बीजक मानी जाती हैं।

वेस्टकॉट के अनुसार कबीर चौरा की महंत-परंपरा में सुरत गोपाल (लगभग 1559) को सामान्यतः पंथ का संस्थापक माना जाता है; उनसे पहले के तीन महंतों का अस्तित्व वे अत्यंत संदिग्ध मानते हैं। मगहर में कबीर का देहांत हुआ; वहाँ दो मठ साथ-साथ हैं, एक मुसलमान कबीरपंथियों का, जिसमें कबीर का मज़ार है, जिसकी मरम्मत 1567 में मुग़ल सेना के अधिकारी नवाब फ़िदाई ख़ाँ ने करवाई, और एक हिंदू कबीरपंथियों का, जो कबीर चौरा के महंत के अधीन है। बर्न (1914) के अनुसार एक विवरण मगहर में पहले हिंदू महंत की नियुक्ति 1764 में बताता है।

धर्मदासी शाखा

यह शाखा धर्मदास से चली, जिन्हें परंपरा बांधोगढ़ का एक धनी व्यापारी बताती है। प्रचलित कथा के अनुसार कबीर ने उन्हें पहले वाराणसी में, फिर वृंदावन में और अंत में उनके घर बांधोगढ़ में मूर्ति-पूजा पर टोका, और तब धर्मदास और उनकी पत्नी दोनों कबीर के शिष्य बने। परंपरा के अनुसार उनके पुत्र चूड़ामणि को स्वयं कबीर ने गद्दी पर बैठाया और कहा कि उनके वंशज बयालीस पीढ़ियों तक गद्दी पर बैठेंगे; इसलिए इस शाखा के मुख्य महंत विवाह करते हैं और उनके बाद पुत्र गद्दी पाता है (वेस्टकॉट)।

वेस्टकॉट (1907) के अनुसार इस शाखा का मुख्यालय पहले जबलपुर क्षेत्र के बांधोगढ़ में था, फिर कुदरमाल गया, और कुछ ही वर्ष पहले दामाखेड़ा आया। विकिपीडिया के अनुसार “कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा” की गद्दी आज छत्तीसगढ़ के बलौदा बाज़ार-भाटापारा ज़िले में, रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर है। वेस्टकॉट लिखते हैं कि उनके समय में दोनों शाखाओं में धर्मदासी शाखा अधिक प्रभावशाली थी। इस शाखा के ग्रंथों में सुख निधान (परंपरा के अनुसार लगभग 1729 में लिखा गया) और अमर मूल हैं, और विकिपीडिया के अनुसार अनुराग सागर, जिसमें सृष्टि की कथा कबीर द्वारा धर्मदास को सुनाई गई बताई जाती है, बीजक के साथ पंथ के सबसे पवित्र ग्रंथों में गिना जाता है।

नियम और साधना

वेस्टकॉट के अनुसार पंथ में आने वाले को अनेक देवताओं की पूजा छोड़कर एक परमेश्वर में विश्वास स्वीकार करना होता है, और ये वचन देने होते हैं: मांस न खाना और शराब न पीना; रोज़ स्नान करना और सुबह-शाम भगवान के भजन गाना; अपने साथ बुरा करने वाले को तीन बार तक क्षमा करना; बुरी संगति और भद्दे हँसी-मज़ाक से बचना; अपनी विवाहिता पत्नी को कभी न त्यागना; झूठ न बोलना; किसी की वस्तु न छिपाना; और पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना, न सुनी-सुनाई बात पर किसी की निंदा करना। दीक्षा पर गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण की अपेक्षा होती है।

दीक्षा पर महंत शिष्य के गले में तुलसी के मनकों की कंठी पहनाते हैं, जिसे केवल महंत पहना सकते हैं, और उसके कान में मंत्र देते हैं; स्त्रियाँ भी कंठी पहन सकती हैं, पर वेस्टकॉट के अनुसार विवाह के बाद। पंथ में गृहस्थ भी हैं और विरक्त (बैरागी) भी; स्त्रियाँ भी दो वर्ष की परख के बाद बैरागी बन सकती हैं, और शाखाओं के महंत हर वर्ष अपने शिष्यों के पास जाकर उन्हें उपदेश देते हैं। अनुयायियों को हर रविवार और पूर्णिमा को उपवास रखकर शाम को “चौका” में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिसमें महंत पाठ करते हैं, भजन होते हैं, और नारियल और पान का प्रसाद बँटता है; महंत की उपस्थिति में पूरा चौका वर्ष में दो बार, फागुन और भादों में, होता है (वेस्टकॉट; बर्न)।

बीजक और पंथ के ग्रंथ

बर्न (1914) के अनुसार कबीर की शिक्षा मौखिक थी, और उनकी वाणी के संग्रहों में सबसे प्रामाणिक बीजक है (शाब्दिक अर्थ: बीजक, यानी हिसाब की सूची), जिसे परंपरा कबीर के एक सीधे शिष्य भागोदास का संकलन बताती है। वेस्टकॉट लिखते हैं कि कबीर की शिक्षा के सबसे पुराने लिखित संग्रह बीजक और आदि ग्रंथ हैं, और संभवतः दोनों में से कोई भी कबीर के देहांत के पचास वर्ष से पहले नहीं बना। बीजक में रमैनी, सबद और साखी (दोहे) हैं; रेवा के महाराजा विश्वनाथ सिंह और बाबा पूरनदास की टीकाओं वाले संस्करण प्रसिद्ध हैं।

बीजक के अलावा पंथ का साहित्य समय के साथ बढ़ता गया। बर्न के अनुसार विल्सन ने कबीर चौरा के “खास ग्रंथ” में 20 रचनाएँ गिनाईं, और वेस्टकॉट ने इनके अलावा 82 और रचनाओं के उल्लेख जुटाए, जिनमें से अधिकतर हस्तलिखित ही रहीं। वेस्टकॉट यह भी सावधान करते हैं कि आज पंथ के महंत जो सिखाते हैं, उसे कबीर की अपनी शिक्षा के समान मान लेने का अधिकार हमें नहीं है।

स्रोतों में अंतर

  • कबीर का समय: पंथ की परंपरा, मैकॉलिफ़ और द्रिक पंचांग जन्म वि.सं. 1455 (सन् 1398) और देहांत 1518 देते हैं, जिससे लगभग 120 वर्ष की आयु बनती है; वेस्टकॉट और बर्न लगभग 1440–1518 देते हैं। भंडारकर (1913) 1518 को देहांत का वर्ष मान लेते हैं, पर जन्म के दोनों मत गिनाते हैं।
  • शाखाओं की गिनती: एच. एच. विल्सन (Religious Sects of the Hindus) ने पंथ की बारह शाखाएँ गिनाईं, जिन्हें वेस्टकॉट “काल्पनिक” मानते हैं; वेस्टकॉट दो मुख्य शाखाएँ बताते हैं और लिखते हैं कि बंबई और गुजरात आदि की शाखाएँ अपने को इन्हीं दोनों से अलग मानती हैं या नहीं, यह संदिग्ध है।
  • धर्मदासी शाखा की तिथियाँ: परंपरा चूड़ामणि का जन्म 1516 बताती है; वेस्टकॉट के अनुसार यह तिथि इसलिए चुनी गई लगती है कि जन्म कबीर के जीवनकाल में पड़े, और पंथ की स्थापना से जुड़ी तिथियों को महत्त्व नहीं दिया जा सकता। महंतों के कार्यकाल जोड़कर वे शाखा का आरंभ अलग-अलग गणनाओं से 1625 और 1694 के बीच कहीं रखते हैं।
  • कबीर और रामानंद: बर्न लिखते हैं कि कबीर लगभग निश्चित रूप से रामानंद के शिष्य थे; भंडारकर लिखते हैं कि कबीर की जितनी रचनाएँ उन्होंने देखीं, उनमें रामानंद का नाम नहीं मिलता, और यह संबंध तभी संभव है जब कबीर का जन्म 1398 माना जाए।
  • दामाखेड़ा की जगह: वेस्टकॉट (1907) शाखा के केंद्र को “छत्तीसगढ़ ज़िला, मध्य प्रांत” में बताते हैं; आज का ज़िला (बलौदा बाज़ार-भाटापारा) हमने केवल विकिपीडिया में देखा।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कबीर पंथ क्या है?

संत कबीर को सद्गुरु मानकर उनकी वाणी पर चलने वालों का पंथ। इसकी दो मुख्य शाखाएँ हैं: वाराणसी के कबीर चौरा मठ की शाखा और धर्मदास की शाखा, जिसका केंद्र छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा में है। इसका मुख्य ग्रंथ बीजक है।

कबीर पंथ के संस्थापक कौन थे?

कबीर ने स्वयं कोई सम्प्रदाय नहीं चलाया। वेस्टकॉट (1907) के अनुसार पंथ की शाखाएँ उनके शिष्यों ने बाद में बनाईं: परंपरा कबीर चौरा शाखा को सुरत गोपाल से और धर्मदासी शाखा को धर्मदास और उनके पुत्र चूड़ामणि से जोड़ती है।

कबीर पंथ की कितनी शाखाएँ हैं?

वेस्टकॉट दो मुख्य शाखाएँ बताते हैं: कबीर चौरा (वाराणसी) और मगहर वाली शाखा, और धर्मदासी शाखा (बांधोगढ़, कुदरमाल, अब दामाखेड़ा)। विल्सन ने बारह शाखाएँ गिनाई थीं, पर वेस्टकॉट उस गिनती को काल्पनिक मानते हैं; बंबई और गुजरात में भी शाखाएँ हैं।

कबीर पंथ के नियम क्या हैं?

वेस्टकॉट के अनुसार: एक परमेश्वर में विश्वास, मांस और शराब का त्याग, रोज़ स्नान और सुबह-शाम भजन, क्षमा, बुरी संगति से दूरी, पत्नी का त्याग न करना, सच बोलना, पराई वस्तु न छिपाना और झूठी गवाही या निंदा न करना, और गुरु के प्रति समर्पण। दीक्षा पर तुलसी की कंठी पहनाई जाती है।

कबीर पंथ का मुख्य ग्रंथ कौन सा है?

बीजक, जिसमें कबीर की रमैनी, सबद और साखियाँ हैं; बर्न इसे कबीर की वाणी का सबसे प्रामाणिक संग्रह बताते हैं। धर्मदासी शाखा में अनुराग सागर का भी विशेष स्थान है।

कबीर पंथ का दीक्षा-मंत्र क्या है?

दीक्षा पर गुरु शिष्य के कान में मंत्र देते हैं, और पंथ इसे गुप्त रखता है, इसलिए हम इसे यहाँ नहीं देते। वेस्टकॉट (1907) के अनुसार कबीर चौरा शाखा में दीक्षा पर एक गुरु-मंत्र दिया जाता है, जबकि धर्मदासी शाखा में दो मंत्र दीक्षा पर और तीन बाद में; दोनों शाखाओं के गुरु-मंत्र का रूप भी अलग बताया जाता है।

स्रोत

  1. जी. एच. वेस्टकॉट, Kabir and the Kabir Panth (क्राइस्ट चर्च मिशन प्रेस, कानपुर, 1907), अध्याय 5–7 (“The Kabir Panth”, “The Teaching of the Panth”), महंतों की सूचियाँ और बीजक पर टिप्पणी (archive.org)
  2. आर. बर्न, “Kabir, Kabirpanthis”, Encyclopaedia of Religion and Ethics, खंड 7 (1914), पृ. 632–634
  3. आर. जी. भंडारकर, Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems (1913), § 57 “Kabir” (कबीर का समय और रामानंद से संबंध)
  4. द्रिक पंचांग: “Sant Kabir Jayanti” (ज्येष्ठ पूर्णिमा; जन्म वि.सं. 1455 की परंपरा)
  5. विकिपीडिया: “Kabir panth” (दामाखेड़ा की आज की जगह; अनुराग सागर)

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