सम्प्रदाय

वीरशैव और लिंगायत परंपरा

संक्षेप में

वीरशैव या लिंगायत परंपरा केवल शिव को उपास्य मानने वाली परंपरा है, जिसके अनुयायी स्त्री-पुरुष सभी गले में एक छोटा शिवलिंग, इष्टलिंग, सदा धारण करते हैं; “लिंगायत” नाम इसी से है, और “वीरशैव” का अर्थ है दृढ़ (वीर) शैव, जो केवल शिव को पूजते हैं। इसका मुख्य क्षेत्र कर्नाटक और आसपास का दक्षिण भारत है। अधिकतर इतिहासकार और परंपरा इसे 12वीं सदी के बसवण्णा (बसव) से जोड़ते हैं, जिनके और दूसरे शरणों के कन्नड़ वचन जाति-भेद के विरोध और भक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं; एक दूसरी परंपरा इसे पाँच आचार्यों (पंचाचार्य) से बहुत प्राचीन मानती है। दोनों नाम लंबे समय तक एक ही अर्थ में चले, पर आज उनके अर्थ और हिंदू धर्म से संबंध पर बहस है, जिसके दोनों पक्ष इस पन्ने पर हैं।

आराध्य
केवल शिव, इष्टलिंग के रूप में
प्रमुख व्यक्ति
बसवण्णा (बसवेश्वर), अल्लमप्रभु, अक्कमहादेवी, चन्नबसव (12वीं सदी के शरण); पंचाचार्य: रेवणसिद्ध, मरुलसिद्ध, एकोराम, पंडिताराध्य, विश्वाराध्य (परंपरा के अनुसार)
दर्शन
षट्स्थल: भक्त से ऐक्य (शिव से एकता) तक साधना की छह अवस्थाएँ
आचार
अष्टावरण: गुरु, लिंग, जंगम, पादोदक, प्रसाद, विभूति, रुद्राक्ष, मंत्र; पंचाचार; दिन में इष्टलिंग की पूजा
मुख्य ग्रंथ
बसवण्णा और दूसरे शरणों के कन्नड़ वचन; शून्यसंपादने; बसव पुराण; मायिदेव का अनुभव-सूत्र; श्रीपति पंडित का श्रीकर-भाष्य
चिह्न
गले में इष्टलिंग (पेटिका या डोरी में); विभूति (भस्म) और रुद्राक्ष
प्रमुख मंत्र
नमः शिवाय (अष्टावरण का मंत्र, विकिपीडिया के अनुसार)
मुख्य केंद्र
कर्नाटक; कूडलसंगम (बसवण्णा का ऐक्य-स्थल); पाँच पीठ: रंभापुरी (बालेहोन्नूर), उज्जयिनी (कर्नाटक), केदार, श्रीशैल, काशी; विरक्त मठ

वीरशैव या लिंगायत क्या है

फ़र्कुहार (1920) के अनुसार लिंगायत शिव को परम मानते हैं और केवल उन्हीं की उपासना करते हैं; यही “वीरशैव”, यानी दृढ़ शैव, नाम का अर्थ है। वे उपासना दो रूपों में करते हैं: अपने जंगम गुरु की, और उस छोटे लिंग की जो गले में एक पेटिका में लटका रहता है, जिससे दूसरा नाम “लिंगायत”, यानी लिंग धारण करने वाले, बना। भांडारकर के अनुसार इस परंपरा में यह लिंग शिव का केवल बाहरी प्रतीक नहीं, स्वयं शिव माना जाता है।

फ़र्कुहार लिखते हैं कि हर लिंगायत का एक गुरु होता है और वह किसी मठ से जुड़ा होता है, और मंदिर जाना उसके लिए आवश्यक अंग नहीं। विकिपीडिया के अनुसार लिंगायत शिव मंदिर भी बनाते रहे हैं, जिनमें गर्भगृह में शिवलिंग और सामने नंदी होते हैं, और वहाँ पूजा लिंगायत जंगम पुजारी कराते हैं। वे शिवरात्रि जैसे हिंदू पर्वों के साथ अपने आचार्यों और संतों की जयंतियाँ भी मनाते हैं।

संक्षिप्त इतिहास

विकिपीडिया के अनुसार बसवण्णा का जन्म उत्तरी कर्नाटक के बसवन बागेवाडी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ, और उन्होंने बारह वर्ष कूडलसंगम के संगमेश्वर मंदिर में अध्ययन किया। भांडारकर के अनुसार वे कल्याण गए, जहाँ बिज्जल (बिज्जल का राज्य 1157–1167) शासक था; उनके मामा बलदेव राजा के मंत्री थे और उनके बाद बसवण्णा स्वयं मंत्री बने और राजकोष से जंगमों की बड़ी सेवा करते रहे। विकिपीडिया के अनुसार उन्होंने कल्याण में अनुभव मंटप नाम की सभा बनाई, जहाँ स्त्री-पुरुष, कोई भी, आध्यात्मिक अनुभव और कन्नड़ में अपने वचन रखता था।

विकिपीडिया के अनुसार जाति-भेद के विरोध पर राजा से मतभेद के बाद 1167 में वीरशैवों का दमन हुआ और अधिकांश कल्याण छोड़कर फैल गए, जिससे बसवण्णा की शिक्षा और दूर तक पहुँची; बसवण्णा का देहांत कूडलसंगम में हुआ, जो उनका ऐक्य-स्थल माना जाता है। उनके भतीजे चन्नबसव ने समुदाय को संगठित किया और वीरशैव धर्मशास्त्र को व्यवस्थित किया।

दूसरी परंपरा, जिसका वर्णन भांडारकर और फ़र्कुहार दोनों करते हैं, यह है कि यह धर्म पाँच आचार्यों, रेवणसिद्ध, मरुलसिद्ध, एकोराम, पंडिताराध्य और विश्वाराध्य, से चला, जो शिव के पाँच मुखों से हर युग में प्रकट होते हैं, और बसवण्णा केवल इसके पुनरुद्धारक थे। भांडारकर इसी के आधार पर मानते हैं कि यह मत बसवण्णा से लगभग सौ वर्ष पहले बन चुका था; फ़र्कुहार लिखते हैं कि आरंभिक साहित्य इन पाँचों को बसवण्णा का समकालीन दिखाता है, और प्रारंभिक इतिहास अभी अस्पष्ट है।

विश्वास और साधना

भांडारकर मायिदेव के अनुभव-सूत्र के आधार पर इसका दर्शन बताते हैं: सत्, चित् और आनंद रूप एक ब्रह्म, जिसे “स्थल” कहा जाता है, अपनी शक्ति से दो रूपों में बँटता है: लिंग-स्थल, यानी उपास्य शिव, और अंग-स्थल, यानी उपासक जीव। शिव में वह शक्ति कला कहलाती है और जीव में भक्ति, और अंत में इसी भक्ति से जीव और शिव का मिलन होता है। लिंग के तीन रूप बताए गए हैं: भावलिंग (श्रद्धा से अनुभव), प्राणलिंग (मन से) और इष्टलिंग (आँखों से दिखने वाला, जिसकी पूजा होती है)।

साधक की प्रगति छह स्थलों (षट्स्थल) में मानी जाती है: भक्त, माहेश्वर, प्रसादी, प्राणलिंगी, शरण और ऐक्य (शिव से एकता)। फ़र्कुहार के अनुसार लिंगायत दिन में दो बार, भोजन से पहले, इष्टलिंग को बाईं हथेली पर रखकर इन्हीं स्थलों के अनुसार ध्यान और पूजा करते हैं।

अष्टावरण, यानी आठ “आवरण” जो साधक को बचाते हैं, फ़र्कुहार और विकिपीडिया दोनों गिनाते हैं: गुरु, लिंग, जंगम, पादोदक (लिंग या गुरु के चरणों को धोया जल), प्रसाद, विभूति, रुद्राक्ष और मंत्र। विकिपीडिया पाँच आचार (पंचाचार) भी बताता है: लिंगाचार (इष्टलिंग की दैनिक पूजा), सदाचार (अपने काम और कर्तव्य में लगे रहना), शिवाचार, भृत्याचार (सब प्राणियों पर दया) और गणाचार (समुदाय की रक्षा)। “कायकवे कैलास”, यानी काम ही कैलास है, बसवण्णा की परंपरा का प्रसिद्ध वाक्य है।

जंगम, मठ और पाँच पीठ

फ़र्कुहार के अनुसार परंपरा के पाँच मूल मठ हैं, जिनके पहले प्रमुख पाँच आचार्य माने जाते हैं: हिमालय में केदारनाथ (एकोराम), श्रीशैल (पंडिताराध्य), पश्चिमी मैसूर में बालेहल्ली (रेवण), उज्जिनी (मरुल) और काशी (विश्वाराध्य); हर गाँव का मठ इनमें से किसी एक से जुड़ा होता है। विकिपीडिया इन्हें रंभापुरी, उज्जयिनी, केदार, श्रीशैल और काशी, पाँच पीठ कहता है।

परंपरा के गुरु और पुजारी जंगम कहलाते हैं। फ़र्कुहार दो प्रकार के जंगम बताते हैं: गुरुस्थल जंगम, जो गाँव-गाँव के मठों में रहकर गृहस्थों के संस्कार कराते हैं, और विरक्त जंगम, जो षट्स्थल मठों में दर्शन पढ़ाते हैं। विकिपीडिया के अनुसार विरक्त मठ बसवण्णा और उनके समकालीन शरणों के आदर्शों पर विशेष ज़ोर देते हैं।

वीरशैव और लिंगायत: नाम और पहचान पर बहस

पुराने विद्वान दोनों नामों को एक ही अर्थ में लेते हैं: भांडारकर अपने अध्याय का शीर्षक “वीरशैव या लिंगायत सम्प्रदाय” रखते हैं और फ़र्कुहार भी दोनों नाम एक साथ देते हैं; विकिपीडिया भी लिखता है कि दोनों शब्द समानार्थी के रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं। भांडारकर के समय भी भीतर दो धाराएँ थीं: आराध्य, जिन्होंने गायत्री और यज्ञोपवीत जैसे ब्राह्मण आचार बनाए रखे, और दूसरे लिंगायत, जिन्होंने इन्हें छोड़ दिया।

आज इस पर दो मत हैं। एक मत के अनुसार लिंगायत बसवण्णा और वचनों पर आधारित एक अलग धर्म है, और वीरशैव वेद-आधारित एक शैव सम्प्रदाय; विकिपीडिया के अनुसार चरंतेश्वर मठ के श्री शरणबसव देवरु ने 2013 में यही कहा। दूसरे मत के अनुसार वीरशैव और लिंगायत एक ही परंपरा हैं, जो पंचाचार्य पीठों और बसवण्णा, दोनों को मानती है; वीरशैवों ने 2018 में लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने के कर्नाटक सरकार के निर्णय का विरोध किया। विकिपीडिया के अनुसार अखिल भारत वीरशैव महासभा ने 2000 में “वीरशैव या लिंगायत” को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिलाने का अभियान भी चलाया था, यानी अलग पहचान की माँग और वीरशैव-लिंगायत एकता, दोनों प्रश्न अलग-अलग हैं।

विकिपीडिया के अनुसार मार्च 2018 में नागमोहन दास समिति की सिफ़ारिश पर कर्नाटक सरकार ने लिंगायतों को अलग धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफ़ारिश केंद्र को भेजी, जिसे केंद्र सरकार ने दिसंबर 2018 में स्वीकार नहीं किया। यह पन्ना किसी एक मत का पक्ष नहीं लेता।

स्रोतों में अंतर

  • संस्थापक: परंपरा और अधिकतर इतिहासकार बसवण्णा को प्रवर्तक मानते हैं; पंचाचार्य परंपरा पाँच प्राचीन आचार्यों को और बसवण्णा को पुनरुद्धारक मानती है; भांडारकर मानते हैं कि मत बसवण्णा से लगभग सौ वर्ष पहले बन चुका था और उन्होंने राजनीतिक प्रभाव से इसे फैलाया; फ़र्कुहार फ़्लीट का यह मत भी देते हैं कि अबलूर के एकांतद रामय्य असली नेता थे।
  • बसवण्णा का समय: विकिपीडिया (कार्ल ओल्सन के आधार पर) 1131–1196 देता है; भांडारकर बिज्जल का कल्याण पर राज्य 1157–1167 और फ़र्कुहार उसका राजा बनना 1156 में बताते हैं। दूसरी तिथियाँ भी प्रचलित हैं, इसलिए यह पन्ना “12वीं सदी” लिखता है।
  • पाँच पीठों के नाम: फ़र्कुहार बालेहल्ली, उज्जिनी, केदारनाथ, श्रीशैल और काशी लिखते हैं; विकिपीडिया रंभापुरी, उज्जयिनी, केदार, श्रीशैल और काशी। चंदन गौड़ा (विकिपीडिया में उद्धृत) के अनुसार ये पाँच मठ बसवण्णा से पहले के हैं।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 3 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लिंगायत कौन हैं?

केवल शिव को उपास्य मानने वाली परंपरा के अनुयायी, जो स्त्री-पुरुष सभी गले में इष्टलिंग धारण करते हैं। वे मुख्य रूप से कर्नाटक और आसपास के क्षेत्रों में हैं, और बसवण्णा और 12वीं सदी के शरणों के कन्नड़ वचन उनकी परंपरा का केंद्र हैं।

वीरशैव और लिंगायत में क्या अंतर है?

लंबे समय तक दोनों नाम एक ही परंपरा के लिए प्रयुक्त होते रहे। आज कुछ लोग लिंगायत को बसवण्णा पर आधारित अलग धर्म और वीरशैव को वेद-आधारित शैव सम्प्रदाय मानते हैं, जबकि दूसरे दोनों को एक ही परंपरा मानते हैं जो पंचाचार्यों और बसवण्णा, दोनों को मानती है।

इष्टलिंग क्या है?

एक छोटा शिवलिंग, जिसे लिंगायत दीक्षा के बाद जीवन भर गले में एक छोटी पेटिका या डोरी में पहनते हैं और रोज़ हथेली पर रखकर पूजते हैं। परंपरा में यह शिव का प्रतीक भर नहीं, स्वयं शिव माना जाता है।

बसवण्णा कौन थे?

12वीं सदी के कन्नड़ संत, कवि और कल्याण के राजा बिज्जल के मंत्री, जिनके वचनों ने भक्ति, श्रम के सम्मान (कायक) और जाति-भेद के विरोध पर ज़ोर दिया। अधिकतर लिंगायत उन्हें अपनी परंपरा का प्रवर्तक मानते हैं; उनका ऐक्य-स्थल कूडलसंगम है।

षट्स्थल क्या है?

साधना की छह अवस्थाएँ, जिनसे होकर साधक शिव से एकता तक पहुँचता है: भक्त, माहेश्वर, प्रसादी, प्राणलिंगी, शरण और ऐक्य।

स्रोत

  1. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, Vaiṣṇavism, Śaivism and Minor Religious Systems (1913), अध्याय 11 “The Vīraśaiva or Liṅgāyat Sect”, §100–106 (archive.org)
  2. जे. एन. फ़र्कुहार, An Outline of the Religious Literature of India (1920), §310–313 (archive.org)
  3. विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Lingayats”, “Basava”, “Kudalasangama”

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