आरतीतुलसी

तुलसी माता की आरती: जय जय तुलसी माता

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
साँझ में आँगन के तुलसी चौरे पर हरी साड़ी में स्त्री दीया जलाती हुई
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता॥

    हे तुलसी माता, आपकी जय हो, जय हो। आप सारे जगत को सुख देने वाली और सबको वरदान देने वाली माता हैं।

  2. पद 2

    सब योगों के ऊपर, सब रोगों के ऊपर, रुज से रक्षा करके भव त्राता॥

    आप सब योगों से ऊपर हैं और सब रोगों पर भारी हैं। आप रोग (रुज) से रक्षा करके संसार (भव) से पार उतारने वाली हैं।

  3. पद 3

    बटु पुत्री है श्यामा, सुर बल्ली है ग्राम्या, विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे, सो नर तर जाता॥

    आप श्यामा (साँवली तुलसी), सुर बल्ली (देवताओं की लता) और ग्राम्या (गाँव-घर में उगने वाली) कहलाती हैं; ‘बटु पुत्री’ शब्द अलग-अलग पाठों में अलग मिलते हैं और उनका अर्थ स्पष्ट नहीं है। हे विष्णुप्रिया, जो मनुष्य आपकी सेवा करता है, वह (संसार-सागर से) तर जाता है।

  4. पद 4

    हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित, पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता॥

    आप हरि के सिर पर विराजती हैं (पूजा में तुलसी-दल भगवान को चढ़ाया जाता है) और तीनों लोक आपकी वंदना करते हैं। पतितों को तारने वाली के रूप में आप प्रसिद्ध हैं।

  5. पद 5

    लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में, मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता॥

    विजन (सुनसान वन) में जन्म लेकर आप दिव्य भवन में आईं। मनुष्य-लोक आप ही से सुख और संपत्ति पाता है।

  6. पद 6

    हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी, प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता॥

    हे साँवले रंग वाली कोमल (सुकुमारी) देवी, आप हरि को अत्यंत प्यारी हैं। उनका प्रेम अनोखा है; आपसे उनका कैसा गहरा नाता है!

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/tulsi-aarti/

संक्षेप में

“जय जय तुलसी माता” तुलसी देवी की प्रचलित आरती है। इसमें तुलसी को सबको सुख और वर देने वाली, हरि के सिर पर विराजने वाली और विष्णु को अत्यंत प्रिय देवी के रूप में याद किया गया है। यह कार्तिक मास में, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर, और घरों में तुलसी के पौधे की रोज़ की पूजा में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।

इस आरती के पाठ में स्रोतों के बीच काफ़ी अंतर मिलता है; यहाँ अधिकतर स्रोतों में मिलने वाला पाठ दिया गया है। अंतर के कुछ उदाहरण: टेक का छोटा रूप ‘जय जय तुलसी माता, सबकी सुखदाता वर माता’; पद 2 में ‘सब योगों से ऊपर’, ‘सब भोगों के ऊपर’ और ‘रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता’; पद 3 में ‘बहु पुत्री’, ‘सूर बल्ली/वल्ली’ और ‘विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे’; पद 6 में ‘प्रेम अजब है श्री हरि का तुम से नाता’। कुछ संस्करणों में अंत में ‘हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता’ पंक्ति भी जुड़ी मिलती है। गाते समय पहली पंक्तियाँ (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तुलसी माता की आरती कब गाई जाती है?

पूरे कार्तिक मास में संध्या को तुलसी के पास दीपक जलाकर, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर, और घरों में तुलसी की रोज़ की पूजा में।

आरती तुलसी को ‘हरि के शीश विराजत’ क्यों कहती है?

विष्णु और कृष्ण की पूजा में तुलसी-दल चढ़ाना आवश्यक माना जाता है, और भोग में भी तुलसी-दल रखा जाता है। इसी से आरती कहती है कि तुलसी हरि के सिर पर विराजती हैं।

तुलसी विवाह क्या है?

कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा के बीच, अधिकतर देवउठनी एकादशी या द्वादशी को, तुलसी का विवाह शालग्राम रूपी विष्णु से कराया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड) की कथा में तुलसी शालग्राम रूपी विष्णु की प्रिया हैं।

क्या इस आरती के शब्द हर जगह एक जैसे हैं?

नहीं। कई पंक्तियाँ अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलती हैं, खासकर तीसरा पद। मुख्य अंतर ऊपर टिप्पणी में दिए गए हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. तुलसी और शालग्राम की कथा: ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, hindi.webdunia.com, srimandir.com