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तुलसी माता की आरती: जय जय तुलसी माता PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/tulsi-aarti/
“जय जय तुलसी माता” तुलसी देवी की प्रचलित आरती है। इसमें तुलसी को सबको सुख और वर देने वाली, हरि के सिर पर विराजने वाली और विष्णु को अत्यंत प्रिय देवी के रूप में याद किया गया है। यह कार्तिक मास में, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर, और घरों में तुलसी के पौधे की रोज़ की पूजा में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।
इस आरती के पाठ में स्रोतों के बीच काफ़ी अंतर मिलता है; यहाँ अधिकतर स्रोतों में मिलने वाला पाठ दिया गया है। अंतर के कुछ उदाहरण: टेक का छोटा रूप ‘जय जय तुलसी माता, सबकी सुखदाता वर माता’; पद 2 में ‘सब योगों से ऊपर’, ‘सब भोगों के ऊपर’ और ‘रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता’; पद 3 में ‘बहु पुत्री’, ‘सूर बल्ली/वल्ली’ और ‘विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे’; पद 6 में ‘प्रेम अजब है श्री हरि का तुम से नाता’। कुछ संस्करणों में अंत में ‘हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता’ पंक्ति भी जुड़ी मिलती है। गाते समय पहली पंक्तियाँ (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तुलसी माता की आरती कब गाई जाती है?
पूरे कार्तिक मास में संध्या को तुलसी के पास दीपक जलाकर, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह पर, और घरों में तुलसी की रोज़ की पूजा में।
आरती तुलसी को ‘हरि के शीश विराजत’ क्यों कहती है?
विष्णु और कृष्ण की पूजा में तुलसी-दल चढ़ाना आवश्यक माना जाता है, और भोग में भी तुलसी-दल रखा जाता है। इसी से आरती कहती है कि तुलसी हरि के सिर पर विराजती हैं।
तुलसी विवाह क्या है?
कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा के बीच, अधिकतर देवउठनी एकादशी या द्वादशी को, तुलसी का विवाह शालग्राम रूपी विष्णु से कराया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड) की कथा में तुलसी शालग्राम रूपी विष्णु की प्रिया हैं।
क्या इस आरती के शब्द हर जगह एक जैसे हैं?
नहीं। कई पंक्तियाँ अलग-अलग स्रोतों में अलग मिलती हैं, खासकर तीसरा पद। मुख्य अंतर ऊपर टिप्पणी में दिए गए हैं।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
- तुलसी और शालग्राम की कथा: ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड
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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, hindi.webdunia.com, srimandir.com
