चालीसालक्ष्मी

महालक्ष्मी चालीसा

रचना: परंपरागत

परंपरा में: शुक्रवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    जय जय श्री महालक्ष्मी, करूँ मात तव ध्यान। सिद्ध काज मम कीजिए, निज शिशु सेवक जान॥

    हे माँ श्री महालक्ष्मी, आपकी जय हो, जय हो। मैं आपका ध्यान करता हूँ। मुझे अपना बालक और सेवक जानकर मेरे काम सफल कीजिए।

  2. चौपाई 1

    नमो महा लक्ष्मी जय माता। तेरो नाम जगत विख्याता॥

    हे महालक्ष्मी माता, आपको नमस्कार, आपकी जय हो। आपका नाम सारे जगत में प्रसिद्ध है।

  3. चौपाई 2

    आदि शक्ति हो मात भवानी। पूजत सब नर मुनि ज्ञानी॥

    हे माँ भवानी, आप आदिशक्ति (सबसे पहली, मूल शक्ति) हैं। सब मनुष्य, मुनि और ज्ञानी आपकी पूजा करते हैं।

  4. चौपाई 3

    जगत पालिनी सब सुख करनी। निज जनहित भण्डारन भरनी॥

    आप जगत का पालन करने वाली और सब सुख देने वाली हैं। अपने भक्तों के हित के लिए आप उनके भंडार भर देती हैं।

  5. चौपाई 4

    श्वेत कमल दल पर तव आसन। मात सुशोभित है पद्मासन॥

    सफ़ेद कमल की पंखुड़ियों पर आपका आसन है; हे माँ, आप कमल के आसन पर शोभित हैं।

  6. चौपाई 5

    श्वेताम्बर अरु श्वेता भूषन। श्वेतहि श्वेत सुसज्जित पुष्पन॥

    आपके वस्त्र सफ़ेद हैं, आभूषण सफ़ेद हैं, और आप सफ़ेद ही सफ़ेद फूलों से सजी हैं।

  7. चौपाई 6

    शीश छत्र अति रूप विशाला। गल सोहे मुक्तन की माला॥

    आपके सिर पर छत्र है और आपका रूप अत्यंत भव्य है। आपके गले में मोतियों की माला शोभित है।

  8. चौपाई 7

    सुन्दर सोहे कुंचित केशा। विमल नयन अरू अनुपम भेषा॥

    आपके घुँघराले बाल सुंदर लगते हैं; आपकी आँखें निर्मल हैं और आपका वेश अनुपम है।

  9. चौपाई 8

    कमलनाल सम भुज तव चारी। सुर नर मुनिजन हित सुखकारी॥

    आपकी चारों भुजाएँ कमल की नाल जैसी (कोमल और सुडौल) हैं, जो देवताओं, मनुष्यों और मुनियों का हित करती हैं और उन्हें सुख देती हैं।

  10. चौपाई 9

    अद्भुत छटा मात तव बानी। सकल विश्व कीन्हो सुखखानी॥

    हे माँ, आपकी छटा (शोभा) अद्भुत है; आपने सारे विश्व को सुख की खान बना दिया है।

  11. चौपाई 10

    शांति स्वभाव मृदुल तव भवानी। सकल विश्व की हो सुखखानी॥

    हे भवानी, आपका स्वभाव शांत और कोमल है। आप सारे विश्व के सुख की खान हैं।

  12. चौपाई 11

    महालक्ष्मी धन्य हो माई। पंच तत्व में सृष्टि रचाई॥

    हे माँ महालक्ष्मी, आप धन्य हैं; आपने पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से सृष्टि रची।

  13. चौपाई 12

    जीव चराचर तुम उपजाए। पशु पक्षी नर नारि बनाए॥

    आपने चलने वाले और न चलने वाले सब जीव उत्पन्न किए, और पशु, पक्षी, पुरुष और स्त्रियाँ बनाए।

  14. चौपाई 13

    क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए। अमित रंग फल फूल सुहाए॥

    धरती पर आपने अनगिनत पेड़ उगाए और उन्हें अनगिनत रंगों के सुंदर फल-फूलों से सजाया।

  15. चौपाई 14

    छवि बिलोक सुर मुनि नर नारी। करे सदा तव जय-जय कारी॥

    आपकी छवि देखकर देवता, मुनि, पुरुष और स्त्रियाँ सदा आपकी जय-जयकार करते हैं।

  16. चौपाई 15

    सुरपति औ नरपत सब ध्यावैं। तेरे सम्मुख शीश नवावैं॥

    देवताओं के राजा (इंद्र) और मनुष्यों के राजा, सब आपका ध्यान करते हैं और आपके सामने सिर झुकाते हैं।

  17. चौपाई 16

    चारहु वेदन तव यश गाया। महिमा अगम पार नहिं पाया॥

    चारों वेदों ने आपका यश गाया है; आपकी महिमा अथाह है, उसका पार किसी ने नहीं पाया।

  18. चौपाई 17

    जापर करहु मातु तुम दाया। सोई जग में धन्य कहाया॥

    हे माँ, जिस पर आप दया करती हैं, वही संसार में धन्य कहलाता है।

  19. चौपाई 18

    पल में राजाहि रंक बनाओ। रंक राव कर बिलम न लाओ॥

    आप पल भर में राजा को रंक (कंगाल) बना देती हैं, और रंक को राजा बनाने में देर नहीं लगातीं।

  20. चौपाई 19

    जिन घर करहु मात तुम बासा। उनका यश हो विश्व प्रकाशा॥

    हे माँ, जिनके घर में आप वास करती हैं, उनका यश सारे विश्व में फैलता है।

  21. चौपाई 20

    जो ध्यावै सो बहु सुख पावै। विमुख रहै हो दुख उठावै॥

    चालीसा कहती है: जो आपका ध्यान करता है, वह बहुत सुख पाता है; जो आपसे मुँह मोड़े रहता है, वह दुख उठाता है।

  22. चौपाई 21

    महालक्ष्मी जन सुख दाई। ध्याऊं तुमको शीश नवाई॥

    भक्तों को सुख देने वाली हे महालक्ष्मी, मैं सिर झुकाकर आपका ध्यान करता हूँ।

  23. चौपाई 22

    निज जन जानि मोहिं अपनाओ। सुख सम्पति दे दुख नसाओ॥

    मुझे अपना भक्त जानकर अपना लीजिए; सुख और संपत्ति देकर मेरे दुख मिटाइए।

  24. चौपाई 23

    ॐ श्री-श्री जय सुख की खानी। रिद्धि सिद्ध देउ मात जन जानी॥

    ‘ॐ श्री, श्री’: हे सुख की खान, आपकी जय हो। हे माँ, मुझे अपना भक्त जानकर ऋद्धि-सिद्धि (समृद्धि और सफलता) दीजिए।

  25. चौपाई 24

    ॐ ह्रीं-ॐ ह्रीं सब ब्याधि हटाओ। जन उन बिमल दृष्टि दर्शाओ॥

    ‘ॐ ह्रीं, ॐ ह्रीं’: सब रोग दूर कीजिए, और अपने भक्तों पर अपनी निर्मल कृपा-दृष्टि डालिए।

  26. चौपाई 25

    ॐ क्लीं-ॐ क्लीं शत्रुन क्षय कीजै। जनहित मात अभय वर दीजै॥

    ‘ॐ क्लीं, ॐ क्लीं’: शत्रुओं का नाश कीजिए। हे माँ, भक्तों के हित के लिए निर्भयता का वर दीजिए।

  27. चौपाई 26

    ॐ जय जयति जय जननी। सकल काज भक्तन के सरनी॥

    ‘ॐ’: हे जननी, आपकी जय हो, जय हो। आप भक्तों के सब काम पूरे करने वाली हैं।

  28. चौपाई 27

    ॐ नमो-नमो भवनिधि तारनी। तरणि भंवर से पार उतारनी॥

    ‘ॐ’: संसार रूपी सागर से पार लगाने वाली माँ, आपको बार-बार नमस्कार। आप नाव बनकर भँवर से पार उतारती हैं।

  29. चौपाई 28

    सुनहु मात यह विनय हमारी। पुरवहु आश न करहु अबारी॥

    हे माँ, हमारी यह विनती सुनिए: हमारी आशा पूरी कीजिए, देर न कीजिए।

  30. चौपाई 29

    ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै। सो प्राणी सुख सम्पत्ति पावै॥

    चालीसा कहती है कि कर्ज़ में डूबा या दुखी जो भी व्यक्ति आपका ध्यान करता है, वह सुख और संपत्ति पाता है।

  31. चौपाई 30

    रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई। ताकी निर्मल काया होई॥

    चालीसा कहती है कि रोग से घिरा जो कोई आपका ध्यान करता है, उसका शरीर निर्मल (निरोग) हो जाता है।

  32. चौपाई 31

    विष्णु प्रिया जय-जय महारानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥

    विष्णु की प्रिया हे महारानी, आपकी जय हो, जय हो। आपकी महिमा अपार है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

  33. चौपाई 32

    पुत्रहीन जो ध्यान लगावै। पाये सुत अतिहि हुलसावै॥

    चालीसा कहती है कि जिसके पुत्र नहीं है, वह आपका ध्यान करे तो पुत्र पाकर बहुत आनंदित होता है।

  34. चौपाई 33

    त्राहि त्राहि शरणागत तेरी। करहु मात अब नेक न देरी॥

    रक्षा करो, रक्षा करो! मैं आपकी शरण में आया हूँ; हे माँ, अब ज़रा भी देर न कीजिए।

  35. चौपाई 34

    आवहु मात विलम्ब न कीजै। हृदय निवास भक्त बर दीजै॥

    हे माँ, आइए, देर न कीजिए। मेरे हृदय में निवास कीजिए और इस भक्त को वर दीजिए।

  36. चौपाई 35

    जानूँ जप तप का नहिं भेवा। पार करौ भवनिध बन खेवा॥

    मैं जप और तप का भेद (रहस्य) नहीं जानता। आप ही माँझी बनकर मुझे संसार-सागर से पार कीजिए।

  37. चौपाई 36

    बिनवों बार-बार कर जोरी। पूरण आशा करहु अब मेरी॥

    मैं हाथ जोड़कर बार-बार विनती करता हूँ: अब मेरी आशा पूरी कीजिए।

  38. चौपाई 37

    जानि दास मम संकट टारौ। सकल व्याधि से मोहिं उबारौ॥

    मुझे अपना दास जानकर मेरे संकट टालिए और सब रोगों से मुझे उबारिए।

  39. चौपाई 38

    जो तव सुरति रहै लव लाई। सो जग पावै सुयश बड़ाई॥

    चालीसा कहती है कि जो लगन से आपका स्मरण करता रहता है, वह संसार में सुयश और बड़ाई पाता है।

  40. चौपाई 39

    छायो यश तेरा संसारा। पावत शेष शम्भु नहिं पारा॥

    आपका यश सारे संसार में छाया है; शेषनाग और शंभु (शिव) भी उसका पार नहीं पाते।

  41. चौपाई 40

    गोविंद निशदिन शरण तिहारी। करहु पूरण अभिलाष हमारी॥

    गोविंद दिन-रात आपकी शरण में है; हमारी अभिलाषा पूरी कीजिए। (‘गोविंद’ कवि की छाप हो सकती है।)

  42. समापन दोहा

    महालक्ष्मी चालीसा, पढ़ै सुनै चित लाय। ताहि पदारथ मिलै अब, कहै वेद अस गाय॥

    चालीसा कहती है: जो मन लगाकर महालक्ष्मी चालीसा पढ़ता या सुनता है, उसे मनचाहे पदार्थ मिलते हैं; ऐसा वेद गाते हैं।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/mahalakshmi-chalisa/

संक्षेप में

महालक्ष्मी चालीसा देवी महालक्ष्मी की स्तुति है, जो ‘जय जय श्री महालक्ष्मी, करूँ मात तव ध्यान’ दोहे से शुरू होती है। इसमें एक दोहा, चालीस चौपाइयाँ और समापन दोहा है। इसमें देवी के श्वेत कमल के आसन, सृष्टि की रचना और भक्तों पर कृपा का वर्णन है, और बीच में ‘श्री’, ‘ह्रीं’ और ‘क्लीं’ बीजाक्षर आते हैं। परंपरा में शुक्रवार और दीपावली पर इसका पाठ होता है।

पाठ का आधार रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार का ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004, पृष्ठ 187–190) है, जिसके पृष्ठ स्कैन से पढ़े गए। इसे द्रिक पंचांग, भक्ति भारत, श्री मंदिर और मुक्ति मंत्र के पाठ से मिलाया गया; इन चारों का पाठ आपस में लगभग एक जैसा है और कई जगह छपी पुस्तक से अलग है, इसलिए यह एक अलग परंपरा का पाठ है। मुख्य पाठभेद: चौपाई 18 में वेबसाइटों पर ‘बिमल न लाओ’ है, पर छपी पुस्तक का ‘बिलम न लाओ’ (देर न लगाओ) ही अर्थ देता है; चौपाई 16 में ‘तब यश’ और ‘पार नहिं पाये’; चौपाई 20 में ‘जो ध्यावै से’; चौपाई 35 में ‘पार करो भवनिध वन खेवा’; चौपाई 36 में ‘करहु अब मोरी’; चौपाई 12 में ‘नर नारी’; दोहे में ‘किजिये’। चौपाई 6 में छपी पुस्तक में ‘सौहे’ छपा है, जो छपाई की भूल है (अगली ही चौपाई में ‘सोहे’ है); यहाँ वेबसाइटों का ‘सोहे’ लिया गया है। छपी पुस्तक में कई शब्द जुड़े छपे हैं (जैसे ‘माततुम’, ‘जानिमोहिं’, ‘ब्याधिहटाओ’, ‘आशन’); यहाँ उन्हें अलग-अलग लिखा गया है, और चौपाई 28 का ‘आशन’ ‘आश न’ (आशा, न) पढ़ा गया है। रोग, संतान और धन के बारे में चालीसा जो कहती है, वह भक्ति-रचना का कथन है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महालक्ष्मी चालीसा और लक्ष्मी चालीसा में क्या अंतर है?

ये दो अलग पाठ हैं। लक्ष्मी चालीसा ‘मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास’ दोहे से शुरू होती है, और महालक्ष्मी चालीसा ‘जय जय श्री महालक्ष्मी, करूँ मात तव ध्यान’ से। रणधीर प्रकाशन के ‘51 चालीसा संग्रह’ में दोनों एक के बाद एक छपी हैं (पृष्ठ 183 और 187)।

चौपाई 23 से 27 में ‘ॐ श्री’, ‘ॐ ह्रीं’, ‘ॐ क्लीं’ क्या हैं?

ये बीजाक्षर हैं, यानी मंत्रों में आने वाले एक अक्षर के पवित्र शब्द। चालीसा इन्हें अलग-अलग प्रार्थनाओं से जोड़ती है: ‘श्री’ के साथ सुख और ऋद्धि-सिद्धि, ‘ह्रीं’ के साथ रोग दूर होने, और ‘क्लीं’ के साथ शत्रुओं के नाश और अभय की प्रार्थना। यह चालीसा के पाठ का हिस्सा है; किसी मंत्र के जप की विधि के लिए अपने गुरु या आचार्य से पूछें।

महालक्ष्मी चालीसा किसने लिखी?

रचयिता का नाम प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है। चौपाई 40 में ‘गोविंद’ नाम आता है (‘गोविंद निशदिन शरण तिहारी’), जो कवि की छाप हो सकती है। रणधीर प्रकाशन की पुस्तक में रचयिता का नाम नहीं दिया गया है।

महालक्ष्मी चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में शुक्रवार, दीपावली की लक्ष्मी पूजा और महालक्ष्मी व्रत के दिनों में इसका पाठ होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से शुरू होकर सोलह दिन चलता है।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 187–190
  3. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह एवं आरतियाँ’, प्रथम संस्करण (2000)
  4. द्रिक पंचांग: श्री महालक्ष्मी चालीसा (महालक्ष्मी व्रत की जानकारी सहित)
  5. भक्ति भारत, श्री मंदिर, मुक्ति मंत्र: श्री महालक्ष्मी चालीसा

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