चालीसागंगा

गंगा चालीसा

रचना: सुन्दरदास (पाठ में आई छाप)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा

    जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥

    संसार को पवित्र करने वाली, देवताओं की नदी गंगा, आपकी जय हो, जय हो। शिव की जटाओं में रहने वाली, अनुपम ऊँची लहरों वाली गंगा, आपकी जय हो।

  2. चौपाई 1

    जय जग जननि हरण अघ खानी। आनन्द करनि गंग महारानी॥

    जगत की माता, पापों की खान को हरने वाली, आनंद देने वाली गंगा महारानी, आपकी जय हो।

  3. चौपाई 2

    जय भागीरथि सुरसरि माता। कलिमल मूल दलनि विख्याता॥

    भगीरथ द्वारा लाई गई (भागीरथी), देवताओं की नदी (सुरसरि) माता, आपकी जय हो। आप कलियुग के पापों की जड़ को नष्ट करने के लिए प्रसिद्ध हैं।

  4. चौपाई 3

    जय जय जह्नु सुता अघ हननी। भीषम की माता जग जननी॥

    पापों का नाश करने वाली, जह्नु ऋषि की पुत्री (जाह्नवी), आपकी जय हो। आप भीष्म की माता और जगत की जननी हैं।

  5. चौपाई 4

    धवल कमल दल मम तनु साजे। लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे॥

    आपका शरीर सफ़ेद कमल की पंखुड़ियों जैसा सजा है। उसे देखकर शरद ऋतु के सौ चंद्रमाओं की शोभा भी लजा जाती है।

  6. चौपाई 5

    वाहन मकर विमल शुचि सोहै। अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥

    आपका वाहन निर्मल और पवित्र मगर (मकर) शोभित है। आपके हाथ में अमृत का कलश देखकर मन मोहित हो जाता है।

  7. चौपाई 6

    जड़ित रत्न कंचन आभूषण। हिय मणि हार, हरणितम दूषण॥

    आपके सोने के गहनों में रत्न जड़े हैं और हृदय पर मणियों का हार है। आप अंधकार (तम) और दोषों को हरने वाली हैं।

  8. चौपाई 7

    जग पावनि त्रय ताप नसावनि। तरल तरंग तुंग मन भावनि॥

    आप संसार को पवित्र करती हैं और तीनों प्रकार के ताप (दुख) मिटाती हैं। आपकी चंचल, ऊँची लहरें मन को भाती हैं।

  9. चौपाई 8

    जो गणपति अति पूज्य प्रधाना। तिहुँ ते प्रथम गंग अस्नाना॥

    गणपति, जो सबसे पहले पूजे जाते हैं, चालीसा कहती है कि उनसे भी पहले गंगा-स्नान का स्थान है।

  10. चौपाई 9

    ब्रह्म कमण्डल वासिनि देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी॥

    हे देवी, आप ब्रह्मा के कमंडल में निवास करती हैं और प्रभु (विष्णु) के चरण-कमलों की आनंद से सेवा करती हैं।

  11. चौपाई 10

    साठि सहस्र सगर सुत तारयो। गंगा सागर तीरथ धारयो॥

    आपने राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार किया, और (समुद्र से आपके मिलन पर) गंगासागर तीर्थ बना।

  12. चौपाई 11

    अगम तरंग उठ्यो मन भावन। लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥

    आपकी गहरी, मनभावन लहरें उठती हैं। सुंदर हरिद्वार तीर्थ में उन्हें देखकर मन प्रसन्न होता है।

  13. चौपाई 12

    तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट। धरयौ मातु पुनि काशी करवट॥

    तीर्थराज प्रयाग में अक्षयवट के पास, और फिर काशी में, हे माता, आपने करवट ली (अपनी धारा की दिशा बदली)।

  14. चौपाई 13

    धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी। तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी॥

    हे सुरसरि, आप धन्य हैं, धन्य हैं! आप स्वर्ग की सीढ़ी हैं और पितरों की अनगिनत पीढ़ियों को तारने वाली हैं।

  15. चौपाई 14

    भागीरथ तप कियो अपारा। दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा॥

    राजा भगीरथ ने अपार तपस्या की, तब ब्रह्मा ने (धरती के लिए) गंगा की धारा दी।

  16. चौपाई 15

    जब जग जननी चल्यो हहराई। शंभु जटा महँ रह्यो समाई॥

    जब जगत की माता गंगा गर्जना करती हुई (वेग से) चलीं, तो वे शिव की जटाओं में समा गईं।

  17. चौपाई 16

    वर्ष पर्यन्त गंग महारानी। रहीं शंभु के जटा भुलानी॥

    गंगा महारानी वर्ष भर शिव की जटाओं में ही भटकती रहीं (बाहर का रास्ता न पा सकीं)।

  18. चौपाई 17

    मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो। तब इक बूँद जटा से पायो॥

    तब मुनि भगीरथ ने शिव का ध्यान किया, और उन्हें जटा से एक बूँद (धारा) मिली।

  19. चौपाई 18

    ताते मातु भई त्रय धारा। मृत्यु लोक, नभ अरु पातारा॥

    उसी से माता गंगा तीन धाराओं में बँटीं: मृत्युलोक (धरती), आकाश और पाताल।

  20. चौपाई 19

    गई पाताल प्रभावति नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥

    पाताल में गई धारा ‘प्रभावती’ कहलाई, और आकाश में गई सुंदर धारा ‘मंदाकिनी’।

  21. चौपाई 20

    मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि। कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥

    धरती पर वे सुंदर ‘जाह्नवी’ कहलाईं, जो कलियुग के पाप हरती हैं और अथाह रूप से जगत को पवित्र करती हैं।

  22. चौपाई 21

    धनि मइया तव महिमा भारी। धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी॥

    हे मैया, आप धन्य हैं, आपकी महिमा भारी है। आप धर्म की धुरी हैं और कलियुग के पापों के लिए कुल्हाड़ी हैं।

  23. चौपाई 22

    मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी। धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥

    हे माता प्रभावती, हे मंदाकिनी, आप धन्य हैं। सब भयों का नाश करने वाली हे सुरसरिता, आप धन्य हैं।

  24. चौपाई 23

    पान करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनन्त फल॥

    चालीसा कहती है कि निर्मल गंगाजल पीने वाला मनचाहा अनंत फल पाता है।

  25. चौपाई 24

    पूरब जन्म पुण्य जब जागत। तबहिं ध्यान गंगा महँ लागत॥

    जब पिछले जन्मों के पुण्य जागते हैं, तभी मन गंगा के ध्यान में लगता है।

  26. चौपाई 25

    जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं। तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं॥

    चालीसा के अनुसार गंगा के लिए जितने कदम उठाए जाते हैं, उतने ही अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है।

  27. चौपाई 26

    महा पतित जिन काहु न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥

    जिन बड़े पापियों को कोई नहीं तार सका, उन्हें आपके एक नाम ने तार दिया।

  28. चौपाई 27

    शत योजनहू से जो ध्यावहिं। निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥

    चालीसा कहती है कि जो सौ योजन दूर से भी आपका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही विष्णुलोक में स्थान पाते हैं।

  29. चौपाई 28

    नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥

    आपका नाम भजने से अनगिनत पाप नष्ट होते हैं और निर्मल ज्ञान, बल और बुद्धि प्रकाशित होते हैं।

  30. चौपाई 29

    जिमि धन मूल धर्म अरु दाना। धर्म मूल गंगाजल पाना॥

    जैसे धन का मूल धर्म और दान है, वैसे ही धर्म का मूल गंगाजल का पान है।

  31. चौपाई 30

    तव गुण गुणन करत दुख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥

    आपके गुणों का बार-बार स्मरण करने से दुख भाग जाते हैं, और घर-घर में संपत्ति और सद्बुद्धि बसती है।

  32. चौपाई 31

    गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत॥

    जो नियम से प्रतिदिन गंगा का ध्यान करता है, वह दुर्जन भी सज्जन का पद पा लेता है।

  33. चौपाई 32

    बुद्धिहीन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥

    चालीसा कहती है कि बुद्धिहीन विद्या और बल पाता है और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है। (यह भक्ति-काव्य की भाषा है; रोग में डॉक्टर की सलाह लें।)

  34. चौपाई 33

    गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखे नंगे कबहुँ न रहहीं॥

    चालीसा के अनुसार जो ‘गंगा गंगा’ कहते हैं, वे कभी भूखे या नंगे (अभाव में) नहीं रहते।

  35. चौपाई 34

    निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥

    चालीसा कहती है कि मुख से ‘गंगा माई’ निकलते ही यम (के दूत) कान दबाकर भाग जाते हैं।

  36. चौपाई 35

    महाँ अघिन अधमन कहँ तारे। भए नर्क के बन्द किवारे॥

    आपने बड़े-बड़े पापियों और अधम लोगों को तार दिया, जिससे नरक के दरवाज़े बंद हो गए।

  37. चौपाई 36

    जो नर जपै गंग शत नामा। सकल सिद्ध पूरण ह्वै कामा॥

    चालीसा कहती है कि जो गंगा के सौ नाम जपता है, उसके सब काम सिद्ध और पूरे होते हैं।

  38. चौपाई 37

    सब सुख भोग परम पद पावहिं। आवागमन रहित ह्वै जावहिं॥

    वे सब सुख भोगकर परमपद पाते हैं और जन्म-मरण के चक्र (आवागमन) से मुक्त हो जाते हैं।

  39. चौपाई 38

    धनि मइया सुरसरि सुखदैनी। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥

    सुख देने वाली गंगा मैया, आप धन्य हैं। तीर्थों के राजा त्रिवेणी (प्रयाग का संगम) धन्य हैं, धन्य हैं।

  40. चौपाई 39

    ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥

    ककरा गाँव, जहाँ ऋषि दुर्वासा (का आश्रम) है, वहाँ का सुंदरदास गंगा का दास है। यह कवि की छाप है।

  41. चौपाई 40

    जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥

    चालीसा कहती है कि जो यह गंगा चालीसा पढ़ता है, उसे अविरल (अटूट) भक्ति मिलती है और वह वाणी का धनी होता है।

  42. समापन दोहा 1

    नित नव सुख सम्पति लहैं, धरैं गंग का ध्यान। अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान॥

    चालीसा कहती है कि जो गंगा का ध्यान धरते हैं, वे नित नए सुख और संपत्ति पाते हैं, और अंत समय में आदर के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग में बसते हैं।

  43. समापन दोहा 2

    सम्वत् भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र। पूरण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र॥

    ‘भुज, नभ, दिशि’ शब्दों से सूचित संवत में, चैत्र मास के राम-जन्म के दिन (रामनवमी) को, हरि के भक्तों के हित के लिए यह चालीसा पूरी की गई। (पुराने कवि वर्ष को इसी तरह शब्द-संकेतों में लिखते थे।)

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ganga-chalisa/

संक्षेप में

गंगा चालीसा माँ गंगा की स्तुति है, जो ‘जय जय जय जग पावनी’ दोहे से शुरू होती है। इसमें भगीरथ की तपस्या, शिव की जटाओं में गंगा के रुकने और धरती पर उनके आने की कथा है, और हरिद्वार, प्रयाग और काशी का स्मरण है। परंपरा में गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा और गंगा-स्नान के दिनों में इसका पाठ होता है।

यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के ‘51 चालीसा संग्रह’ (छपी पुस्तक) का पाठ लिया गया है; वेबदुनिया के 2021 के पेज पर लगभग यही पाठ है। द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और वेबदुनिया के दूसरे पेजों पर इसी चालीसा का एक बिगड़ा हुआ पाठ है (जैसे ‘हराना’, ‘डालिनी’, ‘जहानु’, ‘वहां मकर’), जो शायद रोमन लिपि से उलटकर लिखा गया है; उसका उपयोग केवल शब्दों के मिलान के लिए किया गया। मुख्य पाठभेद: चौपाई 3 में छपी पुस्तक और वेबदुनिया ‘जय जय जय हनु सुता’ छापते हैं, जबकि बाकी स्रोतों में ‘जह्नु सुता’ (जह्नु की पुत्री, जाह्नवी) है, जिसे यहाँ लिया गया है; चौपाई 7 में पुस्तक ‘तरल तरंग तंग’ छापती है, पर पहला दोहा ‘तुंग तरंग’ कहता है, इसलिए ‘तुंग’ लिया गया; चौपाई 15 में वेबदुनिया ‘लहराई’; चौपाई 17 में ‘मुनि भागीरथ’ की जगह कुछ स्रोतों में ‘पुनि भागीरथी’; चौपाई 35 में पुस्तक ‘अधिन’ छापती है, द्रिक पंचांग ‘अघिन’ (पापी), जिसे यहाँ लिया गया। चौपाई 4 में सभी स्रोत ‘मम तनु’ पढ़ते हैं; अर्थ में इसे देवी के रूप का वर्णन माना गया है। अंतिम दोहे में कवि ने रचना का संवत शब्द-संकेतों में दिया है; उसका अर्थ निश्चित न होने से यहाँ कोई वर्ष नहीं लिखा गया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गंगा चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 39 में ‘सुन्दरदास गंगा कर दासा’ आता है, साथ में ककरा गाँव और ऋषि दुर्वासा का नाम। यही छाप नवग्रह चालीसा और शीतला चालीसा में भी है, जहाँ कवि अपना निवास प्रयाग के पूर्व में बताते हैं। इसके अलावा कवि के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

गंगा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति और गंगा-स्नान के दूसरे अवसरों पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

चालीसा में गंगा के धरती पर आने की कौन-सी कथा है?

राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए भगीरथ की तपस्या, शिव की जटाओं में गंगा का रुकना और फिर धरती पर आना। यह कथा वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड) और भागवत पुराण (नवम स्कंध) में मिलती है। चालीसा के अनुसार गंगा की तीन धाराएँ हैं: आकाश में मंदाकिनी, धरती पर जाह्नवी और पाताल में प्रभावती।

गंगा को जाह्नवी और भीष्म की माता क्यों कहा गया है?

वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड) की कथा के अनुसार धरती पर आते समय गंगा ने ऋषि जह्नु की यज्ञभूमि बहा दी; ऋषि ने उन्हें पी लिया और फिर छोड़ा, इसलिए वे जह्नु की पुत्री, ‘जाह्नवी’ कहलाईं। महाभारत के आदिपर्व के अनुसार गंगा राजा शांतनु की पत्नी और भीष्म की माता थीं।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 256–259
  3. वेबदुनिया: श्री गंगा चालीसा (2021)
  4. द्रिक पंचांग और भक्ति भारत: गंगा चालीसा (केवल शब्दों के मिलान के लिए)
  5. सगर, भगीरथ और जह्नु की कथा: वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड; भागवत पुराण, नवम स्कंध
  6. भीष्म की माता गंगा: महाभारत, आदिपर्व

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