आरतीविष्णु

श्री सत्यनारायण जी की आरती: जय लक्ष्मी रमणा

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केले के खंभों वाले मंडप में सत्यनारायण पूजा: कलश, पंचामृत, पंजीरी और बैठे परिवारजन
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा। सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक हरणा॥

    हे लक्ष्मी-रमण (लक्ष्मी के पति विष्णु), हे स्वामी, आपकी जय हो। हे सत्यनारायण स्वामी, आप लोगों के पाप (पातक) हरने वाले हैं।

  2. पद 2

    रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे। नारद करत निराजन, घंटा ध्वनि बाजे॥

    आप रत्नों से जड़े सिंहासन पर विराजते हैं और आपकी छवि अद्भुत है। नारद जी आपकी आरती (नीराजन) करते हैं और घंटे की ध्वनि गूँजती है।

  3. पद 3

    प्रगट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो। बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥

    कलियुग के लोगों के लिए आप प्रकट हुए और एक (निर्धन) ब्राह्मण को दर्शन दिए। बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर आपने उसके घर को सोने का महल बना दिया। यह सत्यनारायण कथा के निर्धन ब्राह्मण का प्रसंग है।

  4. पद 4

    दुर्बल भील कठारो, इन पर कृपा करी। चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपत्ति हरी॥

    आपने दुर्बल (गरीब) भील लकड़हारे (कठारो) पर कृपा की, और चन्द्रचूड़ नाम के एक राजा की विपत्ति दूर की।

  5. पद 5

    वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी। सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी॥

    एक वैश्य (व्यापारी) की मनोकामना पूरी हुई, पर उसने श्रद्धा छोड़ दी और व्रत का वचन भुला दिया। उसका फल उसने भोगा, और फिर प्रभु की स्तुति की। यह कथा के साधु वैश्य का प्रसंग है।

  6. पद 6

    भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो। श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सर्यो॥

    भक्तों के भाव और भक्ति के कारण आपने क्षण-क्षण में रूप धारण किए। जिन्होंने श्रद्धा रखी, उनके काम पूरे हुए।

  7. पद 7

    ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी। मनवांछित फल दीनो, दीनदयाल हरी॥

    ग्वाल-बालों के साथ राजा ने वन में भक्ति की, तो दीनदयाल हरि ने उसे मनचाहा फल दिया। यह कथा के राजा तुंगध्वज का प्रसंग है, जिसने पहले ग्वालों का दिया प्रसाद ठुकराया था।

  8. पद 8

    चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा। धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥

    आपको सवाया (सवा गुना मात्रा में बना) प्रसाद, केले और मेवे चढ़ते हैं। धूप, दीप और तुलसी से सत्यदेव प्रसन्न होते हैं।

  9. पद 9

    श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥

    शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो कोई श्री सत्यनारायण जी की यह आरती गाता है, वह मनचाहा फल पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/satyanarayan-aarti/

संक्षेप में

“जय लक्ष्मी रमणा” भगवान सत्यनारायण (विष्णु) की आरती है, जो सत्यनारायण व्रत-कथा के बाद गाई जाती है। इसमें कथा के पात्रों को याद किया गया है: निर्धन ब्राह्मण, लकड़हारा, वैश्य और ग्वालों के साथ पूजा करने वाला राजा। पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, गृह-प्रवेश और दूसरे शुभ अवसरों पर होने वाली सत्यनारायण पूजा इसी आरती से पूरी होती है।

इस आरती के शब्दों में संस्करणों के बीच थोड़ा अंतर मिलता है: पहली पंक्ति में ‘स्वामी जय लक्ष्मी रमणा’ की जगह ‘श्री जय लक्ष्मी रमणा’, कई जगह आरंभ में ‘ॐ’, पद 4 में ‘जिन पर कृपा करी’ और ‘तिनकी विपत्ति हरी’, और पद 8 में ‘सवायो’ की जगह ‘सवाया’। कुछ संस्करणों में अंतिम पंक्ति ‘कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे’ की जगह ‘ऋद्धि-सिद्धि सुख-संपत्ति, सहज रूप पावे’ है। ‘शिवानन्द स्वामी’ की छाप “ॐ जय शिव ओंकारा” और “जय अम्बे गौरी” में भी मिलती है, पर रचयिता के बारे में पक्की जानकारी नहीं है। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सत्यनारायण जी की आरती कब गाई जाती है?

सत्यनारायण व्रत-कथा पूरी होने पर, पूजा के अंत में। यह पूजा हर पूर्णिमा पर, विशेष रूप से शरद पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पर, और गृह-प्रवेश, विवाह जैसे शुभ अवसरों पर होती है।

आरती में किन कथाओं का उल्लेख है?

सत्यनारायण व्रत-कथा के प्रसंगों का: निर्धन ब्राह्मण, लकड़हारा, वैश्य (साधु व्यापारी) और ग्वालों के साथ पूजा करने वाला राजा तुंगध्वज। परंपरा इस कथा को स्कंद पुराण के रेवा खंड से जोड़ती है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

प्रचलित पाठ के अंतिम पद में ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ आता है, पर कुछ संस्करणों में यह नाम नहीं आता। रचयिता के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

क्या यह आरती “ॐ जय जगदीश हरे” से अलग है?

हाँ। दोनों विष्णु की आरतियाँ हैं और सत्यनारायण पूजा में अक्सर दोनों गाई जाती हैं, पर “जय लक्ष्मी रमणा” विशेष रूप से सत्यनारायण कथा की आरती है और उसी के प्रसंगों को याद करती है।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. कथा के प्रसंग: सत्यनारायण व्रत-कथा (परंपरा अनुसार स्कंद पुराण, रेवा खंड)

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